Thursday, April 21, 2016

विज्ञान का कोई जेंडर नहीं होता (टेस्सी थॉमस) ...रसोई का भी नहीं ...

मिसाइल वुमन के नाम से जानी जाने वाली टेस्सी थॉमस को  वाकई कम लोग जानते हैं। श्री ओमप्रकाश हाथपसारिया ने उनसे हुई बातचीत पर आधारित यह लेख चोखेरबाली के लिए भेजा है। टेस्सी कहती हैं कि साइंस हैज़ नो  जेंडर ...लेकिन हमारी पारम्परिक सोच देश की एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक के भी घरेलू रूप को दिखाने के बाद ही चैन की साँस लेती है। विज्ञान का कोई जेंडर नहीं। रसोई का भी कोई जेंडर नहीं। यहाँ भी प्रतिभा ही सर्वश्रेष्ठ है। 
जानिए टेस्सी थॉमस के विषय में : - 
भारत की ‘ अग्निपुत्री ‘ या ‘ मिसाइल-वुमन ऑफ़ इंडिया ‘ कहलाने वाली – डॉ. टेस्सी थॉमस को बहुत ही कम लोग जानते है, क्योंकि इन्होने अपना अब तक का सारा जीवन भारत की अग्नि मिसाइल के अनेक उन्नत एवम परिष्कृत संस्करणों के लिए अनुसन्धान करके फिर उन्हें विकसित करने में ही बिता दिया है। भारत की 3500 कि. मी. तक मार करने वाली अग्नि- 4 मिसाइल के सफल परीक्षण के बाद से ही रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन {DRDO} की इस महिला वैज्ञानिक डॉ. टेस्सी थॉमस को अग्नि पुत्री के नाम सम्बोधित किया जाने लगा था ।
जिस प्रकार डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम को भारत का मिसाइल-मेन कहा जाता है क्योंकि उन्होंने अपना सारा जीवन देश के मिसाइल कार्यक्रम के अंतर्गत – पृथ्वी, आकाश, अग्नि, नाग, धनुष , त्रिशूल और ब्रहमोस जैसी मिसाइलो के अनुसन्धान और विकास को समर्पित किया है। उसी प्रकार डॉ टेस्सी थॉमस के लिए अग्निपुत्री का नाम एक दम उपयुक्त है क्योकि इन्होने इसी मिसाइल परियोजना में अग्नि मिसाइल के लगभग सभी संस्करणों को जन्म दिया है। ये डॉ अब्दुल कलाम को अपना गुरु मानती है जो भारत के मिसाइल कार्यक्रम और परियोजना के जनक रहे है।
विश्व ने डॉ. टेस्सी थॉमस को तब पहचाना ही नहीं इनका लोहा भी माना जब इन्होने 19 अप्रैल 2012 को देश की सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी मिसाइल परियोजना में अग्नि-5 की प्रोजेक्ट डायरेक्टर के रूप में अग्नि-5 की स्ट्राइक रेंज 5,000 किलोमीटर की मिसाइल का सफल परीक्षण कर दिखाया था । भारत के लिए मात्र यह एक वैज्ञानिक उपलब्धि ही नही थी अपितु यह हमारे देश की सामरिक शक्ति और रक्षा कवच का भी पूरे विश्व को परिचय दिया गया था। आज भारत अंतर महादिव्पीय मिसाइल प्रणाली ( Inter-Continental Ballistic Missile System – ICBM ) की क्षमता से लैस ऐसा विश्व में पांचवा देश है जो 5000 कि. मी. तक अपनी मिसाइल की मार से किसी भी शत्रु को उसके घर में ही ढेर कर सकता है और अपने नागरिको को सुरक्षित रखने में सक्षम है । इसका सारा श्रेय डॉ. टेस्सी थॉमस को ही जाता है ।
TessThomas4डॉ. टेस्सी थॉमस का जन्म अप्रेल – 1964 में केरल के एक कैथोलिक परिवार में हुआ , इनका नाम शांति की दूत नोबेल पुरुस्कार विजेता मदर टेरेसा के नाम पर रखा गया। टेस्सी थॉमस जब स्कूल में पढ़ा करती थी, उन दिनों नासा का अपोलो यान चाँद पर उतरने वाला था। इन्हें रोजाना उस यान के बारे में सुनकर प्रेरणा मिल रही थी कि ये भी एक दिन ऐसा एक राकेट बनाये जो इसी तरह आसमान की ऊंचाई को छु सके ।
टेस्सी थॉमस का ये उन दिनों एक सपना था। अग्नि – 5 की सफलता ने उनकी मेहनत, लगन और प्रतिभा से केवल टेस्सी थॉमस का ही सपना पूरा नहीं हुआ है बल्कि देश का भी एक वो सपना पूरा हुआ है, जो इस देश को स्वदेशी राकेट और मिसाइल तकनीक से वैज्ञानिक और सामरिक रूप से अपने पैरो पर खड़ा देखने के लिए बरसो पहले डॉ. विक्रम साराभाई और डॉ. सतीश धवन ने देखा था ।
टेस्सी थॉमस ने त्रिचुर इन्जीनरिंग कॉलेज – कालीकट ( केरल ) से बी। टेक। किया और इसके बाद ये एम्। टेक। के लिए पुणे स्थित डिफेन्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस टेक्नोलॉजी की प्रवेश परीक्षा पास करने वाले तीन छात्रो में एक थी और वह भी पहली महिला। इनकी इसी प्रतिभा के कारण इन्हें – गाइडेड मिसाइल एंड वेपन टेक्नोलॉजी – के विशेष कोर्स के लिए चुना गया। १९८५ में राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में प्रथम आकर इन्होने २१ वर्ष की आयु में ही देश के रक्षा अनुसन्धान एवम विकास संगठन – DRDO – में कदम रखा और इस क्षेत्र में पुरुषो के प्रभुत्व को भी तोडा।
अपनी प्रतिभा, मेहनत एवं लगन से 1988 में डॉ. टेस्सी थॉमस भारत की मिसाइल परियोजना में शामिल हुई, तब डॉ. अब्दुल कलाम इस परियोजना का नेतृत्व कर रहे थे। डॉ टेस्सी थॉमस जो डॉ. कलाम को अपना गुरु मानती है और कहती है मीडिया उन्हे अग्निपुत्री या मिसाइल वुमन की कोई भी संज्ञा दे या इससे संबोधित करे लेकिन डॉ. कलाम की प्रतिभा और लगन के साथ देशप्रेम के आगे वे आजीवन नतमस्तक ही रहेंगी। डॉ. कलाम के साथ इन्होने अनेक वर्षो तक कार्य किया। वह अनुभव ही इनके लिए आज भी काम आ रहा है, जो उन्होंने DRDO में डॉ अब्दुल कलाम के नेतृत्व में मिसाइल परियोजना में उनके साथ काम करते हुए प्राप्त किए थे ।
रसोई मे
रसोई मे
एक विनम्र और साधारण सी लगने वाली डॉ. टेस्सी थॉमस के जब अग्नि मिसाइल प्रयोगशाला से जुड़े होने का सवाल आता है तो वे अपनी प्रयोगशाला में अपने विषय –सालिड प्रोपेलेट्स सिस्टम ( ठोस प्रणोदक प्रणाली ) की देश में चोटी की एक्सपर्ट है। इसी विशेषता के कारण ही ये इस परियोजना की निर्देशक होने का गौरव पाती है। डॉ. टेस्सी थॉमस को अग्नि के परिष्कृत संस्करण विकसित करने की सम्पूर्ण जिम्मेवारियां इसलिए भी दी गयी क्योंकि इनकी राकेट ठोस प्रणोदक प्रणाली ) में जो विशेषज्ञता है, उसके बिना किसी राकेट या मिसाइल को हवा में नहीं उड़ाया जा सकता है है ।
साथ ही डॉ. टेस्सी थॉमस की – गाइडेड मिसाइल सिस्टम – में भी विशेषज्ञता भी है, यही विशेषता किसी राकेट को मिसाइल में बदलती है और उसे अचूक निशाने के लिए तैयार करती है। इन दोनों विशेषज्ञताओ का एक साथ मिलन विश्व के एक दो वैज्ञानिको में ही मिलता है, उनमे एक डॉ. टेस्सी थॉमस भी है। ये हामारे देश के लिए लाभान्वित होने ही नहीं गौरवान्वित होने का भी विषय है ।
अग्नि २- अग्नि -5 तक के सभी संस्करणों को विकसित करने में डॉ. टेस्सी थॉमस की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। किसी संस्करण में इन्हें असिस्टेंट डायरेक्टर तो किसी में एसोसिएट डायरेक्टर तो कभी एडिशनल डायरेक्टर के रूप में काम करने का मौका दिया गया है और अग्नि -5 के संस्करण के लिए इन्हें मिशन-डायरेक्टर के रूप में कार्य करने का मौका दिया गया, जिसे इन्होने सफलता के साथ पूरा किया है। आज ये अग्नि परियोजना की निदेशक है ।
अग्नि -5 के परीक्षण के लिए डॉ. टेस्सी थॉमस को मिशन डायरेक्टर नियुक्त किया गया था । जिसमे इसका डिजाईन , निर्माण और अचूक परीक्षण का पूर्ण कार्यभार इन्ही के कंधो पर रखा गया। इस जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए डॉ. टेस्सी थॉमस ने लगातार तीन वर्षो तक काम किया। इस प्रोजेक्ट में लगभग दर्ज़न भर देश में फैली रक्षा और सार्वजनिक क्षेत्र की प्रयोगशालाओ के छोटे – बडे लगभग 1000 वैज्ञानिको के साथ समन्वय करके जोखिम भरी तकनीको पर काम के साथ उनका नेतृत्व डॉ. टेस्सी थॉमस ने सफलता पूर्वक किया ।
कार्यालय मे
कार्यालय मे
अग्नि मिसाइल परियोजना देश की एक बहुत बड़ी वैज्ञानिक परियोजना है, जिसमे देश की दर्जनों प्रयोगशाला शामिल है। इसमें एक हज़ार से भी ज्यादा वैज्ञानिक शामिल है। लगभग 200 महिला वैज्ञानिक भी अपनी विशेषज्ञताओ के साथ इस परियोजना शामिल है और उनमें से लगभग आधा दर्जन महिला वैज्ञानिक / इंजिनियर तो डॉ. टेस्सी थॉमस के साथ सीधे उसी प्रयोगशाला में कार्यरत है जहाँ से ये इस महत्वपूर्ण परियोजना का नेतृत्व कर रही है। इनकी प्रयोगशाला हैदराबाद में एडवांस सिस्टम लेबोरेटरी, भारत ही नही दुनिया की सबसे संवेदनशील प्रयोगशालाओ में गिनी जाती है। डॉ टेस्सी थामस वैसे तो मिसाइल परियोजना से 1988 में जुडी लेकिन 2008 से इस परियोजना की डायरेक्टर है।
जब अग्नि – 5 परियोजना पर अंतिम चरण में काम चल रहा था तो इनकी कोर टीम के कई सदस्य और ये स्वयं लगभग महीनो तक अपने घर नहीं गए थे। जिनमे आधा दर्ज़न वे महिला वैज्ञानिक भी शामिल थी जो डॉ. टेस्सी थॉमस के साथ सीधे जुडी थी। इसका एक बड़ा कारण ये भी था कि अग्नि -3 का पहला परीक्षण विफल हो चूका था, उस विफलता की पुनरावृति ये वैज्ञानिक दुबारा नहीं होने देना चाहते थे।
डॉ. टेस्सी के अनुसार एक गरीब देश की जनता के गाढे खून – पसीने की कमाई को ये सभी वैज्ञानिक किसी भी कीमत पर व्यर्थ नहीं होने देने के लिए कृतसंकल्पित थे। डॉ. टेस्सी थॉमस की पूरी टीम ने अथक प्रयास किये, एक-एक तकनीक को कई बार कई अलग–अलग टीम ने जांचा – परखा, तब जाकर सभी में एक विश्वास का संचार हो पाया। अग्नि – 5 की हर तकनीकी जाँच की अग्निपरीक्षा इतनी कठोर थी कि इसमें कभी कोई भी तकनीकी दिक्कत नहीं आई।
लेकिन जिस दिन इसका परीक्षण / लांच निर्धारित किया गया उस दिन मौसम का हाल बुरा हो गया और सभी वैज्ञानिको को निराशा ने घेर लिया। डॉ. टेस्सी के अनुसार उनकी माँ खुद बार – बार टेस्सी को फ़ोन करके पूछती रही कि उडान में देरी का कारण क्या है ? लेकिन मिशन टीम का हर सदस्य ‘ मिशन कमांड कण्ट्रोल सेंटर ‘ से हिला नहीं, जो कई महीने से घर नहीं गए थे।
अचानक इन सबकी हठ के आगे मौसम ने हार मान ली और मौसम ठीक हो गया। कुछ घंटो की देरी के बाद अग्नि – 5 का सफल परीक्षण होकर रहा। और इस सफलता ने देश को आई सी बी एम् क्षमता धारक देशो के क्लब की प्रथम पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया। ये सब देश की अग्निपुत्री डॉ. टेस्सी थॉमस के संकल्प से ही संभव हो पाया।
TessThomas5इस मौसम की मार के अनुभव ने डॉ. टेस्सी थॉमस को एक और प्रेरणा दे डाली और उसका परिणाम यह हुआ कि डॉ. टेस्सी थॉमस ने एक महत्वपूर्ण मिसाइल तकनीक – Re Entry Vheical System – REVS का भी स्वदेश में ही विकास कर लिया है। जो भारत को विश्व के एक-दो देशो के पास होने पर इस लिए उपलब्ध नहीं हो पा रही थी कि उन देशो ने पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद भारत की कई प्रयोगशालाओ के प्रयोगों को उपकरण और तकनीक देने के लिए प्रतिबंध लगा दिए थे।
यह अत्याधुनिक REVS तकनीक मिसाइल को विपरीत मौसम की परिस्थितियों में भी अनुकूल बना देती है और 3000 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान में भी सक्रीय और अचूक निशाने तक पहुचने में नहीं रोक सकती है। यह तकनीक लम्बी दूरी की मिसाइल को वायुमंडल से बाहर जाकर फिर से वायुमंडल में आकर अपने लक्ष्य को भेदने में सक्षम बनाती है, जिससे शत्रु को मौसम ख़राब होने पर भी सर्दी , गर्मी और बरसात के किसी भी मौसम में उसी के पाले में जाकर सबक सिखाया जा सके।
ये सभी मिसाइल तकनीक भारत की केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धियां ही नहीं है बल्कि ये सब मिलकर भारत को एक सामरिक सुरक्षा कवच प्रदान करती है। जबकि भारत एक परमाणु शस्त्र संपन्न देश है। उसे कभी भी किसी भी स्थिति में अपने परमाणु शस्त्र को इन मिसाइलो के जरिये हजारो कि. मी. तक मार करने के लिए प्रयोग करना पड़ सकता है। तब यही तकनीक इस देश के हर नागरिक की सुरक्षा की गारंटी होगी जो अग्निपुत्री के करकमलों से प्राप्त हुई है ।
डॉ. टेस्सी थॉमस कभी काम से नहीं थकने वाली वैज्ञानिक है। लेकिन इसे वे विनम्रता से एक इंटरव्यू में कहती है कि जब मिसाइल परीक्षण / लांच अपने अंतिम चरणों में होता है, तो ये अपने घर जाना तो दूर अपना खाना – पीना और सोना तक भूल जाते है। लेकिन साथ ही वे यह भी कहती है कि ऐसा हम ही नहीं करते बल्कि देश के दूसरे क्षेत्रो में लगन और मेहनत से देश के लिए काम करने वाले विशेषज्ञ ही नहीं देश के किसान तक भी ऐसा ही करते है और देश ऐसे कर्मो से ही विकास के पथ पर अग्रसर होता है ।
विज्ञान में इसलिए कोई जेंडर नहीं होता है। ( No , Not At All. Science Has No Gender)
विज्ञान में इसलिए कोई जेंडर नहीं होता है। ( No , Not At All. Science Has No Gender)
एक महिला वैज्ञानिक होने के नाते किसी भी प्रकार की विशेष छुट या सुविधा का वे हर समय विरोध करती है। उनका मानना है कि विज्ञान में प्रतिभा सर्वश्रेष्ठ होती है, यहाँ कोई जेंडर कमजोर या मज़बूत नहीं होता बल्कि प्रतिभा ही उसे मज़बूत बनाती है और “ विज्ञान में इसलिए कोई जेंडर नहीं होता है। ( No , Not At All. Science Has No Gender) “ – ये उनकी पंक्तियाँ या सूक्ति वह वाक्य है जो दुनिया की सभी प्रयोगशालाओ में उनके नाम के साथ सुनाई या गाई जाती है।
2013 में भुवनेश्वर में आयोजित भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशन को संबोधित करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने डॉ. टेस्सी थॉमस को भारत की “ वैज्ञानिक – रत्न “ की संज्ञा देते हुए ही देश की महिलाओं को विज्ञान के क्षेत्र में आकर काम करने का आह्वाहन किया था। डॉ. टेस्सी थॉमस की तुलना उन्होंने नोबेल पुरुस्कार विजेता विजेता मैडम क्युरी से कर डाली थी ।
डॉ. टेस्सी थॉमस को अनेक पुरुस्कारों से सम्मानित किया जा चूका है , भारत के राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी के हाथों इन्हें लाल बहादुर शास्त्री नेशनल अवार्ड -2012 से नवाजा गया है। साथ ही 2001,2007,2008 में DRDO की ओर इन्हें विशेष तकनीको के विकास के लिए पांच बार पुरुस्कृत किया गया है। कल्पना चावल पुरुस्कार, सुमन शर्मा पुरुस्कार जैसे वैज्ञानिक क्षेत्र के प्रतिष्ठित पुरुस्कार और इंडिया टुडे वुमन ऑफ़ द इयर का ख़िताब 2009 में दिया गया है ।
डॉ. टेस्सी थॉमस एक का दूसरा रूप और भी है। ये एक कुशल गृहिणी भी है, जब भी ये घर होती है तो कम से कम एक टाइम खुद खाना बनाती है। ( एक टीवी चैनल को तो इन्होने समय बचाने के लिए अपनी रसोई से ही इंटरव्यू दे दिया था ) इनके पति कोमोडोर सरोज कुमार भारतीय नौसेना में तैनात है। इनका पुत्र – तेजस – जिसका नाम ही भारत में स्वदेशी तकनीक से निर्मित हल्के लड़ाकू विमान तेजस के नाम पर ही रखा गया है, उसने अभी अपनी इंजीनियरिंग की पढाई पूरी कर ली है। डॉ. टेस्सी के माता – पिता विज्ञान पृष्ठभूमि से नहीं थे – पिता एक अकाउंटेंट और माता एक शिक्षिका थी। लेकिन शुरू से ही टेस्सी को गंणित और विज्ञान में ही रूचि थी , जिसने उनको आज इस मुकाम तक पहुँचाया है ।
अग्नि – 5 की सफलता ने डॉ. टेस्सी थॉमस के कदमो को अभी इस क्षेत्र में ही आगे बढ़ने से रोका नहीं है। उनका लक्ष्य अग्नि मिसाइल के और ज्यादा उन्नत एवं विकसित संस्करणों के परीक्षण करके भारत के रक्षा कवच को और मज़बूत बनाने का है। अग्नि मिसाइल का एक नौसेनिक ( Sub – Marine ) संस्करण बनाने पर भी काम किया जा रहा है, जिससे कि कभी शत्रु हमें जमीन और हवा में घेर ले या सारा जमीनी तंत्र विफल हो जाये, तो शत्रु को पानी के रास्ते उसी के घर में मात दी जा सके। इस परियोजना का नेतृत्व भी अब डॉ. टेस्सी के कंधो पर ही आने वाला है और वे इसके लिए सहर्ष तत्पर है।
अग्निपुत्री के इस आख्यान से यह स्पष्ट है कि इस ने अपना अब तक का सारा जीवन अग्नि मिसाइल के विभिन्न संस्करणों के अनुसन्धान और विकास को ही समर्पित कर दिया है, अब भी इनका जीवन उसके प्रति ही समर्पित है और भविष्य समर्पित करने के लिए भी तत्पर है तो फिर क्यों नहीं डॉ. टेस्सी थॉमस को भारत की अग्नि पुत्री या मिसाइल वुमन ऑफ़ इंडिया कहा जाये ।

Sunday, April 17, 2016

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफर के हम हैं


हम नहीं जानते कि हम नहीं जानते और इस न जानने को उम्र भर जीते जाते हैं। महसूस करते हैं वो जो महसूस करने के इंजेक्शन समाजीकरण की प्रक्रिया में हमें लगाये गये हैं। रास्तों का सही या गलत होना, लोगों का एक-दूसरे के साथ पेश आना, चीजों को देखने और समझने का हमारा नजरिया सब पहले से तय किया जा चुका है। चित्रलेखा में जिस तरह पाप और पुण्य की खोज शुरू होती है और एक समूची यात्रा तय करके जिस तरह प्रस्थान बिंदु की ओर बढ़ती है वैसी ही यात्रा हम सबके जीवन में भी चलती है बस कि उस यात्रा में हमारी खोज क्या है, यह हम जान नहीं पाते। ऐसी ही एक यात्रा स्त्री जीवन की भी है। समाजीकरण के घने बुने ताने-बाने ने किस तरह एक खंडित समाज को रचते हुए इंसान की इंसान के बीच दूरियां खींच दी हैं जिनमें से कुछ पर तो हमारी नज़र गई है लेकिन कहीं तो नज़र गई तक नहीं। नज़र की हद में आने से छूट गये ऐसे ही छोटे-बड़े टुकड़ों को समेटते हुए अपने समाज के बरअक्स स्त्री मन, उसके जीवन की चुनौतियों को समझने की कोशिश-

”आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा।” उस अजनबी लड़के ने कहा। ”मुझे भी।” अजनबी लड़की ने जवाब दिया। वो अजनबी थे लेकिन दो दिनों से दोस्तों के एक समूह में थे। एक-दूसरे के नाम के सिवा वे एक-दूसरे के बारे में कुछ नहीं जानते थे, जानने की जरूरत भी महसूस नहीं हुई। विदा के वक्त जब वो दोनों ही बचे थे और बचा था थोड़ा सा रास्ता भी तो बीच में कोई खामोशी आकर बैठ गई। उस खामोशी को तोड़ते हुए लड़की ने यूं ही पूछ लिया, ”आप क्या करते हैं, परिवार में कौन-कौन है।” लड़के ने बताया, कारोबार, पत्नी, दो बच्चे। फिर यही घिसा हुआ सवाल लड़के ने भी गाड़ी का गियर बदलते हुए दोहरा दिया। लड़की ने भी बता दिया, ऑफिस के बारे में, बच्चे के बारे में। ”और पति?” उसने पूछा। न दिये गये जवाब अक्सर उलझाते हैं...लड़की ने बेपरवाही से जवाब दिया, ”हमारा तलाक हो चुका है।” लड़का बोला, ”अरे...लेकिन आप तलाक लेने वाली औरतों जैसी लगती तो नहीं....” लड़की के भीतर कुछ दरक गया। उसने कुछ नहीं कहा, थोड़ी देर बाद वो उतर गई लेकिन वो लड़के का वो जवाब अब तक जेहन से उतरा नहीं। यूं तलाक, सेपरेशन, ब्रेकअप के भीतर की टूटन और समाज के व्यवहार इंसान को काफी हद तक सख्त बना ही देते हैं। लेकिन जब तथाकथित पढ़ी लिखी, सभ्य, सुसंस्कृत, नई पीढ़ी भी इस तरह पेश आती है तो थोड़ा बुरा तो लगता है...क्या ऐसा ही सवाल पुरुष से भी पूछा गया होगा या वो इसलिए बेचारा बना होगा समाज में कि कैसी तेज बीवी से पाला पड़ गया था बेचारे का। समाज की हर टूटन की जिम्मेदारी स़्त्री के मत्थे ही तो मढ़ी है। तभी तो पुराने लोग कहते हैं कि लड़कियां पढ़-लिखकर घर तोड़ रही हैं। सचमुच चेतना, टूटने की शुरुआत ही तो है...आखिर हर टूटन के लिए स्त्री को जिम्मेदार पाने वाली नज़र और नज़रिया कहां से आता होगा। कहां से आती होगी वो निजी सोच जिसमें खुलकर सांस लेने को गुनाह करार दिया जाता होगा। किस तरह एक स्त्री को दूसरी स्त्री के सम्मुख खड़ा कर दिया जाता होगा बतौर दुश्मन...वो नज़रिया न स्त्री गर्भ से लेकर आती है, न पुरुष। पीके की भाषा में कहें तो सब इसी गोले में रचा गया है, हमारा होना और न होना सब.
हम जिस तरह बर्ताव करते हैं, नजर आते हैं, अपनी बात को कहते हैं, जैसा जीवन जीते हैं यह सब कहां से आता है। कौन है जो हमें व्यक्ति बनाता है, हमारे सोचने-समझने के ढंग का निर्माण करता है, कब अनजाने हमारे सही, गलत, अच्छे बुरे तय होने लगते हैं...फेविकोल की जोड़ की तरह हमारे जेहन से चिपक जाते हैं। कमाल यह कि हम यह सोचते हैं कि यह तो हमारी ही इच्छा है, ऐसा हम ही चाहते हैं, यह हमारा अच्छा लगना है, हमारा बुरा लगना। यह समाज इसका ताना-बाना, इसकी जटिलताएं, रूढि़यां बच्चे के जन्म से पहले ही उसे जकड़ने को आतुर। सामाजिक सत्ताएं व्यक्ति निर्धारण करती हैं। हमारे जन्म से सैकड़ों बरस पहले ही हमारा होना तय किया जा चुका है। किस बात पर हंसना है हमें, किस बात पर रोना, किस बात पर गुस्सा बस आ ही जाना चाहिए। एक समाज के लोग एक ही जैसे चुटकुलों पर हंसते हैं, एक जैसे मनोरंजन के साधन तलाशते हैं, एक जैसी जीवनशैली अपनाते हैं, एक जैसे उनके अहंकार होते हैं और एक जैसी अनुभूतियां भी। हमें एक जैसी चीजों पर एक जैसा बुरा भला लगता है तभी तो नई सदी की नई पीढ़ी का वो अजनबी लड़का बिना कुछ भी जानने-समझने की इच्छा के सपाट ढंग से कह बैठता है कि ”आप तो नहीं लगतीं तलाक लेने वाली औरतों जैसी....” वो जो बोल गया वो कौन था, कोई चेहरा या नाम नहीं एक समूूची सोच। समूचा समाज। समाज जो कभी पड़ोस वाली आंटी, कभी बुआ, कभी चाची, कभी कामवाली बाई, कभी दफ्तर के सहकर्मियों और कभी तो दोस्तों के रूप में मिलता रहता है...हमें लगता है कि हम व्यक्तियों से व्यथित हैं, या हम व्यक्तियों का विरोध करते हैं, उनसे नाराज होते हैं....जबकि असल में हम व्यक्तियों से नहीं समूचे समाज से भिड़ रहे होते हैं, लहूलुहान हो रहे होते हैं।
स्त्री होती नहीं बनाई जाती है-
सिमोन को पढ़ते हुए, समाज के ताने-बाने को देखते हुए समझा था कि स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। साथ ही यह भी समझा था कि बनाये तो पुरुष भी जाते हैं, पैदा तो वो भी नहीं होते होंगे। स्त्री को शोषित होने के लिए तैयार करने वाला यह समाज पुरुषों को शोषण करने के लिए भी तो तैयार करता है। एक स्त्री को उसकी रची-बसी भूमिकाओं की ओर धकेलने वाला समाज उन भूमिकाओं की ओर पैर बढ़ाने वाले पुरुषों का मजाक भी तो बनाता है। बचपन में मालती जोशी की कहानी पढ़ी थी समर्पण का सुख। उसका एक किरदार राजू अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता है, उसे सारा दिन घर के कामों में कोल्हू के बैल की तरह खटते देखकर उदास होता है लेकिन चाहकर भी उसकी मदद नहीं कर पाता क्योंकि वो तो मर्द है और मर्दों को घरेलू काम करना बुरा माना जाता है, उन्हें ”मेहरा ” कहकर उनका मजाक उड़ाया जाता है। इसलिए वो रात में अपने कमरे में सबके सो जाने के बाद अपनी पत्नी की सेवा करता है उसके दर्द को कम करने की कोशिश करता है...। यह है बनाया जाना। राजू तो फिर भी महसूस करता था अपनी पत्नी की तकलीफ लेकिन कितने लोग तो महसूस करने से भी वंचित कर दिए गये हैं। उन्हें महसूस भी वही होता है, जो समाज चाहता है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ गांवों के उदाहरण आंखों के आगे घूमते हैं जहां अपनी पत्नी की तबियत खराब होने और उसकी दवा के बारे में, दर्द के बारे में पूछने, इलाज की चिंता को जाहिर करने वाले पुरुष को ”जोरू का गुलाम” कह दिया जाता है। अगर पत्नी काम में व्यस्त है और बच्चा रो रहा है तो वो अपने बच्चे को गोद में उठाकर दुलरा नहीं सकता...क्योंकि यह तो स्त्रियों का काम है। पुरुषों के हाथ में सजा-संवरा, खिलखिलाता बच्चा आना चाहिए वो भी कुछ देर को। सिर्फ उनके बाप होने के रौब को बढ़ाने को (बच्चा अगर लड़की है तो वो भी कम हो जाता है) अगर बच्चा रोने लगता है तो पुरुष पिता चिड़चिड़ा जाते हैं. झुंझला जाते हैं...”ले जाओ यार इसे, पें पें करता रहता है...”कहकर स्त्री की गोद में पटककर निकल जाते हैं। उनका कलेजा बच्चे के रूदन से फटता नहीं। यह व्यक्ति का नहीं, समाज का व्यवहार है। इसी नई पीढ़ी के कई पुरुष जो कुछ हद तक अपने भीतर संवेदनाओं को बचा पाये हैं वो मेहमानों के आने से पहले, मां के जागने से पहले, पड़ोसियों से नजर बचाकर चुपके-चुपके अपनी पत्नी की मदद करते हैं...हालांकि इसका इलहाम भी उन्हें होता ही है कि वो कुछ खास पति हैं जिसका अहसानमंद उनकी पत्नी को होना चाहिए।
हमने तो कोई रोक-टोक नहीं रखी-
अक्सर नये जमाने के आधुनिक सोच वाले लोगों से मुलाकात होती है। वो जो कहते हैं समाज बदलना चाहिए, ये सूरत बदलनी चाहिए। वो जो अपने प्रेम के लिए जमाने से लड़ने को बुरा नहीं मानते। वो जो मानने लगे हैं कि मनुष्य का मनुष्य से बराबरी का रिश्ता होना चाहिए वो अक्सर कहते हैं, ”हमने तो अपने घर में, रिश्तों में कोई पाबन्दी नहीं लगाई। खुली छूट दे रखी है पत्नी को, मां को, बहन को।” और यह कहते हुए वो यह भूल जाते हैं कि वो खुली छूट ”दे रहे हैं...” यह छूट देने की सत्ता उनकी ही तो है। कहां से आई? किसने तय की? वो कौन होते हैं छूट देने वाले आखिर? पता ही नहीं चलता कि लोकतान्त्रिक होने का दावा करते-करते हम अनजाने ही कितने अलोकतान्त्रिक होते जाते हैं। ये समाज ही तो है जो हमारे समूचे व्यवहार पर अपना कब्जा करके बैठा है...हम जो हम हैं, लेकिन हम नहीं हैं। 

प्रेम भी बचा नहीं, न फिल्में -
हाल ही की एक फिल्म का उदाहरण आंखों के आगे घूम रहा है...बाजीराव मस्तानी। मस्तानी इतिहास की प्रेमिका है, बाजीराव भी। मस्तानी योद्धा है, वीर है। तमाम बैरिकेडिंग तोड़कर बाजीराव के प्रेम में पड़ जाती है। क्यों वो प्रेम में पड़ते ही नर्तकी बन जाती है. क्यों वो खुद को बुंदेलखंड की नाजायज बेटी कहती है और सिंदूर को महान...क्यों? क्यों इसी समाज की तमाम ढांचागत स़्ित्रयां काशी के प्रति दया से भर जाती हैं और तमाम प्रेमिकाएं मस्तानी में अपना अक्स देखने लगती हैं... कितने ही ऐसे संबंध आसपास सांस ले रहे हैं लेकिन चोरी से...समाज की मुहरों वाले रिश्ते क्यों दिल के रिश्तों को मुह चिढ़ा रहे हैं। प्रेम के लिए जमाने भर से लड़ जाने वाले प्रेमी भी क्यों आखिर समाज की मुहर लगवाने को मजबूर ही हैं अब तक...क्योंकि फिल्ममेकर भी तो इसी समाज में एक यात्रा जीकर आया है....। तनु वेड्स मनु की अति आधुनिक दत्तो सब कुछ कर सकने में सक्षम है, मेडल भी ला सकती है, चूल्हा भी फंूक सकती है, रिश्ते भी संभाल सकती है, बच्चे भी पाल सकती है...जमाने भर से लड़ भी सकती है लेकिन तनु के उस प्यार को नहीं समझ सकती जो इस तरह के समर्पण की सीमाओं में बंधा नहीं। वो कभी तनु को अपनी आदर्शवादिता का ताना मारती है तो कभी शादी के बीच में शादी से इनकार करके महानता का चोला ओढ़ लेती है....लोग दत्तो की महानता के कायल हो जाते हैं। क्यांे? क्यों एक स्त्री को महानता के तमाम लबादों मेें लदे हुए ही देखने की आदत है इस समाज को। ऑफिस भी संभालो, घर भी, बच्चे भी, पति भी, क्लब भी, मंदिर भी...सब। सादा सहज तनु ये सब करने से इनकार कर देती है तो उसे गलत साबित करने के लिए उसे फूहड़ बनाना जरूरी लगा फिल्मकार को कि कभी नशे में धुत, कभी तौलिए में घर के आंगन में बिठाने जैसी घटनाएं बुन दीं। दत्तो महान नहीं थी, दत्तो अब तक की ”कहानी घर घर की” भाभी जी का ही एडवांस वर्जन भर थी। तनु ने समाज की बनी बनाई मान्यताओं और स्त्री के तयशुदा खांचों में फिट होने से इनकार किया....तो उसे क्यों फिल्मकार को डार्क शेड में छुपाना पड़ा। क्योंकि फिल्मकार को समाज की सोच का ख्याल रखना था। जबकि तमाशा की दीपिका अपने उस प्रेमी की अंगूठी पहनने से इनकार कर देती है जिसके बिना वो एक पल नहीं जी पाती...क्यों? क्योंकि वो व्यक्ति रणवीर नहीं उसकी खुली हुई आत्मा से प्यार करती है। बिना आत्मा के देह का क्या अस्तित्व...यह बात समाज पर चोट करती है...हैप्पी एंडिग सिर्फ हीरो हीरोईन का मिल जाना नहीं...अपने आपको समझ लेना है...ऐसा ही नजर आया क्वीन में...कि जिसे वो प्रेम समझ के बिसूरती फिर रही थी वो तो प्रेम था ही नहीं...लेकिन इस बात को समझने में 3 घंटे लग गए...क्योंकि प्रेम को भी हम उसी तरह समझने के आदी हैं जिस तरह समाज तय करता है। चंद गुलाब के फूल, टेडी बियर, डेट, शादी, सेक्स, बच्चे और बस...”हां यही प्रेम है” से ”जाने कहां गये वो दिन” तक का सिलसिला...
कोई आरोपपत्र नहीं, युद्ध नहीं- 
बहुत से लोग हैं आसपास जो किसी भी बात में स्त्री विमर्श तलाश लेते हैं, रच भी देते हैं स्त्री विमर्श की तमाम कहानियां कविताएं, आलेख, भाषण। जो संवदेना वो समझ सके हैं, जो उनकी रचनाओं से ध्वनित होता है वो जीवन जीते वक्त कहां गायब हो जाता है आखिर। इस बिना जिये सिर्फ उगल दिए गये विमर्शों के शोर ने अजीब सी उकताहट भर दी है लोगों में। स्त्रियों में भी, पुरुषों में। कोई नस चटखती मालूम होती है जब किसी अति संवेदनशील बात को लोग उकताकर खारिज कर देते हैं या उसका मजाक उड़ाते हैं यह कहकर कि ये लोग तो हमेशा स्त्री विमर्श का राग अलापते रहते हैं...
तो क्या जो लोग समझ रहे हैं कि वो समझ रहे हैं वो अपनी बात ठीक से समझा नहीं पा रहे हैं। या यह समझ पाना भी एक वहम है, या यह कोई चालाकी है...मालूम नहीं क्या है लेकिन जो भी है दुःखद है। दुःखद है सिनेमा के बलात्कार के दृश्यों में रस और आनंद ढूंढते लोग। बचपन के सेक्सुअल एब्यूज के बारे में बताती हुई आलिया को देखते हुए सीटियां बजाते हुए पीवीआर में बैठे दर्शक, बैंडिट क्वीन में आनंद तलाशती आंखें और 16 दिसंबर की खबरों को पढ़ते हुए कोई रस अनुभूत करते हुए बार-बार उन घटनाओं का विवरण करते लोग। वो क्या चीज होती है जो दर्द से फफककर रो पड़ने की बजाय या उफनकर छलक पड़ने की बजाय स्त्रियां भी कहने लगती हैं कि उसे रात में अकेले जाना ही नहीं चाहिए था....और घर के पुरुष अपने घर की औरतों के इस वक्तव्य पर गौरव महसूस करते है। हर बात पर स्त्री या पुरुष का राग छेड़े जाने का मसला नहीं, मसला यह है कि किस कदर हमारी रगों में दौड़ते खून के साथ एक पूरी साजिश, पूरी सत्ता, पूरी सोच भी दौड़ रही है। जिस तरह हमें अपनी सांस के आने-जाने का, रगों में दौड़ते खून का इल्म नहीं होता उसी तरह अपने व्यवहार अपनी सोच का भी इल्म नहीं होता...और एक रोज उकताकर कहने लगते हैं बस करो यह स्त्री पुरुष का राग। दरअसल यह राग...एक सुंदर जीवन की कल्पना है...कोई युद्ध नहीं। कि अपने भीतर सदियों से पड़ी जड़ताओं को टटोलने उन्हें तोड़ने उनसे आजाद होने की बात है...किसी का किसी के खिलाफ कोई आरोपपत्र नहीं...
अपनी मर्जी से कहां अपने सफर के हम हैं-
यह हमारी मर्जी है कि हम अपने पति पर न्योछावर होते हैं, यह हमारी मर्जी है कि हम उनकी सत्ता मंे सुखी रहते हैं, यह हमारा सुख है कि हम उनके लिए भूखे प्यासे उपवास करते हैं, सब हमारी मर्जी है...ये चूड़ी, ये बिंदी, ये गहने, ये साज श्रृंगार...सब हमारी मर्जी है....भला इससे किसी के पेट में क्यों दर्द होता है. मेरा पति मुझे पीटता भी है तो क्या हुआ...प्यार भी तो करता है। मेरा उससे प्रेम और झगड़ा मेरा निजी मामला है. जब हम ”अपनी” ”इन मर्जियों” से जीते हैं तब तो किसी समाज का कोई नियम भी नहीं टूटता...फिर परेशानी किसे है...आईएएस, पीसीएस, सीईओ, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफसेर, आईपीएस, लेखिकाएं, फिल्मकार, अभिनेत्रियां, किसान, मजदूर, सारी औरतें इन अपनी मर्जियों के सफर पर मजे से चल रही हैं। समाज की सारी व्यवस्थाएं चाक-चौबंद हैं, बाजार की भी। सत्ताएं अपने-अपने ठिकानांे पर काबिज हैं बिना किसी खतरे के। कि एक रोज कोई स्त्री घूंघट में दम घुटने की शिकायत करती है, कोई स्त्री जेवरों से आजिज आकर उतार देती है, कोई स्त्री गर्भ धारण के फैसले अपने हाथ में ले लेती है, कोई स्त्री प्रेम की परीक्षा देने के लिए तमाम परंपरागत रिवाजों का पालन करने से इनकार कर देती है...और तब समाज में हलचल होने लगती है...खलबली मचने लगती है...क्यों भई, ये तो उनकी अपनी मर्जी का मामला था...आज मर्जी नहीं है...तो यह खलबली क्यों है आखिर...सोचा है कभी?
महानता का ताज और दुनियादारी-
सोचा है कभी क्या उन स्त्रियों ने कि जिस गर्व के साथ वो अपने सतीत्व और पारंपरिक होने के ताज को धारण किये बैठी हैं, उसका प्रचार कर रही हैं, उसका वैभव जी रही हैं वो एक बड़े तबके की त्रासदी है, जकड़न है, मजबूरी है। वो जिस तरह सोच रही हैं उन्हें इसी तरह सोचने के ईनाम में उनका महानता का ताज समाज से मिला है...वो अपनी मर्जियों से अनजान हैं और इस बात का उन्हें पता भी नहीं. महानता का तमगा, दैवीयता, प्रशंसाएं ये सब दुनियादारी के प्रपंच हैं क्या हम समझ पाते हैं। बहुत अच्छी स्त्री के मानक तय करके उसे लगातार तयशुदा दायरों में धकेलता जाना, तुम बहुत अच्छा पोछा लगाती हो, तुम गली में बहुत अच्छी झाड़ू लगाती हो, तुम बहुत सुंदर हो, तुम बहुत स्वादिष्ट खाना बनाती हो, तुम एक अच्छे पति हो वक्त पर घर आते हो, वीकेंड को फैमिली को आउटिंग कराते हो, अच्छे बेटे हो तुम कि मां-बाप का ख्याल रखते हो, तीर्थ कराते हो....और इस तरह ये बहुत अच्छे होने के मानकों में समूचा व्यक्तित्व धंसता चला जाता है, बहुत अच्छे होने की कोशिश में अपने आप तक कभी पहुंच ही नहीं पाता। अंत में यह बहुत अच्छा होना भी छूट ही जाता है...एक रोज ऑफिस से देर हो जाने पर, एक रोज साफ पोछा न लगाने पर, एक रोज ठीक से सज संवर कर न रहने पर, एक रोज दाल में नमक तेज हो जाने पर, एक रोज मां-बाप को किसी काम के लिए इनकार करने पर अच्छे के सिंहासन से धकेल दिया जाता है। असंतोष ही है चारों ओर और एक रेस भी उस बहुत अच्छे होने के सिंहासन की ओर दौड़ने की। स्त्रियां इस दौड़ में ब्यूटीपार्लर की ओर भागती हैं, ज्वेलरी शॉप की ओर, नये फैशन के कपड़ों की ओर, पुरुष नये मॉडल की गाडि़यों की ओर, और ज्यादा कमाने की ओर....इस दौड़ से बाहर कोई अस्तित्व ही न हो जैसे। जो लोग खुद को इस दौड़ से बाहर निकाल लेते हैं वो समाज की आंख की किरकिरी बन जाते हैं।
टुकड़ों में दिखता है टुकड़ा-टुकड़ा विमर्श-
मैं तो भई इन स्त्री विमर्श वालों से दूर ही रहती हूं। इन्हें हर बात में पुरुषों के खिलाफ मोर्चा निकालने की हड़बड़ी रहती है...ऐसा कहने वाली स्त्रियों से कम मिलना नहीं होता। ऐसा कहते ही ये पावन स्त्रियां पुरुषों की प्रियता तलाशती हैं कि उन्हें विरोधी खेमे का समझ अपने से अलग न कर दिया जाए कहीं। दलितों को अपना दलित होना छुपाते भी देखा ही होगा हमने कि वो आरक्षण लेकर आये हैं इस बात का दंश समाज उन्हें रह-रहकर मारता ही रहता है। उनसे हुई एक गलती उनकी पूरे जाति पर, उनके चयन की प्रक्रिया पर सवालिया निशान भी होती है और मजाक का हिस्सा भी। एक दलित दूसरे दलित का अपमान होते देखकर भी चुप रहता है कि कहीं उसकी पहचान न सामने आ जाए, वो समाज की विद्रूपताओं का सामना करने की हिम्मत कहां से लाए। शक्तियों से वंचित इस समाज के सारे लोग चाहे स्त्री हो, दलित हो, आदिवासी हो हाशिए पर हैं। उन्हें हाशिए पर ही पड़े रखने की कवायद जारी है जिसमें उन्हें ही मोहरा भी बनाया जा रहा है।
”भई, औरतों का मामला है हम बीच में नहीं बोलते...” कहकर मूंछों के नीचे मुस्कुराकर निकल जाने वाले घर की सत्ता के मालिक जानते हैं कि इन स्त्रियों के आपस में जूझते रहने पर ही उनका होना कायम है। क्योंकि ये वही लोग हैं जो एक स्त्री के प्रधान बनते ही उसकी साारी शक्तियां अपने हाथ में लेना नहीं भूलते। टुकड़ों में स्त्री या दलित या सामाजिक विमर्शों को देखने की दिक्कत यही है कि इसके तहत एक को दूसरे के सामने विरोधी खेमा बनाकर परोस दिया जाता है जो कि है नहीं, विरोध तो चेतना का जड़ता से है...लेकिन वो दिखता नहीं है। यही खेल सबसे बड़ा है। एक स्त्री दूसरी स्त्री के विरोध में नहीं होती एक ज्यादा शक्तिसंपन्न व्यक्ति अपने से कम शक्तिसंपन्न व्यक्ति पर रौब गांठ रहा होता है।
16 बरस बाद घर-
सोनू लोगों के घरों में झाडू पोछा का काम करती है। एक रोज सुबह खुश-खुश आई और बोली, दीदी आज मम्मी का फोन आया है। घर पे बुलाया है खाने के लिए। 16 बरस से सोनू एक ही शहर में रहकर अपनी मां-बाप, भाई से नहीं मिली थी। उसकी आंखें छलक रही थीं। नहीं मिली थी क्योंकि 16 बरस पहले उसने अपनी पसंद के लड़के से शादी कर ली थी। पिता और भाई ने उसे मरा हुआ घोषित कर दिया और मां के पास उनके साथ होने के सिवाय कोई चारा नहीं था। उस घटना के कई साल बाद उस घर में एक बहू आई यानी सोनू की भाभी। उसने धीरे-धीरे बात करते हुए अपने पति को अपनी ननद के प्रति घृणा से बाहर निकाला। आाखिर घर की बहू ने घर की बेटी को घर से जोड़ने की कोशिश में सफलता पाई। कहां है वो इतिहास जो जुमलों में स्त्रियों को दुश्मन करार देता है स्त्रियों का। ऐसे उदाहरणों की संख्या बढ़ रही है और जाहिर है समाज की चूलें हिल रही हैं....।
मां को बेटा चाहिए-
कन्या भ्रूण हत्याओं का ठीकरा भी स्त्रियों के ही सर है। क्योंकि स्त्रियों को ही बेटा चाहिए होता है। क्यों चाहिए होता है स़्त्री को बेटा, क्यों वो अपनी ही कोख में अपनी बेटी के मार दिए जाने की पीड़ा बयान तक नहीं कर सकती। क्यों उसने समझ लिया है कि बेटियों को जन्म देकर वो अपना बचा-खुचा अस्तित्व भी खो देंगी। उसका सम्मान, उसका गौरव, उसके अधिकार सब एक पुत्र जन्म पर आश्रित हैं इसलिए वो बेटे की कामना करती है। असल में यह कामना तो पुरुष सत्ता की ही है जिसे आरोपित भी स्त्री पर किया गया है और जिसका दंश भी स्त्री को ही सहना पड़ता है। यहां से अहंकार का राज शुरू होता है। एक ही घर की तमाम बहुओं में से पुत्र को जन्म देने वाली बहू का मान बढ़ता जाता है और बेटियों की मांओं के हिस्से में उपेक्षा बढ़ती जाती है। जीवन भर स्त्री होने की उपेक्षा का दंश सहने के लिए पुत्री को जन्म देने की बजाय वे पुत्र जन्म देना चाहती हैं इसमें स्त्री को स्त्री का दुश्मन समझने वाली बात कहां से आ गई कोई समझाए तो।
आसान नहीं बेटियों की मां होना-
यह काला समाज है। स्त्री के लिए न कोई अधिकार हैं यहां, न सुरक्षा, न जीने लायक जीवन। जिस समाज में एक बरस की बेटी घर के सदस्यों की हवस की शिकार होती हो वहां मां का कलेजा उन्हें जन्म देते हुए क्यों नहीं कचोट उठेगा। एक ही वक्त पर दो दोस्तों ने अपने-अपने बच्चों को जन्म दिया। आज दोनों बच्चे 12 बरस के हैं। जहां बेटी की मां की नींद हराम रहती है सुरक्षा को लेकर वहीं बेटे की मां चैन से रहती है यह कहते हुए कि ”अच्छा हुआ लड़का है मेरा वरना मेरी भी नींद उड़ जाती।” यहां से आती हैं बेटों की ख्वाहिशें और बेटियों की उपेक्षा। और देखिए न यह इल्जाम भी उसी मां के सर पर है जो इस दंश को सह रही हैं वो तो जानती ही नहीं कि कब उन्हें उनके ही खिलाफ खड़ा कर दिया गया है। कितने चुपचाप सदियों से हमसे हमारा होना छीना जाता रहा है और हम बेखबर हैं।
उड़ो न अपनी भरपूर उड़ान-
समय के साथ बदले स्त्री के साथ संवाद करने के ढंग भी। बच्चियों की परवरिश में उनकी थाली की रोटी और कपड़ों का भेदभाव स्कूल तक पहुंचा। जहां पहले समस्या इस रूप में थी कि लड़कियों को पढ़ने की क्या जरूरत है अब इसका रूप उन्हें सरकारी स्कूलों में पढ़ लेने की आजादी मिलने तक बदल गया है, (संभ्रांत परिवारों की कान्वेंटी लड़कियों के अलावा जो संसार है उसके बरक्स देखा जाए इस बात को)। लड़कियों का आर्थिकी में सहयोग बाजारवाद से लड़ने में सहयोग करने लगा था सो, गृहकार्य में दक्ष, सुशील, गोरी कन्या के साथ नौकरीपेशा भी जुड़ गया। लेकिन रोजगार करने की आजादी उन्हें यह कहकर थमाई गई कि देखो, टीचिंग या नर्सिंग कर लो आराम रहेगा। नर्सिंग तो खैर उनके सेवाभाव के चलते चिपका दिया गया होगा उनके पीछे।
मीडिया में, सेना में, मेडिकल में, बैंक में, बिजनेस में जाने वाली लड़कियों की बाहर की दुनिया तो बदली लेकिन घरेलू संघर्ष नहीं बदले। लेखन में उतरी महिलाओं की प्रशंसा के साथ ही ऐसा लिखो, ऐसा न लिखो की ताकीदें भी उभरने लगती हैं। उन पर आरोपों के शिकंजे भी कसे जाने लगते हैं, खेमेबंदियों का शिकार भी बनाया जाने लगा। इतने सुभीते से कि शिकार को खुद भी पता न चले और वो अपना शिकार हो जाने का आनंद अनुभूत करने लगे। शर्त यह है कि नौकरी और घर संभालते हुए आह नहीं निकलनी चाहिए। आह निकली या कोई और दुर्घटना घटी तो ये समाज तंज की तलवारें लेकर खड़ा मिलेगा, और निकलो घर से बाहर...और करो नौकरी...
और अंत में बाजार-
इस सारे पेचोखम में बाजार भी, मीडिया भी सब जाकर खड़े हो गये पितृसत्ता के साथ। श्रंृगार, अच्छी होने की छवि, ममता, वात्सल्य, विनम्रता, त्योहार, परंपराओं को स्त्री के साथ मिक्स एंड मैच करके चमचमाते बाजार में तब्दील कर दिया। दृश्यम फिल्म का यह डॉयलाग काबिले गौर है कि चीजें जो दिखती हैं उनका असर बहुत गहरा होता है...बाजार ने दिखाया स्त्री का सौन्दर्य, ग्लैमर कितना महत्वपूर्ण है। धारावाहिकों ने, फिल्मों ने एक आदर्श स्त्री की छवि परोसी जो समर्पण की देवी की हैे। एक ऐसी स्त्री जो सुपरवुमन है। जो घर से बाहर तक, क्लब से बिस्तर तक सब हंसते हुए संभाल लेती है...जो सबको समझ लेती है...सबके काम फुर्ती से निपटा लेती है. जो भले ही नाइटक्लब में जाती हो लेकिन मंगलसूत्र और करवाचौथ से विमुख नहीं होती।
इस समाज रूपी रेलगाड़ी के हर डिब्बे में वही बिक रहा है जिसकी इजाजत समाज ने दी है। यात्रियों को आजादी तो पूरी है लेकिन अपने-अपने डिब्बों के भीतर भर। आसमान देखा तो जा सकता है लेकिन पूरा नहीं। और इस बात का इल्म भी नहीं होने देना है कि हमारी जिंदगी से हम ही मिसिंग हैं...इसीलिए कोई भी भंसाली, कोई कपूर, कुछ भी परोस के चला जाता है और हम बजाय सवाल करने के अश अश करके फिदा हो जाते हैं....ये सिलसिला रुके इसके लिए पहले इस सिलसिले को समझना होगा...

Thursday, April 14, 2016

हमें सिर्फ भारतीय सम्विधान से उम्मीद है

डॉ अम्बेडकर ने पितृसत्ता को स्त्रियों की दासता के कारण के रूप में पह्चाना। मनुस्मृति को उद्धृत करते हुए समाज में स्त्रियों की हीन दशा पर विचार किया और स्त्री-अधिकारों के हिमायत की। वे जान रहे थे कि स्त्रियाँ अपनी अस्मिता खो चुकी हैं।अपने एक लेख 'नारी और प्रतिक्रांति' में वे मनु स्मृति से स्त्री-द्वेष सम्बंधी कई उद्धरण देते हुए सवाल उठाते हैं कि 'मनु ने स्त्रियों को पदावनत क्यों किया?'

मनु के विचारों पर चलने वाले हिंदू समाज में स्त्रियों की दशा पर 1870 के दशक में भारतीय समाज में विस्फोट की तरह आईं पं. रमाबाई की पुस्तक 'हिंदू स्त्री का जीवन' में मनु के स्त्री-द्वेषी विचारों को उद्धृत करते हुए समझाया गया है कि  'धर्म' भारतीय स्त्री की मुक्ति की राह की सबसे पहली बाधा है। वे लिखती हैं "जो व्यक्ति मूल संस्कृत  साहित्य कोकटःइन परिश्रमव निष्पक्षता से पढ्ते हैं,यह  पह्चानने में कभी धोखा नहीं  खा सकते कि आचार संहिता निर्माता मनु उन कई  सौ लोगों में से एक हैं, जिसने दुनिया की नज़रों में  स्त्रियों को घृणास्पद जीव बनाने में अपना सारा ज़ोर लगा दिया। गृहकार्यमें तथा सगोत्रियता के कामों में लगा करयह सोचा गया कि स्त्रियों को भटकने से बचाने का यही एकमात्र उपाय है।...वह राष्ट्र केए प्यारी माता, समर्पित पत्नी,सहृदयी बहन तथा स्नेही पुत्री स्वतंत्रता के लिए कभी उपयुक्त नहीं होती'अपने आप में असत्य की भाँति अपवित्र होती है' कभी विश्वास की पात्र नहीं होती तथा कभी भी महत्वपूर्ण मुद्दे इन्हें नहीं सौंपे जाते।"

मनु के इस मिसोजिनिस्ट रवैये को मानो हिंदू समाज ने आत्मसात कर लिया।अम्बेडकर लिखते हैं कि मनु के ये नियम अकाट्य हैं और इनके ज़रिए उसने स्त्रियों को दास के स्तर पर लाकर पटक दिया।


मनु कहता है कि स्त्रियाँ वेद विहित दैनिक अग्निहोत्र नहीं करेंगी -
करेंगी तो वे नरक में जाएंगी ...

फेमिनिस्ट कहती हैं जो पहले ही नरक में है वह और किस नरक में जाएगा !! जिसके लिए न सड़क सुरक्षित है न घर।


धर्म से भी विद्रोह किया जा सकता है यह  अम्बेडकर ने कर दिखाया। मनुस्मृति को जलाया।विरोध सहा। मंदिरों में प्रवेश की मुहिम को लेकर हिंसा भी  झेली। अपने पद और और क्षमता के आधार पर उन्होंने स्त्रियों की स्थिति   को  बेहतर बनाने और  उन्हे प्रगति के पथ पर आगे बढाने के लिए भरसक प्रयास किए। स्त्रियों की शिक्षा से लेकर महिला  श्रमिकों को बराबरी के अधिकारों की हिमायत वे करते रहे।स्त्री शिक्षा, स्वास्थ्य , प्रजनन सभी पर विचार करते हुए  स्त्री अधिकारों की हिमायत उन्होंने की। स्त्री का दमन उसकी जाति और वर्ग से भी सम्बंध रखता है यह उन्होने पह्चाना।  एक तरह से डॉ अम्बेडकर ने भारतीय स्त्रीवाद के लिए एक व्यापक एजेंडा  तय किया और साथ ही वर्ग, जाति और जेंडर के मुद्दों पर एक साथ विचार करते हुए भारतीय चिंतकों में वे सबसे आगे निकल गए।

यह अतिशयोक्ति न होगी कि स्त्रियों को  किसी जगह अपने लिए उम्मीद दिखाई देती है तो वह सम्विधान ही है  जो उन्हे सम्मान , बराबरी और गरिमा मय जीवन देने का वादा करता है। वक़्त और ज़रूरत के हिसाब से जिसमें संशोधन किए जा सकने सम्भव हैं।
हम आज 14 अप्रैल के दिन उन्हें नमन करते हैं! 

Wednesday, April 13, 2016

स्त्री-संघर्ष का इतिहास और सिनेमा


विश्व इतिहास में अपने अधिकारों के प्रति सचेत होने की शुरुआत स्त्री ने मताधिकार की मांग के साथ की. इंग्लैंड और अमेरिका में स्त्री मताधिकार के लिए होनेवाले आंदोलनों के इतिहास से हम बहुत परिचित नहीं हैं.

स्कूल की इतिहास की किताबों में अक्सर उसे चंद पंक्तियों में समेट दिया जाता है और औरतों के ‘सफरेज’(मताधिकार) आंदोलन का महत्व हमारी पीढ़ियां समझ ही नहीं पातीं. बीसवीं सदी की शुरुआत ने ब्रिटेन में मताधिकार के राजनीतिक हक के लिए आंदोलनकर्ता स्त्रियों, जिन्हें सफरेज मिलिटैंट तक कहा गया, का आक्रोश और प्रतिरोध देखा. शीशे तोड़ने, फोड़ने, पुलिस से पिटने और जेल भरने, भूख हड़ताल से लेकर जॉर्ज पंचम के सामने एक मताधिकार आंदोलनकर्त्री एमिली डेविसन की शहादत की गवाह रही इस सदी की शुरुआत. बड़ी संख्या में आम कामगार औरतें इसमें शामिल थीं. 

जब विश्व क्रांतियों की बात होती है, तो औरतों की इस क्रांति को हम किताबों से और बौद्धिकों की स्मृति से भी मिटा हुआ पाते हैं. जबकि इसके लिए हमें ऋणी होना चाहिए उन स्त्रियों का, जिन्होंने अपने पतियों और प्रशासन दोनों से पिटते हुए मताधिकार के लिए आंदोलन जारी रखा. आंदोलन में निराशा के क्षणों में एमिली डेविसन को लगा कि कोई बड़ा झटका ही आंदोलन की तरफ ध्यान खींचेगा और यह उसने अपनी शहादत से किया. हैरानी की बात है कि जब एमिली चार दिन अस्पताल में पड़ी रहीं, तो कई पुरुषों ने भर्त्सना में पत्र लिखे कि उस जैसी स्त्री को तो मर ही जाना चाहिए.

अंतत: 1928 में स्त्रियों को पुरुषों के बराबर मताधिकार मिल सका. पिछले साल अक्तूबर में आयी फिल्म ‘सफरेजेट’ स्कूल के इतिहास पाठ्यक्रम से गायब इसी महत्वपूर्ण पक्ष पर आधारित है. मेरिल स्ट्रीप, जिन्होंने फिल्म में छोटी-सी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है, कहती हैं कि लोग ‘सफरेज’ शब्द का अर्थ तक नहीं जानते. ऐसे में यह फिल्म स्त्री आंदोलन के इतिहास को कला और नाटकीयता के जरिये आम दर्शक तक पहुंचानेवाली महत्वपूर्ण फिल्म है.

शी इज ब्यूटीफुल व्हेन शी इज एंग्री’ एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म है, जो स्त्री-मुक्ति आंदोलन (विमेन-लिब), की शुरुआत और प्रक्रिया की छानबीन करती है. अमेरिका में 1960 से 80 का दशक इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि यह ‘उग्र नारीवाद’ का दौर था, जिसमें औरतों ने हर स्तर पर बराबरी के लिए आवाज उठायी. 

सिर्फ मताधिकार और विश्वयुद्धों में पुरुषों के व्यस्त हो जाने की वजह से खाली हुई जगहों पर नौकरी करती हुई स्त्री अपने जायज हकों को हासिल नहीं कर पायी थी. सफरेज आंदोलन के बाद 1960 तक का समय स्त्री-मुक्ति आंदोलन के लिए एक लगभग व्यर्थ हुआ समय था. 1960-70 के दशक में औरतों ने अपने शरीर, अपनी यौनिकता और प्रजनन पर अपना हक मांगा. वे अपने दोयम दर्जे से निराश थीं और उग्र हो चुकी थीं. तब के नारीवाद ने स्त्री की समस्या की जड़ पर प्रहार किया. शुलमिथ फायरस्टोन अपनी 1970 की पुस्तक में लिखती हैं कि औरतों और मर्दों के बीच श्रम का विभाजन इतिहास का सबसे पहला और पुराना वर्ग-विभाजन है और इसलिए यह समस्या बहुत गहरी है. 

इस आंदोलन में मुख्य भूमिका निभानेवाली स्त्रीवादियों- केट मिलेट, रीटा ब्राउन, फ्रैन बील आदि के साक्षात्कार फिल्म में हैं. खास बात यह है कि इस डॉक्यूमेंटरी फिल्म की शूटिंग, साक्षात्कार, निर्देशन आदि सब कुछ  स्त्रियों ने किया है. यह फिल्म समकालीन नारीवादी मुद्दों- अश्वेत नारीवाद, बलात्कार और ‘स्लट वॉक’ जैसे मुद्दों को भी समेटती हुई एक बेहद जरूरी फिल्म है. 

बीसवीं सदी के भारतीय समानांतर सिनेमा ने पितृसत्ता के विरुद्ध खड़ी स्त्री के संघर्ष को दिखाया और इक्कीसवीं सदी की शुरुआत से मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में स्त्री मुद्दों पर आधारित फिल्में आने लगीं. कई महिला-निर्देशक भी जहां परंपरागत तरीके से सिनेमा बना रही हैं, वहीं अपनी अलग उपस्थिति दर्ज करानेवाली स्त्रियां भी मौजूद हैं.  दीपा मेहता, अपर्णा सेन, मीरा नायर जैसी निर्देशकों ने महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज की है. हमारे पास वाटर, बैंडिट क्वीन, मेरी कॉम, फायर, क्वीन, डर्टी पिक्चर, हाइवे, लंचबॉक्स जैसी उल्लेखनीय फिल्में हैं.  

अब भी भारतीय इतिहास में स्त्री-मुक्ति-आंदोलन के विभिन्न पक्ष सिनेमा का विषय नहीं बन सके हैं. 19वीं सदी के सामाजिक सुधार आंदोलन में सती-प्रथा, बाल-विवाह का विरोध, विधवा-पुनर्विवाह और स्त्री-शिक्षा पर बल दिया गया. आजादी के संघर्ष में स्त्रियों की व्यापक भागीदारी रही. सरला देवी, एनी बेसेंट, सरोजिनी नायडू, भीकाजी कामा, कमला चट्टोपाध्याय, दुर्गाबाई देशमुख, बसंती देवी, अरुणा आसफ अली सरीखे कई सशक्त व्यक्तित्व हैं. शुरुआती दौर में स्त्रियों के सामाजिक-पारिवारिक अधिकारों के साथ मताधिकार को लेकर भी चौदह महिलाओं के एक प्रतिनिधिमंल ने मॉन्टेग्यू-चेम्स्फोर्ड समिति के सामने एक प्रस्ताव रखा था. 

अखिल भारतीय महिला कांग्रेस, इंडियन वीमेन एसोसिएशन, नेशनल काउंसिल ऑफ वीमेन ने स्त्रियों के मताधिकार की मांग को लेकर लंदन जाकर संयुक्त समिति के सामने अपनी बात रखी. लेकिन हमारे यहां भारतीय-स्त्री-संघर्ष के इतिहास के नाम पर निष्ठा जैन के वृत्तचित्र के बाद एक ‘गुलाबी गैंग’ जैसी फिल्म है. 

श्वेत स्त्रियों के आंदोलन के इतिहास में बहुत सी भिन्न स्त्री अस्मिताएं भी हैं, जो दर्ज नहीं हो सकीं. एशियाई प्रतिनिधित्व के तौर पर सोफिया दिलीप सिंह, जो एक भारतीय राजकुमारी थीं, इंग्लैंड के सफरेज आंदोलन में बेहद सक्रिय रहीं, लेकिन उन्हें भुला दिया गया. वे फिल्म ‘सफरेज’ में कहीं नहीं हैं.

स्त्री-मुक्ति आंदोलन इतिहास का उपेक्षित पक्ष है. इसलिए इस पक्ष पर फिल्म बनाना जितना मर्दवादी सिनेमा में जगह बनाने का सवाल है, उससे कहीं ज्यादा इतिहास से जूझने का सवाल है. आज स्त्री-केंद्रित फिल्मों के बड़ी संख्या में दर्शक उपलब्ध हैं. 

मल्टीप्लेक्स सिनेमा के आने के बाद औरतें अकेले भी फिल्म देखने जाने का साहस करने लगी हैं. तकनीक है, अवसर है, नये विमर्श हैं, नये सवाल हैं; हमें अब सिनेमा के स्त्रीवादी युग के लिए, प्रतिमान-परिवर्तन के लिए तैयार होना चाहिए.
-------------------------------------
- प्रभात खबर में प्रकाशित कॉलम