Wednesday, August 22, 2012

स्तन ढकने का अधिकार पाने के लिए केरल में महिलाओं का ऐतिहासिक विद्रोह

केरल के त्रावणकोर इलाके, खास तौर पर वहां की महिलाओं के लिए 26 जुलाई का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन 1859 में वहां के महाराजा ने अवर्ण औरतों को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी। अजीब लग सकता है, पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा।

इस कुरूप परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया। नादर की ही एक उपजाति नादन पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं। उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे। नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था। वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं। लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था।

नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था। सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी। पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी। एक घटना बताई जाती है जिसमें एक निम्न जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला।

इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं। 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए। बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने औऱ यूरपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं। धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया। इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कशिश करती रहीं।

यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे। जो भी इस नियम की अहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता। अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते। यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें।

लेकिन उस समय अंग्रेजों का राजकाज में भी असर बढ़ रहा था। 1814 में त्रावणकोर के दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई नादन और नादर महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं। लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ। उच्च वर्ण के पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे।

आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश निकाला गया। एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश। और ज्यादा महिलाओं ने शालीन कपड़े पहनने शुरू कर दिए। इधर उच्च वर्ण के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा हो गया। एक घटना बताई जाती है कि नादर ईसाई महिलाओं का एक दल निचली अदालत में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा। उन्हें दीवान मुनरो की आंखों के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े। तभी वे भीतर जा पाईं। संघर्ष लगातार बढ़ रहा था और उसका हिंसक प्रतिरोध भी।

सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था। क्यों न होता। आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें। उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था। राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे।

आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया।

कुलीन पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश निकलवा दिया कि किसी भी अवर्ण जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती। अब तक ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म हो गया। अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई। सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं।

इस पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है। विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों दुकानों और सामान को लूटना शुरू कर दिया। राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई। दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया। 

मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है। अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं। 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया। कई स्तरों पर विरोध के बावजूद आखिर त्रावणकोर की महिलाओं ने अपने वक्ष ढकने जैसा बुनियादी हक छीन कर लिया।

इस लेख को जनसत्ता, प्रभात खबर जैसे कई अखबारों और ऑनलाइन मंचों ने शेयर किया।लिंक ये रहे--

41 comments:

रचना said...

very informative post i may say

G.N.SHAW said...

एक अंधी दुनिया के यादो को ताजा कर गया |

Mired Mirage said...

इस संघर्ष के बारे में पहले भी पढ़ा था. कितनी विचित्र बात है न कि स्त्री अपने को कितना ढके और कैसे ढके या क्या पहने या न पहने यह शायद सदा से पुरुष तय करते आए हैं. कभी वे ढकने पर हमला करते थे तो कभी कम ढकने पर!
घुघूतीबासूती

swapniljewels said...

very well written post ....thanks for sharing

आर. अनुराधा said...

मैं कई बार सोचती हूंकि स्त्री विमर्श को स्त्री बनाम पुरुष के रूप में न सोचूं।लेकिन यही सच्चाई है। अगर ऐसा न होता,यानी स्त्री-पुरुष साथ/पूरक होते तो अलग से ऐसे विमर्शों की जरूरत ही क्यों पड़ती!

आर. अनुराधा said...

@ G N SHAW- दुनिया आज भी अंधेरी है, औरतों के लिए। बस, उसका रूप बदल गया है। बाहर से खूब रोशनी दिखाई पड़ने लगी है। लोगों के भीतर आज भी अंधेरा कम नहीं।

आर. अनुराधा said...

Mired Mirage said...
इस संघर्ष के बारे में पहले भी पढ़ा था. कितनी विचित्र बात है न कि स्त्री अपने को कितना ढके और कैसे ढके या क्या पहने या न पहने यह शायद सदा से पुरुष तय करते आए हैं. कभी वे ढकने पर हमला करते थे तो कभी कम ढकने पर!
घुघूतीबासूती

सोनरूपा विशाल said...

वाकई ये तो मन को झझकोर देने वाली बात है ..........

rashmi ravija said...

एकदम शॉकिंग न्यूज़ जैसा है....मुझे इसकी जानकारी नहीं थी.

इसके कुछ अंश अपने ब्लॉग पर एक पोस्ट में शेयर करना चाहती हूँ....आशा है अनुमति होगी.

rashmi ravija said...

अनुराधा जी,
मैने इस पोस्ट में आपकी पोस्ट के कुछ अंश लिए हैं.
किन किन चीज़ों के लिए आखिर लड़ें महिलाएँ??

Rangnath Singh said...

विश्व का तो पता नहीं लेकिन भारत में बर्बर युग कभी समाप्त नहीं हुआ शायद...

Vivek VK Jain said...

mahila sashktikaran ki zarurat ab bhi hai.......jab tak ki womens day manaana band nhi ho jataa tab tak.

आर. अनुराधा said...

जरूर रश्मि रविजा, इसे शेयर करें और करने के बाद लिंक मुझे भेज सकें तो और भी अच्छा। बात जितने लोगों तक और जिकनी दूर तक पहुंचे, उतना ही अच्छा है।

आर. अनुराधा said...

@ Vivek VK Jain-- 'जब तक कि वूमन्स डे मनाना बंद नहीं हो जाता'-- नहीं, बल्कि जब तक कि वूमन्सडे मनाने की जरूरत खत्म नहीं हो जाती।

arun prakash said...

informative post and very shocking facts oh that is our indian history against woman

अनूप शुक्ल said...

जानकारी परक पोस्ट। कितनी अपमान भरी जिन्दगी रही होगी उस समय महिलाओं की।

rashmi ravija said...

ओह!! मैने लिंक पोस्ट की थी शायद वो टिप्पणी स्पैम में चली गयी....एक बार स्पैम चेक कर लीजियेगा
वैसे पुनः लिंक दे रही हूँ.

"किन किन चीज़ों के लिए आखिर लड़ें महिलाएँ??"

http://rashmiravija.blogspot.in/2012/08/blog-post_23.html

Dinesh Semwal said...

Kathmullawd kisi bhi roop main ho sakts hai.kapray utarwany say ley kar jabardasti burk/gunghat pahnanay tak.

राजन said...

मुझे भी इसके बारे मे पहले पता नही था।पुरुष चाहे जितना कमजोर हो वो ये दिखाना चाहता है कि मेरे पास बहुत ताकत है और इस ताकत की आजमाईश का जो सबसे अच्छा तरीका उसे लगता है वह है स्त्री।ये सदियो की बनी बनाई मानसिकता है इतनी आसानी से नही जाएगी और इस तरह की परंपरा चाहे अब न रही हो लेकिन किसी न किसी रूप मे यह अब भी मौजूद है।गली मोहल्लो में होने वाली छेड़छाड़ को और क्या माने क्या उनकी मानसिकता भी यही नहीं है?
@रंगनाथ जी,आप 'शायद' को हटा भी सकते हैं।

आर. अनुराधा said...

रश्मि रविजा के ब्लॉग पर इस लेख को लिया गया है। (http://rashmiravija.blogspot.in/2012/08/blog-post_23.html#comment-form_5935801215721643423)

बहस वहां भी जारी है। कुछ लोगों ने आदिवासी स्त्रियों के वस्त्र न पहनने और गर्भवती महिलाओं को पेठा -कद्दी न खाने देने की मनाही को भी स्त्री विमर्श के इस पहलू से जोड़ा गया है। यह अज्ञानता ज्यादा है, पुरुष बनाम महिला से ज्यादा। उस पर मेरी टिप्पणी यह है--

स्त्रियोंके वस्त्र न पहनने की हर घटना को उसके खिलाफ न माना जाए। जैसे कि अबूझमाड़ की वनवासी महिलाओं (पुरुषों में भी) में कपड़े कम या न पहनने की अलग कहानी है। वहां तो स्त्री विमर्श जैसे किसी मसले की (मेरी जानकारी में) कोई जरूरत ही नहीं है। दिक्कत तब है जब कि किसी की इच्छा के विरुद्ध उसे शर्मनाक स्थिति में डाला जाए। वैसे कविवर के उपन्यास चोखेर बाली में भी बाली की मित्र को अंग्रेजी चलन की नकल पर उसका पति पहली-पहली बार ब्लाउज सिलवा देता है। अन्यथा बाकी औरतें ब्लाउज नहीं पहनतीं।

आर. अनुराधा said...

ऊपर की टिप्पणी के साथ जोड़ना चाहूंगी कि बंगाल में ब्लाउज न पहनने की चॉइस/मजबूरी पर मेरा ज्ञान बिल्कुल नहीं है। इसलिए मेरी टिप्पणी को उसके समर्थन में न समझा जाए। उस बारे में भी जानकारी लेने की कोशिश करती हूं।

anshumala said...

सबसे पहले एक सवाल है अनुराधा जी यदि स्पष्ट कर सके तो करे की नियम क्या था ब्लाउज नहीं पहनने का नियम था या वक्षो को न ढकने का नियम था , क्योकि कई जगह पर साड़ी से ही वक्षो को ढंका जाता था तो क्या उसकी भी मनाही थी |
बहुत पहले टीवी पर संजय खान का टीपू सुल्तान देखा था उसमे इस किस्से से मिलता जुलता किस्सा दिखाया गया था , जब वो केरल गया तो उसने देखा की वो हाथी पर बैठा था और उसके दोनों तरह खड़ी महिलाओ ने बस ब्लाउज और लुंगी ही पहन रख था ऊपर से कोई टुपट्टा नहीं लिया था इस पर उसे काफी आश्चर्य होता है क्योकि देश के अन्य भाग में महिलाए ऐसे कपडे नहीं पहनती थी तो उसे बताया जाता है की इन महिलाओ को चुन्नी लेने की इजाजत नहीं है ,उसने तुरंत ये निर्देश दिया की ये नियम बदला जाये |
मात्र आज से ३० साल पहले मुंबई में रह रहे उत्तर भारत के एक ऊँची जाती के व्यक्ति अपनी बहु को निर्देश दे रखे थे की किचन में खाना बनते और परोसते समय वो ब्लाउज नहीं पहनेगी , इस किस्से को सुना तो दो बाते मन में आई पहली की ससुर जी का चरित्र कैसा था , दूसरी कही ये जाति वाला बात तो नहीं है की कपडे सिलने वाला दर्जी छोटी जाति का होता है , फिर ये भी लगा की कपडे बनाने का काम भी छोटी जाति वाले ही करते है ( एक मोटा मोटी माने तो ) फिर ये परहेज कैसा |

आर. अनुराधा said...

अमशुमाला, आपने खुद ही अपने सवाल का जवाब दे दिया है।टीपू सुल्तान ने देखा कि औरतें लुंगी जैसा कुछ पहने थीं (जो केरल में औरतें आज भी पहनती हैं, इसे मुंडु कहा जाता है) और दुपट्टा नहीं लिया था। सवाल का जवाब इस पोस्ट के शीर्षक में भी है कि महिलाओं को वक्ष ढकने की मनाही थी और यह बात ध्यान देंतो आलेख में भी जगह-जगह है।

और जहां तक साड़ी के पल्लू से सीना ढकने और ब्लाउज न पहनने की बात है, तो वह रिवाज देशके कई हिस्सों में था। अगर आपने उपन्यासचोखेरबाली पढ़ा हो तो उसमें भी बाली की मित्र का पति उसके लिए अंग्रेजों के असर के कारण ब्लाउज सिलवा देता है,जिसे वह संकोट और गर्व के साथ पहनती है। महिलाओं पर बिना सिले वस्त्र पहनने की बंदिश बंगाल के अलावा पूरे दक्षिण भारत में रही है- महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश,तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल। इसे 'शुद्धता' से जोड़ा जाता है। आज भी वहां विधवाएं या ब्राह्मण बुजुर्ग स्त्रियां,(शायद दूसरी भी, मुझे पता नहीं है)जो घर में खाना आदि बनाती हैं, गीली साड़ी में खाना बनने तक रसोई में ही रहती हैं, बिना ब्लाउज के। खाना बनने के बाद ही वे रसोई से निकलती हैं,सूखे कपड़े पहनती हैं (या आग के सामने वे ही सूख गए होते हैं) और ब्लाउज भी। यह मैंने अपने ननिहाल में रोज-ब-रोज देखा है। ब्लाउज का चलन तो बाद में आया अंग्रेजों के असर से। और रसोई में ब्लाउज न पहनना यह शुद्धता और परंपरा ज्यादा है, ससुर या किसी और के चरित्र से जुड़ी बात कम। और आप जो जाति का मसला यहां लाई हैं,वह वाहियात लगता है क्योंकि असल में काम करने वाले तो सभी हमेशा से नीची जातियों के रहे हैं। ऊंची जातियों ने कब अपने हाथ से काम किया। और उनसे काम लेने में कभी ऊंची जातियों के लोगों को कभी दिक्कत नहीं हुई।

आर. अनुराधा said...

मेरी पिछली टिप्पणी से यह न समझा जाए कि मैं ब्लाउज न पहनने के पङ में हूं। फिलहाल मुद्दा कोई कपड़ा पहनने या न पहनने का नहीं बल्कि सिर्फ यह है कि कोई अपनी मर्जी से जो चाहे पहने या किसी परादबावरहे कि उसे ऐसे ही पहनना है, वैसे नहीं।

anshumala said...

चरित्र की बात इसलिए की कि ये बात कोई १०० साल पुरानी नहीं है मात्र ३० साल पहले कि है और मुंबई जैसी जगह कि है किसी गांव खेत की नहीं जहा समाज का डर या परम्परा आदि की बात की जा सके उस पर से यहाँ बड़े घर नहीं होते थे एक ही कमरे में रहते थे और रसोई वही सामने होती थी जहा बहु को वो खाना बनाते सब करते वो देख सकते थे ,जाति वाला भी एंगल है और ये तो आज भी है सम्भवतः आप का सामना ना हुआ हो , मैंने बताया भी है की वो ऊँची जाति से है , ( उनकी घर का कोई भी सदस्य आज भी अपनी जाति के अलावा किसी और जाति के बड़े बुजुर्गो का पैर नहीं छूते है और कच्चा खाना नहीं खाते है जबकि मुंबई में दादा और पिता यहाँ टैक्सी चलाते थे ) उस समय मुझे इस तरह के नियमो परम्पराओ का पता नहीं था इसलिए इस तरफ ध्यान नहीं गया जो बाकि सामजिक समस्या थी उस तरह ही देखा | आप की जानकारी सच में चौकाने वाली है |

rashmi ravija said...

मुद्दा किसी के कपड़े पहनने या ना पहनने का तो बिलकुल नहीं है. बल्कि जबरदस्ती अपनी मर्जी थोपने और रोक-टोक..बंदिशें लगाने का है. जब महिलाएँ भी मैच्योर हैं..अपना अच्छा-बुरा समझ सकती हैं..सही-गलत का निर्णय ले सकती हैं तो उनपर बंधन लगाकर बस अपना अधिकार ही सिद्ध करना चाहते हैं पुरुष.

केरल के सुदूर गाँवों में आज भी बूढी महिलाएँ अंगवस्त्र नहीं पहनतीं. ये उनका अपना निर्णय है, उनपर जबरदस्ती थोपा हुआ नहीं. पर केरल के कई मंदिरों में अब भी सिले हुए वस्त्र...सलवार कुरता भी पहने की अनुमति नहीं है.

कई नियम,परम्पराओं का पालन ,महिलाएँ ..अशिक्षा, अज्ञानता,अंधविश्वास की वजह से करती हैं. जैसे जैसे उनमें शिक्षा का प्रचार होगा...वे तार्किक ढंग से चीज़ों को देखेंगी और खुद ही उन अंधविश्वासों से मुक्त हो जायेंगी.

आर. अनुराधा said...

अंशुमाला, आपकी बात समझ रही हूं। साड़ी के साथ ब्लाउज न पहनने का मसला आज भी है,लेकिन उसे किसी नियम या राजाज्ञा से नहीं थोपा गया है। यही फर्क है। जहां जाति की बात है तो पैर छूना (या शरीर का कोई हिस्सा गलती से भी छू जाना!) जैसे व्यवहार और काम करवाना-जैसे कपड़े सिलवाना, नाखून-बाल कटवाना, जूते बनवाना आदि में बहुत फर्क है। जब से जाति बनी है, ये सारे काम नीची जातियों के लोग ही करते आए हैं, ऊंची जातियों के लिए। बदलाव अब आना शुरू हुए हैं।

और जब मैंने जिक्र किया कि " यह मैंने अपने ननिहाल में रोज-ब-रोज देखा है।" तो यह ज्यादा पुरानी बात नहीं है। और, संदर्भ आया है और जरूरी लग रहा है तो बता रही हूं कि मेरा ननिहाल दक्षिण भारतीय ब्राह्मण है।

रश्मि ने ठीक कहा-- कई नियम,परम्पराओं का पालन ,महिलाएँ ..अशिक्षा, अज्ञानता,अंधविश्वास की वजह से करती है। जागरूकता से ही ये समस्याएं खत्म होंगी।

rashmi ravija said...

मेरी टिप्पणी फिर से स्पैम में गयी...:(

आर. अनुराधा said...

Rashmi ravija, इस ब्लॉग में कमेंट मॉडरेशन आदि नहीं है, सब सीधे पोस्ट कर सकते हैं अपनी टिप्पणियां। आपकी टिप्पणियां कहां खो जा रही हैं, पता नहीं। स्पैम तो नहीं, हो सकता है, आपका सर्वर धीमा चला हो उस समय, जिससे पोस्ट करने की प्रक्रिया पूरी न हो पाई हो।

सुजाता said...

फिर-फिर हमे अतीत को विश्लेषित करने को मजबूर करती पोस्ट के लिए अनुराधा जी को धन्यवाद !....रश्मि पहले भी एक पोस्ट पर आपका कमेंट जाने क्यो मेल मे आया पर यहाँ प्रकाशित नही हुआ था।अभी तक यहाँ कोई कमेंट मॉडरेशन नही है।हमे सेटिंग्स को चेक कर लेना होगा एक बार।

सुजाता said...

वैसे रश्मि जी की पोस्ट पर आए कमेंट भी बेहद दिलचस्प हैं OMG से लेकर इस नतीजे तक कि बिना लम्बी लड़ाई लड़े स्त्री को छोटी से छोटी चीज़ भी हासिल नही होती।विमर्श के लिए उकसा पाव यही एक पोस्ट की सार्थकता है ।

rashmi ravija said...

अनुराधा जी एवं सुजाता जी,
आजकल हर ब्लॉग में ऐसा हो रहा है...टिप्पणियाँ मेल में तो मिलती हैं पर पोस्ट पर नहीं दिखतीं.
इसके लिए डैशबोर्ड पर जाकर कमेन्ट ऑप्शन चूज़ करना होता है.
फिर कमेंट्स में. Published ,Awaiting Moderation and Spam जैसे आप्शन दिखते हैं.
वहाँ spam पर क्लिक करना होता है और जिन कमेंट्स को पब्लिश करना होता है...उसे Not Spam करते ही वो कमेन्ट पोस्ट पर दिखने लगता है.

मेरी पोस्ट में ज्यादातर विमर्श अमुक चीज़ नहीं खानी है..अमुक सब्जी नहीं काटनी है...जैसी बातों पर ही केन्द्रित रही.
जबकि सच्चाई तो यही है..कई सारी छोटी-मोटी सुविधाओं के लिए भी स्त्रियों लम्बी लडाइयां लड़नी पड़ी हैं...और आज भी सतत वो संघर्ष जारी है.

Virendra Kumar Sharma said...

हाँ प्रवीण जी !इस मर्तबा जब बेंगलुरु आया था तब इस कोस्मोपोलिटन का मिजाज़ मुझे बदला बदला लगा था .ऑटो वालो की मनमानी और कन्नड़ गैर कन्नड़ सवाल के खदबदाने की बात शेखर भाई ने बतलाई थी साथ ही वहां शाम को शराब के अंग्रेजी ठेकों पर सरे आम शराब बढे दामों पर बिकते देखी .ओल्ड ट्रेवार्ण व्हिस्की भले माल्या साहब ने टेट्रा पैक (५२रूपैया )रुपैया में मुहैया करवाई हुई है लेकिन ठेके वाले ६० रुपैया वसूलते हैं .

तमिलनाडु की तरह अब यहाँ भी कन्नड़ बरक्स बाकी भारत सवाल उठने लगें हैं यह दुखद है अपने तीन साला आई आई टी चेन्नई प्रवास के दौरान में चेन्नई शताब्दी से यहाँ अकसर आया हूँ .इस मर्तबा इस विश्वनगर को बदला बदला पाया .

उत्तर पूरब के लोगों का आकस्मिक पलायन इसीलिए उतना आकस्मिक भी नहीं लगा .इस नजरिये से भी कुछ लिखिए "बेंगलुरु बनता बैंगलोर "बदल रहा है भारत की सिलिकोन वेली का स्वरूप .कृपया यहाँ भी पधारें -
ram ram bhai
बृहस्पतिवार, 30 अगस्त 2012
लम्पटता के मानी क्या हैं ?

ashok suryavedi said...

स्त्री अगर चाहती है कि वो कुछ पहने तो उसे कोई उतार नहीं सकता , और अगर वो चाहती है कि न पहने तो कोई उसे पहना नहीं सकता निर्णय तो स्त्री को ही करना है मैं बधाई देना चाहता हूँ केरल कि उन स्त्रिओं को जिन्हें अपने शरीर को ढकने की आजादी मिली इसका यह अर्थ नहीं है कि मैं स्त्री को वस्त्रों के आवरण में कैद करने का हिमायती हूँ !

Mukesh Kumar Sinha said...

jindagi badal rahi hai.. sir auraton ki nahi purusho ki bhi... :)

Pravin Dubey said...

अनुराधा जी अभी आपने अपनी पिछली पोस्ट में कहा कि "कोई महिला अपना सीना भी छुपाए तो क्यों? क्या वह उसके शरीर का कोई शर्मनाक हिस्सा है, जिसे कोई देख ले तो वह औरत शर्मिंदा रहे?" और इस पोस्ट में आप "महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने का समर्थन कर रही है"
ये Confusion क्यु?

आर. अनुराधा said...

@ Praveen Dubey, आप कनफ्यूज न हों, ठीक से पोस्ट पढ़ें और ज्यादा समझने के लिए मेरी या घुघुती जी की टिप्पणियां पढ़ लें।

kobta kumar said...

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s jalba said...

बहूत बुरी प्रथा थी

khaniyan said...

it reads only one thing. men of this era was complete waste. what a shitty mentality. bad society.

Unknown said...

x-mirage key 2018