Wednesday, May 24, 2017

उसे लडकी ही कहूँगी भले साठ की हो - फलटन डायरी

प्रकृति को मुग्ध भाव से देखती है स्त्री और इस शहर से उस शहर बस जाने के अनुभवों में जितना नए परिवेश की खूबसूरती का अपनापन है उतना ही नॉस्टेल्जिया...नए परिवेश को अपना बना लेने की खूबी और फलटन में इलाहाबाद ढूँढती स्त्री का मन... कभी बगल की प्रियंका और कभी हायसिंथ नाम केी जामुनेी लड़की तक ले जाता हुआ...आज रुचि भल्ला  केी डायरेी के कुछ अंश- 


*****
- हायसिन्थ एक फूल का नाम है जामुनी फूल ...। मैं उसे भी फूल ही कहूँगी , एक लड़की जो जामुनी है । मैं उसे लड़की ही कहूँगी ...होने दो उसे चाहे साठ साल की । वह फूल ही है... फूल सी कोमल -मुलायम, खिली हुई ....खुशबू बिखेरती हुई ...जीवन से भरपूर ... । हायसिन्थ को मैंने उसके घर का दरवाज़ा खोलते हुए देखा ..काली जीन्स, आसमानी टाॅप, बाॅय कट बाल ,आँखों में गहरे हरे रंग का काजल, सुनहरे फ्रेम का चश्मा , होठों पर काॅफी कलर की लिपस्टिक ,मैनीक्योर्ड हाथों पर गोल्डन ग्लिटर्ड नेल पेन्ट थी। रोमन कैथोलिक हैं हायसिन्थ .... पिता डच माँ बर्मा की और पति अंबाला के ....सागर नाम है पति का ...सन् 78 में सागर से पुणे में मिलीं और तबसे हो गईं हायसिन्थ आर्य ....
मैं अब तक दरवाज़े पर ही खड़ी थी उनके सामने कि उनकी फूलों भरी मुस्कराहट ने अपने पास मुझे रोक लिया ....हायसिन्थ पुणे में एमोनारा सोसायटी में रहती हैं पच्चीस माले की खूबसूरत अट्टालिका के एक फ्लैट में ... पति का अपना व्यवसाय... बेटी को ब्याह दिया है और खुद पेशे से इवेंट मैनेजर हैं ... । दोपहर का समय था आसमान में नर्म उजली रुई की धूप बिखर रही थी ....दिन इत्मीनान का था इतवार ....मैंने घर की चौखट के अंदर पाँव बढ़ा दिये थे ....
वैसे आपको बता दूँ मुलाकात का यह दिन छब्बीस जनवरी का था कैलेंडर के हिसाब से ...पर हायसिन्थ का घर अब भी क्रिसमस का त्योहार मना रहा था ...26 जनवरी में 25 दिसंबर को उस घर में मैंने देखा ... ।कभी-कभी वक्त ठहर जाता है ... । वक्त पाँव की पालथी मार कर बैठा हुआ है हायसिन्थ के सोफे पर लाल कुशन को गोद में लिए हुए ,बैठ कर बतिया रहा है सैंटाक्लाॅज़ के साथ ...। सैंटा जो हायसिन्थ के घर आकर फिर लौटा नहीं अब तक ... छुट्टियाँ बढ़ा दी हैं उसने ;वहाँ और ठहर जाने के लिए ।
ड्राॅइंग रूम ...कमरा न होकर किताब का पन्ना लग रहा था ...साफ -शफ़्फ़ाक पन्नों पर लाल -हरी सजी-धजी तस्वीरें ...घर क्रिसमस थीम पर सजा हुआ था ... यह बात अलग है कि अपने घर को सभी मनपसंद तौर-तरीके से सजाते हैं ....अपनी सामर्थ्य से...पर घर ऐसे भी सजता है ... आँखों देखी विश्वास नहीं हो रहा था ....ऐसा लग रहा था जैसे घर के कमरों को देखना किताब के सुंदर रंगीन पन्नों को पलटना है ...।
ड्राॅइंग रूम के एक कोने में सोफे और कुर्सियों के बीच क्रिसमस ट्री रखा हुआ था टी-पाॅय पर ;लाल पीली हरी नीली छोटी बत्तियों से जगमगा रहा था ... फ़ैन्सी बाॅल्स और सुनहरी घंटियाँ भी ट्री से लटकी हुई थीं । दर-ओ-दीवार पर हर जगह लाल रंग था....बल्ब और बत्तियों के आस-पास लाल रिबन के साथ लटकते हुए फ़ैन्सी बाॅल्स और सुनहरी घंटियाँ थीं....। कमरे के फ़र्श पर दीवार के सहारे काँच और चीनी मिट्टी के अनगिनत शो-पीस रखे हुए थे.... सबमें लाल रंग की छटा .... लालरंग की छींट से सजा घर देख कर मुझे याद आने लग गया वह गीत- "यह लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा ....." लाल रंग भी कभी छूटता है ... वह तो सिर्फ चढ़ता है।
दरवाजे से अंदर आते हुए मैंने देखा.... दीवार के साथ-साथ दसियों टी-लाइट सजी हुई थीं फ़र्श पर जिसके अंदर सफेद चौड़ी छोटी मोमबत्तियाँ थीं ....काँच की खूबसूरत बोतलें भी फर्श पर ऐहतियात से रखी हुई थीं जिसमें पेड़ से गिरे लाल रंग के बीज भरे हुए थे...मखमली सोफ़ासेट पर लाल पफ़्ड कुशन थे....बीचोंबीच रखी काँच की गोल मेज पर सैंटा के आकार की लाल-सफेद चीनी मिट्टी की छोटी सी एक प्लेट थी .... रुई की रंगत के पर्दे फ़्रिलदार हवा में लहरा रहे थे....कमरे की दीवारों पर लाल- सुनहरी बेल-बूटों वाले हैंगिग लटके हुए थे ....
ड्राॅइंगरूम के सामने ही ओपन-किचन थी ....काले पत्थर का प्लेटफॉर्म था वहाँ ....वह इतना चिकना और साफ था कि जैसे आइना हो कोई... किचन टाॅप पर बीचोंबीच चार बर्नर वाला गैस- स्टोव रखा हुआ था ...उसके ऊपर चमकती स्टील की चिमनी थी ... घर ऐसी नफ़ासत से सजा हुआ था ...ऐसे करीने से और इतना चमकदार .... कि धूल का कहीं नामोनिशान नहीं जैसे किताब के पन्नों के अंदर धूल का निशान नहीं होता है... हायसिन्थ के हाथों का कमाल था कि चिमनी को देख कर लगा शायद अभी-अभी बाज़ार से लाकर किसी ने फ़िट कर दिया हो उसे रसोई में...रसोई जैसे तनिष्क का जगमगाता शो-रूम हो ....
चिमनी के ऊपर सफेद फ़र वाला मुर्गा बैठा रखा था एक ....पता चला मुझे कि पन्द्रह दिनों से उसी दशा में बैठा हुआ है ...मजाल है उस पर तेल या कालिख का राई भर भी दाग चढ़ा हो ...दिन पर दिन और निखरता चला जा रहा है। चिमनी के अगल-बगल रेशमी कपड़े से बनी लाल मिर्चों की झालर भी टँगी हुई थी । किचन की टाॅप पर छोटे-बड़े कुल मिलाकर पचास से ज्यादा स्टफ़्ड टाॅय और गुड्डे-गुड़िया थे कुछ खड़े-कुछ बैठे .... कार्नर पर मिट्टी की बड़ी सी गुड़िया थी जिसे हायसिन्थ ने मनपसंद रंगों से रंग कर वार्निश कर दिया था ....गुड़िया जैसे पार्लर से सज सँवर कर चली आयी हो ,मेरे आने से कुछ देर पहले ही,उसके हाथ की लाल टोकरी में लाल-सफेद धारीदार नैपकिन पड़े हुए थे ...
रसोई में लगी काँच की अल्मारी के शैल्फ़ में अनामिका अंगुली जितने प्लास्टिक के ढेर खिलौने एक कतार में सजे हुए थे जैसे मेहमान को सलामी देने के लिए खड़े हो रखे हों....किसी शैल्फ़ में इंग्लिश बैंड का ट्रूप साजोसामान के साथ खड़ा हुआ था एलर्ट होकर। किचन की खिड़की पर पाँव लटकाये बैठे थे प्लासटिक के चार-पाँच छोटे गुड्डे अपनी मस्ती में ....।
छत से लटक रहा था लाल फूलों वाला गोल रिंग जिसमें ढेर हरे पत्ते और लाल गुँथे हुए साटिन रिबन थे ....सुनहरी घंटी और लाल बत्ती भी साथ में...। फ़्रिज के टाॅप पर बाँस की एक अंडाकार टोकरी रखी हुई थी जिसमें दसियों लाल-गुलाबी स्टफ़्ड टाॅय खचाखच भरे हुए थे एक के ऊपर एक जैसे ऑटो में भरी हुई सवारियाँ हों ...फ्रिज के हैंडिल पर लगा टाॅवल भी सैंटा के आकार का था..., लाल-सफेद सुनहरे फूल-पत्तियों के लगे हुए स्टिकर खिल आए थे फ्रिज की मैटेलिक दीवार पर ....
जबकि हायसिन्थ लंच तैयार कर चुकी थीं ... कोल्ड सैलेड, रसम, चिकन करी ,हरा-भरा कबाब, कालीमिर्ची भिन्डी , रुमाली फुल्के ,रिसौटो .... सारे घर को इस मैन्यू की खबर नहीं थी ... लगता था खाना हायसिन्थ ने नहीं सैंटा ने तैयार कर दिया है छू मन्तर से ...खाना आॅलिव ऑयल के टच से बना हुआ था .... नाम भर का ऑयल ...। हायसिन्थ को देख कर ही लगता था ...उनकी इकहरी काया का राज़ ही यही है ....
रसोई में ट्रांजिस्टर मद्धिम आवाज़ में बज रहा था ....लता मंगेशकर का गीत था - "ले तो आए हो हमें सपनों के गाँव में । प्यार की छाँव में बिठाए रखना ....।। " हायसिन्थ सुर में सुर मिला रही थीं ...लय के साथ गाते हुए एकबारगी वह नाच भी उठती थीं.... एक ऐड़ी पर बलखा कर थिरक उठतीं ....उनकी बढ़ती उम्र भी सैंटा की तरह ही थमी हुई थी .... चेहरे के हाव-भाव बेहद कमसिन थे ....उम्र को पीछे धक्का देते हुए वह सर्व कर रही थीं नाॅन-अल्कोहलिक जिंजर वाइन ...जिसे अपने हाथों से उन्होंने बनाया था ....
उनकी पैन्ट्री में बीस किस्म के अचार भरे मर्तबान थे एक कतार में शैल्फ़ पर सजे हुए, मलमल के कपड़े का सर पर रूमाल बाँधे हुए बैठे थे पंजाब के गोरे-चिट्टे मर्तबान ....सब पर लिखा हुआ था अचार का नाम ...हायसिन्थ पंजाबी अचार भी डाल लेती हैं ....इस बात का समर्थन रसोई में रखे सैकड़ों गुड्डे-गुड़िया भी कर रहे थे .... वह क्रिश्चियन ही नहीं अब पंजाबी भी हैं..धाराप्रवाह मराठी भी बोल लेती हैं , उनका दामाद मारवाड़ी है ...विभिन्नता में एकता ...कई संस्कृति को जी रही हैं वह .... सभी तीज-त्योहार उसी उत्साह से मनाती हैं ... दीपावली पर घर की साज -सज्जा दिवाली के थीम के अनुसार करती हैं ... जैसे मौसम बदलता है घर की सजावट भी बदल देती हैं ....
कोल्ड सैलेड का क्रिस्टल बाॅउल लेकर वह जब किचन से बाहर आ रही थीं मैंने देखा....ड्राॅइंगरूम में टंगे फ़्रिलदार परदे की राॅड से सुनहरी एक तार लटक रही थी ,तार पर बैट्री आॅपरेटेड सैंटाक्लाॅज़ चढ़-उतर रहा था ....उसे इस तरह चलते देख कर मैंने चाहा कि अगर वह बोल पड़े तो मैं उससे हायसिन्थ की सजावट और काम करने के अंदाज़ का राज़ पूछ लेती ... घर इस कदर तरतीब से सजा हुआ था कि लगता था जैसे किताब पर छपे अक्षर कभी तितर-बितर नहीं होते ,उसी तरह से सब चीज़ें अपने-अपने ठिकाने पर थीं ...
पलंग पर बिछी लाल-सफेद फूलों वाली चादर पर एक सिलवट तक नहीं .... कमरों के पर्दे सफेद जालीदार थे....राॅड से बँधे प्लासटिक वाले लाल फूलों के गुच्छे सुनहरी पत्तियों के साथ लटक रहे थे ...दरवाज़ों पर लाल - सफेद रंग वाले सैंटा के बड़े-बड़े डिजाइनर मोज़े टेप की मदद से लगा रखे थे ...एक कमरे से दूसरे कमरे में जाने वाले रास्ते के बीच में दीवार के सहारे अनगिनत शो-पीस रखे हुए ....वहाँ लकड़ी का खूबसूरत ड्रम भी था जिस पर सजा-धजा सैंटाक्लाॅज़ बिठा रखा था ऐनक पहने हुए ....घर भर में सैकड़ों सैंटा लाल टोपी लगाए हुए इधर-उधर बैठे नज़र आ रहे थे .... कहीं -कहीं मनीप्लांट की लटकती लतर भी थी हर एक कमरे में ....
बाथरूम भी इस साज-सज्जा से अछूता नहीं था ....कम से कम दो सौ मिले-जुले छोटे-बड़े गुड्डे और काँच के शो-पीस थे वहाँ ...टाॅवल भी लाल रंग का लटक रहा था हैंगर पर। लाल और काला प्रिन्टेड मखमली कार्पेट बिछा हुआ था बाथरूम के फर्श पर .... रखे हुए कुछ खिलौनों में सेंसर भी था जो बोल पड़ते थे अपनी ज़ुबान में शायद खुशी का इज़हार कर रहे थे मेहमान से मिल कर .... कार्पेट थोड़ा बड़ा था जिसका एक टुकड़ा कभी काट कर, बीच में जोड़ डाल कर हायसिन्थ ने बाथरूम के लिए मैचिंग पायदान बना दिया था .... अपनी कुशल कारीगरी का परिचय देते हुए ....
बारह देशों में घूमी हुई हायसिन्थ ने देश-विदेश का सामान सजाया हुआ है अपने घर में ....। पसंद आने की बात है उनके लिए , चाहे सरेराह चलते जाते नुक्कड़ से कुछ ले लिया हो या विदेश की गलियों में घूमते हुए कुछ खरीदा हो... घर भर में हायसिन्थ के मेहनतकश खूबसूरत हाथों की छाप दिखती है ... कहीं कम्प्यूटर के स्क्रीन पर जालीदार कवर बना कर उसे पहना दिया है ...कहीं पर्दों को सिल कर टाँग दिया है अपने हाथों से...
हँसती-मुस्कराती गीत गुनगुनाती काम के दरम्यान नाचने की मुद्रा में आ जाती हैं हायसिन्थ ... नृत्य उनकी रग-रग में है ... MBA के विद्यार्थियों को ही नहीं पढ़ाती हैं वह understanding skills . Motivational speech से असंख्य बच्चों का कैरियर बनाया है उन्होंने ....विदेशों में इवेन्ट किए हैं जाकर और भारत का प्रतिनिधित्व करके टीम को प्रथम स्थान भी कई बार दिलवाया है .... एक साल में तीन हजार से ज्यादा कॉस्ट्यूम सिल देती हैं, बच्चों के सालाना कार्यक्रम के लिए ...उनकी सिली हुई ड्रैस पशु-पक्षियों के पहनावे को भी मात देने का हौसला रखती है ....
मैं कभी हायसिन्थ को कभी उनके घर को देखती रही ... जैसे दिवा स्वप्न देख रही हूँ ....काल्पनिक जगत में जा पहुँची थी मैं कहानी की किताब के पन्नों को पलटते हुए ....यथार्थ में रह कर जैसे कल्पना जगत में घूम रही थी उस घर में ....हायसिन्थ घुमा रही थी मेरा हाथ पकड़ कर ....जैसे वह कोई परी हो जादू की छड़ी हाथ में लिए हुई .... इतना सारा काम कैसे चुटकियों में कर जाती है न कहीं फैलाव न बिखराव न चेहरे पर तनाव फूल सी खिली हुई है हायसिन्थ।
बालकनी में थर्मोकोल के बाॅक्स में उन्होंने किचन गार्डन भी बना रखा है अपना ....बेसिल रोज़मेरी पान लगा रखा है वहाँ.... पान का एक पत्ता तोड़ कर उन्होंने मुझे थमाया ....मैं नर्म-नाज़ुक पत्ता देख ही रही थी कि वह किचन से टाॅफी जैसा कुछ हाथ में लेकर आयीं और रैपर खोल कर पकड़ा दिया, दरअसल वह रेडीमेड गिलौरी थी .... मैंने उसे पत्ते में रखा और मोड़ कर मुँह में धर लिया पान...अभी खा ही रही थी कि वह गिलहरी की चाल चलते हुए फुर्ती से मेरे पास आयीं .... उनके एक हाथ में पानी भरा हुआ काँच का छोटा बाॅउल था दूसरे हाथ में टाॅवल नैपकिन ... इससे पहले मैं कुछ समझती ...हायसिन्थ ने मेरे हाथ को थामा और मेरी अंगुलियाँ उस पानी में भिगो दीं और मुझे टाॅवल नैपकिन थमा दिया ....यह सब कुछ पलक झपकते हो गया .... वैसे भी मैं उस घर को अपलक देख रही थी बहुत देर से ....एक बार पलक झपकना ज़रूरी भी था ....
थोड़ी देर बाद वह किचन में जिंजर टी बना रही थीं गैस स्टोव पर टी पैन रख कर....यकीन हो रहा था अब मुझे कि खिलौनों से सजी-धजी इस रसोई में खाना भी पकता है ....जिंजर टी को व्हाइट बोन चाइना के कप-प्लेट में सर्व किया उन्होंने जिस पर लाल पोल्का डाॅट्स बने हुए थे ...क्रॉकरी भी क्रिसमस का त्योहार मना रही थी लाल-सफेद ड्रैस पहने हुए....मैं हकीकत में सब देख रही थी पर लग रहा था जैसे जागती हुई आँखों से सपना देख रही हूँ .... सपनों की दुनिया में हूँ ....दुनिया में रह कर भी दुनिया में नहीं ....हायसिन्थ जैसे आउट आॅफ़ दिस वर्ल्ड हो ....और मैं जैसे गुलीवर ट्रैवल्स की कहानी वाले उस द्वीप में ....

 रुचि भल्ला

ruchibhalla72@gmail.com
 *****

वक्त होगा रात के साढ़े आठ बजे .....मस्जिद में हो रही थी नमाज़ -ए-अशा ....। दिन की अंतिम नमाज़ के पहले ही रात की चारपाई बिछा कर सो गया था सूरज ....। उसे देखते हुए मैंने आसमान की ओर देखा ....वहाँ सज रही थी तारों की बारात ....। रात के राजकुमार ने चाँद के श्वेत घोड़े पर सवार होकर थाम ली थी अपने हाथों में लगाम और चाँदनी सबके स्वागत में बैठी अब बजा रही थी तारों की शहनाई ....।
तारे बुंदकियों से छिटके हुए थे आसमान की क्यारी में ....। प्रकृति का एक रूप किसान का भी है ....जैसे किसान बीज डालता है खेत में वैसे ही तारों के बीज भी छिटके हुए थे वहाँ ... । रुपहले उन फूलों को देखते हुए निगाह पड़ी सप्तर्षि तारों की तरफ ... जैसे आसमान की तश्तरी पर किसी ने धर दिया हो आकर चाँदी का चम्मच .... तो यह है वह चम्मच .... जिससे चंदू के चाचा ने चंदू की चाची को, चाँदनी रात में चाँदी के चम्मच से चटनी चटाई थी... । छुटपन में इस बाल गीत को खूब गाया करते थे ...उम्र के चवालीसवें साल में जाकर मुझे यह चाँदी का चम्मच दिखा जो चंदू के चाचा के पास होता था ....
ऐसी बहुत सी छुटपन की बातें याद आने लगीं फिर.... जैसे- झूठ बोले कौआ काटे ..... कभी सुना होगा इसे बचपन में ....और फिर डर के मारे झूठ भी ठीक से बोल नहीं पाए कि वह कौआ कहीं से उड़ता चला आएगा कान काटने के लिए....जबकि बड़े होकर जाना भी कि जब भी झूठ बोला कोई कौआ तो आया ही नहीं था...
याद आती रही ऐसी और भी बातें - झूठ बोलना पाप है नदी किनारे साँप है .... आज तक मुझे वह नदी के किनारे वाला साँप भी नहीं दिखाई दिया जो झूठ बोलने पर आकर काट जाता हो ...एक बार एक साँप को मैंने हाथ में पकड़ कर देखा भी था ....वह प्यार से मेरे हाथ में माला की तरह ही झूलता रहा ... उसने भी नहीं काटा मुझे जबकि उस दिन मैं उसके सामने सच और झूठ के तराजू में खड़ी खुद को तौल रही थी ...। बातों-बातों में बच्चों को बहुत से पाठ पढ़ा दिये जाते हैं उनके संग खेल-खेल में , दरअसल वह संस्कार देने की ही कोशिश होती है ....बालमन में फिर वह बात गहरे जाकर बैठ जाती है जड़ की तरह ...। मैं छत पर टहलते हुए स्मृति के गलियारों में जा पहुँची थी .... ।
यह तपते जेठ की ठंडी रात थी .... हवा में उड़ रहे थे आसमानी परी के खुले हुए केश ...। जी में आया उसके बालों को समेट कर मैं लंबी एक चोटी गूँथ दूँ और चोटी के हर बल पर टाँकती जाऊँ चुन-चुन कर तारों के फूल... पर तारे अब भी बहुत दूर थे मेरे हाथ की पहुँच से .....। हवा की रफ्तार बढ़ती ही जा रही थी ...आँगन में लगा नारियल का पेड़ हवा में लहरा कर झूलने लगा था ....। उसके झूलते हुए पत्ते ऐसे लग रहे थे जैसे वे कव्वाली गाते हुए हवा में ताली बजा रहे हों , उसे देखते हुए मुझे याद आने लगी यह कव्वाली - काली घटा है मस्त फ़ज़ा है/ जाम उठा कर घूम घूम घूम /झूम बराबर झूम शराबी ...
हवा भी पेड़ के संग मस्त चाल सी चल रही थी ...। आम का घना पेड़ भी नारियल के पेड़ को देख कर लहराने लगा था ....उसके एक-एक पत्ते पर सुरूर का नशातारी था ....। उसे इस तरह झूलते देख कर लगा यह कहीं लहराते हुए गिर न पड़े , मैं आगे बढ़ कर उसे थाम लूँ ...। उसे थामने के लिए मैं छत के किनारे तक जा पहुँची...अभी पेड़ को हाथ लगाने ही जा रही थी कि फिर याद आ गई छुटपन में सुनी एक बात- रात में सोते हुए पेड़ को हाथ नहीं लगाया करते ...और याद आते ही मैंने अपना हाथ खींच लिया वापस ....।
जबकि जानती हूँ पेड़ कभी सोते नहीं और अब भी लहरा रहे हैं जागती आँखों के साथ पर बचपन का इतना गहरा असर होता है मन पर ... उन सुनी-सुनाई बातों का.... कि आज उम्र के इस दौर पर खड़ी सोच रही हूँ .... कि वे कितनी झूठी कहानियाँ होती थीं जो कितने सच्चे लोगों ने सुनाईं थीं ...। जीवन को जीवन की तरह जीने का पाठ सिखाती थीं वे कहानियाँ ....।उन्हें सुनाने का अद्भुत कौशल होता था उनके पास ....। यही तो है वह art of living....जिसे हम उम्र के पायदान पर चढ़ते जाते अपनी पीढ़ी के हाथ सौंपते जाते हैं ...। उसे सौंपते हुए बच्चों के चेहरे में खुद की छवि खोजते रहते हैं ....।
उम्र बढ़ती जाती है और मन बच्चों सा होने लगता है कोमल और निष्पाप....। यही तो चक्र है जन्म से मृत्यु तक जाने का ...। सोने सा खरा मन होता है एक शिशु का जन्म लेते हुए ..... जीवन चक्र के आखिरी पड़ाव तक जाते-जाते मन फिर उस खरे सोने सा होने लगता है ....तप-तप कर कुंदन होने लगता है समय की आँच में ....। ठीक ही तो कहा है किसी ने - बच्चा और बूढ़ा एक समान जो होता है... । चौबीस कैरेट गोल्ड की तरह खालिस सोने की गारंटी वाला .....।

- 17 दिसम्बर 

इलाहाबाद की सड़कें बड़ी सीधी होती हैं... बहुत सरल इसलिए टूट भी जल्दी जाती हैं...चटक जाती हैं एक झटके से....नाज़ुक मन की कोई लड़की लगती है मुझे इलाहाबाद की सड़क .... पर दिल ऐसा भी नहीं होना चाहिए जो टूट जाए बात-बात पर ....मैं जब देखती हूँ महाराष्ट्र की सड़कों को वे मज़बूत कलेजे वाली लगती हैं ... दुख-दर्द झेल जाती हैं हँसते-हँसते ...चोट के कम ही निशान पड़ते हैं उनकी देह पर । सजी-सँवरी रहती हैं हर हाल में तोरकाल की काली शाॅल लपेटे ....

 कल फलटन से पुणे जाते हुए कार की खिड़की से बाहर मैं देखती रही...पहियों पर भागती कार ऐसी लग रही थी जैसे कार ने अपने पाँव में स्केट्स बाँध रखे हों ... दौड़ती कार के भीतर से मेरी निगाह जहाँ तक जाती रही , मैंने देखा कि महाराष्ट्र पठार की सुरक्षित घेराबंदी में रहता है ....जैसे लोग अपने घरों के बाहर बाउंड्री वाॅल बना देते हैं .... ये पठार महाराष्ट्र के इर्द-गिर्द बाउंड्री वाॅल बना कर रखते हैं ....।  

 दिन के उजाले में किसी भी मौसम में खूबसूरत लगते हैं ...बारिशों के मौसम में कोचिया का झबरा पेड़ बन जाते हैं ....गर्मियों में ओढ़ कर बैठ जाते हैं हरा दुपट्टा और सर्दियों के महीने में दिन भर धूप तापते बैठते हैं पर पठारों को आप रात में नहीं देख सकते जब तक आपके पास किसी और का दर्द सहने की कूवत न हो ...आप रात के अँधेरे में सिसकते पठार का दर्द नहीं झेल सकेंगे ...।
 भागती हुई कार अभी फलटन में ही थी कि मेरी नज़र पड़ी शुगर मिल की तरफ़ ....शुगर मिल के सामने वाली सड़क पर अनगिनत जोड़ियाँ बैलों की थीं , बैलगाड़ियों में गन्ने की मिठास उठाए बढ़ती चली जा रही थीं शुगर मिल के अहाते की ओर ... । सफेद रंग के वे बैल ,उनके सींगों पर रंग संतरी था । सींग जैसे सींग न होकर उनके बाल हों जिन्हें किसी पार्लर में बैठ कर मनपसंद संतरी रंग रंगवाया हो उन्होंने ... । 

 गले में पहन रखी थी काले रंग की चौड़ी डोर .... डोर के बीच में पड़ी हुई थी पीतल की बड़ी सी घंटी... ऐसी घंटियाँ मैंने पहले कभी नहीं देखी थीं ....क्रिकेट की गेंद के आकार की गोल बड़ी घंटी थी और उसके बीच में बजता हुआ घुँघरू .... किसी बैल के गले में था रंगीन काँच के मोतियों का हार, किसी ने पहन रखी थी सफेद कौड़ियों की माला और पीतल के घुँघरूओं वाली जंजीर कई बैलों के गले में थी ....पर घंटी सभी बैलों के पास थी .... 

 एक के पीछे एक चलती हुई बैलगाड़ियाँ सैकड़ों की संख्या में चलती चली आ रही थीं आस-पास के गाँवों से....। सारी सड़क पर बैलों का ही कब्ज़ा था ...। कर्मठ मेहनती प्यारे बैल कितने सरल हैं दिल के .... खेत के खेत जोत डालते हैं और खुश हो जाते हैं पीतल की एक घंटी से....मैं बैलों की मासूमियत देखती रह गई  ...रुक कर पूछ नहीं सकी ... घंटी से प्यार करने का राज़ ..... ।

 कार भागती रही सड़क पर ....फलटन से जेजुरी जा पहुँची.... जेजुरी में खंडोबा का पुराना मंदिर है ऊँचे पठार पर समाधिस्थ  .... मंदिर जाती हुई सड़क का रंग हल्दी जैसा पीला हो रखा था ....दर्शनार्थी जो भी दिखे उस राह पर , उसी रंग में रंगे हुए थे ..... खंडोबा ऊँचे जाकर बैठ गए हैं पठार पर .... देखिए ! कब जा पाते हैं उनसे मिलने ....इस ख्याल के साथ मैं आगे बढ़ती गई और पहुँच गई सासवड़ ....वहाँ दोनों तरफ हरियल खेत थे , बीच में से निकलती थी सड़क पुणे की ओर जाती हुई .....

  खेत में ज्वार बाजरा गन्ना कहीं गेंदे के फूल लगे हुए थे। हरे के साथ खिला हुआ था उसका प्रिय पीला रंग .....तभी वहाँ आ पहुँचा गाँव का बाज़ार चलते हुए ..... कहीं ठेलों पर संतरे बिक रहे थे ....कहीं केले ....दुकानदार ने फलों में फूल भी सजा रखा था गुलाब का .....तीन औरतें खड़ी थीं ठेले के पास ,फलों का दाम तय करती हुईं .... उनके बालों में चमेली के फूलों की वेणी थी....माथे पर थी अर्धचन्द्राकार बिंदी ... उन औरतों का रंग कस्बाई था ....वैसे भी जो जहाँ रहता है, उसी रंग में रंग जाता है ....एक लड़की भी दिखी मुझे सामने जाते हुए ऑटो में , अमरूद खा रही थी स्वाद लेते हुए.... अमरूद का गूदा गाढ़ा गुलाबी था ....जी चाहा खिड़की से हाथ बढ़ा कर उससे अमरूद माँग लूँ पर आॅटो कार की तरह भागता चला जा रहा था ....

 बीच रास्ते में सड़क के किनारे लोहे की कढ़ाईयाँ भी रखी हुईं थीं , बेचने वाले उनके संग बैठे हुए थे ....छोटी-बड़ी उन चमकती कढ़ाईयों के आइने में सूरज झाँक रहा था....मैं मुड़-मुड़ कर कभी सूरज कभी कढ़ाई की तरफ़ देखती रही ...बाज़ार पीछे छूट रहा था। पीछे ही छूट जाता है सब कुछ और जो आगे होता है, वह हाथ की पकड़ में नहीं आता ....। 

 खैर!  ...मेरी बगल में आ गया था ...कहीं से चल कर अब इमली का एक पेड़ ....पेड़ पर ढेर सारी इमलियाँ लटकी हुई थीं ....कच्ची-पक्की .. उन्हें देख कर लगा ....इमली खट्टी ही नहीं मीठी भी होती है ....पेड़ भी लोगों की तरह सब दिन देखता है खुद पर आते हुए  ....खट्टे भी मीठे भी ...जीवन का स्वाद यही है ....जीवन देखते-देखते निगाह आग की सुनहरी लपटों पर जा पड़ी .... किसी की देह अग्नि में भस्म होकर कुंदन हो रही थी .... लपटें छू रही थीं आसमान ....ले जा रही थीं उसे किसी दूसरी दुनिया में ... जीवन चक्र ऐसा ही है ... 

 उस चक्र के बीच मुझे एक बच्चा दिखा सात-आठ साल का छोटी सी गेंद को उछाल कर कैच करता हुआ .... उसकी गेंद के साथ मेरी निगाह भी आसमान से ज़मीन पर आ गई ...लपटों में लिपटे दुख को....मैं बच्चे की खुशी देख कर भूलने लग गई थी और बिजली की तारों पर बैठे हुए पंछियों को गिनने लगी ....उन्हें गिनना मुश्किल था भागती हुई कार से .....पर उनके रंग फिर भी दिख गए थे , कोई नीला था कोई पीला ... किसी की चोंच लाल थी किसी की आँख नारंगी ....सातारा के पंछियों पर खुशरंग चढ़ा रहता है  ....मौसम चाहे जो भी हो  ...

  दौड़ती -भागती गाड़ियों के बीच से रास्ता बनाती हुई एक वैन मेरी बगल से गुज़री ....वैन में रंग-बिरंगे प्लास्टिक के बाॅल रखे हुए थे , बाॅल से भरी वैन जैसे खुशियाँ भर कर बाँटने जा रही हो फलटन में... लाल पीले नीले हरे गुलाबी रंग के बाॅल.....जीवन के रंग भरे थे उनमें.... हवा में उड़ते चले जा रहे थे बच्चों के हाथ में जाने के लिए .....बच्चों को ही नहीं बाॅल को भी बच्चों के स्पर्श की चाहत होती है , किलक उठते हैं बच्चों के हाथ आते ही .....यही सोचते-सोचते मैं पुणे पहुंच गई ....

 मुझे जाना एयरपोर्ट था पर उससे पहले एक मुलाकात आनंद वी ओझा जी से भी थी ...उनके लिखे संस्मरण मैं फेसबुक की वाॅल पर लंबे समय से पढ़ती आ रही थी.... प्रभावित थी उनके लेखन से ....एक रोज़ मेरी डायरी का पन्ना पढ़ कर जब उन्होंने लिखा कि वह आजकल पुणे में रहते हैं ....मुझे लगा पुणे इलाहाबाद जितना तो दूर नहीं ....मुझे मिलना चाहिए उनसे....वह इलाहाबाद में भी रहे हैं ....और वैसे उनका घर पटना में है ...।

  रोजी- रोटी घर और शहर से बहुत दूर ले जाती है सबको ....। लोग अपने दिलों में घर और शहर साथ लिए घूमते जाते हैं .....जितना दूर जाते हैं .... उतना ही पीछे लौटते हैं स्मृतियों में .... । यही सोचते-सोचते मैं उनके घर की सीढ़ियाँ चढ़ गई .....। उनकी तस्वीर फेसबुक की वाॅल पर देख रखी थी .... ।ओझा जी से मिलना पहली बार था.... रूबरु.... ।

  काॅल बेल पर मैंने हाथ रखा और मेरे सामने वही चेहरा चला आया तस्वीर से मेल खाता हुआ ....। होठों पर उनके स्मित ... आँखों में पहचान की चमक थी....सफेद रंग का कुर्ता -पायजामा लखनवी अंदाज़ में पहन रखा था .....और उनकी ज़ुबान पर थी हिंदी बोलने वाली मीठी चिड़िया ....हिंदी सुने हुए मुझे छ: महीने हो गए हैं .......उनकी हिंदी जैसे इलाहाबाद की बोली का शहद घुल रहा हो कानों में ....इलाहाबाद की बोली इलाहाबाद में खिले गुलाब से बना गुलकंद होती है......।

  इलाहाबाद शहर ओझा जी का भी रहा है  ... ओझा जी की फ्रेंच कट दाढ़ी उनके कुर्ते के रंग से मैच कर रही थी....उनकी ज़ुबान पर बैठी चिड़िया के होठों में थी पान की गिलौरी.....स्वाद तो उनके भीतर था ....पर पान की गंध सारे घर में फैल रखी थी .... उस गंध को देखा मैंने उनके घर की खिड़की के रास्ते ...बाहर जाते हुए....हवा में उड़ती चली जा रही थी इलाहाबाद की ओर ...मेरे शहर में सजी पान की गुमटियों के पास ....कुछ पल ठहर कर वह बनारस की गलियों में घूमने लग गई और फिर उसने पकड़ ली पटना जाती हुई गाड़ी....। 

 उन्हें इस पहनावे में ...इस तरह से पान खाते हुए देख कर मैंने पूछना चाहा  - क्या आपको नहीं लगता कि आपने पुणे के इस फ्लैट की क्यारियों में उत्तर प्रदेश और बिहार उगा रखा है ...जो रात-दिन महक रहा है खिले हुए पान के हरे पत्ते सा ....जिसका मीठा स्वाद आपकी ज़ुबान पर घुल रहा है और उतर रहा है होठों पर लाल रंग ....रंग जो छोड़ रहा है छाप आप पर इलाहाबाद और पटना शहरों की । आप पुणे में रह कर पान नहीं खा रहे हैं...अपने भीतर इलाहाबाद और पटना को उतार रहे हैं ....घर के भीतर घर .....


Monday, May 1, 2017

आँकड़ों से बाहर अलक्षित स्त्री-श्रम


-          सुजाता                                   

पुरानी बॉलीवुड फिल्मों में माँ के किरदार को याद करते हुए अक्सर एक चेहरा निरुपा राय जैसी माँ का सामने आता है जो विधवा है, दुखी लेकिन स्वाभिमानी है। पति के न रहने पर वह दिन-रात दूसरों के कपड़े सिल कर अपने बच्चों को बड़ा करती है। अचानक यह एहसास होता है कि दुनिया का सारा  कारोबार पुरुष के श्रम पर चलता है और स्त्री इसमें केवल मर्द के न रहने पर ही मजबूरी में आती है। उसका सारा श्रम घरेलू श्रम है जिसका कोई मूल्य नहीं है और इस तरह मौद्रिक अर्थव्यवस्था में से घरेलू औरत का श्रम गिनती से बाहर का हो जाता है। घर का काम तुम्हारा और बाहर का हमारा वाले श्रम के लैंगिक विभाजन का एक बड़ा प्रचलित हिस्सा एक फरेब है क्योंकि जब हम अर्थव्यवस्था से जुड़े आँकड़ें जुटाते हैं तो बड़ी संख्या में घर पर काम करके कमाने वाली महिलाओं की बड़ी संख्या अदृश्य होती है। वही बड़ी संख्या न सिर्फ घर के काम करती है बल्कि अचार पापड़ बनाकर, ऊनी कपड़े बुनकर, कढाई वगैरह करके पति की कमाई में अपना हिस्सा जोड़ती है ताकि घर को ठीक से चलाया जा सके, बच्चों को कुछ और सुविधाएँ मिल सकें। बीड़ी,अगरबत्ती,टोकरियाँ, कारपेट आदि बनाने के लघु उद्योग औरतों के श्रम से चलते हैं। यह गैर संस्थागत तरीके से हो तो ऐसे श्रम का कहीं किसी गणना में आना असम्भव ही है। 

 
ऐसे जाने कितने ही काम हैं जहाँ पुरुष श्रम करता दिखाई देता है लेकिन उसके घंधे के लिए तैयारी करने वाली स्त्री पर्दे के पीछे छिप जाती है। खेतों में श्रम करना और गाय-बैल की पानी-सानी करना और बाकी बेहुनर काम सब स्त्रियाँ करती आई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि में 83 प्रतिशत औरतें हैं जबकि जिन ज़मीनों पर उनका श्रम लगता है उनका मालिकाना हक़ पुरुषों के पास है। पहाड़ों पर अक्सर औरतें घर देखने के साथ-साथ खेती, बुनाई जैसे काम तो करती ही हैं। लकड़ियाँ ढोते या पीठ पर गैस का सिलेण्डर ढोते दिखती हैं वे तो पता लगता है कि इस घर देखने में पहाड़ जैसे मुश्किल भूगोल में पहाड़ जैसा श्रम जाता है।



छोटे दुकानदारों के घर की स्त्रियाँ उनके लिए सूखे मेवे वगैरह के पैकेट बनाती हैं या ठेला लगा के छोले भटूरे आदि बेचने वाले पुरुषों की स्त्रियाँ यह सब व्यंजन काटने पकाने में मदद करती हैं। इसके अलावा भी, बाज़ार उनका श्रम बेहद सस्ते दामों में खरीदता है। किसी मैचिंग सेंटर पर से साड़ियाँ घरों तक पहुँचाई जाती हैं और घर की काम से फुरसत पाकर कुछ औरतें उनपर फॉल लगाती  हैं,तैयार लहंगे और चुन्नियों पर सलमे सितारे लगाती हैं। देसी बीड़ी बनाने के उद्योग मे बड़ी संख्या मे औरते हैं। चाय के बागानों में  काम करने वाली औरतों हैं। यह ऐसा श्रम है जो बिज़नेस के आँकड़े  इकट्ठे करते हुए अनदेखा चला जाता है। बिज़नेस या दुकानें भी स्त्रियों की नहीं होतीं। भवन निर्माण के कामों में लगी उन मजदूर औरतों का श्रम भी हमें दिखाई नहीं देता जो निर्माण स्थल पर खाना बनाने के वक़्त खाना बनाती हैं और बाकी वक़्त अपने मजदूर पति की हेल्पर बन जाती हैं। ऐसे बेहुनर, अप्रशिक्षित श्रम की कोई वाजिब कीमत बाज़ार के पास नहीं है। इसके लिए कोई आकड़े नहीं हैं। इसकी कहीं पहचान और सम्मान नहीं है।  


भारतीय परिवार संरचना के अध्ययन से बाज़ार ने स्त्री श्रम का बहुत शातिर तरीके से इस्तेमाल किया। स्त्रियाँ घर के बाहर नहीं जा  सकतीं काम करने के लिए , वे आर्थिकरूप से निर्भर हैं और सुबह से शाम तक जब घर के मर्द बाहर रहते हैं उनके पास एक बड़ा खाली वक़्त है जिसका आकलन किया गया। साथ ही औरतों को अपने पे-रोल पर सीधे रखने में नियोक्ताओं को जो पचड़े हो सकते हैं, मातृत्व अवकाश, बच्चा पालन अवकाश, बीमारी- तीमारदारी वगैरह उन सबसे भी मुक्ति हो जाती है। एक गर्भवती कर्मचारी सीधे-सीधे बिज़नेस के लिए एक घाटा है। घरेलू औरतों की यह ज़रूरत कि खाली वक़्त में बैठे-बैठे (?) चार पैसे कमाए जा सकें, का फायदा औरत को कितना हुआ यह एक शोध का मुद्दा है क्योंकि इस तरह हाथ में आए चार पैसे भी उसी पितृसत्तात्मक परिवार संरचना को बनाए रखने में खप जाते हैं जिसे स्त्री की आर्थिक या किसी भी तरह की आत्मनिर्भरता से दिक्कत होती है। यह सस्ता श्रम है। ये स्त्रियाँ एक एक पीस के हिसाब से बेहद कम पैसा पाती हैं। बीड़ी के लिए जब ग्राहक सौ रुपए देता है उसमें से ग्यारह रुपए ही इन तक पहुँचता है। ग्रामीण श्रेत्रों में अगरबत्ती निर्माता ज़्यादातर औरतों को ही इस काम के लिए रखते  हैं।  
शहरों में बाज़ार ने मध्यवर्गीय उपभोक्ता स्त्री और उत्पाद की मार्केटिंग करने वाली स्त्री को आमने-सामने कर दिया है। खर्चीले विज्ञापनों से बचते हुए टपरवेयर ,ओरीफ्लेम और एमवे जैसे उत्पादों ने शहरी घरेलू औरत के खाली वक़्त और पैसे की ज़रूरत को एक साथ साधा। एक पुरुष  सेल्समैन से अधिक विश्वसनीय यह पड़ोसन-सी औरत बाज़ार की एजेण्ट हुई तो उसे भी फायदा हुआ बाज़ार को भी। पितृसत्ता को इससे कोई खतरा भी नहीं हुआ कि औरत को बाहर नौकरी करने नहीं जाना पड़ा। यह सुरक्षित भी था कि उसे औरतों से ही डील करना था। यही नहीं,पिछले बीस-पच्चीस सालों में जिस तरह गली-नुक्कड़ में प्ले स्कूल और पब्लिक स्कूल मशरूम की तरह उगने शुरु हुए उनके लिए घरेलू महिलाएँ, प्रशिक्षित या अप्रशिक्षित ,सस्ता श्रम साबित हुईं जिन्होंने काम करने की शर्तों और पारिश्रमिक से समझौता किया। यह भी पितृसत्ता के लिए फायदे का ही सौदा हुआ कि शादी के बाज़ार में भी टीचर-बहू की मांग बढ गई जो घर के काम निबटाने के साथ साथ चार पैसे कमा रही थी।
सब कुछ बड़ी फैक्टरियों में ही नहीं बनता। दीवाली पर जो सजे हुए दिए खरीदें जाएंगे उन सबमें घरेलू औरतों का श्रम लगा है। यह अनस्किल्ड और पारिवारिक किस्म का श्रम है। मेक इन इण्डिया का कितना फायदा ऐसी औरतों को होगा कहना बहुत मुश्किल है। इस अलक्षित अदृश्य चले जाने वाले स्त्री-श्रम को कुछ गैर-सरकारी संस्थाएँ सामने लाने की कोशिश कर रही हैं। जो स्त्रियाँ ऐसे असंगठित क्षेत्रों में काम कर रही हैं उनके प्रशिक्षण और बेहतर मेहनताने के लिए प्रयास किए जाने की सख्त ज़रूरत है। औरतों को जितना सम्भव हो पे-रोल पर लाया जाना ज़रूरी है। साथ ही इस भ्रामक धारणा से भी मुक्ति पानी चाहिए कि अर्थव्यवस्था का दारोमदार पुरुष के श्रम पर टिका है।