Saturday, January 21, 2012

यकीन मानिए यह नही है कविता...

मेरी सवा साल की
नन्ही मुन्नी, शरारती ,लाडली ,नौटंकी ,बातूनी
बैठी थी मेरी गोद में
और कम्प्यूटर पर
काम करते करते याद आया
देखनी थी मुझे एक फिल्म भी
सर्च किया
मिली
--
पहला दृश्य-
प्रसव पीड़ा ,कराह,कष्ट
नौ माह
महसूसती रही करवटें अपने भीतर
बात करते करते किसी से खिलखिला उठना
लातें मारने पर
उसके
उस खुशी का
दुनिया में आगमन....
मै साथ-साथ सोच रही थी..
मुस्कराते हुए
जबकि रिव्यू पढा था
मुस्कराना व्यर्थ तो था ही

वह थी लड़की जो जन्मी थी
बोझ , भार,पाप ,अशुभ
नन्हा जन्मा शिशु
अभी गर्भ के भीतर से आने के
निशान भी शरीर से साफ नही हुए थे
उसका इतना सम्मान तो किया ही गया
दूध
पी न पाई हो भले ही
उस पवित्र पेय मे डुबोई तो गयी ही...
पतीले की तली मे मज़बूत हाथों से
तब तक जकडी गयी
जब तक
हवा के बुलबुले उठने
दूध की सतह पर बन्द नही हुए!


और ...
मुंद गयीं मेरी आँखें
झर-झर आँसू बह रहे हैं
लिखते लिखते
यह सब
जानना भी बेहद दुखद था
लेकिन और भी मुश्किल है
आँखों देखना
मै आगे नही देखूंगी
यह फिल्म क्योंकि
बेहद कमज़ोर है हृदय मेरा...
अपनी नन्ही को मैने अभी कई कई बार
पुचकारा है रोते-रोते !



15 comments:

राजन said...

nahi...hum ise sirf kavita nahi maan rahe.
ek katu sachchaai se aankhein milane jaisa hai.

अनूप शुक्ल said...

बहुत संवेदनशील बात है! बहुत संवेदनशील कविता है!

राजेश उत्‍साही said...

आपकी कविता की संवेदना समझ आती है। लेकिन बीच में दूध में डूबाने वाली बात कुछ समझ नहीं आई।

सुजाता said...

राजेश जी,
नवजात बच्ची को दूध मे डुबाकर मार दिए जाने की प्रथा इस देश मे रही आई है......जिस फिल्म का उल्लेख हुआ है वह 'मातृभूमि' है।

आर. अनुराधा said...

दूध या पानी में डुबो देना, नमक खिला देना, चारपाई के पाये से गला दबा देना, मिट्टी में या तकिये में सिर दबा देना... ऐसे सैकड़ों तरीके आज भी आजमाए जा रहे हैं। बहुत आसान भी तो है ऐसे निरीह, न बोल सकने, न समझने, न प्रतिरोध कर सकने वाले प्राणी का जीवन खत्म कर देना! शर्मनाक!- यह शब्द तो बहुत छोटा है उस कृत्य के लिए।

रचना said...

kavita hi haen
sach hotaa to vidroh hota

Prafull said...

Well Sorry to disagree, but is feminism only to bring & talk about the pathetic & negative part... as if the whole human kind is operessive & only the women are suferrers. How about giving a bit of positivity to the whole issue by touching the lives or deeds of those who despite all the odds & obstacles realised their dreams ... proved themselves.

Pratibha Katiyar said...

ye sach jane kab badlega. film ko to ham band kar sakte hain lekin jeewan men jo ho raha hai uske liye remote kahan se laya jaye...

Mired Mirage said...

पता नहीं हम किस क्रूर मिट्टी के बने हैं? सबसे क्रूर बात यह है की बहुत से लोग इन बातों को अनदेखा करने की सलाह देते हैं.
घुघूतीबासूती

vidya said...

very nicely expressed poem...
i'm touched...
its a bitter truth of our society...
regards.

Udan Tashtari said...

अति संवेदनशील!

Piush Trivedi said...

बहुत सुन्दर, इसे भी देखे :- http://hindi4tech.blogspot.com

आशा जोगळेकर said...

दुखःद सत्य पर ये बदलेगा बदल रहा है ।

dinesh aggarwal said...

यदि यह सच है तो कविता है
जहाँ सच होता है वहीं कविता होती है
सच कहूँ तो सच ही कविता होती है
जहाँ सच न हो
वहाँ कविता की कल्पना भी संम्भव नहीं है
नेता,कुत्ता और वेश्या

कविता रावत said...

bahut badiya samvedana se upji kriti..