Friday, February 10, 2012

कपड़ों की लंबाई और बलात्कार की घटनाएं व्युत्क्रमानुपाती हैं?

इस साल की शुरुआत में ही कुछ ऐसा हुआ कि आंध्रप्रदेश के पुलिस महानिदेशक दिनेश रेड्डी ने कहा कि बलात्कार जैसी घटनाओं का कारण यह है कि महिलाएं ‘फैशनेबल और कम/हल्के(flimsy)’ कपड़े पहनती हैं।

इसकी प्रतिक्रिया में, बल्कि उनके बचाव में कर्नाटक के महिला और बाल विकास मंत्री सी सी पाटिल ने कहा था कि ‘निजी तौर पर मैं महिलाओं के उत्तेजक कपड़े पहनने के पक्ष में नहीं हैं।( महिलाओं को शालीन कपड़े पहनने चाहिए और उन्हें पता होना चाहिए कि कितनी चमड़ी दिखानी है।‘ यानी औरतों के कपड़ों में समस्या (उनकी नजरों के मुताबिक- कमी) होने पर पुरुष उत्तेजित हो जाते हैं और महिलाओं के साथ दुराचार जैसे अपराध करते हैं। अगर महिलाएँ ‘शालीन कपड़े पहनें’ तो हमारे देश के पुरुष साधु हो जाएंगे।

वे यह भी कहने से नहीं चूके कि “सदियों से हमने महिलाओं को सम्मानित स्थान और शालीन दर्जा दिया है। हम उनकी कई तरह से पूजा करते हैं। उनके सम्मान में ही कई नदियों के नाम महिलाओं के नाम पर हैं।”[sic]

ये ही सी सी पाटिल पिछले दिनों विधानसभा में,सदन में कार्रवाई के दौरान अपने मोबाइल पर पोर्न वीडियो देखते कैमरे पर पकड़े गए। पार्टी पर दबाव के कारण उनकी छुट्टी करनी पड़ी, लेकिन उनके बचाव में कई नेता कह रहे हैं कि वे ‘देख ही तो रहे थे,कर थोड़े ही रहे थे।’

यह किसी एक राजनीतिक पार्टी की बात नहीं है। कांग्रेसी शीला दीक्षित भी, सौम्या विश्वनाथन हत्या के मामले में कह चुकी हैं कि महिलाओं को इतनी रात गए बाहर निकलने की जरूरत क्या है। क्यों नहीं वे आराम से बंद दरवाजों के भीतर सुरक्षित रहतीं।

इसी किसी समय में जुझारू फोटो पत्रकार सर्वेश ने कहा था, जो मुझे सौ फीसदी सही लगता है कि- किसी भी वक्त घर से निकलना मेरा मानवाधिकार है।

साथ ही, मैं यह जोड़ूंगी कि साड़ी,जो हमारे देश में सबसे शालीन वस्त्र माना जाता है, सबसे ज्यादा शरीर-दिखाऊ 'अभद्र' कपड़ा है। साथ ही यह कहने से नहीं रुकूंगी कि रेप जैसी घटना को रोकने की कोशिश में यह रुकावट है। यह इस अर्थ में कि अगर ऐसा कोई मौका किसी साड़ी-धारी महिला के साथ आता है जब उसे बचकर भागना है, तो साड़ी उसकी फुर्ती में बाधा बनती है। कोई कह सकता है कि जिसे आदत है, उसे साड़ी में भी भाग-दौड़ करने में कोई दिक्कत नहीं होती। पर सोचकर देखिए, साड़ी की परतों और कम घेरे में पैर कितना फैल सकेगा? जबकि सलवार,पैंट आदि में ऐसी कोई असुविधा नहीं है।

आपके विचारों, टिप्पणियों, लानत-मलामत का इंतजार है।

Thursday, February 9, 2012

एक निवेदन है इस उभरती गायिका के लिए..एक जीवट व्यक्तित्व के लिए

नमस्कार,
ये पोस्ट नितांत वैक्तिक हो सकती है या समझी जा सकती है..फिर भी आप सभी के बीच रखने का लोभ संवरण नहीं कर सका. लखनऊ की एक होनहार लड़की है साथ में उभरती हुई गायिका. लखनऊ में आयोजित एक लोक गायन की प्रतियोगिता में उसको फाईनल में स्थान मिला है. अपने ग्रुप में वो उस समय जीतेगी जब उसे आप सभी का वोट मिलेगा, समर्थन मिलेगा.

आप सब में जो भी फेसबुक का सदस्य है वो कृपया वहां जाकर नीचे दी गई लिंक पर क्लिक करके का वीडिओ देखे. वीडिओ के नीचे बने लाईक के बटन को क्लिक करके अपना वोट और समर्थन प्रदान करें. उसकी जीवटता का प्रमाण उसका वीडिओ खुद ही देगा..
लिंक ये है>>
http://www.inextlive.com/iktara/videos/Mousmi-Pandey-_-iktara-super-16-finalist-Week-1

बुरी बात है

भवानी प्रसाद मिश्र

बुरी बात है
चुप मसान में बैठे-बैठे
दुःख सोचना , दर्द सोचना !
शक्तिहीन कमज़ोर तुच्छ को
हाज़िर नाज़िर रखकर
सपने बुरे देखना !
टूटी हुई बीन को लिपटाकर छाती से
राग उदासी के अलापना !

बुरी बात है !
उठो , पांव रक्खो रकाब पर
जंगल-जंगल नद्दी-नाले कूद-फांद कर
धरती रौंदो !
जैसे भादों की रातों में बिजली कौंधे ,
ऐसे कौंधो ।

Wednesday, February 8, 2012

अफगानिस्तान की जांबाज़ बेटी - मीना किश्वर कमाल

मीना किश्वर कमाल का जन्म २७ फरवरी १९५६ को काबुल में हुआ था. जिन दिनों वे स्कूल में थीं, काबुल और अन्य अफगान शहरों के छात्र सामाजिक आन्दोलनों और जन-संघर्षों से बड़ी तादाद में जुड़ रहे थे. मीना ने पूर्णकालिक सामाजिक कार्यकर्ता बनने और महिलाओं को शिक्षित करने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय छोड़ देने का फैसला किया. इस उद्देश्य के लिए उन्होंने १९७७ में RAWA (Revolutionary Association of the Women of Afghanistan) की स्थापना की. इस संगठन का उद्देश्य अफगानिस्तान की वंचित और खामोश करा दी गयी स्त्रियों के अधिकारों को आवाज़ मुहैय्या कराना था. उन्होंने तत्कालीन रूसी सेना और कठपुतली सरकार के विरोध में कई जुलूस, सभाएं और प्रदर्शन आयोजित किये.

इसके अलावा उन्होंने अफगान महिलाओं के लिए एक द्विभाषी पत्रिका 'पयाम-ए-जां' का प्रकाशन १९८१ में किया. इसके अलावा मीना ने शरणार्थी बच्चों और स्त्रियों के लिए स्कूल, हस्पताल और रोज़गार-परक केंद्र भी खोले.

१९८१ का अंत आते आते मीना को फ़्रांस की सरकार ने फ्रेंच सोशलिस्ट पार्टी कॉंग्रेस में भाग लेने का निमंत्रण दिया. जब मीना मंच की तरफ जा रही थीं, रूसी प्रतिनिधि बोरिस पोनामारेव को शर्मसार होकर हॉल से बाहर निकलना पड़ा. फ्रांस के अलावा उन्होंने कई अन्य यूरोपीय देशों का भी भ्रमण किया और कई महत्वपूर्ण लोगों से मुलाक़ात की.

उनका सामाजिक कार्य और प्रभावी नेतृत्व कट्टरपंथियों और रूसी सेना की आँख किरकिरी बन गया. ४ फरवरी १९८७ को पाकिस्तान के क्वेटा में KGB की अफगान शाखा खाद ने उन पर हमला कर उनकी हत्या कर दी.

मीना ने अपनी कुल ३१ साल की ज़िन्दगी के १२ साल अपनी मातृभूमि और उसकी महिलाओं के हितों के लिए वार दिए. उनका गहरा विशवास था कि निरक्षरता, अज्ञान और कट्टरपन, भ्रष्टाचार और ह्रास के अँधेरे के बावजूद उनके मुल्क की आधी आबादी अंततः जागेगी और आज़ादी, लोकतंत्र और महिला-अधिकारों के नए रस्ते खोलेगी.

मीना के कार्य को आज भी बहुत आदर के साथ याद किया जाता है.

आज उनकी एक कविता पढ़िए -



कभी नहीं लौटूंगी मैं

मैं हूँ वह औरत जो जाग चुकी
मैं जाग चुकी और जला दिए गए अपने बच्चों की राख़ से गुज़र कर बन चुकी तूफ़ान
मैं जाग चुकी अपने भाई के खून की धाराओं से
मेरे मुल्क के गुस्से ने दी है मुझे ताक़त
तबाह किए गए और जला दी गए मेरे गाँव मेरे भीतर भरते हैं दुश्मन के खिलाफ नफरत
मैं हूँ वह औरत जो जाग चुकी
मैंने पा लिया है अपना रास्ता और कभी नहीं लौटूंगी मैं.
मैंने खोल दिए हैं अज्ञान के बंद दरवाज़े
मैं अलविदा कह चुकी सारे सुनहरे कंगनों को
ओ मेरे हमवतन, मैं वो नहीं जो मैं थी
मैं हूँ वह औरत जो जाग चुकी
मैंने पा लिया है अपना रास्ता और कभी नहीं लौटूंगी मैं.
मैं देख चुकी हूँ नंगे पाँव भटकते बेघर बच्चों को
मैं देख चुकी हूँ मातम के कपड़े पहने मेंहदी लगी दुल्हनें
मैं देख चुकी हूँ कैदखाने की विशाल दीवारों के भुक्खड़ पेटों को आज़ादी निगलते हुए
मैंने दूसरा जनम लिया है विरोध और साहस के महाकाव्यों के बीच
मैंने आख़िरी साँसों में सीखा है आजादी का गीत, रक्त की लहरों और जीत में
ओ हमवतन, ओ भाई, अब मत समझना मुझे कमज़ोर और अक्षम
अपनी धरती की आज़ादी के रस्ते पर मैं तुम्हारे साथ हूँ अपनी पूरी ताक़त के साथ.
मेरी आवाज़ मिल चुकी है हजारों जाग चुकी औरतों के साथ
बंधी हुई हैं मेरी मुठ्ठियाँ हजारों हमवतनों के साथ,
तुम्हारे ही साथ मैं कदम बढ़ा चुकी अपने देश की राह पर
इन सब यातनाओं, गुलामी की इन सब जंजीरों को तोड़ने के लिए,
ओ मेरे हमवतन, मैं वो नहीं जो मैं थी
मैं हूँ वह औरत जो जाग चुकी
मैंने पा लिया है अपना रास्ता और कभी नहीं लौटूंगी मैं.