Saturday, May 28, 2016

बेहद महीन स्तरों पर बेहद गहरी और गाढी लकीरों सी खिंची है स्त्री देह पर अनधिकार चेष्टाओं की कहानियाँ

रोज़ के अखबारों और समाचारों से हम बलात्कार की खबरें और उनकी डीटेल्स इकट्ठी कर पढने लगें तो दिन के अंत तक उबकाई ,आक्रोश, तनाव, व्यर्थता -बोध और माइग्रेन से अधमरे हो जाएँगे ...लेकिन सच यह है कि अब सब उदासीन होते जा रहे हैं...आह , एक और बलात्कार ...हम बलात्कारों के प्रकारों और भेदों पर विस्तार में बात कर सकें इतनी तरह के बलात्कार...वर्गीय कुण्ठा से, जातीय ठसक  से, फैलिक ताकत के प्रदर्शन के लिए, सबक सिखाने के लिए, मनोरंजन के लिए ....न बुझने वाली हवस के लिए...न जाने क्या क्या ... पुरुष की हमेशा असंतुष्ट कामेच्छा को लेकर एक कम्बोडियाई  कहावत है - "दस नदियाँ मिल कर भी एक सागर को नहीं भर सकतीं".... जब भी लुइज़ ब्राउन की किताब "एशिया का सेक्स बाज़ार "उठाई और पढी एक गहरे तनाव से कुछ दिन तक उबर नहीं पाती...वेश्याओं का बलात्कार हमारे समाज की समझ मे ही आने वाली चीज़ नहीं है....वैवाहिक रेप की अवधारणा तो और भी गज़ब बात है संस्कारी भारतीय समाज के लिए ...जो आपकी मर्ज़ी से नहीं बना ...किसी भी तरह के दबाव के  तहत हुआ वह सेक्स ' फ्री' नहीं है यह साधारण सी बात न समझ पाना  फेसबुक पर भले दिखते हुए पढे -लिखे लोगों  की घटिया सोच के प्रकटीकरण का माध्यम बनीं और सामाजिक कार्यकर्ता कविता कृष्णन बेहूदा टीका-टिप्पणियों और लागातार मिलने वाली गालियों का निशाना हुईं।  मैं सड़क किनारे एक टेंट में बसे मजदूर परिवार की स्त्री को देख रही थी जिसके तीन बच्चे बाहर खेल रहे थे और एक अजन्मा उसकी पीठ को झुकाए था...दुबली सी  उस औरत को देख कर सोच रही थी...इसके लिए फ्री सेक्स के मानी होंगे वह सम्भोग जिसमें उसे फिर से गर्भ ठहरने का भय न हो...वह कितना सोच पाती होगी इस विषय में ...उसके लिए जितनी बड़ी समस्या दो वक़्त की रोटी है क्या बार-बार गर्भ ठहरने का भय पीड़ा और स्वास्थ्य का बिगड़ते रहना कोई "बड़ी"  समस्या नहीं है ? उसके पास 'ना' कहने का अधिकार होना और उसकी 'ना'  का सम्मान किया जाना सीखना क्या किसी फ्लाईओवर के बनने या भीड़भाड़ वाले इलाके में फटने से पहले किसी बम के डिफ्यूज़ किए जाने से कम महत्वपूर्ण है ? ?
बेहद महीन स्तरों पर बेहद गहरी और गाढी लकीरों सी खिंची है स्त्री देह पर अनधिकार चेष्टाओं की कहानियाँ , अपनी ही देह से अपने ही निर्वासित हो जाने की स्त्री की यह व्यथा जितनी मुश्किल है कही जानी उसकी कई   गुना सम्वेदनशीलता चाहिए  उसे समझने को...

  अमरीकी एक्टीविस्ट कवि मार्च पियर्सी की एक कविता ने झकझोरा ...सम्भवत: आपने पढी हो...फिर भी चाहूंगी कि उसे पढा जाए..

बलात्कार 


बलात्कार और
सीमेंट की ऊँची सीढियों सेसीधा नीचे
                धकेल दिए जाने में
फर्क है तो इतना
               कि पहले में ज़ख्मों का मुँह अंदर भी खुलता है।


बलात्कार और
ट्रक के नीचे आ जाने में
फर्क है तो इतना
             कि पहले के बाद
              पूछते हैं मर्द कि मज़ा आया न!


बलात्कार और
तलवे के सर्पदंश में
फर्क है तो इतना
          कि पूछते हैं लोग-बाग
          कि क्यों फ्रॉक छोटी पहन कर
                 निकली थी एकदम अकेली ?


बलात्कार और
कार का शीशा तोड़ते हुए  मुण्ड
          बाहर कर लेने में
फर्क नहीं है इसके सिवा
कि उसके बाद आप डरने लगती हैं
         कारों से नहीं- आदमजात से !



भाई का दोस्त ही तो था वह !
सिनेमाघर में बैठा आपके पास
          फाँकता हुआ पॉपकॉर्न।
फंतासियों पर स्वस्थ मर्द की
                 मुटाता है
यह बलात्कार -
जैसे पिल्लू कूड़े पर !


भय बलात्कार का
            है एक बर्फीली हवा
            जो औरत की कुबड़ाई पीठ पर
            बहती रहती है हरा वक़्त--
            चीड़ के दरख्तों की छाया में ----
बलुआही रास्तों पर- अकेले-अकेले टहलने की सोचना भी मत,
          सोचना भी मत चढने की गाड़ी
          मुँह में अल्मूनियम बिना दाबे
         जब देखो बढा आ रहा है कोई आदमी
                                 तुम्हारी ओर !



तेज़ , गलाकाट सा रेज़र
           कभी हाथ में पकड़े बिन तो
           सवाल ही नहींं उठता
                          दरवाज़ा खोलो !

झाड़ियों के उन अंधेरे किनारों का भय
भय गाड़ी की पिछली सीटों और खाली मकानों का
जिसमें कि चाभियाँ खड़खड़  करती हैं
                    साँप की चेतावनी सी !


मुस्काते आदमी का भय
               जिसकी कि जेब में हो चाकू
भय उस गम्भीर आदमी का
             जिसकी मुट्ठी में है भरपूर नफरत !

अरे भई, बलात्कारी को चाहिए ही क्या ?

         देह की एक झलक ----
         देह जैसे जैक या हथौड़ा या टॉर्च
                         जैसे कि कोई मशीनगन
चाहिए क्या अलावा इसके
----- सिर्फ एक भरपूर नफरत -----
देह के लिए, आपकी देह या कि समूचे वजूद के लिए
माँसपेशियोंं की खातिर नफरत भरपूर
जो मुलायम पड़कर मछली हो जाती है!
और आपको करना क्या चाहिए ?
                ज़ोर से  धकेलना ही तो
उस मुलायम और अनजान-सी माँसपेशी के
               घुसपैठिए को
ठ्ण्डी मुद्राओं की तोप से
      बस धड- धड़ दागते जाने
                  अजेयता -----

पाना, सज़ा देना साथ-साथ
                 मज़े सए उड़ा देना धज्जी धज्जी
                और मार डालना उसे
जो प्रेम की खातिर
               पत्ती सी खुली
                मुलायम माँसपेशी में
घुसने की  सोचे भी !


मार्च पियर्सी : स्त्रीवादी -मार्क्सवादी अमरीकी एक्टीविस्ट कवि जिनका  कविता संग्रह The Moon Is Always Female (1980)स्त्री- आंदोलन का एक क्लासिक टेक्स्ट माना जाता है।

अनुवाद : अनामिका 

     

Friday, May 6, 2016

रेखाओं में साझा संसार स्त्री का


आज चोखेरबाली पर अनुप्रिया के कुछ रेखांकन शाया करते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है। जबसे फेसबुक के ज़रिए उन्हेंं जाना अनुप्रिया के ये खूबसूरत रेखांकन मुझे विस्मित करते रहे हैं। इनकी खासियत है कि एक स्त्री संसार इनके भीतर बसता  है।इनमें स्त्री का साझा संसार भी है और कभी निजी पलों की अबूझ भावनाएँ भी। निजी भी उतनी निजी कहाँ है ...स्त्री का सत्य निजी होते हुए भी आत्मकेंद्रित नहीं होता। अस्मिता के शोध के साथ मुक्ति की इच्छा और उसकी कल्पना का आनंद ....मैनें इन रेखांकनो में देखे हैं। कुछ रेखाएँ कैसे इतना कुछ कह पाती हैं यह अनु के रेखांकन बताते हैं जो कितना क़रीब हैं कविता के, मन के, अवचेतन के ...अपनी कल्पनाओं के उलझे सिरे सुलझाते हुए भी हमारी कल्पना को अथाह स्पेस दे सकने की इनमें क्षमता है। अनु खुद कहती हैं कि जब वे कोई चित्र बनाती हैं तो एक स्त्री मानो आकर बैठ जाती है पन्ने पर...उसी से बतियाती हुईं वे रेखाओं के संग उसकी बात कहने की कोशिश करती हैं।
अनु ने अब तक 500 से अधिक चित्र बनाएँ हैं जिनमें से 400 स्त्री केंद्रित हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मेंं उनके चित्र देखने को मिल रहे हैं। हाल ही में बच्चों के लिए उनकी एक किताब"थोड़ा सा तो हो न बचपन " भी प्रकाशन विभाग से आई है। इन रेखांकनों के लिए उन्हें बहुत बधाई और शुभकामनाएँ।