Thursday, December 29, 2016

मेरा होना बड़ा ज़रूरी था...

 
अनुराधा सिंह : मुख्य धारा की प्रमुख पत्रिकाओं और ब्लाग्स में कविताएँ समीक्षाएँ और अनुवाद प्रकाशित एवं प्रकाशनाधीन। संप्रति: मुंबई में प्रबंधन कक्षाओं में बिजनेस कम्युनिकेशन का अध्यापन ईमेल: anuradhadei@yahoo.co.in

मेरा होना बड़ा ज़रूरी था .....रहती दुनिया के लिए . मैं दुनिया के होने की सबसे अद्भुत निशानी थी और उसके होने का कारण भी. फिर भी कुछ ज़रूरी नहीं था मेरा होना. अपने होने की, यूँ और यहाँ होने की सफाई देते देते मैंने कई जिंदगियां काट दीं. 

रोज़ सुबह चढ़ाती

रात को भिगोये गैरज़रूरी बीज गैस पर

उतारती जाती निषिद्ध सुखों के छिलके

मुंह अँधेरे करती देवों और दानवों का शुकराना

बनी रहे छीलने और उबालने की

प्रासंगिकता ऐसी ही

रात लिखती निरर्थक कामनाओं की स्वीकारोक्ति

अगले दिन की तैयारी प्रायश्चित की इमला

सिहरती उस दिन से जब नहीं सिद्ध कर पायेगी

किसी एक काम की सार्थकता .


लगभग तीन सौ सालों से जानती थी वह कि पति नाम का इंसान जो प्रेम या साधन से जैसे भी वरण करेगा उसका. तुरंत ही उसके सब अच्छे बुरे (या जो उसे अच्छा, बुरा लगेगा) का उत्तरदायी हो जायेगा. कम से कम वह तो ऐसा ही मान कर चलेगा. लगभग दस सालों से जानती थी कि उसके बोलने का लहज़ा हर वक़्त इतना नरम होना चाहिए कि किसी कांच से अहम् पर चटख न लगे. उसने देखा था, पुरुष अच्छे मित्र होते हैं, बस पति बनते ही ऐसे हो जाते हैं. वरना भला ग्यारह साल पहले प्रेम विवाह ही क्यों करती वह अनुज से. ताज्ज़ुब है कि अब भी उसे बोलने की इच्छा होती थी, ढेर सा कहने की. जोर से कहने की. ठहाके लगा कर हंसने की. इतना हंसने की कि भीतर का पत्थर पानी बनकर आँखों के रास्ते बह निकले. लेकिन उन पहाड़ों में ऐसी एक दरार तक न थी जहाँ से वह धारा बाहर आ पाती सो उसने रास्ता दूसरा चुना, चुप से सन्नाटे की तरफ जाता. शाम को लाइब्रेरी जाने लगी. वहाँ संजय से दोस्ती हुई और जल्द ही वह उसका भरोसेमंद हो गया. वे बातें जो इससे पहले उसने खुद ने भी नोटिस नहीं की थीं संजय पुलों में बाँध देता, लेकिन एकदम जेन्युइन, हाँ? बन्दे को देखकर पता चल जाता है. मज़ा आने लगा खुलकर बोलते हुए, एक अनजान व्यक्ति से अपनी घुटन और कुंठा बाँटते हुए. अँधेरी कोठरी में छोटी सी ही सही एक खिड़की खुल गयी. वे पुस्तकालय से विश्वविद्यालय तक जाने वाली छायादार सुकूनभरी सड़क पर घंटा भर चहलकदमी करते. इस दोस्ती से न उसे परहेज़ हुआ न गुरेज़ क्योंकि वह एक पूरी दुनिया जी लेती उसके साथ. थिएटर की, साहित्य की, यायावरी की, मुक्ति की. लगता था जैसे भाग आई हो अपने जीवन और मन से. हालाँकि देह अब भी वहीँ थी उसी संयुक्त परिवार की दोमंजिला कोठी में अनुशासित यांत्रिक. तमाम वर्जनाओं और हदबंदियों के बीच यही एक घंटे की पैरोल मिली थी उसे. यही सरल सहज रास्ता लगा, नैतिक और ईमानदार भी. लेकिन दोस्ती के दूसरे ही महीने में वह भाग आयी वापस अपने पिंजरे में . संजय ने कुछ नहीं किया था बस यह पूछा था, ‘तुम्हें ज़रूरत क्या थी कैफेटेरिया के लड़के को डाँटने की, मैं था न वहाँ?’ पौलिश्ड चेहरे के साथ सलीकेदार पार्क एवेन्यू आवाज़ भी तमतमाने लगी. सीएफएल चाँद टूटा छनाक!! वह धुंधलके में आँखें गड़ा कर पहचानने कर कोशिश करती रही, संजय या अनुज? अनुज या संजय? सब गड्ड मड्ड हो गया. फिर भी बात के दूसरे हिस्से को नज़रंदाज़ करते हुए उसने बमुश्किल कहा, “अरे यार रोज़ बद्तमीज़ी करता था डांट दिया तो क्या बड़ी बात हो गयी?” पता है न हम स्त्रियाँ अंतिम साँस तक बात सम्हालने की कोशिश करती रहती हैं. और अगर वह तुम्हारी डांट के बदले में भिड़ जाता तुमसे, तो? बेइज्ज़ती तो मेरी होती. ज़रूरत ही क्या थी कुछ कहने की?’ ...........‘संजय आज न मुझे ज़रा जल्दी घर जाना है, फिर मिलते हैं”, और वह उलटे पैरों प्रथम पुरुष के पास लौट आई जिसे समाज और विधान ने ऐसे सवाल पूछने का हक़ दिया था, जिस जवाबदेही से घबराकर वह उस घनी छायादार सड़क पर भागी थी, लौट आई उसी बाध्यता पर. मसलन, ज़रूरत ही क्या थी? जाने की, आने की, बोलने की, चुप रहने की, लिखने की, पढ़ने की? और अनंत ..... 

लेकिन इस वाकये से वह इतना तो समझ ही गयी थी कि बात पति और मित्र की नहीं पोजीशन की होती है. अधिकार हो जाने की थी. मानसिकता की थी. भाग कर जाती भी कहाँ? इससे पहले भी तो कोई बात कभी ज़रूरी नहीं थी उसके लिए. दुनिया के किसी कोने में वह धक्का मार कर गिरा दी गयी? भीड़ भाड़ में कोई अपनी लोहे जैसी कोहनी घोंप देता है उसकी छाती में और घर में सांत्वना की बजाय सवाल पूछा जाता है क्या ज़रूरत थी इतनी भीड़ भरी ब्रिगेड रोड पर अकेले जाने की, क्या ज़रूरी थे बच्चों के कपड़े आज ही खरीदने? ज़रूरत ही क्या थी पांच लड़कियों के अकेले सिनेमा जाने की? वह हताशा से सर झटकती अपने आस पास खिंचा कटघरा उतारते हुए हाथ मुँह धोने चली जाती है, आँखें भी, जो क्षोभ और अपमान से भर आयीं हैं. ज़रूरत क्या थी तुम्हें ......?..यह सवाल देखते ही देखते प्रताड़ित को अपराधी के कटघरे में खड़ा करने कि क़ुव्वत रखता है. बहुत पुरानी नज़ीर है, दिल्ली के जघन्य निर्भया कांड के विषय में पुरुषों से भी अधिक स्त्रियाँ यह सोच रही थीं कि ज़रूरत ही क्या थी भला निर्भया को इतनी रात गए एक पुरुष मित्र के साथ सड़कों पर घूमने की. ऐसी लड़कियों के साथ ऐसा ही......


शायद मैंने मिसाल भी ऐसी दे दी है जिसके पक्ष में बहुसंख्या है. ज़ाहिरन यह तो सब मानते थे कि निर्भया के साथ बहुत बहुत बुरा हुआ और उसके अपराधियों को कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए. लेकिन अंततः ज़िम्मेदार वह खुद थी. हम सोच ही नहीं पाते कि घूमने फिरने या ज़रूरी काम से बाहर जाने वाले स्त्री या पुरुष के लिए रात के १० और ११ में बहुत भारी अंतर नहीं होता. इतना बड़ा तो नहीं ही जिसकी सज़ा बलात्कार या हत्या करके दी जाये. अगर निर्भया के साथ उसका मित्र नहीं पति होता और वह गले में मंगलसूत्र पहने होती तो क्या वे बलात्कारी उसे बख्श देते? लेकिन कहाँ छोड़ पाएंगे हम शोषित को कसूरवार ठहराने की मनोवृत्ति? आसान नहीं है. आजकल व्हाट्सएप समूहों के ज़रिये साहित्यिक चर्चाएँ खूब सफल हो रही हैं. लेकिन यदि न सफल हो और खटास पड़ जाये तो वह एडमिन और सदस्य नहीं बल्कि एक स्त्री और पुरुष के बीच की बात हो जाती है. सबसे पहले छवि खराब करने की साजिश को अंजाम दिया जाता है. यहाँ स्त्री की असम्प्रक्तता या शालीन चुप्पी से सामने वाले का साहस बढ़ता है. अब क्या
करेगी वह ? पहले तो यह यक्ष प्रश्न ही अड़ जायेगा कि ज़रूरत ही क्या थी कोई व्हाट्सएप ग्रुप जॉइन करने की और फिर वहाँ बोलने (नेतागीरी करने) की? क्या कहेगी वह कि ये सब जीने के ज़ोखिम हैं, स्त्री होकर जीने के ज़ोखिम. स्त्री होकर लिखने के ज़ोखिम? कौन मानेगा उसे बिना संदेह सही . किशोरावस्था में ज़रूरी काम से बाज़ार गई, बारिश आ गयी, चप्पल टूट गयी या पैसे खो गए तो जवाब इसी सवाल का सबसे पहले देना पड़ा ज़रूरत ही क्या थी आज अभी या कभी जाने की?’ इतना गैर ज़रूरी होता है उनका सब किया धरा कि कुछ करते समय पूरा विश्वास ही नहीं आया अपने आप पर. साइंस पढनी चाहिए या आर्ट्स? कहाँ के निमहांस में एडमिशन लेना चाहिए, पढ़ने बाहर जाएँ या शहर में ही रुक जाना चाहिए? छोटे से छोटा निर्णय लेते समय तमाम किन्तु परन्तु और ज़रूरी गैर ज़रूरी होने की तलवारें लटकने लगीं. अंततः खारिज़ कर दिए कई ज़रूरी निर्णय खुद ही, कि आख़िर कौन बहस में पड़े, दलील दे, चुपचाप घर में बैठो. अकूत दौलत के मालिक की बीवी को भी अपना होना ऐसा ज़रूरी नहीं लगता. दसियों कमरे के एक घर में जहाँ नौकरों तक के कमरे होते हैं, वहाँ उसके पास बस पति के साथ साझा एक शयनकक्ष ही होता है. हाँ, पति के पास व्यवधानरहित स्टडी हो सकती है. कमरा होना तो बहुत बड़ी बात है. एक मेज तक नहीं हो सकती है उसकी अपनी. कुसुम ने कहा कि वह अक्सर शाम को घर से १ किलोमीटर दूर एक बाज़ार में सब्जी लेने चली जाती है. या बेसन, पोहा, बच्चों का क्राफ्ट का सामान या ऐसा ही कुछ और. वह वहां तक पैदल जाती है. यह छोटी सी वाक उसे अच्छी लगती है. लेकिन अगर कोई व्यक्तिगत ज़रूरत हो तो जाना खुद ही टाल जाती है. एक बार नितांत आवश्यक हो आने पर कुछ निजी सामान लेने निकली तो घर में तमाम हिदायतें और इंतज़ामात करती गयी जैसे जाने कैसी अय्याशी और गैरज़रूरी तफरीह के लिए और कई दिनों के लिए बाहर जा रही हो. घर में किसी ने उसे जाने से नहीं रोका या शायद पहले कभी किसी ने ऐसे गैरज़रूरी कामों पर समय बर्बाद करने पर गुरेज़ किया भी हो जो अब उसे याद नहीं. लेकिन उस दिन वह रास्ते में अपने आप पर बुरी तरह झुंझला उठी. क्या है? क्या अपने आपको इस लायक भी नहीं समझती कि अपने ही समय में से आधा घंटा अपने ऊपर खर्च कर सके. दूसरों को क्यों दोष दे. ऐसी भी मेंटल कंडीशनिंग किस काम की.


क्रिस्टोफ़र पोइंडेक्सटर की एक कविता खुली है मेरे सामने 


– ‘दरअसल यह बेहद खूबसूरत था 
 कि कैसे उसने उसके भीतर की सारी 

असुरक्षाओं को सुला दिया 

कैसे उसकी आँखों में डूब कर 

वह उसके सारे भय निकाल लाया 

और फिर स्वाद चखा उन सपनों का 

जो छुपा रखे थे उसने अपनी हड्डियों 

के पीछे 

गुडी मुड़ी करके .’ 

कविताओं से बाहर अब भी कुछ ज़रूरी नहीं उसके लिए. बेटी कहती है उसे बारह सौ रूपए की कहानियों की किताब लेनी है, तो वह पूछ ही लेती है, ‘क्या ज़रूरी है खरीदनी?’ पति तुरंत ऑनलाइन आर्डर कर देता है, बिना किसी संशय के. घर उसका, पैसा उसका, बेटी उसकी, निर्णय उसका. मना तो उसे भी कोई नहीं करेगा. बैंक में लाखों रुपये उसके नाम हैं लेकिन डरती है कि अगर पूछ लिया गया कि क्या ज़रूरत थी यह किताब लेने की तो क्या कहेगी. निर्णय लेना बड़ी ज़िम्मेदारी है, सफाई देना और भी बड़ी. पैसा ही नहीं आराम, मनोरंजन, इलाज, दोस्त, शौक, कैरियर. अंतहीन सूची है गैरज़रूरी बातों की. बहुत से पुरुष भी इतने ही समर्पित होते हैं परिवार के लिए, वे भी अपने शौकों और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को तरजीह नहीं देते हैं. लेकिन यह फर्क समझना बहुत ज़रूरी है कि ऐसा करना वे खुद चुनते हैं. बाध्यता नहीं होती कहीं से. सो बात यहाँ आ कर रूकती है कि हमारा चुप रहना ज़रूरी नहीं था, बोलना भी क्या ज़रूरी था .


फिर भी जिए जा रहे हैं यह गैरज़रूरी ज़िन्दगी इसकी बेहद ज़रूरी शर्तों पर . अपने होने और मुक़म्मल बने रहने के संशय के बीच फैज़ याद आ जाते हैं-
 सफ़े-ज़ाहदां है तो बेयकीं, सफ़े-मयकशां है तो बेतलब/

न वो सुबह विरदो-वज़ू की है, न वो शाम जामो-सुबू की है.
(मेरे लिए धर्म उपदेशकों की या शराबियों की कतारें एक जैसी ही बेमायनी हैं. क्योंकि न मेरी सुबहों में इबादत और वज़ू के लिए यकीन शामिल हैं, न ही मेरी शामों में सुराही और प्याले की तलब है.) – 

Wednesday, October 12, 2016

बंदा बनना है तो पहले कंधा बन ...

- सुजाता

कई दिन हो गए टीवी पर शाहरुख लड़कों को सीख दे रहे हैं कि अगर फेयर और हैण्डसम नहीं होगा तो लड़कियाँ तुझे कंधा बना कर इस्तेमाल करेंगी और तेरे हाथ खुछ नहीं आएगा। रंगभेदी और लिंगभेदी यह विज्ञापन मुझे बार-बार खतरनाक लगता है। इस विज्ञापन से लड़कियाँ बार बार ऑफेण्डेड क्यों न महसूस करें ? लड़कियों की तरह रो मत! लड़कियों की तरह शरमा मत! लड़कियों की तरह डर मत! लड़कियों की तरह मुँह लटॅका कर मत बैठ! की ही तरह 'कंधा मत बन' की यह सीख आप उस देश के लड़कों को दे रहे हैं जहाँ परिवारों में लड़के एक गिलास पानी भी अपने हाथ से पीने का संस्कार नहीं लेते। जहाँ 'मर्द' होने का अहंकार इतना ज़्यादा है कि 'ना' सुनने पर लड़कियो के मुँह पर एसिड डाल जाते हैं या सबक सिखाने के लिए पुराने फॉर्मूले बलात्कार का इस्तेमाल करते हैं। यह विज्ञापन न सिर्फ साँवले रंग का अपमान है बल्कि औरत को भी स्त्रियोचित के लिए अपमानित कर उसके स्टीरियोटाइप में बंद करता है। यह विज्ञापन कई तरह के अर्थ दे रहा है। औरतों की क्रीम इस्तेमाल करना मर्दानगी के लिए शर्म की बात है यह साफ है। छिपा हुआ अर्थ है कि औरत का कंधा बनना भी ! वह तो आपकी मर्दानगी से प्रभावित होकर आपकी दोनो बाहों में झूले तभी बंदा होना सार्थक होगा ।
मै 'बंदा' शब्द के इस भयानक नए इस्तेमाल (शायद कूल ड्यूड जैसा साउण्ड करने वाला) से भी चकित हूँ। सब एक ही ईश्वर के बंदे हैं और बंदगी जैसे शब्द सुनते हम बड़े हुए और आज अचानक जब इस संदर्भ में बंदा- बंदी सुनते हैं तो सकपका जाते हैं। मानों पब्लिक स्पेस में लड़कियों के निकल आने से जो चारों तरफ बहार छाई है उसमें तेज़ बाँके बंदों को छोड़ बाकियों के लिए कोई उम्मीद है तो बाज़ार की ऐसी बेहूदी क्रीमों में ही है।
शाहरुख को मैं कहना चाह्ती हूँ कि वक़्त बदल रहा है ...एक पढी-लिखी करियर ओरियण्टेड लड़की दो दिन में ऐसे गोरे रंग के बंदे से ऊब जाएगी जो अकेली खटती हुई पत्नी का हाथ बँटाने की बजाए सिर्फ स्टाइल मारता हो और सण्डे को कुछ मज़ेदार नाश्ता मांगने से पहले देर तक बिस्तर तोड़ता हो। लड़कियों नें अपनी भूमिकाओं में कितनी नई ज़िम्मेदारियाँ अपने कंधे पर उठाई हैं। ऐसे में अगर साथी पुरुष उनका कंधा नहीं बनेगा तो उसका बंदा होना लड़कियाँ ज़्यादा दिन नहीं ढो सकेगीं। इसलिए डियर शाहरुख, लड़कों को अगर बंदा बनना ही है तो उन्हे पहले कंधा तो बनना ही होगा , बोझ ढोने वाला नहीं, दर्द-खुशी-संघर्ष में बराबरी निभाने वाला। थोड़ा कम मर्द ! यानी टिपिकल वाला मर्द नहीं।जैसे लड़कियाँ आज थोड़ी कम लड़की हैं। टिपिकल वाली नहीं। जिनका इलाका सिर्फ घर नही है और चूल्हा नहीं है।

Sunday, October 9, 2016

सम्वादों के आइने में लघु जीवन के बड़े सच


रिचा साकल्ले
वरिष्ठ टीवी पत्रकार
कविताएँ लेख व समीक्षाएँ प्रकाशित
फिलहाल टीवी टुडे आजतक से सम्बद्ध 

रिचा साकल्ले ने चोखेरबाली के लिए ये सम्वाद कथाएँ लिख कर भेजी हैं। ये हमारे आस-पास ही की कुछ कहानियों के सम्वाद हैं। चोखेरबाली पर हमने हमेशा प्रयास किया है कि सीधे थियरी न लिख कर सादी भाषा में अपने और अपने आस-पास के अनुभवोंं को इस तरह साझा करें  कि स्त्री विमर्श की थियरी उनसे इमर्ज होती हो। 


लघु संवाद कथा  1

दो बच्चे थे एक एक साल की उम्र के अंतर के कि अचानक तीसरा भी पेट में आ गया। ख़बर मिलते ही क्रोधित पति ने पत्नी से कहा-बेवक़ूफ़ औरत क्या कर दिया तूनेकुछ अक़्ल है या नहीं? ज़िंदगी की कोई समझ भी है?
पत्नीक्या मैं अकेले दोषी हूंतुममे इतनी समझ है तो तुम्ही समझा देते।
पति-(तड़ाक) ख़ूब बोल रही है तू ,अब जो करना हो कर,नहीं चाहिए मुझे तेरी ये औलाद
पत्नी चुप।
पति- मुँह पर पट्टी बाँध ली है क्या ****द
पत्नी- गाली क्यों दे रहे हो? बोलती हूं तो कहते हो कि ख़ूब बोल रही है। जो हो गया उसमें तो दोनों की ज़िम्मेदारी है।
पति- ज़्यादा भाषण मत दे और जाकर गिरा दे बच्चा
पत्नी- अब अकेले नहीं जाऊँगी। दोनों बच्चों के टाइम भी अकेले अस्पताल के चक्कर लगाती रही। अब साथ चलो तुम भी।
पति-***ड़ी की, मेरे पास टाइम नहीं है इन फ़ालतू कामों के लिए। जा अपने बाप के साथ जा और अबॉर्शन करा के ही अपनी शक्ल दिखाना।
पत्नी ने पिता के साथ जाकर अबॉर्शन कराया और पति के साथ शादी के 5 साल पूरे कर लिए हैं एक अंदरूनी चुप्पी के साथ

लघु संवाद कथा  2

पहला सीन
20 वर्षीय मेड बोली- दीदी आपको एक बात बतानी थी पर किसी को बोलना मत, मेरी मम्मी को भी नहीं
दीदी-हाँ बोल नहीं बोलूँगी किसी को
मेड-खाओ मेरी क़सम
दीदी-ठीक है तेरी क़सम
मेड- मेरा एक ब्वॉय फ़्रेंड है, मैं घर में झूठ बोलकर उससे छिप-छिप कर मिलने जाती हूँ, हम घूमने जाते हैं उसने मुझे गिफ़्ट भी दिए हैं। दीदी मैं उससे बहुत प्यार करती हूँ और शादी भी करना चाहती हूँ।
दीदी- कर लेना क्या दिक़्क़त है
मेड- मेरे पापा हैं ना दिक़्क़त वो मेरी शादी उससे नहीं करेंगे
दीदी- अच्छे से बता दे प्यार से थोड़ा
मेड-अरे अगर मैंने बता दिया तो मेरी हड्डी पसली तोड़ देंगे
दीदी- ऐसा कर पहले मम्मी को बता वो पापा से बात कर लेंगी
मेड-अरे नहीं बाबा वो तो मम्मी और मेरे को पीट पीट कर दोनों को घर से बाहर निकाल देंगे
दीदी- अरे वो मारते भी हैं क्या दोनों को
मेड- और नहीं तो क्या ज़रा सा घर देर से पहुँचो तो बस गाली ही गाली और जूता उठाकर मारते हैं।दीदी कुछ नहीं मैंने तो बस सोच लिया है अगर मेरी शादी उससे नहीं हुई तो फाँसी से लटक जाऊँगी।
दूसरा सीन
डॉक्टर बाप 20 साल की बेटी से-मैंने तुमको बता दिया है शाम को 6 बजे से पहले तुम मुझे घर के अंदर दिखनी चाहिए और अगर ऐसा नहीं हुआ तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा
थोड़ी देर बाद बेटी का मोबाइल घनघनाया बात होने के बाद बाप- किसका फ़ोन था
बेटी- एक फ़्रेंड का
बाप- ये क्यों रोज़ फ़ोन करता है, तुम इससे इतना हँस हँसकर क्यों बात करती हो
बेटी-दोस्त है मेरा कई तरह की बातें होती हैं डैडी अब सब बातें आपको बताऊँ क्या
बाप- ये क्या उस लड़के ने सिखाया है बाप से ऐसे बात करना।
बाप ने मोबाइल फेंका, बेटी को चांटा मारा और उसकी माँ से कहा-बिगड़ रही है तेरी बेटी, समझा दो इसको वरना दोनों को घर में ही बंद कर दूँगा।
बाप के जाने के बाद बेटी माँ से- मम्मी ये पापा के व्यवहार से में तंग आ गई हूँ देख लेना एक दिन सुसाइड कर लूँगी।

लघु संवाद कथा  3
पति (काम से थका हुआ) काम से घर साथ आई पत्नी से- मैडम फटाफट पानी दे दो और अदरक वाली चाय बना दो
पत्नी- रूको, थोड़ा आराम कर लूँ फिर बनाती हूं
पति-तुम समझती ही नहीं हो। थका हुआ हूँ। तुमको अपनी पड़ी है
पत्नी- तो थककर तो मैं भी आई हूँ
पति-ये तो पहले सोचना था, काम का शौक़ तुमको है। घर में रहो और सेवा करो
पत्नी- अरे तो घर में रहकर काम करने वाली औरतें नहीं थकतीं क्या? घर में रहकर भी थक जाऊँगी तो तब भी तुमको बनानी पड़ सकती है चाय।
पति- ज़ुबान मत चलाओ नहीं तो धर दूँगा यहीं. भूल जाओगी ज़ुबान चलाना
पत्नी ने चाय बनाकर पिला दी।
अगले दिन,
थकी हुई पत्नी ने काम से घर साथ लौटे पति से कहा- भई कल मैंने पिलाई थी चाय। आज तो तुम पिला दो
पति-तुम्हारी माँ को तुम्हारे पिता ने कभी चाय पिलाई है जो मैं पिलाऊँ । जाओ चुपचाप अपनाकाम करो।
पत्नी ने फिर चाय पिला दी।

लघु संवाद कथा  4 
पहला सीन
उसके पति और ससुरालवालों ने पति की शारीरिक बीमारी छिपाकर उसके साथ शादी की, शादी के बाद जब उसे पता चला तो पूरे 6 महीने वो ठीक से सो नहीं पाई, हिम्मत बटोरी, घर ठीक से चले इसलिए नौकरी ज्वाइन की और इस धोखे को अनदेखा कर तन मन धन से पति की सेवा में जुट गई। घर बाहर पति बच्चे सबको संभालती दोहरे बोझ से दबी पत्नी एक दिन बोली- यार बहुत हो चुकी घर-बाहर की ज़िम्मेदारी।अब थक चुकी हूँ। आराम करना चाहती हूँ ।
पति-तुम्हारा दिमाग़ तो ठीक है ना? नौकरी छोड़ने की बात आइंदा सोचना भी मत। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ये सोचने की?
पत्नी-मैं भी तो इंसान हूँ। आख़िर कब तक झेलती रहूँगी ये सब?
पति- तुम जो कर रही हो वो कोई अनोखा नहीं है। तुम्हारी जगह कोई भी होती वो यही करती। ये ड्यूटी है तुम्हारी।
थोड़ा श्रेय, सहानुभूति, प्रेम भरी बात चाह रही पत्नी को धोखेबाज़ पति ने अहम और कर्तव्य का जूता जड़ दिया था।
दूसरा सीन                                                             
अपनी लड़की की शारीरिक बीमारी छिपाकर पिता ने उसकी शादी कर दी।
बात खुलने पर पति भड़क उठा- ये धोखा मुझसे बर्दाश्त नहीं। तुम जहाँ से आई हो, वहीं वापस चली जाओ।
पत्नी- देखो, मैं माफ़ी चाहती हूँ लेकिन ये मेरे पिता ने किया मैंने नहीं।आपको जो दुख पहुँचा वो मैं समझती हूँ। लेकिन मैं आपके और आपके घरवालों को शिकायत का मौक़ा नहीं दूंगी। मैं इस बीमारी के बावजूद सब अच्छे से संभाल लूँगी।
पति- अरे तेरी बीमारी का ख़र्चा कौन उठाएगा? अपने बाप से पैसे लेकर आती फिर इलाज के।
पत्नी- प्लीज़ माफ़ कर दीजिए।मैं नौकरी कर लूँगी। मुझे एक स्कूल में नौकरी मिलने वाली है।
पति- मुझे तेरी शक्ल से नफ़रत हो रही है। चल निकल यहाँ से।
पति और ससुराल वालों ने लड़की को घर से निकाल दिया। पति उसे तलाक़ भी नहीं दे रहा।

Tuesday, August 16, 2016

मूंछे, ब्रा और फेमिनिज्म

-  सुजाता 

क्या  बेहूदगी है !
-          सॉरी सर ! बस हँस ही तो रही हूँ ...

बकवास ! इस बहस को अभी , इसी वक़्त खत्म किया जाए ।

-          ओह , डाली से उलटी लटकी चिड़िया के पंख में छिपा कीड़ा आपकी नाक में घुस गया है
             छींक कर उसपर एहसान नहीं करेंगे साहब !
             कबूतर नोचते जो पंख फंसा है      
             खखार के थूकिये उसे ...धरा पावन हो जनाब !
             
            
खबरदार ! आगे एक शब्द नहीं  ...

         ठीक  मैं चुप सुनूंगी ।
-          इस परिवार में एक आप ही समझदार हैं
       सालों से जेब भी है आपकी पैण्ट में
       आप ही न्याय करें !                     
(फरियादी महिला की फरमायश पर ; तलवारी आवाज़ और मूँछीले तर्कों का सिलसिला ...ढैन ट टैन ...! )
                                                                                                    
                                                                                                     होती पुरुष तो शोक में बढा लेती मैं अपनी दाढी
                                                                                                     अभी तो वह खिचड़ी भी न होती
                                                                                                     पैक अप कब होगा
                                                                                                 मेरी नई कुर्ती की जेब में रखे चने खत्म हो गए तो
        देखना !                 
             जल्दी  क्या  है ! अभी तो एक गाना भी आएगा-  
             आज़ादी !
           - दो गुलामियों के बीच चयन की स्वतंत्रता
             दो औरतों के बीच तनी हुई रस्सी सा आदमी
             दो आदमियों के बीच लटकी अधमरी औरत
             तीन मुर्गे तीतर तीन
             दिल्ली मैक्लॉडगंज- दिल्ली !
             बिहार- यूपी कश्मीर !
             काला-सफ़ेद-रंगीन 
           
          

एक सिंदूरवान फेमिनिस्ट रोती है कलीग के कंधे पर
वह हँसता है शातिर , दाँत क्लोज़ अप में अगली बेस्ट सेलर आपकी होगी ...
सद्योन्मुक्ता !

दीवारों पर सखियाँ हैं , छ्प्पन इंच के सीने हैं पोस्टरों पर ,साथ में उनके खम्भे मुस्तैद , घिघियाए
एक सौ आठ में एक पोस्टर कम है

मेरी आँख चलेगी हुज़ूर ?
फोड़ लो , बहुत बोलती हैं ।
सर, जल्दी नाराज़ होते हैं कोई पानी पिलाओ
पॉर्न दिखाओ ... पॉलिटिक्स सुनाओ ...नहीं नहीं सिर्फ़ सुनो
                                                                                                     कभी नाव गाड़ी पर कभी गाड़ी नाव पर परफेक्ट!
                                                                                                                 ई ल्यो फोटू - रब ने बना दी जोड़ी टाइप   
मार धड़ाधड़ लाइक, फटाफट
शुक्रिया !
शुक्रिया !
शुक्रिया !
ओह ...मैडम
झुकते-झुकते गिरीं
उड़ते-उड़ते बिखर गईं ज़ुल्फें ...
कोई इतनी तारीफ न करे रब्बा ! बैक स्टेज गईं ...
ब्रा हटा के कोई बार-बार मूँछें टांग जाता है स्क्रीन पर , हटाओ यार !





Thursday, July 14, 2016

आत्मविश्वास से चमकती शबनम

रात का समय, घड़ी नौ से अधिक का समय बता रही थी. झमाझम बारिश हो जाने के बाद हल्की-हल्की फुहारें अठखेलियाँ करती लग रही थीं. स्ट्रीट लाइट के साथ-साथ गुजरते वाहनों की हेडलाइट भी सड़क को जगमग कर रही थी. गीली सड़क पर वाहनों और लोगों की आवाजाही के बीच मद्धिम गति से चलती बाइक पर फुहारों का अपना ही आनंद आ रहा था. घर पहुँचने की अनिवार्यता होते हुए भी पहुँचने की जल्दबाजी नहीं थी. दोस्तों का संग, हँसी-ठिठोली के बीच समय भी साथ-साथ चलता हुआ सा एहसास करा रहा था. सड़क किनारे एक दुकान के पास बाइक रुकते ही उतरा जाता उससे पहले उससे नजरें मिली. चंचलता-विहीन आँखें एकटक बस निहार रही थी. आँखों में, चेहरे में शून्य सा स्पष्ट दिख रहा था.  चेहरा-मोहरा बहुत आकर्षक नहीं था. कद-काठी भी ऐसी नहीं कि पहली नजर में ध्यान अपनी तरफ खींचती. आँखों में भी किसी तरह का निवेदन नहीं, कोई आग्रह नहीं, कोई याचना नहीं. इसके बाद भी कुछ ऐसा था जो उसकी नज़रों से अपनी नज़रों को हटा नहीं सका. ऐसा क्या था, उस समय समझ ही नहीं आया. 

बाइक से उतर कर खड़े होते ही वो उन्हीं नज़रों के सहारे नजदीक चली आई. चाल रुकी हुई सी थी मगर अनियमित नहीं थी. आँखों में बोझिलता थी मगर सजगता साफ़ झलक रही थी. चेहरे पर थकान के पर्याप्त चिन्ह थे मगर कर्मठता में कमी नहीं दिख रही थी. एकदम नजदीक आकर भी उसने कुछ नहीं कहा. अबकी आँखों में हलकी सी चंचल गति समझ आई. एक हाथ से अपने उलझे बालों की एक लट को अपने गालों से हटाकर वापस बालों के बीच फँसाया और दूसरे हाथ में पकड़े कुछेक गुब्बारों को हमारे सामने कर दिया. बिना कुछ कहे उसका आशय समझ आ गया. उस लड़की का आँखों ही आँखों में गुब्बारे खरीदने का अंदाज दिल को छू गया. गुब्बारे जैसी क्षणिक वस्तु बेचने का रिस्क और उस पर भी कोई याचना जैसा नहीं. कोई अनुरोध जैसा नहीं बस आँखों की चंचलता. उस चंचलता से झाँकता आत्मविश्वास जैसा कुछ. उस लड़की के हाव-भाव ने, आँखों की चपलता ने प्रभावित किया. लगा कि उसकी मदद की जानी चाहिए किन्तु घर जाने की स्थिति अभी बनी नहीं थी. मन में घुमक्कड़ी का भाव-बोध हावी था. मौसम भी आशिकाना रूप में साथ-साथ चल रहा था. इस कारण गुब्बारे न ले पाने की विवशता ने अन्दर ही अन्दर परेशान किया.


उस लड़की की दृढ़ता और एकबार पुनः गुब्बारों की तरफ देखने के अंदाज़ ने दोस्तों को भी प्रभावित सा किया. जेब में गया हाथ चंद रुपयों के साथ बाहर आया. भाव उभरा कि घर न जाने के कारण हम गुब्बारे नहीं ले पा रहे हैं पर ये कुछ रुपये रख लो. उस लड़की ने रुपयों की तरफ देखे बिना ऐसे बुरा सा मुँह बनाया जैसे उसे रुपये नहीं चाहिए बस गुब्बारे ही बेचने हैं. अबकी आँखों में कुछ अपनापन सा उभरता दिखाई दिया. उसके होंठों पर एक हल्की सी, न दिखाई देने वाली मुस्कराहट क्षण भर को उभरी और गायब हो गई. आँखों और होंठों की समवेत मुस्कराहट में गुब्बारे खरीद ही लेने का अनुरोध जैसा आदेश सा दिखा. हम दोस्तों ने अपने आपको इस मोहजाल से बाहर निकालते हुए गुब्बारे खरीद लिए. गुब्बारों के बदले रुपये लेते उभरी उस मुस्कान ने, आँखों की चमक ने, चेहरे की दृढ़ता ने, उसके आत्मसम्मान ने उसके प्रति आकर्षण पैदा किया. 

आँखों आँखों में बने रास्ते पर चलकर नजदीक आई उस लड़की ने हमारे कुछ सवालों पर अपने होंठों को खोला. पता चला कि उस जगह से लगभग पन्द्रह किमी दूर उसका घर है. बड़े से शहर से दूर ग्रामीण अंचल तक उसे अकेले जाना है. कोई उसके साथ नहीं है. अकेले का आना, अकेले का जाना, सुबह से देर रात तक सिर्फ गुब्बारे बेचना, पूरे दिन में सत्तर-अस्सी रुपयों को जमा कर लेना, पेट की आग शांत करने के कारण पढ़ न पाना, चंद मिनट में उसने रुक-रुक कर बहुत कुछ बताया. उम्र, कर्मठता, जिम्मेवारी और आत्मविश्वास के अद्भुत समन्वय में फुहारों में भीगती ‘शबनम’ सुबह की बजाय रात को जगमगा रही थी. बाइक पर चढ़कर जाते समय गीली सड़क पर खड़ी बारह-तेरह वर्ष की वो बच्ची एकाएक प्रौढ़ लगने लगी. उसके नाजुक हाथों में गुब्बारे की जगह जिम्मेवारियाँ दिखाई देने लगी. स्ट्रीट लाइट और गाड़ियों की लाइट से उसका चेहरा चमक रहा था. लोगों के लिए इस चमक का कारण स्ट्रीट लाइट और गाड़ियों की लाइट हो सकती थी मगर हमारी निगाह में वो चमक उसकी कर्मठता की, उसके आत्मविश्वास की थी.