Sunday, April 14, 2013

क्या चाहते हो तुम चीखों का एक मुल्क ?'


मेरे अल्फ़ाज़ में दामिनी की आख़िरी विदाई देश के नाम...
आपके नाम....
 डिम्पल चौधरी (पत्रकार्)
______________________________
 मैंने अपनी रुख़सती की शर्त पर
अपने हिंन्दुस्तान को
शर्मसार होने से बचाने की कोशिश की है
लोखों बेटियोंमांओंबहनोंभाइयों
और करोड़ों अंजान कंधों पर सवार होगा मेरा शव

कोई रुदन, कोई हाहाकार ना करना
मेरी शवयात्रा में


मां........
बताओ ना मुझे याद करोगी ना
मैं..... मैं लड़ी मां.....
अपनी सांस के मर्ज होते आख़िरी छोर तक
मैं लड़ी थी मां....
मगर मेरे जिस्म को औजारों की नकेल ने
ज़मीर तक छलनी कर दिया था
मेरे ज़ख़्म मेरे ज़िंदा रहने की ख़्वाहिश को
पनाह नहीं दे पाए मां......

मगर मां.....
मैं मरी नहीं हूं ना ही ख़मोशी के आले को ओढ़ा है मैंने
बस मौत पर मुझे दया आ गई,
कब से दरवाज़े पर टकटकी लगाए
मेरे इंतज़ार में थी

मां....
मौत को चुना है मैंने
ताकि सोने की चिड़िया कहे जाने वाले
मेरे इस हिंन्दुस्तान के माथे पर
मेरी बदनसीब मौजूदगी का कलंक ना लगे....
इसीलिए मैंने मौत को चुना है मां...

आखिरी लम्हों मे 
मेरे कानों में आवाज़ आई थी कहीं से
कि पूरा देश मेरी ज़िदगी की दुआं कर रहा है,
कि मेरे नाम की मुहर के बिना
हर किसी के सीने में मेरा दर्द है आज
ये हर तरफ़ से आती हुईं आवाज़ें
ये जुलूस, ये हुज़ूम, ये चीख़,
ये शोर, ये तड़प....
सब मेरी ही तो हैं

अब मैं ...मैं कहां रही
मैं अब पूरा मुल्क़ बन गई हूं
ए मेरे देश
हज़ारों आवाज़ों का इंकलाब देके जा रही हूं
लोगों की इन गरजती इंसाफ़ की दहाड़ में
मैंने अपने लिए दर्द सुना है
ए मेरे देश मैं जा रही हूं
मगर इस दहाड़ को यूं ही बरक़रार रखना
ताकि कोई और बहन, कोई और बेटी
उन औजारों, उन अत्याचारों का रुदन ना सहे
जिसे सहा मैंने, जिसे जिया मैंने

जब उस रात बस की परछाई मैं
मुझे उजाड़ा गया था
उस रात सिर्फ़ मेरी ही रूह छलनी नहीं हुई थी
बल्कि हर लड़की उस रात दामिनी या अमानत बनी थी
उस रात मेरे साथ
देश की हर औरत एक मौत मरी थी.......
मरा था ये अतुल्य भारत,
मरी थी इंसानियत,
मरी थी इज़्ज़त,
मरा था मेरा आंगन,  मरी थी मेरी रूह
मैं तो बाबा के आंगन में फ़िर लौटना चाहती थी
एक आज़ाद चिड़िया की तरह उड़ना चाहती थी
मगर खूंख़ार बाज़ों के नुकीले पंजों ने
मुझे नोच डाला........


मगर अब ये शोर
मेरी ये मुल्क़ बन चुकी आवाजें
अब किसी और बुलबुल को
किसी और चिड़ियां को
कभी यूं मरने नहीं देगी....
मेरे देश
मेरी रुख़सती मे यह वादा दे दो
कि यहाँ अब कोई बेटी दामिनी न बनें 
वर्ना उसकी चीखें 
मुल्क बन जाएँगी 
क्या चाहते हो तुम 
चीखों का एक मुल्क ?'

अलविदा.....



5 comments:

SM said...

nice poem

Pratibha Verma said...

बहुत सुन्दर....बेहतरीन प्रस्तुति
पधारें "आँसुओं के मोती"

आशा जोगळेकर said...

Bahut dard bhare shabdon men damini kee peeda ko ukera hai aapne.

RACHANA KOLI said...

दर्दनाक मंजर याद आ गया जो उस लडकी के साथ घटित हुवा होगा फिर एसा किसी के साथ न हो एसी मशाल समाज में जले .

Madan Mohan Saxena said...

खुबसूरत रचना ,बहुत सुन्दर भाव भरे है रचना में,आभार !
http://madan-saxena.blogspot.in/
http://mmsaxena.blogspot.in/
http://madanmohansaxena.blogspot.in/