Saturday, May 2, 2015

वैवाहिक बलात्कार का समर्थन करने वाली पवित्र संसद पर हमें शर्म आती है !


न जाने आप लोग किस दुनिया में रहते हैं। शायद आपको जीते जी जन्नत नसीब हुई है। मुझे भी हुई है। लेकिन मैंने अपने आस पास के दोज़ख से आँख बंद नहीं कर ली है। मेरे घर आने वाली हाउस हेल्प, मेरे मोहल्ले की पड़ोसिन, सैलों में मिलने वाली ब्यूटीशियन , कभी सब्ज़ी के ठेले पर टकरा गयी अजनबी स्त्री , अस्पताल में मिली नर्स , और अपने ही घर की भी कोई स्त्री कभी कभी... जिनके पास बच्चे हैं , दिन भर निभाने को ढेरों काम हैं, सेवा करने को ससुराल में बहुत लोग हैं , उनके लिए रात को अक्सर बिस्तर में पति के "सेवा" भी अक्सर एक काम ही है जिसके लिए कभी मना करने पर उन्हें सुनना पड़ता है -"तेरे जैसी पत्नियो के पति ही बाहर मुंह मारने को मजबूर होते हैं।" कुछ महीने सालावान स्कूल राजेन्द्र नगर में पढ़ाया था मैंने। मुझसे 5 साल उम्र में बड़ी मेरी कलीग ने मेरी शादी के समय मुझे यह राज़ बताया कि कितना भी बेमन हो ,थकी हो, पति को कभी "न" मत कहना। यह राज़ भी उन्होंने बताया कि अब वे इसे काम ही समझती है आनंद नहीं आता उन्हें। एक महीने के रिफ्रेशर कोर्स में दोस्त बन गयी एक अध्यापिका एक दिन फट पडी। बोलीं जिस दिन उसकी छूट्टी होती है कमबख्त सारा दिन पिराई कर देता है। एक टाइम बना खाना दुबारा सामने रखना पाप है। सारा दिन सेवा करो और छुट्टी वाले दिन थका भी नहीं होता तो रात को भी...मैं ईश्वर से मनाती हूँ कि उसकी छुट्टियां ही न हों।...मेरी हाउस हेल्प को इंकार करने पर हाथ और गाल पर परमानेंट जले के निशान मिले हैं और पति की दूसरी शादी और उसका परित्याग भी।

और जाने कितनी सच्ची कहानियाँ हैं मेरे पास। ये स्त्रियां वैवाहिक रेप को रेप मानती हैं पर कह नहीं पाती क्योंकि आप बरदाश्त नहीं कर पायेंगे कि बिस्तर में पत्नी की इच्छा का सम्मान करना भारतीय मर्द ने सीखा नहीं। ऐसे ही मर्द संसद में आपका प्रतिनिधित्व करने के लिए भी मौजूद हैं । इसलिए मैं , स्त्री होने के नाते स्त्री जाति का प्रतिनिधित्व करते हुए, यह कहना चाहती हूँ, कि संसद हमारे लिए नहीं है, वह हमारे पक्ष में नहीं , हम इस देश की सम्मानित नागरिक नहीं।