Friday, August 31, 2012

शरीर अगर हमारे लिए शर्म का विषय है तो हमारा पूरा वजूद भी!

मेरी पिछली पोस्ट स्तन ढकने का अधिकार पाने के लिए केरल में महिलाओं का ऐतिहासिक विद्रोह को कई प्रिंट और ऑनलइऩ अखबारों और ब्लॉगर्स ने इसे अपने स्पेस में जगह दी, इन पर ढेर सारी टिप्पणियां आईँ।  ऐसी  ही एक टिप्पणी रश्मि रविजा के ब्लॉग 'अपनी, उनकी, सबकी बातें' में राजस्थान के शेखवाटी अंचल में  लहंगा ओढ़नी पहने के तरीके पर थी। इसमें महिलाओं के चेहरा घूघट में लेकिन सामने छाती बिलकुल खुली रखने के व्यवहार पर सवाल और आपत्ति की गई। 


 "...मेरी बहुत बहस हो जाती थी इन महिलाओं से कि ये क्या रिवाज़ है , अच्छा ख़ासा चेहरा छिपाना और जो ढकना है उसे ही उघाडा जाए"


इसके समर्थन में एक और टिप्पणी थी-


 "शेखावटी यात्रा के दौरान मैंने भी ऐसा ही देखा था और बहुत अजीब लगा था ..."


ऐसी सभी टिप्पणियां, बातें, विचार मुझे पुरुषवादी विचारों को पोषित करते लगते हैं। इस नजरिए से सोचकर हम, जिस आजादी के लिए लड़ रही हैं, उसी के खिलाफ हो जाती हैं। कोई महिला अपना सीना भी छुपाए तो क्यों? क्या वह उसके शरीर का कोई शर्मनाक हिस्सा है, जिसे कोई देख ले तो वह औरत शर्मिंदा रहे? 


अपने शरीर के हिस्सों पर शर्मिंदा होना भी हमें पुरुषों ने ही सिखाया है, उन्होंने ही तय किया है कि जो किसी जगह पर छिपाया जाना है, वही कहीं और उघाड़ना भी है। कहां, यह भी उन्होने हमें सिखा दिया है। घर-परिवार में दुपट्टा लो , शरीर ढको। न ढको तो लांछन पाओ। लेकिन चमकीली पत्रिकाओं, विज्ञापनों में खूब उघाड़ो। 


पुरुष एक साथ दो लगाम थामे हैं और हमें दौड़ा रहे हैं। हम मूर्ख औरतें उनके लगाम का इशारा होने पर हांफती-थकती भी दौड़ती चली जा रही हैं।


मैं अपने स्तन/सीना क्यों छुपाऊं, जबकि उन्होंने ऐसी कोई गलती नहीं की। न ही मैंने ऐसी कोई गलती की कि मैं अपने शरीर को लेकर शर्मिंदा होऊं। पुरुष गर्मियों में क्वार्टर पैंट में, ढीले-ढाले बरमूडा में, सैंडो बनियान में 'कूल' लगते हैं, उन्हें किसी की शर्म की चिंता नहीं करनी पड़ती। मेहमान घर पर आ जाएं तो उन्हें संकोच नहीं होता (होना भी नहीं चाहिए) लेकिन औरतें क्यों दरवाजा खोलने से पहले दुपट्टा लेने घर के भीतर भागती हैं?

 
मैं बताना चाहती हूं कि मेरे दोनों स्तन कैंसर के इलाज के लिए निकाल दिए गए और मुझे अपने शरीर को इस तरह स्वीकारने और किसी के सामने लाने में कभी कोई शर्मिंदगी, ग्लानि, परेशानी नहीं होती। एक स्तन हटने के बाद शरीर बेडौल हो गया, जिससे पीठ-कंधे में दर्द-स्थायी नुकसान का खतरा बढ़ जाता है। वैसे भी ऐस्थेटिक्स के लिहाज से मैंने कुछ साल नकली स्तन पहना। फिर कोई सात साल बाद जब दूसरा स्तन भी इसी वजह से निकाल दिया गया तो मैंने राहत महसूस की। अब उस नकली के बोझ को ढोते रहने की मजबूरी नहीं थी। चाहूं तो पहनूं दो नकली स्तन, न चाहूं तो न पहनूं। यह सात साल पुरानी बात है। तब से मेरे आस-पास के लोग सहज हैं इस बात को लेकर कि मेरे 'स्तन'' कभी होते हैं, कभी नहीं। घर में ही नहीं, बाहर भी। बाजार से लेकर दफ्तर तक।


अपने शरीर को जैसा है, वैसा स्वीकार न करने के पीछे ही हजारों करोड़ रुपए के उद्योग चल रहे हैं। मोटापा कम करने, चमड़ी का रंग काले से गोरा बनाने, त्वचा चिकनी, चमकीली बनाने, हमेशा जवान दिखने, झुर्रियां हटाने, दाग-धब्बे, निशान हटाने, त्वचा के 'अनचाहे' बाल हटाने, सिर के बाल लंबे, चमकीले बनाने, काले बनाने के लिए लाखों उत्पाद हैं और इनका मुख्य लक्ष्य औरतें ही हैं- हर उम्र, देश, रंग और रेस की। शो बिज़नेस के लोगों के अलावा दूसरे पुरुषों के लिए ये सब काम दैनिक परिचर्या का हिस्सा नहीं है, लेकिन औरतों के लिए हैं।
हम पढ़ी-लिखी शहरी महिलाओं को लगता है कि हम आज़ाद हैं, क्योंकि हम अपनी कहानी कह पाती हैं, अपनी मर्जी से पैसे खर्च कर पाती हैं, अपनी इच्छा से बहुत कुछ कर पाती हैं। लेकिन इन सबके बावजूद अगर हम अपने शरीर को अपनी नज़र से नहीं देख पातीं, अपने पैसे खर्च करने के फैसले अपने स्वतंत्र विवेक से नहीं ले पातीं तो हमारी आजादी अधूरी है। 


अपना शरीर अगर हमारे अपने लिए या किसी के लिए भी शर्म का विषय है तो हमारा पूरा वजूद भी, क्योंकि शरीर नहीं, तो हम कहां। हमें अपने शरीर पर, वह चाहे जैसा है, चाहे जिस आकार-प्रकार में है या नहीं है,  गर्व करना सीखना होगा, तभी हम इसकी इज्जत कर पाएंगे और अपना सम्मान पुरुषों से छीन कर ले पाएंगे। 


वरना बदलाव सिर्फ दुपट्टे का कपड़ा, रंग या स्टाइल बदलने तक ही सीमित रह जाएगा। दुपट्टा बना रहेगा, कभी खत्म नहीं होगा।

Wednesday, August 22, 2012

स्तन ढकने का अधिकार पाने के लिए केरल में महिलाओं का ऐतिहासिक विद्रोह

केरल के त्रावणकोर इलाके, खास तौर पर वहां की महिलाओं के लिए 26 जुलाई का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन 1859 में वहां के महाराजा ने अवर्ण औरतों को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी। अजीब लग सकता है, पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा।

इस कुरूप परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया। नादर की ही एक उपजाति नादन पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं। उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे। नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था। वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं। लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था।

नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था। सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी। पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी। एक घटना बताई जाती है जिसमें एक निम्न जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला।

इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं। 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए। बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने औऱ यूरपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं। धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया। इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कशिश करती रहीं।

यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे। जो भी इस नियम की अहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता। अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते। यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें।

लेकिन उस समय अंग्रेजों का राजकाज में भी असर बढ़ रहा था। 1814 में त्रावणकोर के दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई नादन और नादर महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं। लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ। उच्च वर्ण के पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे।

आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश निकाला गया। एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश। और ज्यादा महिलाओं ने शालीन कपड़े पहनने शुरू कर दिए। इधर उच्च वर्ण के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा हो गया। एक घटना बताई जाती है कि नादर ईसाई महिलाओं का एक दल निचली अदालत में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा। उन्हें दीवान मुनरो की आंखों के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े। तभी वे भीतर जा पाईं। संघर्ष लगातार बढ़ रहा था और उसका हिंसक प्रतिरोध भी।

सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था। क्यों न होता। आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें। उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था। राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे।

आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया।

कुलीन पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश निकलवा दिया कि किसी भी अवर्ण जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती। अब तक ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म हो गया। अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई। सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं।

इस पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है। विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों दुकानों और सामान को लूटना शुरू कर दिया। राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई। दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया। 

मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है। अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं। 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया। कई स्तरों पर विरोध के बावजूद आखिर त्रावणकोर की महिलाओं ने अपने वक्ष ढकने जैसा बुनियादी हक छीन कर लिया।

इस लेख को जनसत्ता, प्रभात खबर जैसे कई अखबारों और ऑनलाइन मंचों ने शेयर किया।लिंक ये रहे--

Wednesday, August 1, 2012

गृहकार्य की अपरिहार्यता- विचार के कुछ बिंदु

दुनिया में ज्यादातर औरतें अपने को घर के कामों का विशेषज्ञ मानती हैं, बना लेती हैं। उनका यह व्यवहार लगातार हाशिए पर धकेले जाने के कारण अनावश्यक मान लिए जाने की असुरक्षा के बीच घर और समाज में अपनी जगह सुनिश्चित करने और खुद को परिवार के लिए जरूरी बनाने की जाने-अनजाने की गई कोशिश है। साथ ही लगातार करने के कारण स्वाभाविक तौर पर वे उन कामों की विशेषज्ञ हो भी जाती हैं।


उधर घर के पुरुष महिलाओं के ऐसे व्यवहार के आदी हो जाते हैं और उनकी महिलाओं से अपेक्षाएं भी यही हो जाती हैं। आखिरकार यह विशेषज्ञता धीरे-धीरे महिलाओँ का स्थापित, आधारभूत पारिवारिक कर्तव्य बनकर रूढ़ हो जाती है।


इस अवलोकन के आधार पर महिलाओं के मन की आम भ्रामक धारणाएं नीचे दे रही हूं।


1. कुछ घरेलू काम बेहद जरूरी हैं, जिनके बिना दुनिया का चलन रुक जाएगा।

2. उन कामों को बेहतरीन ढंग से करना भी उतना ही जरूरी है।

3. उन कामों को वे खुद अपने बेहतरीन ढंग से करें, यह भी उतना ही जरूरी है।

4. वे काम सिर्फ वे ही कर सकती हैं कोई दूसरा नहीं, क्योंकि वे ही उनमें पारंगत हैं।

5. चाहे कुछ भी हो, वे काम वे खुद ही करेंगी, वरना घर के लोग नाराज होंगे या असंतुष्ट रहेंगे।


 कृपया इन विचारों पर पर जम कर विचार, लानत-मलामत करें।  इसमें और बिंदु भी जोड़े जा सकते हैं। 

समीकरण हमेशा स्त्री-बनाम-पुरुष नहीं होता। हालांकि पुरुषवादी सोच भी उसी पुरुष- प्रभाव/प्रभुत्व के कारण आती है, लेकिन इससे उबरने की जहद तो हमें करनी होगी। खुद को इसके लिए तैयार करना होगा।