Thursday, December 26, 2013

अब वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद...


हमने वंदे मातरम का पंजाबी में अनुवाद किया है. वंदे मातरम भारत का राष्ट्रीय गीत है. इसकी रचना बंकिमचंद्र चटर्जी ने की थी. अरबिंदो घोष ने इस गीत का अंग्रेज़ी में और वरिष्ठ साहित्यकार मदनलाल वर्मा क्रांत ने वंदे हिन्दी में अनुवाद किया था. भाजपा नेता आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने इसका उर्दू में अनुवाद किया. गीत के प्रथम दो पद संस्कृत में तथा शेष पद बांग्ला में हैं. राष्ट्रकवि रबींद्रनाथ ठाकुर ने इस गीत को स्वरबद्ध किया था. भारत में पहले अंतरे के साथ इसे सरकारी गीत के रूप में मान्यता मिली है. इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा कर इसकी धुन और गीत की अवधि तक संविधान सभा द्वारा तय की गई है, जो 52 सेकेंड है.

वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद
ਮਾਂ ਤੈਨੂੰ ਸਲਾਮ
ਤੂੰ ਭਰੀ ਹੈ ਮਿੱਠੇ ਪਾਣੀ ਨਾਲ਼
ਫਲ ਫੁੱਲਾਂ ਦੀ ਮਹਿਕ ਸੁਹਾਣੀ ਨਾਲ਼
ਦੱਖਣ ਦੀਆਂ ਸਰਦ ਹਵਾਵਾਂ ਨਾਲ਼
ਫ਼ਸਲਾਂ ਦੀਆਂ ਸੋਹਣੀਆਂ ਫ਼ਿਜ਼ਾਵਾਂ ਨਾਲ਼
ਮਾਂ ਤੈਨੂੰ ਸਲਾਮ…

ਤੇਰੀਆਂ ਰਾਤਾਂ ਚਾਨਣ ਭਰੀਆਂ ਨੇ
ਤੇਰੀ ਰੌਣਕ ਪੈਲ਼ੀਆਂ ਹਰੀਆਂ ਨੇ
ਤੇਰਾ ਪਿਆਰ ਭਿੱਜਿਆ ਹਾਸਾ ਹੈ
ਤੇਰੀ ਬੋਲੀ ਜਿਵੇਂ ਪਤਾਸ਼ਾ ਹੈ
ਤੇਰੀ ਗੋਦ 'ਚ ਮੇਰਾ ਦਿਲਾਸਾ ਹੈ
ਤੇਰੇ ਪੈਰੀਂ ਸੁਰਗ ਦਾ ਵਾਸਾ ਹੈ
ਮਾਂ ਤੈਨੂੰ ਸਲਾਮ…
-ਫ਼ਿਰਦੌਸ ਖ਼ਾਨ

मातरम का पंजाबी अनुवाद (देवनागरी में)
मां तैनूं सलाम
तूं भरी है मिठ्ठे पाणी नाल
फल फुल्लां दी महिक सुहाणी नाल
दक्खण दीआं सरद हवावां नाल
फ़सलां दीआं सोहणिआं फ़िज़ावां नाल
मां तैनूं सलाम…

तेरीआं रातां चानण भरीआं ने
तेरी रौणक पैलीआं हरीआं ने
तेरा पिआर भिजिआ हासा है
तेरी बोली जिवें पताशा है
तेरी गोद ’च मेरा दिलासा है
तरी पैरीं सुरग दा वासा है
मां तैनूं सलाम…
-फ़िरदौस ख़ान

वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद (रोमन में)
Ma tainu salam
Tu bhri hain mithe pani naal
Phal phulaan di mahik suhaani naal
Dakhan dian sard hawawaan naal
Faslan dian sonia fizawan naal
Ma tainu salam...

Tarian raatan chanan bharian ne
Teri raunak faslan harian ne
Tera pyaar bhijia hasa hai
Teri boli jiven patasha hai
Teri god 'ch mera dilaasa hai
Tere pairin surg da vasa hai
Ma tainu salam...
-Firdaus Khan


Saturday, October 12, 2013

ऐसी थी फ़्रीदा काहलो


फ़्रीदा काहलो मैक्सिको सिटी, मैक्सिको के कोयोकोआन में ६ जुलाई १९०७ को जन्मी थीं. मैक्सिको के महानतम चित्रकारों में शुमार होने वाली फ़्रीदा काहलो ने पेंटिंग की शुरुआत एक बस दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल होने के बाद की. बाद के वर्षों में फ़्रीदा काहलो राजनैतिक रूप से काफ़ी सक्रिय रहीं और उन्होंने अपने साथी कम्युनिस्ट पेन्टर दिएगो रीवेरा से १९२९ में विवाह किया. १९५४ में हुई अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने अपना काम पेरिस और मैक्सिको में प्रदर्शित किया था.

शुरुआती जीवन

६ जुलाई १९०७ को जन्मी फ़्रीदा काहलो का वास्तविक नाम था माग्दालेना कारमेन फ़्रीदा काहलो ई काल्देरोन. फ़्रीदा अपने पारिवारिक घर में पली-बढीं. इस घर को कासा असूल यानी ब्लू हाउस के नाम से जाना जाता था. उनके पिता विल्हेल्म एक जर्मन फ़ोटोग्राफ़र थे जो मैक्सिको चले आये थे जहां उन्होंने फ़्रीदा की माँ मातील्दे से शादी कर ली थी. फ़्रीदा की दो बड़ी और एक एक साल छोटी बहन थी.

६ साल की उम्र में फ़्रीदा को पोलियो हो गया. इस वजह से उन्हें नौ माह बिस्तर में बिताने पड़े. बीमारी से उबरने के बाद फ़्रीदा ठीक से चल नहीं पाती थी क्योंकि पोलियो ने उनके दाएं पैर और टांग को खासा नुक्सान पहुंचा दिया था. उसकी चाल की लचक को  ठीक करने की नीयत से उसके पिता ने उसे सॉकर खेलने, तैराकी और कुश्ती करने को प्रेरित किया – उस समय इस तरह की बातों को मैक्सिकी समाज में सोचा तक नहीं जा सकता था.

पढ़ाई और दुर्घटना

१९२२ में फ़्रीदा ने ख्यात नेशनल प्रेपेरेट्री स्कूल में दाखिला लिया. स्कूल में पढ़ने वाली लडकियों की संख्या बहुत कम थी. इस माहौल में वह अपने मजाकिया और हलके-फुल्के अनौपचारिक व्यवहार की वजह से सब की चहेती बन गयी. और पारम्परिक मैक्सिकी कपड़ों और गहनों के प्रति अपने सहज आकर्षण की वजह से भी. उसी साल मशहूर मैक्सिकी कलाकार दिएगो रीवेरा उसी स्कूल में एक म्यूरल प्रोजेक्ट पर काम करने आये. स्कूल के लेक्चर हॉल में दिएगो रीवेरा को ‘द क्रियेशन’ शीर्षक म्यूरल पर काम करते आना देखना फ़्रीदा को भला लगता था. कुछ रपटें बतलाती हैं कि फ़्रीदा ने अपनी एक दोस्त को बताया था कि एक दिन वह दिएगो रीवेरा के बच्चे की माँ बनेगी.


स्कूल के दिनों में फ़्रीदा राजनैतिक और बौद्धिक रूप से एक सी सोच रखने वाले छात्रों के संपर्क में आई. उनमें से एक – आलेहान्द्रो गोमेज़ आरियास के साथ उसका प्रेम शुरू हुआ. १७ सितम्बर १९२५ को दोनों एक बस में साथ सफ़र कर रहे थे जब बस एक स्ट्रीटकार से टकरा गयी. फ़्रीदा सीधे स्टील की रेलिंग से टकराईं जो उनके कूल्हे में धंसकर दूसरी तरफ़ से बाहर निकल आई. फ़्रीदा को  गहरी चोटें आईं और उनकी रीढ़ और पेडू की हड्डियों में मल्टिपल फ्रैक्चर हो गए.

कई सप्ताह मैक्सिको के रेडक्रॉस हस्पताल में रहने के बाद वे स्वास्थ्यलाभ के लिए वापस घर आ गईं. इस दौरान उन्होंने पेंटिंग करना शुरू किया और अगले साल अपना पहला सेल्फ़-पोर्ट्रेट पूरा किया, जो आलेहान्द्रो गोमेज़ को बतौर तोहफ़ा मिला. इसके बाद उनकी राजनैतिक सक्रियता बढ़ी और उन्होंने यंग कम्यूनिस्ट लीग के अलावा मैक्सिकन कम्यूनिस्ट पार्टी को भी जॉइन कर लिया.

तूफानी शादी

१९२८ में फ़्रीदा काहलो फिर से रिवेरा के संपर्क में आई. रिवेरा ने उसके चित्रों को सराहा, और दोनों के दरम्यान एक रिश्ता बन गया. अगले ही साल दोनों ने शादी कर ली. शुरुआती सालों में फ़्रीदा काहलो अपने पति के साथ हर उस जगह होती थी जहां उसे अपना काम करना होता था. १९३० में वे सं फ्रांसिस्को, कैलिफोर्निया में थे जहाँ काहलो ने सां फ्रांसिस्को सोसाइटी ऑफ़ वीमेन आर्टिस्ट्स की छठी वार्षिक प्रदर्शनी में अपना काम ‘फ़्रीदा एंड दिएगो रिवेरा को सबके सामने रखा. वहां से वे न्यूयॉर्क गए फिर डेट्रॉइट.

फ़्रीदा और दिएगो रिवेरा

१९३२ में फ़्रीदा ने अपने काम में ज़्यादा ग्राफिक और सर्रियल तत्वों को अपने काम में जगह देना शुरू किया. उनकी पेंटिंग ‘हेनरी फ़ोर्ड हॉस्पिटल’ (१९३२) में एक विवस्त्र फ़्रीदा कई वस्तुओं के साथ नज़र आती हैं – एक भ्रूण, एक घोंघा, एक फूल, एक पेडू और बहुत कुछ – जो उसके चरों तरफ तैर रही हैं – लाल नसों सरीखे धागों से बंधी. जैसा कि बाकी के सेल्फ पोर्ट्रेट्स के साथ था – यह पेंटिंग भी बेहद व्यक्तिगत थी – उसके दूसरे गर्भपात को बयान करती हुई.  

हैनरी फ़ोर्ड हॉस्पिटल
न्यूयॉर्क में काहलो और रिवेरा का बिताया समय खासा विवादस्पद रहा था. नेल्सन रॉकफेलर द्वारा रिवेरा को ‘मैन एट द क्रॉसरोड्स’ शीर्षक एक म्यूरल बनाना था आर. सी. ए.बिल्डिंग के रॉकफेलर सेंटर में. रॉकफेलर को इस म्यूरल से शुरू में ही दिक्कत होने लगी क्योंकि रिवेरा ने इस म्यूरल में लेनिन का एक पोर्ट्रेट भी सम्मिलित कर लिया था. म्यूरल पर काम रुकवा दिया गया. अलबत्ता बाद में लेनिन के पोर्ट्रेट के ऊपर रंग पुतवाया गया. इस घटना के महीनों बाद दोनों वापस मैक्सिलो आ गए और सान आन्हेल में रहने लगे.

फ़्रीदा और रिवेरा का सम्बन्ध कभी भी पारम्परिक या सामान्य नहीं था – दोनों अगल बगल के घरों में रहते थे और दोनों के अपने अपने स्टूडियोज थे. फ़्रीदा को रिवेरा के अन्य स्त्रियों के साथ चलते रहने वाले संबंधों को देखकर दुःख होता था. रिवेरा ने फ़्रीदा की बहन  क्रिस्टीना तक से सम्बन्ध बना रखे थे. इस धोखे से त्रस्त फ़्रीदा ने विरोध जताने के तौर पर अपने लम्बे पारम्परिक केश कटा लिए. उसे एक बच्चे की बेतरह चाह थी पर १९३४ में हुए एक और गर्भपात ने उसकी आत्मा को तोड़ कर रख दिया.

फ़्रीदा ट्रोट्स्की और नतालिया के साथ
दोनों के बीच अलगाव के लम्बे दौर चले अपर १९३७ में निर्वासित सोवियत कम्यूनिस्ट लियोन ट्रोट्स्की और उसकी पत्नी नतालिया की सहायता करने को दोनों फिर साथ आए. ट्रोट्स्की को मैक्सिको में राजनैतिक शरण मिल गयी थी. उन्हें ब्लू हाउस में रहने का आमन्त्रण दिया गया. एक समय जोसेफ़ स्टालिन के प्रतिद्वंद्वी रहे ट्रोट्स्की को भय था कि उनकी हत्या कर दी जाएगी. कहा जाता है कि इस दौरान ट्रोट्स्की और फ़्रीदा के बीच एक संक्षिप्त अफेयर भी चला.

कासा असूल
कला और सेल्फ़ पोर्ट्रेट्स

हालांकि फ़्रीदा ने ख़ुद को सर्रियलिस्ट कभी नहीं माना पर १९३८ में उनकी मुलाक़ात सर्रियल आन्दोलन के एक महत्वपूर्ण स्तम्भ आंद्रे ब्रेतों से हुई. उसी साल न्यूयॉर्क सिटी गैलरी में फ़्रीदा की एक चित्र प्रदर्शनी लगी जिसमें प्रदर्शित सभी पच्चीस पेंटिंग्स बिक गईं. परिणामतः काहलो को दो कमीशन मिले, जिनमें से एक मशहूर संपादिका क्लेयर बूथ लूस का प्रस्ताव शामिल था.

काहलो से कहा गया कि वे लूस और ख़ुद अपनी एक कॉमन मित्र अभिनेत्री डोरोथी हेल का पोर्ट्रेट बनाएं. डोरोथी ने उसी साल एक ऊंची इमारत से कूद कर आत्महत्या कर ली थी. यह पेंटिंग डोरोथी की दुखी माता को तोहफे में दी जानी थी. पारम्परिक पोर्ट्रेट बनाने की जगह फ़्रीदा ने डोरोथी की त्रासद छलांग की कहानी को चित्रित किया. जहां आलोचकों ने ‘द सुइसाइड ऑफ़ डोरोथी हेल’ को हाथों हाथ लिया, क्लेयर बूथ लूस उसे देखकर खौफज़दा हो गईं.

द सुइसाइड ऑफ़ डोरोथी हेल

१९३९ में फ़्रीदा कुछ समय रहने को पेरिस आईं. वहां उन्होंने अपनी पेंटिंग्स दिखाना शुरू किया और समकालीन कलाकारों जैसे मार्सेल द्यूशैम और पाब्लो पिकासो से मित्रता की. उसी साल उन्होंने तलाक ले लिया. इसी दौरान उन्होंने अपना सबसे प्रसिद्ध चित्र तैयार किया – ‘द टू फ़्रीदाज़’ (१९३९). पेंटिंग में फ़्रीदा के दो रूप अगल बगल बैठे हुए हैं और दोनों के दिल खुले हुए हैं. एक फ़्रीदा तकरीबन पूरी सफ़ेद लिबास में है, उसका दिल का काफ़ी नुक्सान हो चुका है और कपड़ों पर खून के निशान हैं. दूसरी फ़्रीदा चटख लिबास में है और उसका ह्रदय सुरक्षित है. ये फ़्रीदा के “प्यार पाए हुए” और “प्यार न पाए हुए” संस्करण माने जाते हैं.

द टू फ़्रीदाज़
अटपटी बात यह है कि फ़्रीदा लम्बे समय तक तलाकशुदा नहीं रहीं. दोनों ने १९४० में दोबारा विवाह कर लिया अलबत्ता दोनों अलग-अलग जिंदगानियां जीते रहे. और अगले वर्षों में दोनों के अलग-अलग लोगों के साथ अफेयर्स चलते रहे.

१९४१ में फ़्रीदा को मैक्सिकी सरकार ने प्रस्ताव दिया कि वे पांच महत्वपूर्ण मैक्सिकी महिलाओं के पोर्ट्रेट तैयार करें. फ़्रीदा इस प्रोजेक्ट को पूरा न कर सकीं. उसी साल उनके प्रिय पिता का देहांत हुआ और ख़ुद वे तमाम बीमारियों से जूझ रही थीं. इन सबके बावजूद उनका अपना काम लगातार बेहतर होता गया और तकरीबन हर प्रदर्शनी में उसे जगह मिला करती थी.

द ब्रोकन कॉलम
१९४४ में फ़्रीदा ने ‘द ब्रोकन कॉलम’ पेन्ट की. इसमें तकरीबन न्यूड फ़्रीदा की देह का मध्यभाग खुल गया है और उसकी रीढ़ की हड्डी सज्जाकारी किये जाने वाले एक छिन्न-भिन्न कॉलम की तरह नज़र आती है. उसने सर्जिकल ब्रेसेज़ भी पहने हुए हैं और उस्की त्वचा में कीलें खुभी हुई हैं. अपनी कला के माध्यम से यहाँ भी वे अपनी शारीरिक चुनौतियों से आपको परिचित करती जाती हैं. इस समय तक उनके कई ऑपरेशन हो चुके थे और अपनी रीढ़ को सीधा रखने के लिए उन्हें तमाम तरह के कोर्सेट्स पहनने होते थे.

बिगड़ता स्वास्थ्य और देहांत

१९५० के आसपास उनकी हालत बहुत बिगड़ चुकी थी. दाएं पैर में गैंगरीन का पता चलने के बाद फ़्रीदा को नौ माह अस्पताल में रहना पड़ा और उनके अनेक ऑपरेशन करने पड़े. इसके बावजूद वे पेन्ट करती रहीं और अपनी सीमित गतिमानता के बावजूद राजनैतिक काम भी उनके एजेंडे से बाहर नहीं गया. १९५३ में मैक्सिको में फ़्रीदा की पहली एकल प्रदर्शनी लगी. वे बिस्तर पर थीं लेकिन उन्होंने प्रदर्शनी के उद्घाटन में मौजूद रहने का मौका हाथ से नहीं जाने दिया. वे एम्बुलेंस से वहां पहुँचीं जहां उनके वास्ते एक पलंग लगाया गया जिस पर लेटे लेटे उन्होंने दर्शकों से बातें कीं. फ़्रीदा की ख़ुशी ज्यादा दिन नहीं चल पाई क्योंकि जल्दी ही गैंगरीन से प्रभावित उनकी दाईं टांग को काट देना पड़ा.  

भयंकर डिप्रेशन से जूझ रही फ़्रीदा को स्वास्थ्य बिगड़ जाने के कारण अप्रैल १९५४ में दुबारा भर्ती कराया गया – यह भी कहा जाता है कि इस दौरान उन्होंने आत्महत्या की कोशिश की थी. फिर दो माह बाद न्यूमोनिया के चलते वे अस्पताल में थीं. इस सब के बावजूद उनकी राजनैतिक सक्रियता बती रही. अमरीका द्वारा गुआटेमाला के राष्ट्रपति हकोबो आर्बेंज़ के तख्तापलट के विरोध में हुए २ जुलाई को एक प्रदर्शन में वे शामिल थीं. सैन्तालीसवीं वर्षगाँठ के करीब हफ़्ते भर बाद १३ जुलाई को अपने बचपन के घर कासा असूल में फ़्रीदा की मृत्यु हो गयी. उनकी मृत्यु को लेकर तरह तरह की अटकलें लगी जाती रही हैं. बीमारियों की बाद दरकिनार कर कई लोग कहते हैं कि संभवतः फ़्रीदा ने आत्महत्या की थी.

फ़्रीदा को दफनाया नहीं गया था बल्कि उनका दाह संस्कार हुआ था और अस्थियाँ परिवारजनों को दे दी गईं. कोयोकान मैक्सिको की लोंद्रेस स्ट्रीट पर मौजूद उनके घर में उनका अस्थिपात्र सुरक्षित है.  

फ़्रीदा की विरासत

'फ़्रीदा' फ़िल्म का पोस्टर 
मृत्यु के बाद फ़्रीदा की ख्याति बढ़ती बढ़ती गयी है. १९५८ में कासा असूल यानी ब्लू हाउस को बतौर संग्रहालय खोल दिया गया. १९७० के दशक के नारीवादी आन्दोलन ने फ़्रीदा के काम में नई दिलचस्पी लेना शुरू किया और फ़्रीदा को स्त्री-रचनात्मकता के सिम्बल के रूप में प्रतिष्ठित किया गया. १९८३ में हेडन हेरेरा की किताब ‘अ बायोग्राफी ऑफ़ फ़्रीदा काहलो’ ने इस महान पेन्टर के प्रति लोगों के मन में नई जिज्ञासा पैदा की.

बिलकुल हाल की बात करें तो २००२ में जूली टिमोर ने ‘फ़्रीदा’ नाम से एक फ़िल्म बनाई जिसमें सलमा हायेक ने फ़्रीदा का रोल किया था और फ़िल्म को छः अकादेमी अवार्ड्स के लिए नामित किया गया.

Thursday, May 16, 2013

कहानी का यथार्थ और समाज का: शेखर जोशी की कहानी कोसी का घटवार के बहाने एक बहस - सीमा मौर्य



हिंदी कहानी के इतिहास में उसने कहा था के बाद शेखर जोशी विरचित कोसी का घटवार अपनी तरह की अलग और विशेष प्रेमकहानी है।

फौजी जवान गुंसाई और लछमा की कहानी, जहां सांसारिक अर्थ में प्रेम परास्त होता है। बड़े-बूढ़ों की जिद लछमा का विवाह कहीं और करवा देती है, क्योंकि गुंसाई अनाथ है और फौज में उसकी जान का भी भरोसा नहीं।1 कहानी बताती है कि लछमा का पति रामसिंह भी फौज में है पर उसके पीछे भरापूरा परिवार है।

यह मनोविज्ञान कि अकेले आदमी को ब्याह कर बेटी संकट में पड़ सकती है और उधर दूसरे आदमी पर संकट आया भी तो परिवार देखभाल के लिए है, खोखला निकलता है। रामसिंह नहीं रहता और क्योंकि मनोविज्ञान जटिल विषयवस्तु है, रामसिंह के जेठ-जिठानी वाले परिवार का भी एक मनोविज्ञान है, जो विधवा लछमा और बच्चे को खुद पर बोझ और ज़मीन-जायदाद पर अवांछित अधिकारी मानता है।

लछमा मायके लौट आती है पर वहां भी सभी कुछ नष्टप्राय है। उधर गुंसाई फौज पन्द्रह साल की सेवा समाप्त कर गांव लौट आया है और कुछ मन लगा रहे इसके लिए उसे गेंहू पीसने का घट/पनचक्की लगा ली है। यहां दोनों की पन्द्रह साल बाद दोबारा एक उदासीन-सी मुलाकात होती है।

लछमा ने कभी आंचलिक ग्रामदेवता गंगनाथज्यू की कसम लेकर कहा था कि गुंसाई जैसा कहेगा वैसा वह करेगी, पर उसने किया नहीं। ये दोनों ही पात्र एक जटिल मनोवैज्ञानिक सम्बन्ध और तनाव में जी रहे हैं, एक-दूसरे के प्रति भी और समाज के प्रति भी। एक ओर समाज की तथाकथित मर्यादा निभाने की मानसिक चुनौती है दूसरी ओर अपने गोपन प्रेम का बहुत पीड़ा देनेवाला अहसास। मर्यादा रह जाती है लेकिन क्या प्रेम मर जाता है ? इसे समझना बहुत कठिन है। प्रेम भी मरता नहीं, समाज तो बाहर है पर मन के कोने-अंतरे भी उसी प्रेम का घर हैं। गुंसाई उलाहना नहीं दे रहा पर उसे लगता है कि गंगनाथ की झूटी हो चुकी कसम से ही लछमा का अनिष्ट हुआ है, यह एक परम्परागत ग्रामीण मनोविज्ञान है, जिसमें देवताओं की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है - इसी के चलते वो कहानी के अंत में बच्चे के साथ जाती हुई लछमा को सलाह देता है -

‘‘कभी चार पैसे जुड़ जाएं तो गंगनाथ का जागर लगाकर भूल-चूक की माफी मांग लेना। पूत-परिवार वालों को देवी-देवता के कोप से बचा रहना चाहिए।’’ 2

गुंसाई ने लछमा के बच्चे को देखा है, वह खुद तो अकेला है पर लछमा पूत-परिवार वाली है, उसे इसी बात की चिंता है कि अब लछमा की झूटी पड़ गई कसम का कोप बच्चे पर न हो - यह गुंसाई के मनोजगत में लछमा के प्रति उसके प्रेम का ही विस्तार है।

प्रेम का सरल समीकरण तो यह कहता है कि अभी देर नहीं हुई है, एकाकी जीवन जी रहा गुंसाई और लछमा एक हो जाएं तो दोनों का जीवन संवर सकता है, पर सामाजिक बंधनों में जो मनोसंसार निर्मित होता है, वह जटिलता की ओर जाता है। प्रेम मनोविज्ञान की दृष्टि से वैसे भी बहुआयामी विषय है, जिसकी दिशा व्यक्ति-व्यक्ति में बदल जाती है। अब कहानीकार का मनोविज्ञान भी देखें कि उन्होंने अपने वामपंथी संस्कारों और प्रशिक्षण के बावजूद इस कहानी के परिवेश और यथार्थ की मौलिकता से समझौता नहीं किया है, उसे जस का तस रहने दिया है।


प्रेम की वर्जना बनी रही है। नायक-नायिका के उत्तरजीवन में प्रेम सुधार कर सकता है, उसकी उदासीनता और विवशता को तोड़ कर उसे जीवन्त बना सकता है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं घटता। इस कहानी में ‘‘कुछ शाश्वत समस्याओं को उठाते हुए आंचलिक मूल्य-मान्यताओं की सीमा का भी ध्यान रखा गया है, अन्यथा कोसी का घटवार में गहरे रोमानी स्पर्श के स्तर पर लछमा और गुंसाई घटवार का पुनर्मिलन इतना नीरस और उद्देश्यहीन न होता।’’3  यहां परम्परा से कोई विद्रोह सामने नहीं आता है, जीवन अपने ढर्रे पर चलता है। इसे क्या द्वन्द्व की कसौटी पर कहानी की असफलता माना जाएगा? नहीं, यह कहानी 
लेखक के उन दिनों की तस्‍वीर
जब उन्‍होंने कोसी का घटवार लिखी

विषयवस्तु से अपने व्यवहार से पाठकों में परम्परा और रूढि़यों के प्रति द्वन्द्व जगाती हुई नवीनता के स्वीकार का आग्रह प्रस्तुत करती है। द्वन्द्व कहानी में नहीं, पाठक के मन में चलता है - परम्परा से विद्रोह भी कहानी में नहीं, पाठक के मन में घटता है। कहानी में वर्णित प्रेम की असफलता द्वन्द्व की विशिष्टता के इस स्तर पर कहानी की सफलता में बदल जाती है।   

कहानी के अंत में टीस बनी रहती है कि लछमा तो स्त्री है, उसे लोक में व्याप्त आचार-व्यवहार और लोक-लाज से भय अधिक है लेकिन गुंसाई एक पुरुष है, उसे आगे बढ़कर लछमा को अपनाना चाहिए। प्रश्न उसी यथार्थगत मौलिकता का बच जाता है, जिसकी रक्षा प्रेमचंद ने कफन में बुधिया की दारूण मौत से की थी और शेखर जोशी की इस कहानी में उन्होंने उसकी रक्षा लछमा और गुसाई के प्रेम की मौत से की है।

यह हमारा सामाजिक यथार्थ है, जिसकी कीमत कभी एक स्त्री की मौत से चुकाई जाती है तो कभी उसके प्रेम की मौत से, पर यही यथार्थ  है, इसे कहानी में नहीं, समाज में बदलना होगा। कहानीकार तो बस संकेत कर सकता है कि यह यथार्थ है और गलत है, इसे ऐसा नहीं होना चाहिए, इसमें बदलाव की आवश्यकता है।
***

        1-कोसी का घटवार, वही, प्रतिमान प्रकाशन, 952-मालवीय नगर, इलाहाबाद, तृतीय संस्‍करण 1988 
           पृ0 62
        2-वही, पृ0 74

        3 -पांडेय, बालकृष्ण, मेरा पहाड: असहमति-अस्वीकार की कहानियां, पुस्तक समीक्षा, साहित्य सम्पर्क
          अंक -4, जुलाई 1992
           ------------------------------------------------------------------------
        सीमा मौर्य कुमाऊं विश्‍वविद्यालय, नैनीताल से नई कहानी पर शोध कर रही हैं। सम्‍पर्क : द्वारा 
        प्रो.नीरजा टंडन,हिंदी विभाग, डी.एस.बी.परिसर, नैनीताल-263 002 (उत्‍तराखंड) 

Sunday, April 14, 2013

क्या चाहते हो तुम चीखों का एक मुल्क ?'


मेरे अल्फ़ाज़ में दामिनी की आख़िरी विदाई देश के नाम...
आपके नाम....
 डिम्पल चौधरी (पत्रकार्)
______________________________
 मैंने अपनी रुख़सती की शर्त पर
अपने हिंन्दुस्तान को
शर्मसार होने से बचाने की कोशिश की है
लोखों बेटियोंमांओंबहनोंभाइयों
और करोड़ों अंजान कंधों पर सवार होगा मेरा शव

कोई रुदन, कोई हाहाकार ना करना
मेरी शवयात्रा में


मां........
बताओ ना मुझे याद करोगी ना
मैं..... मैं लड़ी मां.....
अपनी सांस के मर्ज होते आख़िरी छोर तक
मैं लड़ी थी मां....
मगर मेरे जिस्म को औजारों की नकेल ने
ज़मीर तक छलनी कर दिया था
मेरे ज़ख़्म मेरे ज़िंदा रहने की ख़्वाहिश को
पनाह नहीं दे पाए मां......

मगर मां.....
मैं मरी नहीं हूं ना ही ख़मोशी के आले को ओढ़ा है मैंने
बस मौत पर मुझे दया आ गई,
कब से दरवाज़े पर टकटकी लगाए
मेरे इंतज़ार में थी

मां....
मौत को चुना है मैंने
ताकि सोने की चिड़िया कहे जाने वाले
मेरे इस हिंन्दुस्तान के माथे पर
मेरी बदनसीब मौजूदगी का कलंक ना लगे....
इसीलिए मैंने मौत को चुना है मां...

आखिरी लम्हों मे 
मेरे कानों में आवाज़ आई थी कहीं से
कि पूरा देश मेरी ज़िदगी की दुआं कर रहा है,
कि मेरे नाम की मुहर के बिना
हर किसी के सीने में मेरा दर्द है आज
ये हर तरफ़ से आती हुईं आवाज़ें
ये जुलूस, ये हुज़ूम, ये चीख़,
ये शोर, ये तड़प....
सब मेरी ही तो हैं

अब मैं ...मैं कहां रही
मैं अब पूरा मुल्क़ बन गई हूं
ए मेरे देश
हज़ारों आवाज़ों का इंकलाब देके जा रही हूं
लोगों की इन गरजती इंसाफ़ की दहाड़ में
मैंने अपने लिए दर्द सुना है
ए मेरे देश मैं जा रही हूं
मगर इस दहाड़ को यूं ही बरक़रार रखना
ताकि कोई और बहन, कोई और बेटी
उन औजारों, उन अत्याचारों का रुदन ना सहे
जिसे सहा मैंने, जिसे जिया मैंने

जब उस रात बस की परछाई मैं
मुझे उजाड़ा गया था
उस रात सिर्फ़ मेरी ही रूह छलनी नहीं हुई थी
बल्कि हर लड़की उस रात दामिनी या अमानत बनी थी
उस रात मेरे साथ
देश की हर औरत एक मौत मरी थी.......
मरा था ये अतुल्य भारत,
मरी थी इंसानियत,
मरी थी इज़्ज़त,
मरा था मेरा आंगन,  मरी थी मेरी रूह
मैं तो बाबा के आंगन में फ़िर लौटना चाहती थी
एक आज़ाद चिड़िया की तरह उड़ना चाहती थी
मगर खूंख़ार बाज़ों के नुकीले पंजों ने
मुझे नोच डाला........


मगर अब ये शोर
मेरी ये मुल्क़ बन चुकी आवाजें
अब किसी और बुलबुल को
किसी और चिड़ियां को
कभी यूं मरने नहीं देगी....
मेरे देश
मेरी रुख़सती मे यह वादा दे दो
कि यहाँ अब कोई बेटी दामिनी न बनें 
वर्ना उसकी चीखें 
मुल्क बन जाएँगी 
क्या चाहते हो तुम 
चीखों का एक मुल्क ?'

अलविदा.....



Monday, February 25, 2013

नीलोफ़र





वह
रोज़ मेरे ज़हन में
शबनम बनके झरा करती है, चुपचाप..
स्मृतियों की हरी घास पर
न जाने कब आकर चिपक जाती है
लिपट जाती है मुझसे
मुझे बचा लो...
नहीं कर पाती मैं कुछ.
क़तरा-क़तरा साफ शफ़्फ़ाक़
शबनम की बूंदों सी पारदर्शी वह
सचमुच लिपट जाती है मुझसे और
रोज़-रोज़ सूरज के साथ आने वाले घाम में
न जाने कब भाप बन के उड़ जाती है.
नीलोफ़र
जी हां यही नाम था उसका.
नील के रंग की तरह सुन्दर और स्पष्ट थी वह.
बड़ी साफ थी उसकी समझ
हां के लिए हां और न के लिए न.
हमारी तरह घालमेल नहीं करती थी वह
न तो विचारों में, न ही जीवन में........
अन्तरराष्ट्रीय राजनीति पर बहस करती थी वह
ईराक पर अमरीका के हमले को वहशियाना करार दिया था उसने
उस ज़माने में बुश सीनियर राष्ट्रपति हुआ करता था अमरीका का.
रंगों से कलाकृतियां उकेरती थी वह
जिस भी दीवार पर हाथ फेर देती, जगमगाने लगती...
ऐसी कलाकार थी वह
उसके हाथों का हुनर
बागीचे में फूल बन कर खिलता था.
जब वह चलती तो
क्यारी की गुलदाउदियां उसे आवाज़ लगातीं
नीलोफर.....नीलोफर.......नीलोफर...........
फिर कहां चूक हुयी...?
क्या हुआ सरे राह...?
क्यों पगला गयी नीलोफर......?
ख़लाओं में गुलदाउदियां
आज भी आवाज़ दे रही हैं
नीलोफर.....नीलोफर....नीलोफर........
पर कहां रही अब वो नीलोफर......
उसके कमरे की दीवारों में एक भी तस्वीर नहीं है आज
उसके बागीचे फूलों से भरे हुए नहीं हैं आज.....
कमरे की एकमात्र खिड़की से
अपनी बड़ी-बड़ी सूनी आंखों से वह दूर उफ़क में देखा करती है
मानों सुनना चाहती हो गुलदाउदियांे की आवाज़
नीलोफर......नीलोफर..............नीलोफर.................
क्या आप बता सकते हैं
क्यांे पागल हो गयी नीलोफर?
उसके लिए जो घर बसाया गया था
वह उसे रास नहीं आया क्या?
या फिर उसका हमसफर?....
पता नहीं.......क्या हुआ....
उसने कभी किसी से कुछ कहा नहीं..........
कुछ भी नहीं.
शायद यहीं गलती हो गयी हमसे....
हम उसका मौन नहीं पढ़ पाए शायद........
सबने समझा था कि आखिर है तो वह भी एक औरत
ढल जाएगी....खांचे में............
पर नहीं..........
उसने मौन को अपने विद्रोह की आवाज़ बना लिया
और घुट गयी...........
चीखी क्यों नहीं थी वह?
ज़ोर से चिल्लायी क्यों नहीं थी वह?....
प्रतिरोध क्यांे नहीं किया उसने?
शायद इसीलिए पागल हो गयी मेरी नीलोफर..........
क्यांेकि अपने हिस्से का चीखी नहीं वह...........
लड़ी नहीं वह......
इसीलिए खामोश हो गयी मेरी नीलोफर.
दजला-फ़रात, नील, ह्वांगहो, सिंधु
मिसीसिपी, वोल्गा से लेकर
गंगा तक
तुम्हें कहीं मिल जाए मेरी नीलोफर...
तो ज़ोर से झकझोरना उसे....
कहना उसे कि
चिल्लाओ.......इतनी ज़ोर से चिल्लाओ....
कि सारी नदियां मचल उट्ठे....
आकुल हो उठे समन्दर कि ये आवाज़ कहां से आयी....
कि ब्रह्माण्ड में हो जाए सुराख़
कि डोलने लगें सत्ताएं.....
और ये गुलदाउदियां झूम-झूम के देने लगें आवाज़
नीलोफर.........नीलोफर...........नीलोफर............
     रचनाकार - कृतिश्री