Friday, November 14, 2014

जेंडर सेंसिटाइज़ेशन का विचित्र तरीका


सेन्सिटाइज़ेशन के लिए (?) चीन में एक रिअलिटी शो ने नायाब तरीका निकाला । वहाँ एक अस्पताल पुरुषों को उनकी पत्नी के साथ साथ प्रसव पीड़ा का अनुभव करवा रहा है एक यंत्र की सहायता से।रियलिटी शो के साथ शुरु हुए इस 'पेन कैम्प' को कुछ पुरुषों ने ज्वाइन भी किया है और अधिकतर पति दर्द को कुछ मिनट ही बरदाश्त करके भाग खड़े हुए.

  क्या कमेंट करूँ ? यह तरीका खाप-सोच वाले मर्दों को सम्वेदनशील बनाने के लिए भले ही आजमाया जाए ...पर अपने आस पास के पुरुषों को तो मैं पत्नी की इस सृजनात्मक वेदना में साथ देख रहीहूँ । केवल पत्नी को लेबर पेन में देख लेना भर पुरुष के लिए पर्याप्त कष्टदायी होता होगा मुझे लगता है।सोचती हूँ बलातकारी को भी बलत्कृत होने का अनुभव कराने की कोई मशीन ईजाद होनी चाहिए। मशीन जाने दीजिए , अपराधियों को कम से कम गधे पर नंगा कर गाँव भर घुमाने के अनुभव के लिए तो कुछ विशेष संसाधन नहीं चाहिए। देखना यह है कि अपन किस तरह की सोसायटी बना रहे हैं ...जहाँ अतिरेक हैं, बदले हैं,कुण्ठाएँ हैं और गर्त में गिरने के कई मुहाने खुल गए हैं ।

Monday, November 10, 2014

तुम चाहो तो

कैसे बिफर जाता है तुम्हारा वजूद
जब ठुकरा देती हूं मैं
तुम्हारे फैसले
जो लिए थे तुमने मेरे बारे में

कैसा तड़फडाता है तुम्हारा सुपोषित अहम
जब मैं करती हूं अनपेक्षित प्रश्न
तुम्हारे उन आकलनों पर
जो थे समर्पित मुझे
टिके थे तुम्हारे तजुर्बे की शय पर

कैसी होती है न तुम्हारी तिलमिलाहट
जिस पल तुम्हारी घोषणाओं को
टकराना ही पड़ता है
लड़खडाते मेरे नवजात तर्कों से

कैसे अचकचा जाते हो न तुम
जब अपने पहलू में मेरी जगह
पाते हो तुम मेरा मैं

ठीक उस पल चट्टानों के मजबूत छाती से गुजर
बनाती है नदी अनजान पगडंडियां
और नदियों की छाती पर तिर आता है पुल
तुम चाहो तो हम मिल सकते हैं

बहती हुई नदी के इंद्रधनुषी पुल पर प्रिय !!

Saturday, November 8, 2014

सामाजिक मोर्चे पर आज़ादी !

बहुत सी ख्वाहिशें पूरी कीं ...कुछ की कोशिश अभी बाकी है...एक ऐसी है कम्बख्त जिसकी न कोशिश कर सकती हूँ न कभी पूरी ही होगी।पतनशील इच्छा है न! पतनशील इच्छाएँ भी वैसे अपनी व्यक्तिगत कीमत पर पूरी की ही  जा सकती हैं ...पर मेरी चिंता सिर्फ अपनी अकेले की नही है।

सुबह सुबह कॉलेज पहुँचें तो मैदान मे खेल खेल कर थक चुके लड़के शर्ट उतार पाइप से नहा रहे थे। 20 वर्ल्ड कप जीतने पर खुशी ज़ाहिर करने के लिए धोनी ने अपनी टीशर्ट उतार फेंकी थी। 'रंग दे बसंती' के पोस्टर देख देख लगता था दोस्ती और मुक्ति के आनंद की सार्वजनिक अभिव्यक्ति का यह अंदाज़ चिढाता है मुझे ,स्त्री को उसकी सीमाएँ दिखाता हुआ सा ! जहाँ ट्यूबवैल या पानी मिले वहाँ ही नहाना शुरु हो जाना ...यह सार्वजनिक स्नान दुनिया को अभद्रता क्यों नहीं लगता?

श्लील अश्लील तय करने वाले पैमाने बाकी मानकों कीतरह ही स्त्री पुरुष के लिए अलग हैं।  एक के लिए अश्लीलता स्वाभाविक और एक के लिए गुनाह है।धर्म , समाज,राज्य ,कानून  पुरुष की ओर हैं। यह किसी पूर्वाग्रह से नहीं कहती बल्कि इसलिए कहती हूँ कि स्त्री कमरे के भीतर स्वयम को कितना भी मुक्त मान ले लेकिन जिन सड़कों पर वह चलती है ,जिन दफ्तरों में वह काम करती है, जिस पार्क में बच्चों को खिलाने ले जाती है, जिस खेत में निराई करती है, जिस भवन के निर्माण साइट पर मजदूरी करती है ,जिन ठेलों से सब्ज़ी का मोल भाव करती है ...वे उसकी आज़ादी और आज़ाद खयाली को बेमानी कर देते हैं। इसलिए स्त्री की स्वतंत्रता समाजिक रूप से ही हासिल की जाने की चीज़ है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसी चीज़ एक भ्रम है। सिर्फ मेरे व्यक्तिगत चुनाव मुझे पूर्ण रूप से आज़ादी का अनुभव नही करा सकते जब तक की स्त्री जाति ने वह आज़ादी समाजिक मोर्चे पर हासिल न की हो। आखिर , आज़ादी एक सामाजिक निर्मिति जो है।

Wednesday, November 5, 2014

Thank you for not gendering !

क्या स्त्री अपनी उम्र बढने के साथ साथ जेंडर से मुक्त हो पाती है ? माने जैसे  60 की उम्र तक पहुँचते पहुँचते इतनी आज़ादी हासिल कर लेना कि घर में और सदस्यों के होते हुए,ड्राइंग रूम में,बालकनी में बिना झिझक लेट पाना या  ब्रा की लगाम से मुक्त होकर घर में या बाहर बाज़ार तक घूम आना।किसी से कहीं भी खड़े होकर बतिया लेना। या क्या ऐसा है कि भीड़ में स्त्री अपने जेंडर से मुक्त हो जाती है। हरिद्वार के घाटों पर बेझिझक महिलाओं ,लड़कियों को एक पेटिकोट बांधे नहाते देखा है और उन्हें ताड़्ते देखा है बहुत पुरुषों को।कपड़े बदल लिए जाने के क्रम में भी वे स्त्रियाँ निरापद भाव से 'कुछ कुछ ' दिख जाने को नज़रअंदाज़ कर देती हैं।जो बड़ी बूढियाँ अन्यथा लड़कियों को दुपट्टे और कमीज़ सलवार की  तहज़ीब सिखाती हैं वे ही यहाँ लड़कियों को कहती पाई जाती हैं - कौन देख रहा है तुझे ही, चल ड्रामा मत कर , डुबकी लगा । यहाँ कोई नैतिक पुलिस नहीं है। यहाँ कोई शर्म ,रोक टोक नहीं है ।यह बेपरवाही जिस खयाल से आती है उसे मैं अपने भीतर नहीं ला पाई। गंगा  के घाट से पिछली दो बार बिना स्नान किए लौटी और अब जा ही नही पाती जबकि कितना सुखद है कुछ पल के लिए यह भूल जाना कि आप 'स्त्री' हो और बल्कि उससे ज़्यादा यह कि आप ' स्त्री शरीर ' हो। धर्म कर्म के नाम पर न होता तो मैं हरिद्वार के घाटों को 'जेंडर मुक्त एरिया' घोषित करना चाहती या लिखना चाहती 'thank  you for not gendering !'

Friday, October 3, 2014

नहीं हो सकता प्यार तुम्हारे मेरे बीच

नहीं हो सकेगा
प्यार तुम्हारे-मेरे बीच
ज़रूरी है एक प्यार के लिए
एक भाषा ...

इस मामले में
धुरविरोधी हैं
तुम और मैं।

जो पहाड़ और खाईयाँ हैं
मेरी तुम्हारी भाषा की
उन्हें पाटना समझौतों की लय से
सम्भव नहीं दिखता मुझे
किसी भी तरह अब।

इसलिए तुम लौटो
तो मैं निकलूँ खंदकों से
आरम्भ करूँ यात्रा
भीतर नहीं ..बाहर ..
पहाड़ी घुमावों और बोझिल शामों में
नितांत निर्जन और भीड़-भड़क्के में
अकेले और हल्के ।

आवाज़ भी लगा सकने की  तुम्हें
जहाँ नहीं हो सम्भावना ।
न कंधे हों तुम्हारे
जिनपर मेरे शब्द
पिघल जाते हैं सिर टिकाते ही और
फिर  आसान होता है उन्हें ढाल देना
प्यार में ...

नहीं हो सकता प्यार
तुम्हारे मेरे बीच
क्योंकि कभी वह मुकम्मल
 नहीं आ सकता मुझ तक
जिसे तुम कहते हो
वह आभासी रह जाता है
किसी जालसाज़ ने दिमाग को मेरे
 प्रिज़्म बना दिया है;पारदर्शी
लेकिन
तुम्हारे शब्दों को
हज़ारों रंगीन किरनों में बिखरा देता है।

Wednesday, October 1, 2014

पतनशील पत्नियों के नोट्स


  • नीलिमा चौहान

अब मैं सुधरने की सोच रही हूं ! घर ,परिवार ,पति ,बच्चे बस इन्हीं के लिए जीना ! अचार मुरब्बे डालने और रायते के लिए बूंदी तक खुद घर में तलने वाली ,पति के आगे जवाबतलब न करने वाली ममतामयी मां और आज्ञाकारी सेविका बनकर सबका दिल जीत लेने वाली औरत बनूंगी ! ईश्वर ने साफ - साफ तौर पर अलग -अलग भूमिकाएं देकर हमें धरती पर भेजा है हम नाहक ही एक दूसरे की फील्ड में टांग अडाते रहते हैं ! अपनी बाउंडरी डिफाइन जितनी महीनता से करूंगी उतना ही पति को अपने कर्तव्यों व जिम्मेदारियों को निभाने के लिए मजबूर कर पाउंगी ! मुझे तरस आता है उन औरतों पर जो बेफिजू़ल एक बटन पति की कमीज़ पर न टांकने या थाली देर से परोसने पर पति से लताड़ी जाती हैं ! उनपर भी रहम खाने का मन करता है जो औरतें आदमियों की फील्ड में पैर जमाने की जद्दोजहद में न घर की रहती हैं न घाट की ! जितना पति पर निर्भर रहोगी व पति को खुद पर निर्भर रखोगी उतना ही तुम्हारी शादी व प्यार प्रगाढ होगा ! हम सुधर जाएं बस पति तो खुद ब खुद सुधर जाएगा !

अब तो आप सब की ही तरह इस नारीवादी औरतवादी नारेबाजी - बहसबाजी से मैं भी तंग आ चुकी हूं ! सब सही कह रहे हैं ये इंकलाबी ज़ज़्बा हम सब औरतों के खाली दिमागों और नाकाबिलिय़त का धमाका भर है बस ! हम बेकार में दुखियारी बनी फिर रही हैं ! सब कुछ कितना अच्छा, और मिला मिलाया है ! पति घर बच्चे ! हां थोडी दिक्कत हो तो पति की कमाई से मेड भर रख लें तो सारी कमियां दूर हो जाएंगी ! फिर हम सब सुखी सुहागिनें अपने अपने सुखों पर नाज़ कर सकेगीं ! सब रगडे झगडे हमारी गलतफहमियों या ऎडजस्टमेंट की आदत न होने से होते हैं ! बस कभी - कभी एक सवाल मन में उठता है वो यह कि - हम कितने सुखी हैं ये खुशफहमी तभी तक क्यों बनी रहती है जब तक हम सारी घरेलू जिम्मेदारियां हंसते हंसते उठाती रहतीं हैं ! काश जब हम पति के मोजे ,बनियान जगह पर टाइम पर न रखें और सुबह की चाय देरी से दें और फिर भी घर की खुशहाली बनी रहे साथ ही हमारे बारे में नाकाबिल औरत का फतवा न जारी किया जाए ! आस -पास की बराबरी -बराबरी चिल्लाने वाली औरतों का उलझाउ -पकाउ फेमिनिज़्म आपके दाम्पत्य जीवन के रिश्ते की पैरवी में नहीं आएगा तब और आप सोचेगी हाय एक बटन टांक ही देती तो क्या हर्ज हो जाता ??हम पत्नियों को अपना ध्यान गोल रोटियां बनाने ,रसोई के रास्ते पति का दिल जीतने और घर की स्वामिनी कहलाने के योग्य बनने में लगाना चाहिए ताकि हम पति को यह अहसास दिला सकें कि उनका कर्म है ज्यादा कमाना तथा पत्नी को घर व समाज में एक दर्जा दिलाना ! सोचिए अगर पति कमाकर लाने से इंकार कर दे तो सारा दिन बाहर खटता है वह भी तो खुद को मजदूर मान सकता है उसे घर मॆं चैन की दो वक्त की रोटी भी न मिले तो क्यों वह घर लौट के आना चाहे? निहायत ही बुरा ज़माना आ गया है घरों की शांति खत्म हुए चली जा रही है ! हर बात में दमन ,शोषण देखने की आदत पड़ चुकी है कुछ औरतों को ! ये विवाह नाम का रिश्‍ता बहुत समझदार समझौतों से चलता है जो हम पत्नियों को ही करने आने चाहिए ताकि अपने द्वारा बनाए गए सलीकेदार घर में सुव्यवस्था से रहने वाले पति को इस सुख की लत डाल सकें ! ये लत ही उसकी मजबूरी बन जाए यह हमारी स्त्री सुलभ सदिच्छा होनी चाहिए ! बाकी पुरुष की सत्ता को चुनौती की जरूरत ही नहीं पडेगी जब हम विरोध का मौका ही नहीं आने देंगी ! यूं भी पति पत्नी के संबध सब जन्नत में पहले से तय होते हैं उनको निभाने की जिद होनी चाहिए बस !

इसलिए मेरा तो मानना है कि ये बस बददिमागी फितूर है, बदजमानाई हवा है और निखालिस बदजुबानी है कि औरतों की जिंदगी में कोई जुल्‍म पेशतर है। सच बस इतना है कि गोल रोटियॉं, मुरब्‍बे पापड. तक बनाने में नाकाबिल औरतों की काहिली के चलते शादी के इस खूबसूरत रिश्‍ते पर संकट आन पड़ा है जिसे थोड़ी सी तैयारी और मजबूत इरादे से निपटा जा सकता है।  अब मैंने बस इसी इरादे को पूरा करने का हलफ उठाया है। ऊपरवाला मुझे मेरे इरादे में सफल करे ।  आमीन । 

Monday, September 29, 2014

आज़ादी

आज़ादी पर बात करना 
कैसे आसान था तुम्हारे लिए ? 

तुमने कहा- 'जहाँ शुरु होती है नाक 
किसी और की 
वहाँ खत्म होती है आज़ादी मेरी।'

और इस भोलेपन में 
तुम भूल गये 
मेरे यहाँ नाक से अधिक 
जो उन्नत है 
उसे तुमने अपनी आज़ादी में शामिल कर लिया है।

अगर नहीं होती गुफा मैं

अगर नहीं होती गुफा मैं
तो  बन जाती नदी एक दिन।
जितना डरती रही
उतना ही सीखा प्यार करना
और गुम्फित हो जाना।
 गुफाएँ कहीं चलती नहीं
 इसलिए  अगर नहीं होती लता मैं
तो बाढ हो जाती क्या एक दिन?

एक परी या तितली या पंखुरी
सूने गर्भगृह की पवित्र देहरी पर पड़ी हुई।
कभी नहीं हो पाती मैं
जैसे हो सकती हूँ आज !
हवा हो जाती मैं शायद या बयार।

लेकिन
 एक भी अच्छा शब्द
छूटा नहीं है मेरे लिए।
तुम ऊब न जाओ
चलो फिर से गाएँ वही कविता
जिसमें मैं बन जाती थी चिड़िया और तुम भँवरा।
तुम्हारी गुन गुनाहट से
मैं प्यार सीखने लगूँगी फिर से।
इसलिए शब्दसाज़ होना होगा
मुझे ही
अबकी बार।

अगर नहीं होते तुम भ्रमर तो
मैं नहीं गाती कभी कविता
मैं गद्य रचती।
 मुझे फिर से तलाशने हैं
वे छंद जो गुफासरिता से बहते हैंं।

शापित आस्थाएँ अब भी वहाँ
दिया जलाती हैं
कि गुफाएँ पवित्र ही रहें ।
और चिड़िया - या जो भी कुछ
 मैं बनूँगी इस बार-
जब तक बेदखल है
तब तक बार बार पढनी होगी वही कविता
जिसमें तुम बादल बनते थे और
धरा बन जाती थी मैं।

Friday, September 26, 2014

उसे अपराजिता नहीं बना पाए हम



उसकी कथा सुनकर और उसकी दशा देखकर अपने संतुलन को बनाए रखना एक चुनौती हो गया मेरे लिए .... वह 17 - 18 साल की लड़की एनीमिया ,गरीबी ,लाचारगी का जीवंत उदाहरण लग रही थी । वजन उसका इतना कि जिससे ज्यादा अब घट नहीं सकता था और विषाद इतना कि जीने की उसकी ललक उसे हरा ही नहीं पा रही थी । मैं अब अपनी जिंदगी बनाना चाहती हूं मैं अब कुछ करके दिखाना चाहती हूँ जैसे वाक्य वह खुद को दिलासा देते हुए बार - बार दोहराती, मानो वह चाहती हो कि उसके इन वाक्यों को हर वह व्यक्ति सुन ले जो उसकी वजह से शर्मिंदा हुए हैं । उसकी मां और नानी खास तौर पर जिन्होंने अपनी बेटी को क़ॉलेज पढने भेजा, और उसके जीवन को बनाने के लिए अपनी खाली जेबों और आशीषों भरे दिल को उड़ेल दिया। मां उंचे घरों में खाना बनाती , पिता ऑटो चलाते ,नानी सरकारी अस्पताल में सफाई का काम करती ,और रात भर घर के बच्चे उँचे ब्रांडों की जींस के मोटे कपडे को खाकों पर रखकर कैंची से कटाई करते ताकि सुबह कैंची के जोर से सूज गई हथेलियां खाली न हों उनपर चँद रुपये हों ,परिवार के खस्ता हाल महौल को उनका योगदान ..!

गरीब परिवार की पुनर्वास कालोनी के तंग गरीब घर की बेहद काली बेटी से कौन शादी करेगा ये दुख मां व नानी के अपराधबोध में बदल रहा था। अपने कालेपन और बदसूरती के अहसास की पीडा और उसपर गरीबी के अंधकार से भरा भविष्य । समाज के आवारा शिकारियों के लिए ऐसे घरों की बेटियां सबसे आसान शिकार होती हैं ! पडोस के घर में रहने वाले एक लड्के ने प्रेम और शादी का यकीन दिलाकर उस लड्की का शारीरिक शोषण किया। मां व नानी ने इस पर यह सोच कर कोई ऐतराज नहीं किया कि वह लडका अपना वादा निभाएगा ,उनकी बेटी की जिंदगी बन जाएगी ! घर के अन्य लोगों से छिपकर यह विडम्बनापूर्ण व्यापार कुछ दिन चला और बाद में लड्के दृश्‍य से गायब हो गया। लड्की को एक ऎसा शारीरिक रोग संक्रमित कर गया कि कई महीनों नानी के अस्पताल में इलाज चला , सेहत और गिरी , मन की बची खुची ताकत जाती रही। पर तीनों औरतों ने हार नहीं मानी। वे फिर से अपनी ताकत जुटाने लगीं ! बच्ची ने छूटी हुई पढाई को फिर से शुरू किया । जीवन को एक लास्ट चांस देने के लिए , मांओं के सीनों को ठंडक देने के लिए। पर उसकी दोबारा उठने की उसकी उतावली , उसके पीछा न छोडने वाले दुर्भाग्य ,और उसके दुर्जेय हालातों ने मिलकर फिर से एक खेल खेल डाला ! उसने परीक्षा में नकल की और यूनिवर्सिटी की टीम के हाथों पकडी गई । अपने भयों ,दबावों ,और असुरक्षा के प्रभाव में उसने जो गलती की उसके कारण यूनिवर्सिटी से निकाल दी गई।

उसका गरीब अभागिन और बदसूरत बेटी होने का अपराध बोध अब और अधिक बढ गया था ! अपनी जुझारू मां व नानी को निराश करने पर अब वह पूरी तरह से इस धरती पर खुद को बोझ मान रही थी। इतनी सी उम्र में उसने जीवन के साथ कई समझौते कई वादे कई प्रयोग कर डाले। उसे नहीं पता था कि वह क्या बनना चाहती थी या क्या करना चाहती थी। पर उसे लगता था कि जब मां व नानी का इतना विश्वास है तो वह जरूर कुछ न कुछ कर सकेगी। कुछ ऎसा कि उसके कालेपन पर उसे चिढाने वाला समाज उसको कम नफरत से देखेगा। उस दलदल में जिसे सब समाज कहते हैं किसी ठूंठ को पकडकर वह भी पैर जमाकर डटे रहना चाहती थी। उदासीन पिता और सुन्दर छोटी बहनों की नजर में एक जगह की दरकार उसके मन में टीस की तरह पनप रही थी। और वो लडका जिसने उसकी सेहत ,दिल और शरीर के साथ खिलवाड किया उसको चाहे वह जहां कहीं भी हो उसकी औकात बताना चाहती थी। पर अब कुछ नहीं हो सकता था अब वह टूट रही थी , पांव कांप रहे थे मन दुनिया से उठ चुका था , मां व नानी की हिम्मत का तिनके बराबर सहारा इतना मजबूत नहीं था कि तेज थपेडों में उसे बचा ले जाए ! निराशा की उस सीमा पर वह थी कि अब मुत्यु ही उसे वह होना लग रही थी। क्योंकि उसके हिसाब से अब यही सबसे सरल रास्ता था ।

मैं उसकी बीते साल की एक लाचार अध्यापिका अपने सारे फलसफों, सारे दिलासों सारे स्नेह के बावजूद समाज व हालात की शिकार उस निरीह् को उसकी पीडा से नहीं उभार पा रही थी। क्योंकि दरअसल मैं खुद कटघरे में खड़ी अपराधी थी ।

Sunday, September 21, 2014

कभी किसी पीढी में तो

आसान ज़िंदगी भी
मुश्किल हो जाती है एक न एक दिन।
दिखने मे कितना मुलायम है दलदल।
धँसते धँसते जब धँसने ही वाली हो नाक भी
तब अचानक
पूरा दम लगाकर भी निकला नही जा सकता।

मेरे रास्तों को नहीं शोधा था मैंने
आज़माए रास्तों पर से गुरज़ने वाली पुरखिनें
लिख गयीं थीं किसी अज्ञात भाषा में
कुछ सूत्र
जिनका तिलिस्म तोड़ने के लिए
मरना ज़रूरी था मुझे ।

सो मरती रही कई बार ...
बार बार ...
सच कहूँ तो कई अर्थ जान लिए हैं मैंने ।
समझ गई हूँ कि
वे मेरे रास्तों पर से निशान वाली पट्टियाँ
उलट देते थे जाते जाते
मार्ग सुझाने का चिह्न शास्त्र
जिन औजारों से समझा जा सकता था
अपने ही साथ लिए फिरते थे वे उन्हें भी
शिकारी थे जंगल के
आदिम ।

इसलिए अनुगमन करना मेरे लिए विकल्प था
एकमात्र तो नहीं इसलिए
सहेज लेना रास्तों पर से फूल-कंद
अनुगमन की ऊब से निजात देता था।
सरल मुझ पर कितना कठिनाई से बीता
इसकी कहानी
नही सुनाने आयी हूँ तुम्हे ।

लेकिन पिछली पीढियों की धूर्तता की कीमत
कभी किसी पीढी मे तो
तुम चुकाओगे !
वह साहस आज और अभी  ही क्यों ना हो । 

Sunday, June 15, 2014

दर्द की सुबहें ...

9 Feb.2014  को  यह अनुराधा की आखिरी ब्लॉग पोस्ट है...

सर्दियों की एक और सुबह


सांस की नली में कुछ अटकने के अहसास के साथ गहरी, दर्द निवारक से ठहराई नींद उचट जाती है। गला दो-तीन बार खांस कर सांस के लिए रास्ता साफ कर सुकून पा लेता है। ऐसा हमेशा सांस की नली के दाहिने हिस्से में होता लगता है, पर डॉक्टर भाई इस अवलोकन पर हंस देता है कि फेफड़ों के ऊपर दाहिना-बायां कुछ नहीं होता।

कड़ी ठंड के अंधेरे कमरे में समय का पता नहीं चलता। गर्दन के नीचे एक खास तरीके से दबी सहारा देती सी दाहिने हाथ की अंगुलियों को वहां से निकालकर धीरे से हिलाती-डुलाती हूं। दूसरे हाथ की अंगुलियां दोनों घुटनों के ठीक ऊपर पैरों के बीच दबी हैं, गर्माहट पाने के लिए। उन्हें भी तत्काल महसूस करने का ख्याल आता है। सुन्न होने के बावजूद वे चल तो रही हैं, हिलती तो हैं। पैरों के पंजे भी रोज कई बार होने वाली इस कवायद से खुश तो होते होंगे। दाहिनी करवट सोई मैं हाथ के नीचे रखे नर्म छोटे तकिए पर हाथ का जोर देकर उठती हूं ताकि रीढ़ पर जोर न पड़े।

प्यास न होने पर भी उठती हूं, दो गिलास उबला पानी पी जाती हूं क्योंकि रात-दिन कुछ नियमतः पीते रहना शरीर की जरूरत बन गया है। तभी पास की सड़क पर एक बस के ब्रेक लगने और रुकने की तेज तीखी बेसुरी किर्र-चूं की दोहरी चीखें गूंजती हैं और मैं समझ जाती हूं कि सुबह का कोई समय हो गया है। 

पानी पीकर, बाकी नींद को पकड़ने की इच्छा से बिस्तर पर लौटते-लौटते दूर कहीं से लाउड स्पीकर से कानों में आती अजान की फूंक साफ बता देती है कि सुबह की पहली नमाज का वक्त है। इसके साथ ही पास के मंदिर का लाउडस्पीकर प्रतियोगी जुगलबंदी में उतर आता है- आरती से। कुछ ही मिनिटों में एक और लाउडस्पीकर पर अजान। आरती-मंत्रोच्चार खत्म होने के पहले एक जगह अजान खत्म हो चुकी होती है। कुछेक मिनट बाद दूसरी अजान भी शांत। सब तरफ सन्नाटा।

खिड़की पर नजर डालती हूं, सुबह की रोशनी को तौलने के लिए। बंद खिड़की के कांच के ऊपरी हिस्से का धूसर उजलापन अहसास कराता है कि पौ फटने को है, जबकि कांच के निचले हिस्से से आती पीली रोशनी साफ-साफ स्ट्रीट लाइट की तेजी को दिखाती है। यानी अंधेरा कायम है। कांच से आने वाली रोशनी की तीव्रता में अंतर शायद ऊपरी हिस्से में जमे कोहरे के कारण है। पक्के तौर पर पता करने के लिए एक बार बाल्कनी की तरफ खुलने वाले दरवाजे के निचले सिरे पर नजर डालती हूं। दरवाजे का बार्डर अब भी काला है। उसमें उजास का कोई चिह्न नहीं बना है अभी।



बंद खिड़की के कांच पर एक कबूतर की चोंच की ठक-ठक- जैसे कोई करीने से दरवाजा खटखटा रहा हो। और फिर पंखों की तेज फड़फड़ाहट, जिसमें एक और कबूतर शामिल हो जाता है।

सुबह की उम्मीद वाले और उठने का समय फिलहाल न होने का ऐलान करते इन्हीं इशारों के आश्वासन के भरोसे धीरे-धीरे आंख लग जाती है। और इस तरह सर्दियों की एक और सुबह की शुरुआत होती है।

Saturday, June 14, 2014

अनुराधा तुम्हारे शौर्यपूर्ण जीवन और गौरवशाली अवसान को हम सभी चोखेरबालियों का सलाम !!

कई महीनों बाद् यहाँ लिख रही हूँ ...इस बीच कहीं नही लिखा ...लेकिन लिखने का यह मौका मिलेगा सोचा न था। आज सुबह जब पता चला कि आर.अनुराधा नहीं रहीं तो काफी देर तक समझ नही आया कि यह क्या ,वह फिर विजेता बन के उभरेगी कहीं यह आस थी जो इस खबर ने झटके से तोड़ी थी। मुझे दिल्ली हाट की एक मुलाकात में अनुराधा ने अपनी किताब एक कैंसर विजेता की डायरी दी थी शायद 2008 में । मैंने कभी इसे पूरा नहीं पढा , हिम्मत नहीं होती थी ...एक अवसाद ,दर्द और कष्ट  का पूरा ब्यौरा ...लेकिन आशावादिता ...वे ब्यौरे मुझे खतरनाक लगते थे ...कुछ गले मे अटकता सा था...पर खुद से परे हट कर खुद के दर्द और अनुभव को देखना- अनुराधा कर सकती थी  कोई शक नहीं कि कई मायनों में अनुराधा की हिम्मत और आशावादिता असाधारण थी।
चोखेरबाली की शुरुआत  के एक महीने बाद दिलीप जी एक मेल आया था - अनुराधा के लिखे एक लेख को यहाँ छापने के लिए ...फिर अनुराधा से चैट शुरु हुई ...फिल्म देखने का निमंत्रण मिला ... और कुछ मुलाकातें .. फिर सिर्फ फोन ...फिर अंतराल ...अंतहीन ....जो अब कभी खत्म नहीं होगा ...कभी नहीं..

अनुराधा तुम्हारे शौर्यपूर्ण जीवन और गौरवशाली अवसान को हम सभी चोखेरबालियों  का सलाम !!