Friday, November 14, 2014

जेंडर सेंसिटाइज़ेशन का विचित्र तरीका


सेन्सिटाइज़ेशन के लिए (?) चीन में एक रिअलिटी शो ने नायाब तरीका निकाला । वहाँ एक अस्पताल पुरुषों को उनकी पत्नी के साथ साथ प्रसव पीड़ा का अनुभव करवा रहा है एक यंत्र की सहायता से।रियलिटी शो के साथ शुरु हुए इस 'पेन कैम्प' को कुछ पुरुषों ने ज्वाइन भी किया है और अधिकतर पति दर्द को कुछ मिनट ही बरदाश्त करके भाग खड़े हुए.

  क्या कमेंट करूँ ? यह तरीका खाप-सोच वाले मर्दों को सम्वेदनशील बनाने के लिए भले ही आजमाया जाए ...पर अपने आस पास के पुरुषों को तो मैं पत्नी की इस सृजनात्मक वेदना में साथ देख रहीहूँ । केवल पत्नी को लेबर पेन में देख लेना भर पुरुष के लिए पर्याप्त कष्टदायी होता होगा मुझे लगता है।सोचती हूँ बलातकारी को भी बलत्कृत होने का अनुभव कराने की कोई मशीन ईजाद होनी चाहिए। मशीन जाने दीजिए , अपराधियों को कम से कम गधे पर नंगा कर गाँव भर घुमाने के अनुभव के लिए तो कुछ विशेष संसाधन नहीं चाहिए। देखना यह है कि अपन किस तरह की सोसायटी बना रहे हैं ...जहाँ अतिरेक हैं, बदले हैं,कुण्ठाएँ हैं और गर्त में गिरने के कई मुहाने खुल गए हैं ।

Monday, November 10, 2014

तुम चाहो तो

कैसे बिफर जाता है तुम्हारा वजूद
जब ठुकरा देती हूं मैं
तुम्हारे फैसले
जो लिए थे तुमने मेरे बारे में

कैसा तड़फडाता है तुम्हारा सुपोषित अहम
जब मैं करती हूं अनपेक्षित प्रश्न
तुम्हारे उन आकलनों पर
जो थे समर्पित मुझे
टिके थे तुम्हारे तजुर्बे की शय पर

कैसी होती है न तुम्हारी तिलमिलाहट
जिस पल तुम्हारी घोषणाओं को
टकराना ही पड़ता है
लड़खडाते मेरे नवजात तर्कों से

कैसे अचकचा जाते हो न तुम
जब अपने पहलू में मेरी जगह
पाते हो तुम मेरा मैं

ठीक उस पल चट्टानों के मजबूत छाती से गुजर
बनाती है नदी अनजान पगडंडियां
और नदियों की छाती पर तिर आता है पुल
तुम चाहो तो हम मिल सकते हैं

बहती हुई नदी के इंद्रधनुषी पुल पर प्रिय !!

Saturday, November 8, 2014

सामाजिक मोर्चे पर आज़ादी !

बहुत सी ख्वाहिशें पूरी कीं ...कुछ की कोशिश अभी बाकी है...एक ऐसी है कम्बख्त जिसकी न कोशिश कर सकती हूँ न कभी पूरी ही होगी।पतनशील इच्छा है न! पतनशील इच्छाएँ भी वैसे अपनी व्यक्तिगत कीमत पर पूरी की ही  जा सकती हैं ...पर मेरी चिंता सिर्फ अपनी अकेले की नही है।

सुबह सुबह कॉलेज पहुँचें तो मैदान मे खेल खेल कर थक चुके लड़के शर्ट उतार पाइप से नहा रहे थे। 20 वर्ल्ड कप जीतने पर खुशी ज़ाहिर करने के लिए धोनी ने अपनी टीशर्ट उतार फेंकी थी। 'रंग दे बसंती' के पोस्टर देख देख लगता था दोस्ती और मुक्ति के आनंद की सार्वजनिक अभिव्यक्ति का यह अंदाज़ चिढाता है मुझे ,स्त्री को उसकी सीमाएँ दिखाता हुआ सा ! जहाँ ट्यूबवैल या पानी मिले वहाँ ही नहाना शुरु हो जाना ...यह सार्वजनिक स्नान दुनिया को अभद्रता क्यों नहीं लगता?

श्लील अश्लील तय करने वाले पैमाने बाकी मानकों कीतरह ही स्त्री पुरुष के लिए अलग हैं।  एक के लिए अश्लीलता स्वाभाविक और एक के लिए गुनाह है।धर्म , समाज,राज्य ,कानून  पुरुष की ओर हैं। यह किसी पूर्वाग्रह से नहीं कहती बल्कि इसलिए कहती हूँ कि स्त्री कमरे के भीतर स्वयम को कितना भी मुक्त मान ले लेकिन जिन सड़कों पर वह चलती है ,जिन दफ्तरों में वह काम करती है, जिस पार्क में बच्चों को खिलाने ले जाती है, जिस खेत में निराई करती है, जिस भवन के निर्माण साइट पर मजदूरी करती है ,जिन ठेलों से सब्ज़ी का मोल भाव करती है ...वे उसकी आज़ादी और आज़ाद खयाली को बेमानी कर देते हैं। इसलिए स्त्री की स्वतंत्रता समाजिक रूप से ही हासिल की जाने की चीज़ है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसी चीज़ एक भ्रम है। सिर्फ मेरे व्यक्तिगत चुनाव मुझे पूर्ण रूप से आज़ादी का अनुभव नही करा सकते जब तक की स्त्री जाति ने वह आज़ादी समाजिक मोर्चे पर हासिल न की हो। आखिर , आज़ादी एक सामाजिक निर्मिति जो है।

Wednesday, November 5, 2014

Thank you for not gendering !

क्या स्त्री अपनी उम्र बढने के साथ साथ जेंडर से मुक्त हो पाती है ? माने जैसे  60 की उम्र तक पहुँचते पहुँचते इतनी आज़ादी हासिल कर लेना कि घर में और सदस्यों के होते हुए,ड्राइंग रूम में,बालकनी में बिना झिझक लेट पाना या  ब्रा की लगाम से मुक्त होकर घर में या बाहर बाज़ार तक घूम आना।किसी से कहीं भी खड़े होकर बतिया लेना। या क्या ऐसा है कि भीड़ में स्त्री अपने जेंडर से मुक्त हो जाती है। हरिद्वार के घाटों पर बेझिझक महिलाओं ,लड़कियों को एक पेटिकोट बांधे नहाते देखा है और उन्हें ताड़्ते देखा है बहुत पुरुषों को।कपड़े बदल लिए जाने के क्रम में भी वे स्त्रियाँ निरापद भाव से 'कुछ कुछ ' दिख जाने को नज़रअंदाज़ कर देती हैं।जो बड़ी बूढियाँ अन्यथा लड़कियों को दुपट्टे और कमीज़ सलवार की  तहज़ीब सिखाती हैं वे ही यहाँ लड़कियों को कहती पाई जाती हैं - कौन देख रहा है तुझे ही, चल ड्रामा मत कर , डुबकी लगा । यहाँ कोई नैतिक पुलिस नहीं है। यहाँ कोई शर्म ,रोक टोक नहीं है ।यह बेपरवाही जिस खयाल से आती है उसे मैं अपने भीतर नहीं ला पाई। गंगा  के घाट से पिछली दो बार बिना स्नान किए लौटी और अब जा ही नही पाती जबकि कितना सुखद है कुछ पल के लिए यह भूल जाना कि आप 'स्त्री' हो और बल्कि उससे ज़्यादा यह कि आप ' स्त्री शरीर ' हो। धर्म कर्म के नाम पर न होता तो मैं हरिद्वार के घाटों को 'जेंडर मुक्त एरिया' घोषित करना चाहती या लिखना चाहती 'thank  you for not gendering !'