Monday, June 27, 2016

आरती, सुनीता और सुगंधा : तीन दुनिया एक सच

  • विपिन चौधरी


यों तो सारी दुनिया की स्त्रियों के प्रंसग और उनसे जुडी समस्याएँ इस कदर एकरूपता लिए हुए हैं की उनमें एक तरह का बहनापा दर्ज किया जा सकता। फिर भी सामाजिक और आर्थिक आधार पर अगर हम वर्गीकृत करके देखें तो विदेश देश और स्थानीय युवतियों के जीवन में अंतर काफी घना है, इसके पीछे कारण यह हैं कि आर्थिक समृद्धता भी कई बार स्त्रियों की कई परेशानियों को आसान कर देती हैं. पर कई बार मेरी यह सोच गलत साबित होती दिखती तब ऐसा लगता है कि शायद धनाढ्य वर्ग और गरीब- गुरबे की लड़कियों की समस्याओं में कुछ ख़ास अंतर नहीं होता. इसी आधार पर अपनी पहचान की तीनों लड़कियों को अलग नहीं कर पा रही हूँ. पिछले कुछ समय से न जाने क्यों तीनों के चेहरे एक साथ मेरे सामने घूम रहे हैं. तीनों के सामाजिक और आर्थिक परिवेश में ज़मीन आसमान का अंतर है. पहला जिक्र चौबीस वर्षीय लड़की आरती का है. आरती हिसार, हरियाणा की बाल्मीकि बस्ती में रहती हैं. आरती को बारहवीं पास किये हुए पांच साल हो चुके हैं आगे पढ़ने की तीव्र इच्छा के बावजूद आगे की पढ़ाई करना उसके लिए दिवास्वप्न हो गया है. दुःख में भरकर अक्सर आरती कहती है, 'दीदी हर साल मैं कॉलेज में प्रवेश के लिए प्राइवेट फॉर्म भरने के लिए माँ को राजी कर लेती हूँ पर भाई मना कर देता है. लंबे- लंबे दिन कटते ही नहीं। घर का काम करने के बाद जी भर कर सो भी लेती हूँ पर खूब सारा समय फिर भी बच जाता है. घर में ही थोड़ा बहुत सिलाई कर अपने खर्चे लायक कुछ कमा लेती हूँ. 50 गज़ की चारदीवारी का घर ही उसका कार्यक्षेत्र है. वह सिर्फ दिवाली के दिन ही थोड़ी बहुत खरीदारी के लिए बाहर निकलती है वर्ना घर ही उसकी सीमित दुनिया है.

दूसरा उदाहरण सुनीता का है। कुछ समय पहले तक वह मेरे साथ दिल्ली के पेईंग गेस्ट हॉस्टल में रह कर एक कोर्स कर रही थी. अब दो साल से अपने दादा-दादी, चाचा-चाची,ताऊ- ताई और ढेर सारे चचेरे फुफेरे बहन-भाईयों के साथ रहती है. पिछले दिनों उसका फ़ोन आया उसने बड़ी मायूस आवाज़ में कहा 'दीदी क्या करूँ, "घर में बोर हो जाती हूँ. घर वाले मेरे लिए कोई बिज़नेस फैमिली का लड़का तलाश कर रहे हैं, तब तक मुझे सिर्फ इंतज़ार करना होगा. मैं आगे पढ़ना चाहती हूँ लेकिन घर वालों ने उसके लिए साफ मना कर दिया है । घर में ढेर सारे लोग हैं फिर भी मन नहीं लगता वो तो शुक्र है कि घर-परिवार में किसी का जन्मदिन या सालगिरह होती रहती हैं तभी घर में थोड़ा टाइम पास हो जाता है वरना दिन कटता ही नहीं। अगले महीने छोटी चाची की सालगिरह हैं एक छोटा सा फंक्शन होगा हम सभी लड़कियाँ उस की तैयारी में व्यस्त हैं'. छह महीने पहले आया उसका फोन आज तक मुझे परेशान किये हुए हैं. धनाढ्य व्यापारी परिवार की खूबसूरत और शिक्षित लड़की सुनीता को उसके परिवार ने उसकी इच्छा के पंख नहीं दिए. उसे अपने जीवन का पहला हिस्सा मायके वालों फिर ससुराल वालों की इच्छा अनुसार ही रहना होगा जैसे बाकी की आधी दुनिया रहती आई है.

मेरे सामने तीसरा दुखद किस्सा सुनंदा का है. सुनंदा, मेरे संपर्क में आई सबसे जीवंत और खुशमिज़ाज़ युवती थी. पिछले दिनों 'मॉडल की आत्महत्या' शीर्षक से वह टेलीविज़न और अखबार की सुर्ख़ियों में शामिल थी. अपनी इस सहपाठी की आत्महत्या की खबर सुन कर मैं हतप्रभ थी. वह बेहद हिम्मती और जिंदादिल लड़की थी. उसके बारे में मेरा यह विचार था कि वह अपने जीवन से जुड़े सभी फैसले लेने में स्वतंत्र है और अपनी आर्थिक पारिवारिक स्थितियों के चलते जीवन की तमाम सुख सुविधाओं का आनंद उठाने वाली इस लड़की को देख अच्छा महसूस होता था. पर महज़ 25 साल की उम्र तक आतेआते आत्महत्या को बाध्य होने की स्थितियों के कारण मेरे सोचने की दिशा बदल गयी. जर्मनी में ग्रेजुएशन करने केबाद वह दिल्ली में मेरे साथ कुछ समय तक रेडियो अकादमी, हौज़ ख़ास में प्रशिक्षण ले रही थी. पिछले कुछ सालों से दिल्ली टाइम्स की सोशल पार्टीज में उसकी तस्वीरें अक्सर देखने को मिल जाती। पिछले साल ही उसने एक तलाकशुदा व्यक्ति से प्रेम के बाद विवाह किया और चार-पाँच महीने में ही आत्महत्या कर ली. अखबार के ज़रिये ही पता चला कि उसका पति उसके स्वतंत्र व्यवहार से खिन्न था और उसकी पिटाई भी कर डाली इसके बाद वह अपने मायके चली गयी और फिर पति और उसके परिवार वालों के मनाने पर वापिस चली गयी और फिर कभी लौटी ही नहीं। शायद उसे भी अपने परिवार की सामाजिक स्थिति के ख़राब होने की चिंता होगी। लड़कियां अपनी सामाजिक स्थितियों के कारण मानसिक दबाव में रहती हैं.

आरती, सुनीता और सुगंधा यहाँ पर आकर समाज का अनुसरण करने लगती हैं अपने मन को पीछे छोड़ देती हैं. आज इक्कीसवीं सदी में स्त्री सशक्तीकरण के तमाम उजले नारों के बाजजूद स्त्री के जीवन का सच यही है.
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विपिन चौधरी सुपरिचित युवा कवि हैं 





Saturday, June 4, 2016

धर्म के नाम पर विकल्पहीन है औरत की दुनिया

हुस्न तबस्सुम निहाँ 


चित्र : अनुप्रिया 




हलाला मुस्लिम समाज की एक ऐसी प्रथा है जो काफी निंंदनीय कही जा सकती है। इसमें एक तलाकशुदा पत्नी को अपने पति से दोबारा निकाह करने के लिए, उससे पहले किसी दूसरे मर्द से निकाह करना पड़ता है। यही नहीं उसके साथ हमबिस्तरी भी ज़रूरी है। हलाला निकाह के बारे में ठीक ठीक स्पष्ट  नहीं है कि इसका इतिहास क्या है।क्यों ये रवायत शुरु करनी पड़ी।

वास्तव में हलाला शब्द 'हलाल' से बना है जिसका अर्थ है वैध। हराम का विपरीतार्थक। जो वर्जित न हो वह हलालहै। उसी से बना है शब्द हलाला। तलाक़ के बाद पत्नी को पति पर हराम मान लिया जाता है।दोबारा वैध बनाने के लिए उसे हलाला की अग्नि परीक्षा से गुअज़रना होता है।

अब्दुल्लाह बिन मसूद ने कहा कि रसूलल्लाह स.वसल्लम ने हलाला करने वाले और जिसके लिए हलाला किया जाए दोनो पर लानत की है।हैरत ये होती है कि एक  तरफ इसपर लानत भेजी जा रही है तो दूसरी तरफ इसके ताईद भी की जाती है।

ऊम्मुल मोमिनीन आयशा फरमाती हैं कि किसी पति ने अपनी पत्नी को तलाक़ दे दिया। लेकिन बाद में फिर से अपनी पत्नी से शारीरिक सम्बंध बनाने की इच्छा प्रकट की।तब रसूल ने कहा कि ऐसा करना बहुत बड़ा गुनाह है। ऐसा तब तक नही हो सकता जब तक उसकी पत्नी किसी दूसरे मर्द का और वह मर्द उसके शहद का स्वाद न चख ले। (दाउद, किताब 12,नम्बर 2302)

हलाला की चर्चाएँ कुरान में भी पाई जाती हैं। अगर ये बातें लानत की चीज़ हैं तो मो. साहब ने इसे हराम क्यों नही कहा। इससे ज़ाहिर होता है कि हलाला निकाह पितृसत्तात्मक व्यवस्था का ही एक रूप है जो महिलाओं पर अंकुश लगाने उन्हें पति की बांदी बनकर रहने को विवश करता है।अगर दाल में नमक कम है  तो भी पति पत्नी को तलाक देता है। बाद में होश आने पर वह पत्नी को पुन: पाना चाहता है। तब उसे हलाला का रास्ता सुझाया जाता है ताकि उस मर्द की ग़ैरत पर चोट पहुँचे। पर यह अपमान और ज़लालत पत्नी क्यो सहे?

हलाला निकाह के लिए औरत की मर्ज़ी नही जानी जाती। अभी कुछ दिन पहले की घटना है कि क़स्बा फतेहगंज के निकटवर्ती गाँव मेंकुछ आपसी  मन-मुटाव के कारण पति-पत्नी ने अलग हो जाने का फैसला किया। किंतु कुछ दिनो में उन्हे आभास हुआ कि उनका निर्णय गलत था।उन्होने दोबारा साथ रहने का फैसला किया और आपसी बातचीत के बाद हलाला निकाह करने का निर्णय लिया गया। एक व्यक्ति को हलाला निकाह के लिए राज़ी भी कर लिया गया। यह तय हुआ कि निकाह के एक दिन बाद वह महिला को तलाक़ दे देगा। इस निक़ाह के बारे मे उस व्यक्ति ने अपनी पत्नी से कुछ नही कहा। दो दिन पूर्व उस पत्नी को इसकी भनक लग गई।नतीजा , वह गुस्से में आगा बबूला हो गई और कमरा बंद करके फाँसी पर लटक गई।

नशे की हालत में और फोन पर दिया गया तलाक़ भी मान्य है। और इस स्थिति में भी हलाला के सिवाय दूसरा विकल्प नहीं।

मुस्लिम समाज आज इक्कीसवीं सदी में भी क़ुरान द्वारा ही संचालित हो रहा है। हैरत तब होती है जब असग़रअली इंजीनियर जैसे प्रगतिशील विचारक भी अपनी पुस्तकों में आसमानी किताब या 'बही' आने का ज़िक्र करते हुए इस्लामी गाथा लिखते हैं। ऐसे में भला क्या उन्नति कर सकेगा यह मुस्लिम समाज ।

कभी किसी मुस्लिम देश में यकायक यह नियम लागू कर दिया जाता है कि जेलों में जिन महिलाओं के लिए मौत की सज़ा का ऐलान हुआ है उन्हें फाँसी देने से पहले उनके साथ जेल के अधिकारियों या कर्मचारियों को शारीरिक सम्बंध बना लेना चाहिए। इससे महिला को मौत के बाद जन्नत मिलेगी। ऐसे कामों पर आपत्ति होने पर फौरन कुरान का हवाला देकर उसे सही ठहराने का प्रयास किया जाने लगता है। जहाँ तक हदीसों की बात है तो हदीस रचने वाले भी पुरुष ही हैं। उन्हे अपनी सत्ता तो बरक़रार रखनी ही है। इसके लिए महिलाओं को आगे आना होग। ऐसे तमाम मिथकों को तोड़ना होगा जो  उनके  अस्तित्व पर प्रहार करते हैं।

'हलाला निक़ाह: एक वैध वेश्यावृत्ति' 
के कुछ अंश
हंस , जून 2016   से साभार 

Thursday, June 2, 2016

तेरा मेरा मनवा कैसे ...



अनुप्रिया ने इस बार रंगों के साथ ये नए प्रयोग किए हैं। रंगों की भी अपनी  भाषा होती है। इर्द-गिर्द प्रकृति , स्त्री -पुरुष सम्वाद और स्वातंत्र्योन्मुख  चिंतनशील मनुष्य को मैं इन चित्रों में देखती हूँ। रंग और रेखाओं की दुनिया में मानवीय अंतर्सम्बंधों और अबूझ मन की गुत्थियाँ सुलझाने का प्रयास अनु के यहाँ लगातार दिखाई देता है। रंगों ने इन्हे प्रभावशाली बनाया है लेकिन मुझे लगता है अनु की ताकत उनकी रेखाएँ हैं; सफेद कागज़ पर काली रेखाओं से वे जो कविता रचती हैं उसकी ध्वनि मनोजगत में दूर तक जाती है, वे जितनी बार देखे जाते हैं उतनी ही बार पढे जाते हैं। बाकी जो पारखी हों वे जानें, मुझ से सामान्य पाठक को रंग और रेखाओं की समझ इतनी ही है कि मुझे ये चित्र आकर्षित करते हैं। 











तेरा मेरा मनवा कैसे इक होई रे...



अनुप्रिया