Tuesday, April 17, 2012

मध्यप्रदेश की बाल विवाहिता रत्नश्री को न्याय, मानवाधिकार दिलाना होगा

यह पोस्ट 17 अप्रैल को लगाई गई थी। यह मुद्दा इतना महत्वपूर्ण है कि इसी पोस्ट को दैनिक हिंदुस्तान और जनसत्ता दोनों अखबारों ने अपने 20 अप्रैल के अंकों में संपादकीय पृष्ठों पर लिया। इन दोनों आलेखों के लिंक नीचे दिए जा रहे हैं-

यह कैसा नियम (दैनिक हिंदुस्तान)

कुरीति का दुश्चक्र (जनसत्ता) 


आगे आलेख पढ़ना जारी रखें...

अक्षय तृतीया के ठीक हफ्ते भर पहले यह खबर। कायनात की साजिश है। मध्य प्रदेश की रत्नश्री पांडे का 14 साल की छोटी उम्र में बाल विवाह हुआ था। 13 साल तक अपमान, शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना झेलने के बाद आखिर उसको तलाक मिल गया। अपने दो बच्चों का पालन-पोषण भी उसी के जिम्मे है क्योंकि, जाहिर है, पति से उसे कोई गुजारा भत्ता नहीं मिलता।

ऐसी विपरीत स्थितियों से उबर कर

रत्नश्री मध्य प्रदेश की सिविल सेवा परीक्षा पास की है। लेकिन राज्य के बाल विवाह रोकने के नियम के तहत उसे नियुक्ति देने से इनकार कर दिया गया।
रत्नश्री दो बार सिविल सेवा परीक्षा पास कर चुकी है, लेकिन दोनों बार उसे नियुक्ति नहीं दी गई। ऐसे में उसने सरकार के इस फैसले के खिलाफ अदालत में गुहार लगाई। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भी म. प्र. सिविल सेवा नियम 6 (5) का हवाला देते हुए नियुक्ति न करने को सही ठहराया और कहा कि नियम साफ है कि तय उम्र के पहले विवाह करने वालों (लड़कियों के लिए 18 साल) को सरकारी सेवा में नहीं लिया जाएगा।

सोच कर देखें तो रत्नश्री पहले ही बाल विवाह से पीड़ित थी, जिस पर उसका कोई जोर नहीं था। उस कच्ची उम्र में विवाह के लिए न तो उसकी सहमति/असहमति हो सकती थी और न ही वह उसके खिलाफ कुछ करने, उसे रोकने में ही सक्षम थी। बरसों बाद उस घुटन और यातना से निकल कर जब वह अपनी मेहनत और काबिलियत से इस ऊचाई तक पहुंची, तो कानून उसके सशक्तीकरण के रास्ते में रुकावट बन रहा है। उसे समर्थ बनाने के बजाए कमजोर करने पर उतारू है। यह उसके साथ दोहरा अन्याय है।

मध्यप्रदेश में बाल विवाह रोकने के लिए सरकार ने कई नियम बनाए हैं। ऐसे किसी मामले में शामिल लोगों के लिए कड़ी सजाओं का भी प्रावधान किया है, जो कि इस कुरीति को हटाने में मददगार भी रहे हैं, ऐसा सरकार के आंकड़ों से पता चलता है। सरकार का दावा है कि 2001 से 2010 के बीच बाल विवाह की घटनाओं में 87 फीसदी की कमी आई है।

अच्छी खबर यह है कि इस मामले में रत्नश्री ने उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की है जिसमें उसने राज्य सरकार के इस नियम को चुनौती दी है। और इस अपील पर उच्चतम न्यायालय ने मध्य प्रदेश सरकार को एक नोटिस भी भेजा है।

रत्नश्री की हिम्मत की दाद देनी होगी कि वह बाल विवाह जैसी कुरीति के दुश्चक्र से निकल पाई। बाल विवाह करने के दोषी उसके अभिभावक हैं, न कि वह खुद। वह समाज की कुरीति की पीड़ित है, अपराधी नहीं। पीड़ित को अपराधी मानकर इज्जत की जिंदगी जीने से रोकना एक और अपराध कहलाएगा। अपराध ही नहीं, बल्कि मानवाधिकार का हनन। होना तो यह चाहिए कि बाल विवाहित लड़की को पीड़ित मानकर उसे सहारा दिया जाए और उसके पुनर्वास, बेहतर जीवन के लिए भरसक मदद की जाए। तभी औरत सक्षम बनेगी, अपने फैसले ले सकेगी और अपने खिलाफ सामाजिक कुरीतियों का विरोध करेगी, उन्हें दूर करने की कोशिश करेगी।

बाल विवाह का अर्थ सिर्फ एक कानून तोड़ना नहीं बल्कि यह उस लड़की, लड़के और उनकी आने वाली पीढ़ी को शैक्षिक, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, व्यावसायिक विकास के मौके पाने से रोकना है। महिलाओं के लिए यह खास तौर पर बोझ है क्योंकि उन्हें विवाह के बाद विकास का कोई मौका कम ही मिलता है। तिस पर उनके कमजोर तन-मन पर पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ बिना सोचे-समझे डाल दिया जाता है। और अगर ऐसी उम्र में वह मां बन गई, जो कि शिक्षा, जानकारी की कमी के कारण स्वाभाविक ही है, तब तो उसका जीवन ही खतरे में पड़ सकता है।

24 अप्रैल को फिर अक्षय तृतीया आ रही है, जब देश के हजारों नाबालिग, बचपन के आंगन में बेपरवाह खड़ी, नादान लड़कियां शादी के बंधन में बांध दी जाएंगी, जो उनके लिए किसी गुलामी की जंजीर से कम नहीं होगी। उन सब होने वाली घटनाओं को रोकना एक बड़ा काम होगा। क्यों न शुरुआत यहीं से करें और एक रत्नश्री को न्याय दिलाने के लिए मिल कर कुछ करें।