Sunday, December 30, 2018

इनस्टेंट तीन तलाक़ !


यह तस्वीर इण्डियाटुडे डॉट इन से साभार


शाज़िया आले अहमद


पिछले कुछ समय से तीन तलाक़ का मुद्दा इस देश में गरमाया रहा है। मज़ेदार यह है कि मौलानाओं को सब कहना होता है, औरतों की बात सुनी जाए इसे ज़रूरी समझा ही नहीं जाता। टीवी डिबेट में ज़्यादातर मौलाना तलाक़ ए बिद्अत को बुरा मानते और इस बात की पैरवी करते हैं कि इंस्टेंट तीन तलाक़ नहीं दिया जाना चाहिये जबकि मुस्लिम मआशरे की बात की जाए तो ज़्यादातर मुसलमान क़ुरआन के मुताबिक़ तलाक़ के बारे में जानते ही नहीं थे । यह अनजाने में नहीं हुआ इसमें एक सोची समझी साज़िश थी औरतों को कण्ट्रोल करने की । क़ुरआन के मुताबिक़ तलाक़ के लिये मुस्लिम मर्दों और औरतों को जागरूक ही नहीं किया गया ।  संघियों और मुसंघियों केी रस्साकशी के चलते मुसलमानों को काफ़ी हद तक क़ुरआन के मुताबिक़ तलाक़ का पता चला । 
बचपन से देख रही हूँ रमजान शुरू होने से पहले सहरी, इफ़्तार के वक़्त की जानकारी के लिये मस्जिदों और दीगर जगहों से कैलेंडर बंटना शुरू हो जाते थे जिनमें रमज़ान से मुताल्लिक़ कुछ दुआएँ भी लिखी होती हैं ।ये कैलेंडर लग़भग हर घर में मिलेंगे । इसी तरह शबे बारात और बकरीद के मुताल्लिक़ भी पर्चे बांटे जाते हैं जिनमें इबादत का तरीक़ा और क़ुरबानी का तरीक़ा गोश्त की तक़सीम का ज़िक्र होता है । लेकिन आज तक क़ुरआन के मुताबिक़ तलाक़ की जानकारी के लिये किसी मस्जिद, किसी उलेमा, किसी जलसे से, किसी जमात से कोई पहल नहीं हुयी ।
पीस टीवी पर ज़ाकिर नाइक को सुनकर मैंने भी पहली बार क़ुरआन खोलकर देखा उनकी बताई आयतों को देखा जिनमें तलाक़ का ज़िक्र था जो कि व्यवहारिक और बेहतरीन तरीक़ा था, ये 2004 की बात है शायद । इससे पहले मेरी एक कज़िन इंस्टेंट तीन तलाक़ की भेंट चढ़ चुकी थी जो उसके शौहर ने गुस्से और नशे की हालत में दी थी बाद में उसे अपनी ग़लती पर पछतावा भी हुआ इस तरह दो ज़िंदगियाँ तबाह हो गयीं । 

ऐसे हज़ारों किस्से हैं । ये एक सबसे करीबी था इसलिये मेरी बेचैनी, तकलीफ़ भी सबसे ज़्यादा थी ।
दरवाज़े दरवाज़े घुमने वाली जमातों ने भी कभी मुसलमानों को औरतों के हक़ों को लेकर जागरूक नहीं किया नाही तलाक़ का सही तरीक़ा बताया । अक्सर लोग कहते हैं कि गुमराह लोगों तक इस्लाम पहुँचाने में इन जमातों की अहम रोल है जो काफ़ी हद तक सच भी है ।लेकिन इन अल्लाह के बन्दों को भी औरतों के हुक़ूक़ से कोई सरोकार नहीं रहा । जब मुसलमान औरतों की हालत पर गैर मुस्लिम तंज़ कसते है उस वक़्त ये रटा रटाया जुमला "इस्लाम औरतों को सबसे ज़्यादा हुक़ूक़ देता है ।"  का नारा बुलन्द करते हैं ये जुमला इतना ही झूठा और खोखला है जितना बीजेपी का नारा "महिला के सम्मान में बीजेपी मैदान में " है ।

अगर वक़्त रहते उम्मते मुस्लिमा के अलमबरदार अपनी झूठी अना को किनारे रखकर इंस्टेंट तीन तलाक़ को ख़ारिज कर क़ुरआन के मुताबिक़ तलाक़ को मुस्लिम मआशरे में राइज़ करते तो आज ज़लील ओ ख़्वार न होना पड़ता ।इंस्टेंट तीन तलाक़ मुस्लिम औरतों पर थोपा जाने वाला सबसे बड़ा ज़ुल्म था जिसकी वजह से कितनी औरतें ज़िंदा लाशों में तब्दील हो गयीं । मज़े और हैरत की बात ये है मुर्दा लाशों पर खड़े लोगों ने ज़िंदा लाशों पर खड़े लोगों को इंसाफ और क़ुरआन सिखा दिया ।
अगर पूर्वग्रह को छोड़कर, लोकसभा में स्मृति ईरानी के भाषण की बात की जाए तो जिस बिल की वक़ालत की उम्मीद तथाकथित उलेमा सी की जानी चाहिये थी वो एक काफ़िर ( बक़ौल तथाकथित उलेमा) ने की, इससे ज़्यादा शर्मिंदगी की बात उनके लिए क्या होगी ।

और साफ़तौर पर यह जीत किसी राजनीतिक पार्टी की नहीं उन प्रगतिशील मुस्लिम औरतों के संघर्ष की जीत है जिन्होंने मौलवियों के डर के आगे घुटने नहीं टेके। 

शाज़िया आले अहमद दिल्ली की निवासी हैं जो फेसबुक के ज़रिए सामाजिक मुद्दों पर खरी- खरी लिखती रही हैं। मन और पेशे से वे एक शिक्षक हैं। स्थायी पतालखनऊ।

Tuesday, December 11, 2018

मुक्ति के अर्थ तलाश रही आवाज़ें

कविता मानव- सभ्यता की सबसे सघन अनुभूतियों की अभिव्यक्ति है। स्त्री के लिए तो कविता लिखना अपनी पोज़ीशन बदलने या अपने जीवन की कमान सम्भालने की व्यग्रता की तरह भी है कभी। व्यवस्थाबद्ध दमन पर जो प्रेम का पर्दा पड़ा रहता है, उसके ह्टते ही पहले वह अवाक होती है। उसकी अव्याख्येय चुप्पियाँ अक्सर कविता में सम्प्रेषणीय हो जाती हैं। विनीता त्रिपाठी खुद के कवि होने का दावा नहीं करतीं। लेकिन दर्ज किए जाने की चिंताओं से परे, फेसबुक पर चुपचाप कभी लिखती रहती हैं अनपढ हैशटैग से कविताएँ जिनमें सवाल-दर-सवाल हैं, आज़ादी की उत्कट चाह है, स्टेटमेंट्स हैं, अपने वजूद के प्रति सचेत होती हुई स्त्री है जो लिखते हुए उलझ रही है, सुलझ रही है। जो  सत्य और असत्य के भयावह मायाजाल से स्वतंत्र है जो सिर्फ पुरुष से सवाल नहीं करती पिछली पीढी की औरतों को भी हमारी पीढी की औरतों के पर कतरे जाने के इल्ज़ाम से बरी नहीं करना चाह्ती। जो खुद को मांजना चाह्ती है व्यक्ति के तौर पर, जो मुक्ति के अर्थ तलाश रही हैं, ऐसी आवाज़ों का लगातार सामने आना और इन्हें सुना जाना हमारे वक़्त की ज़रूरत है।




आशाएं



मैं सत्य और असत्य के उस भयावह मायाजाल से
स्वतंत्र हूँ।
कोई भयानक ख्वाब या आहट मुझे नहीं डराते,
सहम जाती हूँ तुम्हारी निरुद्देश्य हंसी से,
उन पूर्वाग्रहों से जिनके बीज़ से तुम मेरे बच्चों को अपाहिज कर रहे हो।
तुम मृत्यु से कांपते हो, और सत्य की राह पर चलने का
दावा करते हो।
आदर्श जो तुम्हारे लिए खिलौना है, अपनी छवि को मनमानी शक़्ल देने का,
और दुबक जाते हो व्यवहारिकता की आड़ में।
हवाला देते नहीं थकते स्वर्ग-नर्क का,
जैसे रोज़ विचरण करके आते हो।
तुम्हें भय है किसी अदृश्य शक्ति से,
हा हा हा हा हा हा हा
या भयभीत करने का अचूक उपकरण।
किसी कल्पित देह पर अपना मुखौटा सजाते हो,
'मैं' में पूरा संसार समाया है,
और शब्दों का षडयंत्र ऐसा जैसे संसार के
सबसे पतित तक पहुँचे हो।
पहचान लेती हूँ उन खोखले भाव को,
नहीं कहती कुछ भी ये सोचकर कि इस धरती के
स्वर्ग और नर्क का अनुभव करते करते शायद एक दिन तुम 'तुम' बन जाओगे ।


आपत्ति 


मेरे जन्म लेते ही तुमने सिखाई
सीमाएँ 
मेरी प्रज्ञा सदैव दो किनारों पर टकराई 
दो किनारें बहुआयामी 
अच्छा बुरा
सही ग़लत 
पाप पुण्य
शुभ-अशुभ 
पवित्र-अपवित्र 
जायज़-नाजायज़ 
सुन्दर-बदसूरत 
गोरा-काला
जिनमें अदम्य साहस है 
मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व को बांध रखने का
पंखों को शिथिल रखने का 

क्यों बनाई ये व्यवस्था 
व्यवस्था जो चरम बर्बरता है मानव समुदाय पर 
मानवों द्वारा लादी हुई
मानव जिसमें पुरूष ही आते हैं 
समाज का वर्चस्वशाली तबका

स्त्री होने का तुम्हें कोई मलाल नहीं 
क्योंकि बहुत करीने से बैठाया गया तुम्हें 
व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर 
सांत्वना पुरस्कार के रूप में 
बेटी को लक्ष्मी की टोपी पहनाई
और स्त्री के मातृत्व 
का किया गया किताबी महिमामंडन  
व्यवस्था में इस क़दर घुल गई तुम 
कि देख ही नहीं सकी 
ख़ुद का शोषण
रामचरितमानस का पाठ पढ़ते 
क्यों नहीं दिखा तुम्हें कभी एकतरफ़ा नज़रिया 
नज़रिया जो सिर्फ़ पुरूष के लिए पुरूष के द्वारा निर्मित 

क्यों नहीं देख पाई सीता, अहिल्या, रेणुका, सूर्पनखा   
की नज़रों से रामायण 
क्यों शक केवल मैथिली के चरित्र पर
क्यों जनकदुलारी नहीं करती शक
मर्यादा पुरुषोत्तम राम हैं तो वसुंधरा पुत्री सीता
क्यों राम नहीं देते अग्नि परीक्षा

क्यों तुम्हें तनिक भी दुविधा नहीं होती
जब समान आचरण पर एक स्त्री कहलाती है
रण्डी, कुल्टा, छिनाल और जाने क्या क्या
पुल्लिंग सुना है क्या कभी इनका
क्यों पुरूष के क्रोध में सदैव स्त्री ही होती है भर्त्सना पात्र
क्या गालियों में पुरुष यौनिकता या सम्बन्धों को देखा है अपमानित होते

क्यों नहीं देख पाती हो 
अपना वो अक्षम्य अपराध
व्यवस्था में विलीन तुम
आने वाली नस्लों के परों को कतरने का


सौंदर्य के मानदंड 


मेरे सौंदर्य के जो भी मानदंड हैं तुम्हारे
मुझे नहीं हैं स्वीकार
क्यों होठों का सुर्ख लाल होना तुम्हें लुभाता है
क्यों नैनों में सुरमा ही आंखों के सुन्दर होने की है पहचान
क्यों चूड़ियों की खन खन पायल की छम छम
से घर में रोनक दिखती है
क्यों बिना बिन्दी के मेरा चेहरा तुम्हें पूर्ण नहीं लगता
क्यों पैरों में बिछिया को कहते हो महत्वपूर्ण सुहाग चिन्ह
मैं भी हूँ तुम्हारा सुहाग कहाँ है तुम्हारा सुहाग चिन्ह
क्यों मेरा सौंदर्य मोहताज है बाज़ार का
क्यों मैं ख़ुद की खूबसूरती तुम्हारी आंखों से देखूं
तारीफ़ के तुम्हारे तरीक़े तुम्हें ही मुबारक
जहाँ औरत के सुन्दर दिखने की शर्त तुम तय करो



अनजान तलाश 


मैं अनजान हूँ या भ्रमित या सत्य
को नकारना है मेरी फ़ितरत
पर फिर भी कहूँगी अपरिचित हूँ
मैं तुमसे।
तुम मुझे कविताओं में आह्लादित करते हो,
कहानियों में तुम्हारी उपस्थिति मात्र से
उत्सुकता,रोमांच और कुछ अनकहे
उतार चढ़ाव से गुज़रती हूँ।
फिर भी तुम हो मेरी कल्पनाओं का हिस्सा
मेरे स्वप्न से परे मैं तुमसे अनभिज्ञ हूँ।
मनुष्य में,प्रकृति में,हर भाव में,भोग विलासिता में
हर जगह तलाशती हूँ, पाती हूँ बस लगाव,
पर तुम नहीं।
जानती हूँ तुम हो यहीं कहीं अपनी उपस्थिति
दर्ज़ कराने के अनवरत प्रयास में
शायद मेरे अंदर उस दूर बैठे कमज़ोर बच्चे
की तरह जिसकी चीख़
मेरे कानों तक नहीं पहुँचती।
कई बार ज्वारभाटा से आए मनोभाव तुम्हारा
भ्रम उपजाते हैं।
पर अस्थिर से वे कुछ वक़्त में ही लोप हो जाते हैं।
फिर भी मैं तुम तक पहुंचना चाहती हूँ।

विनीता प्रौद्योगिकी में स्नातक हैं। आठ साल इंजीनियरिंग कॉलेज में पढा चुकी हैं। फिर अकाउंट्स पढना शुरु किया और एक ब्रेक के बाद आजकल फिर से एक नौकरी में हैं और आगरा में रह रही हैं।

Monday, September 24, 2018

पितृसत्ता के दबावों को रेस्पॉन्ड करने को अभिशप्त हैं आज़ाद औरतें भी ?


सीमोन हों, मन्नू भंडारी, अमृता प्रीतम, शिवरानी देवी हों, प्रभा खेतान या चेखव के संस्मरण लिखने वालीं लीडिया अविलोवा। प्रबुद्ध ,आज़ादख़याल, प्रतिभाशाली औरतों ने अपने संबंधों पर बेहिचक लिखा। लेकिन ऐसी क्या वजह रह गई कि उन पुरुषों/ लेखकों को कभी ज़रूरी नहीं लगा कि वे अपने जीवन में आई स्त्री के बारे में लिखें ! क्या बेहद आज़ाद दिखने वाले संबंधों में भी पितृसत्ता महीन स्तरों पर काम करती है? वे क्या पितृसत्तात्मक दबाव क्या हैं?  दुनिया-जहान की फिक्र और कंसर्न और लेखन के बीच क्या पुरुष के लिए उसका सम्बन्ध एक ऐसा प्रायवेट और महत्वहीन अफेयर है जिसके बारे में बात करना गैर-ज़रूरी है ? तमाम सवाल मन में उमड़-घुमड़ गए फिर से जब जया निगम की यह पोस्ट पढी। आप सबके लिए यहाँ शेयर कर रही हूँ। यहाँ जवाब नहीं मिलेंगे, जिज्ञासाएँ हैं और बेहद जायज़ से सवाल हैं कुछ।
इंटरनेट से साभार 

कल्पना लाज़मी के बहाने ...
-          जया निगम
कल्पना लाज़मी के बारे में मैने जो आखिरी खबर पढ़ी थी - वह कई साल पहले भूपेन हजारिका के निधन पर थीं. वह भी इस बारे में थी कि भूपेन अपने जीवन के आखिरी सालों में कल्पना जी द्वारा पूरी तरह कैद कर लिये गये थे, कल्पना जी की अनुमति के बगैर उनसे उनके पुराने दोस्त, परिचित वगैरह मिल भी नहीं पाते थे. कल्पना जी उनके पूरे परसोना पर इस कदर हावी थीं कि भूपेन हजारिका का उनसे अलग कोई व्यक्तित्व नहीं बचा था.हमारे समय के महान लोक संगीतकार भूपेन हजारिका और उनकी संगिनी कल्पना लाजमी के रिश्तों का अनूठापन हमें बार-बार खींचता है उनके संबंधों की तहकीकात करने के लिये.

किसी मर्द का अपनी औरत के नियंत्रण में होना खासकर तब जब उनका रिश्ता आधिकारिक तौर पर पति-पत्नी का ना हो, बाहर वालों को उस औरत के लिये किस कदर शंकालु बना देता है कि वह उसे पूरी दुनिया के सामने आउटसाइडर बना देते हैं (इसको लिखते वक्त प्रभा खेतान की 'अन्य से अनन्या तक' याद आ रही है जो लगभग ऐसी ही एक विद्रोही महिला की कहानी है.) साथ ही उस पुरुष को पितृसत्ता का दुलारा और पूरी दुनिया के सामने बिल्कुल हीन जो अपनी ही औरत की कैद में किसी तरह सांस लेने भर को जिंदा है.

एक पुरुष से इतर एक औरत का व्यक्तित्व पूरी दुनिया के सामने किस कदर कमतर होता है कि उसका अपने युग की सबसे विद्रोही फिल्ममेकर होना भी किसी काम नहीं आता. कल्पना लाजमी जैसी औरत को भी भूपेन हजारिका के आस-पास घिरे चाटुकारों और लिजलिजे लोगों से डील करते वक्त सख्ती से काम लेते ही भूपेन हजारिका की फज़ीहतों का शिकार होना पड़ता है. ( कल्पना लाज़मी की भूपेन हजारिका से उनके संबंधों पर लिखी गयी किताब AS I Knew Him के अंशों में विस्तार से इस वाकये का जिक्र है)

लोक जीवन में रचे-बसे पुरुषों के जीवन में आने वाली विद्रोहिणी महिलाओं के जीवन का बड़ा हिस्सा लोक में समायी पितृसत्ता से लोहा लेने में बीतता है और ज्यादातर मामलों में खुद उनके जीवन साथी ही लोक जीवन में समायी पितृसत्ता के उनकी संगिनी के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैये को पहचानने में असमर्थ होते हैं. (दलित पैंथर के क्रांतिकारी संस्थापक नामदेव ढसाल की पत्नी मल्लिका अमर शेख का मेमॉयर I Want To Destroy Myself देखें) और पितृसत्ता के एजेंट की तरह काम करने लगते हैं. स्वतंत्र स्त्री-पुरुष के अंतर्संबंधों में पितृसत्ता बहुत बारीक स्तर पर काम करती है.

मसलन ये जो किताब कल्पना लाजमी ने अपने और भूपेन हजारिका के संबंधों पर लिखी, ऐसा एक छोटा सा भी पीस भूपेन हजारिका की ओर से क्यूं नहीं लिखा गया. बल्कि केवल हजारिका ही क्यूं किसी भारतीय पुरुष का ऐसा कोई मेमॉयर जो उसकी पत्नी, संगिनी या उसके जीवन में आने वाली किसी प्रेमिका के लिये लिखा गया हो ऐसा बिल्कुल याद नहीं आता. क्यूं महिलाओं के जीवन में आने वाले पुरुष उनके जीवन में इतने जरूरी हो जाते हैं जबकि पुरुषों के जीवन में चाहे कितनी भी टैलेंटेड महिला क्यूं ना आये उसे कभी अपने संबंधों पर लिखने की जरूरत नहीं महसूस होती.

क्या लोकप्रिय पुरुषों के साथ जुड़ने वाली स्वतंत्र चेता महिलाओं पर पितृसत्ता का जो खास दबाव होता है जो बिल्कुल एतकरफा ढ़ंग से उनके संबंधों का सार्वजनिक नरेटिव तैयार करता है उससे उपजा असंतोष महिलाओं को उनके अंतर्संबंधों के बारे में लिखने-बोलने के लिये प्रेरित करता है यानी उसका मुख्य कारण होता है! ...और इस ढ़ंग से कहा जाये तो क्या हर पॉपुलर व्यक्ति से जुड़ी से स्वतंत्र व्यक्तित्व वाली महिला इस दबाव को अपने ढ़ंग से रेस्पांड करने के लिये अभिशप्त होती है? 
जया निगम

Thursday, July 5, 2018

तीन कहानियाँ


सबाहत के पास कितनी ही कहानियाँ हैं। अपने मायके और ससुराल के गाँव में देखी हुई जाने कितनी ही औरतें उसके ज़हन में घूमती हैं, उसे बेचैन करती हुई। वे सब औरतें जो हालात की मारी हैं, जिनके इर्द-गिर्द ऐसे घेरे हैं कि उनसे निकलने की चाह भी कुफ़्र है। वे जो हालात से लड़ते हुए अपने प्रेम के लिए एक अलग व्याख्या तैयार करती हैं, ग्लानि से कोसों दूर, सब नतीजे भुगतने को तैयार। आपके बनाए मापदण्ड तोड़कर औरत दबंग हो जाए तो समाज के लिए मर्द बौदा हो जाता है! मर्दाना अहंकार को ललकारा जाना औरत की हदें बनाए रखने के लिए कितना ज़रूरी है। खिड़की के भीतर सवाल है। खिड़की के बाहर भी। इस पर सबाहत की शैली में वह मस्ती झलकती है जो उर्दू-लेखिकाओं की याद दिलाती है। यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि उर्दू में स्त्री-लेखन को अपनी पुरखिनों से एक बहुत मज़बूत परम्परा मिली है जिसमें सशक्त भाषा है एक चुटीलेपन से के साथ सम्वेदनशीलता। सबाहत अपनी मेहनत और संजीदगी से इसे पाने की सामर्थ्य रखती है।

1.
तेज़ औरतें

बौदा का असल नाम क्या है यह जानने में किसी की दिलचस्पी नहीं थी , मुझे भी न होती अगर दोपहर में बाक़ी घर की औरतों की तरह गहरी नींद आती तो इतनी ज़रा सी बात मेरे ज़ेहन में न घूमती।
बौदा की औरत का पूरे गावँ में जलवा है , और जैसा कि आमतौर पे होता है एक ख़ूबसूरत तेज़ तर्रार ,मर्दो को इशारों पे घुमाने वाली औरत से बाक़ी की औरतें दिल ही दिल में खूब जलती हैं । तो ज़ाहिर है बौदा बहू से भी ख़ुदा वास्ते का बैर पाले बैठी थीं ज़्यादातर औरतें । मुझे हमेशा उन बातों में दिलचस्पी होती थी जिन्हें घर वाले ममनून क़रार देते थे जिन पर पर्दे लगाए जाते थे , इसलिए पहली फ़ुर्सत में बौदा बहु से मेरी दोस्ती हो गयी ।

काजल की तीखी धार सजाये , भरे होंठ पान की लाली से सुर्ख़ किये ,गोल ठोड़ी पे नन्हा तिल । अल्लाह जाने तिल पैदायशी था या उस छैल छबीली ने बनवा रख्खा था । पहली नज़र में दिलकश लगी थी । ज़ात की नाइन है इसलिए शादी ब्याह काम काज के सिलसिले में लोगो को उसका सहारा लेना ही पड़ता है । औरतों के लिए तीख़ी मिर्च ,मर्दों की नज़र में फ़ुर्सत से सधे हाथों से बनाया बनारसी पान है नाउन ।

दिल से दिल की राह होती है बौदा बहु को एहसास हो गया कि मेरे दिल मे उसके लिए कोई रार नही , सो मेरे सामने उसकी जिंदगी की कई गिरहें खुलीं जो उसने अपने दिल से छुपा कर बांध रखी थी ।
बौदा की दिमाग़ी हालत कमज़ोर थी , धोखे से उसकी शादी नाउन से कर दी गयी । नाउन का नाम रेहाना है , उसने पहली मुलाक़ात में जान लिया था कि बौदा बुध्धु है घामड़ है । काम कोई करता नही था , पैसे कमाने का कोई ज़रिया न था । रेहाना ने अपना ख़ानदानी पेशा अपना लिया , शादी ब्याह में लड़की को उबटन लगाना , शादी के बर्तन साफ करना , गावँ में कार्ड देना ,और भी बहुत से अल्लम गल्लम काम । ख़ुशशकल थी मेहनती हंसमुख थी इसलिए मर्दो की नज़र में तर माल थी , ये अलग बात है कि रेहाना होशियारी से अपना काम निकाल कर ऐसा बच निकलती कि सब हाथ मलते रह जाते । गावँ के ही रसूख़ वाले चौधरी से उसे मुहब्बत हो गयी थी , बक़ौल रेहाना ," चौधरी ने पहली नज़र उस पे डाली तो रेहाना एकटुक उन्हें देखती रह गयी , और घर आकर सारी रात जाग जाग कर ख़्वाब देखती रही ।"" बाक़ी के मर्द हज़रात कहते थे चौधरी में ऐसा क्या जड़ा है जो हममे नही है ? रेहाना हंस कर भद्दी सी गाली देकर भाग खड़ी होती ।
ख़ैर हैरानी मुझे तब हुई जब उसने ख़ुशदिली से मुस्कुराकर बताया कि उसे बौदा से भी मुहब्बत है ।
इंसानी दिमाग़ रेशम के गुच्छे से ज़्यादा उलझा हुआ नाज़ुक है । वाक़ई कब क्या सोचे क्या समझे क्या कर बैठे कुछ खबर नही ।

Zehra Doğan is a Kurdish artist and journalist from Diyarbakir in Turkey. She is the editor of Jinha, a feminist Kurdish news agency with an all female staff. She was jailed for a painting of the destruction of the city of Nusaybin in 2017



2.

शरारती लड़की 

गाँव के पुराने जमींदार घर के नई पौध के लड़के असग़र दर्ज़ी के यहां उठने बैठने लगे थे।असग़र इस इज़्ज़त अफ़ज़ाई से दिल ही दिल मे ममनून रहा करता था कि एक ज़माने मे बड़े दरवाज़े के लोग उससे सीधे मुंह बात नही करते थे । आज का ज़माना अच्छा है , नई नस्ल यह सब नही मानती ,असग़र को चचा कह कर पुकारा जाने लगा है , ग़रीब होना कोई जुर्म नही रह गया आजकल । "चचा मटके का पानी पिलवाओ यार , हलक़ सूख गया गर्मी में ।"लड़को में से किसी ने आवाज़ लगाई ।

 "वाह बाबू। आप लोग फ्रिज का पानी छोड़कर मेरे मटके का पानी पीने आते हो , अल्लाह आप लोगो के दिलो में रहम बनाये रख्खे । सजीला , ठंडा पानी ले आ बड़े दरवाज़े से लोग आए हैं ।"

लड़कों ने एक दूसरे को नज़रो में इशारे किये , फिऱ असग़र की निहायत खूबसूरत बेटी की आमद का इंतज़ार करने लगे । सजीला की ख़ूबसूरती पूरे गाँव मे मशहूर हो चुकी थी और इस वजह से असग़र दर्ज़ी सख़्त परेशान रहा करता था । आहिस्ता आहिस्ता यह भेद खुल ही गया कि बड़े दरवाज़े के लड़के किस ग़रज़ से उठते बैठते हैं असग़र की दुकान पर । ख़ैर ऐसी कोई अनहोनी नही होने पाई न ही सजीला का किसी के साथ रूमानी सिलसिला जुड़ा ।

असग़र ने कमउम्र शोख़ ,बेहद हसीन बेटी की शादी मुम्बई में काम धंधा करने वाले इरशाद से तय कर दी । अपने तयशुदा वक़्त पर शादी हो गई गावँ के नौजवान लड़के बुझ कर रह गए , बड़े दरवाज़े के लड़के फिर से अपनी हैसियत के लोगो मे उठने बैठने लगे । सब कुछ मामूल पर आ गया । मुम्बई में सजीला इरशाद के साथ खोली में रहने लगी , आस पास और भी बहुत सी फैमिलीज़ थीं जो एक कमरे के घर मे रह रहे थे । सजीला को मुम्बई काफ़ी पसन्द आया ,उसने पाया कि आसमान तो बेहद वसी है बहुत बड़ा । दुनिया काफ़ी हसीन है , मज़ेदार है ,रंग बिरंगी है ।
इरशाद उसकी खूबसूरती से खाइफ़ रहा करता था ,उसने अपने पड़ोस में रहने वाली उम्रदराज़ ख़ातून से सजीला की देखभाल करने को  कहा और ज़रूरत केघरेलू सामान लाने की जिम्मेदारी भी   पड़ोसियों को सौंप दी । लेकिन परिंदों को कैद में रहना कब पसन्द आया है ,मछलियां रेत में कब रहना चाहती हैं ? सजीला को बाजार देखने और गोलगप्पे खाने का शौक़ था , इरशाद के काम पर जाने के बाद , घर के सारे काम निमटा कर  , बुरका डाल कर सजीला चल देती थी गोलगप्पे खाने ।
इस ज़बान ने क्या क्या न सितम ढाये हैं लोगो पर । गरीब सजीला कितने दिन बचती ? किसी दिलजले ने ख़बर कर दी इरशाद को । एक दिन इरशाद काम पर जाने का बहाना करके , बाज़ार में छुप कर बैठ गया । हस्बे आदत घरेलू कामो से फ़ारिग़ होकर सजीला बाज़ार पहुंची , गोलगप्पे बनवाये और चेहरे से पर्दा हटा कर ,धड़ल्ले से सी सी करके गोलगप्पा खाने लगीं। ऐन उसी लम्हे
इरशाद उसके सामने आ खड़ा हुआ , उसके बुर्के को नोच कर वहीं फेंक दिया , घसीटते हुए  ,भरे बाज़ार मुहल्ले में गालियों से नवाज़ते उसको घर लाया । मुम्बई में रहने वाले सजीला के क़रीबी रिश्तेदारो को बुलाया , और  मना करने के बावजूद ,चोरी छुपे चेहरा खोल कर गोलगप्पा खाने के जुर्म में उसे तलाक़ दे दी ।


 लाख  मिन्नते की गईं माफ़ी माँगी गयी , मगर तलाक़ हो ही गया ,असग़र को बुला कर उसकी बेटी उसके हवाले कर दिया गया ।सजीला को एहसास हुआ उसका आसमान तो निहायत छोटा था भरम था जो टूट गया । रोती बिलखती वापस गावँ आ गई , जहां रात दिन के तानो से उलझ कर ,अपनी सगी माँ के ख़राब रवैये से घबरा कर  उसने सल्फास खाकर अपनी जान दे दी ।

सच कहती हूँ जब से ये वाक़या सुना है दिल चाहता है इरशाद से पूछूं किसने हक़ दिया तुम्हे ? बिना चेहरा खोले वो कैसे खा सकती थी ? और तुम इरशाद , तुमने राह चलते हुए कब कब ग़ैर औरतो पे अपनी निगाह नही पड़ने दी ? कब तुमने अपनी नज़रो की हिफाज़त की ? कब तुमने एक अच्छे साथी , दर्दमन्द शौहर होने का हक़ अदा किया ? क्यों तलाक़ दी तुमने ? कौन होते हो तुम यूँ किसी मासूम को बेइज़्ज़त कर उसकी जान लेने वाले ?

शरीयत में ऐसा कहीं कोई हुक्म नही , जाहिल इंसानो पहले ख़ुद क़ुरआन पढो , तर्जुमा पढो फ़िर एहसास होगा कि बीवी को कितना अहम दर्जा दिया गया है । तुम कफ़ील बनाये गए हो बीवी के , तुम्हे बीवी की दिलजुई (मनोरंजन,दिल बहलाना )करने का हुक्म दिया गया है , खाना न बनाना चाहे तब भी कोई ज़बर्दस्ती करने का हुक्म नही दिया गया । उसकी गलतियों को माफ़ करने का हुक्म दिया गया ।

इरशाद तुमने बुरा किया ,उसका आसमान खींच लिया ।



3.
ख़ूबसूरत मजबूरी 


सफ़ेद दुपट्टे में हिजाब से बंधा चेहरा इतना हसीन ,दिलकश लग सकता है ,इसका अंदाज़ा मुझे तब हुआ जब मैंने शाज़रा को देखा । आँखें नाक ,गाल और होंटो की बनावट ऐसी कि शायरी का दम भरने वाले रूमानी शायर एक लम्हे में हज़ार ग़ज़ल लिख डालें ।  मैंने कई सारे ख़ूबसूरत , रानाई हुस्न वाले चेहरे देख रखे थे ,मगर उसकी खूबसूरती नज़रो को रोक लेती थी ,नज़र ठहर सी जाती थी ।
 शाज़रा को किसी दीनी इज्तमे के दौरान देखा था मैंने । घर आकर नानी से ज़िक्र किया छोटे मामू के रिश्ते के लिए । बक़ौल नानी  "उनके घर मे रिश्ता करना मुनासिब नही ,शाज़रा की दादी निहायत गुस्सैल ,ज़बान दराज़ ख़ातून वाक़ए हुई हैं । बहु को ज़ुल्म के ज़ोर से और पोती को ज़बानी तीरों तन्ज़ो से लहूलुहान कर के रखा है । ऐसे घराने से क्या मेलजोल करना ,जहां बहुओं बेटियों से बदज़बानी बदतहजीबी से पेश आया जाता हो ।" नानी की दलीलें अपनी जगह सही थीं ,मगर मेरे  ज़ेहन में शाज़रा की  जादुई सूरत घूमा करती थी । नानी की निगाह में मैं फ़ितरतन खुराफ़ाती साबित हुई हूँ ,मुझे चैन से सोना बैठना रास नही आता  ,ज़रूर मुझपर किसी भटके हुए जिन्न का साया है । चुड़ैल वाली बात हम नही मानते क्योंकि चुड़ैल से मुझे लंबे नाख़ून बिखरे बाल और उल्टे पैरों वाली औरत का ख़्याल आता है जो कि काफी डरावना है ।

अपनी फ़ितरत से मजबूर होकर मुहल्ले की रशीदा ख़ाला से शाज़रा की मज़ीद जानकारी लेनी चाही । रशीदा ख़ाला अपने आप मे छोटी मोटी गूगल की अहमियत रखती हैं। उन्होंने बताया शाज़रा कि दादी जल्लाद सिफ़त औरत हैं ।", बहु और पोती पर ऐसे ऐसे ग़ज़ब ढाये कि ख़ुदा की पनाह । ऐसा भी सुना है पोती को कभी अच्छी ग़िज़ा नही खाने दीं ,उनका मानना था    दूध ,अंडा  खाने से जवानी जल्दी आती है लड़की बालिग़ होने लगती है । शाज़रा की अम्मी की तो ज़बान ही क़ैद कर रखी थी उन्होंने । अल्लाह माफ़ करे , इन वहशी लोगो के घर कौन शरीफ़ आदमी रिश्ता करेगा । "
ख़ैर , रशीदा ख़ाला की बात आई गयी हो गयी  । हम भी नानी के घर कब तक क़याम करते , सो तशरीफ़ का टोकरा एक पिंजरे से दूसरे पिंजरे में ट्रांसफर हो गया । हम वापस घर आ गए ।

वक्तन फोक्तन शाज़रा के बारे में उड़ती पड़ती खबरें मिला करतीं । क़ुदरत ने उस हसीन मुजस्सिमे को अपनी तमामतर तारीफों से नवाज़ा था । इसलिए जल्द ही उसका रिश्ता किसी अच्छे घराने में तै हो गया ,और इतना सुनने में आया कि उसका शौहर पुलिस डिपार्टमेंट में है । मैंने कहीं पढ़ा था ,"ज़्यादा ख़ूबसूरती भी बद्दुआ बन जाती है ।" अल्लाह का एहसान , इधर बीच फिऱ से मामू के यहाँ जाने का मौक़ा मिला । अक़ीके की दावत थी । हमारी मुमानी चलती फिरती प्रोडक्शन हाउस थीं । हर दो साल पे  बच्चा पैदा करना उनकी ज़िंदगी का अहम मक़सद था ।
बहरहाल दावत में रशीदा ख़ाला से मुलाक़ात हुई । रस्मन दुआ सलाम के बाद ख़ाला ने इधर उधर की जानकारी मुझ तक उंडेलनी शुरू कर दी ।बातों के दौरान ख़ाला ने कहा ,"बेचारी शाज़रा के साथ बड़ा बुरा हुआ  ,चेहरा ऐसा चमकदार और नसीब  कालिख़ से लिखवा कर आई है । माँ के घर दादी और बाप का ज़ुल्म , ससुराल में शराबी शौहर का ज़ुल्म "।

"हाए अल्लाह ख़ाला ! क्या कह रही हैं आप ??

सच कह रही हूँ । शाज़रा का शौहर एक एक पैसे के लिए मोहताज रखता है ,और मारता पीटता अलग से है ।"

उफ़, कोई नौकरी कर लेती शाज़रा ,कम से कम सुकून से ज़िन्दगी बसर होती ।"

अरे बेटी , कौन सी दुनिया मे जी रही हो ? बिना पढ़ाई लिखाई बिना हुनर के नौकरी कहाँ रख्खी पड़ी है , कि जिसको ज़रूरत लगी उठा ले ।"

रशीदा ख़ाला की बातें जारी थीं और मेरे ज़ेहन में आंधी चल रही थी ,लड़कियों को यूं बेबस मजबूर बना कर किसी मर्द के हवाले करके  ,माँ बाप कौन सा फ़र्ज़ अदा कर रहे होते हैं  ?? कौन पूछे ........


--- सबाहत आफ़रीन 

Friday, June 8, 2018

क्या हर पुरुष एक सम्भावित बलात्कारी है ?


-         सुजाता


साल बीतते जाते हैं फिर भी एक सोलह दिसम्बर बचा रहता है जो कई सालों से नहीं बीता। न वह नया होता है न पुराना। वह बस टंग गया है दीवार पर।  तारीखें बदलती हैं तासीर नहीं बदलती। यह हमेशा उतना ठण्डा रहता है जितना बलात्कार के बाद चलती बस से फेंक दिए नग्न शरीर । यह उतना ही सफेद रहता है;  जितना सफेद हम सबके चेहरे बलात्कार के ब्यौरे सुनने के बाद। इसके ज़ख्म इतने हरे रहते हैं कि,  2016 में भी ठीक 16 दिसम्बर को ही एक गैंग रेप दिल्ली की सड़कों पर होता है और फिर 17 दिसम्बर को दिल्ली के किसी और इलाके में उसका रिपीट टेलेकास्ट भी। यह उतना ही गीला रहता है जितना राष्ट्रपति भवन के बाहर नारे लगाते, निर्भया के लिए न्याय की गुहार लगाते लड़के लड़ॅकियाँ पुलिस की पानी की बैछार से और अपने आँसुओं से गीले थे।

कठुआ, उन्नाव, सूरत, सासाराम ; देश जैसे बलात्कारों से रंगा हुआ है इस वक़्त। रोज़ के अखबार और समाचारों से हम बलात्कार की खबरें और उनकी डीटेल्स इकट्ठी कर पढें तो दिन के अंत तक उबकाई, आक्रोश,तनाव, व्यर्थता-बोध और माइग्रेन से अधमरे हो जाएँ। लेकिन सच यह है कि धीरे-धीरे सब उदासीन होते जा रहे हैं। उफ़ ! एक और बलात्कार ! और फिर सब अपने-अपने काम पर। फिर किसी दिन कठुआ में बकरवाल समुदाय की एक आठ साल की बच्ची को बेहोशी की हालत में कई दिन तल लगातार बलात्कार किए जाने और अंत में पत्थर मार-मार कर हत्या कर देने की खबर, उसके गुनगहगारों के समर्थन में एकजुट वकीलों के प्रदर्शन और सरकार की चुप्पी, ठीक उसके साथ-साथ उन्नाव में एमएलए द्वारा एक लड़की का रेप, उस लड़की के मुँह खोलने पर पिता को पुलिस कस्टडी में लेना और वहाँ उसकी मौत...यह सुस्त पड़ गए, उदासीन हो गए जनसमुदाय को एक बार फिर सड़क पर ला खड़ा कर देता है, प्रतिरोध-मार्च करते हुए, हस्ताक्षर अभियान चलाते हुए,चिल्लाते हुए, नारे लगाते हुए, प्रदर्शन करते हुए।


बलात्कार : पुरुष का पुरुष के खिलाफ किया गया अपराध !
हम बलात्कार के प्रकारों और भेदों के बारे में विस्तार से बात कर सकें, इतनी तरह के बलात्कार रोज़ाना घटित हो रहे हैं। वर्गीय कुण्ठा से, जातीय ठसक से, मनोरंजन के लिए, न बुझने वाली हवस के लिए, बदले के लिए, दमन के लिए, ताकत के प्रदर्शन के लिए, सत्ता के मद में, विकृत मानसिकता से; नवजात बच्ची से लेकर बूढी स्त्री तक के बलात्कार।
क्या है बलात्कार? अपनी लैंगिक ताकत का प्रदर्शन ? डराने-धमकाने की एक सचेतन प्रक्रिया जिसके ज़रिए तमाम पुरुष दुनिया की तमाम औरतों को एक निरंतर भय की अवस्था में रखते हैं। कहना चाहिए प्रागैतिहासिक काल में जब मनुष्य ने बलात्कार का अविष्कार किया होगा उसने भी उसी तरह मानव इतिहास को बदल कर रख दिया जैसे कि पहिए , आग और लोहे की खोज ने। कबीलाई समाजों में औरतें जीती और उपहार में दी जाती रहीं। और भी मज़ेदार है कि बलात्कार का इतिहास खोजने जाएँगे तो आप धार्मिक और पौराणिक दस्तावेजों तक पहुँचेंगे। बलात्कार सम्बन्धी कानूनों का इतिहास खंगालेंगे तो समझ आएगा कि बलात्कार को कभी पुरुष का स्त्री की गरिमा के खिलाफ़ किया गया अपराध या औरत के वजूद पर हमला नहीं माना गया। इसे स्त्री के मालिक, घर के मुखिया पिता या पति की इज़्ज़त के खिलाफ़ किए गए अपराध की तरह कानूनों में देखा गया। यह पुरुष का पुरुष के खिलाफ किया गया अपराध था। उसी तरह से दण्ड तय हुए। आज कानून भले बलात्कार की परिभाषा करते हुए स्त्री की गरिमा पर चोट को महत्व देता है, उसकी स्वीकृति/ अस्वीकृति को महत्वपूर्ण मानता है लेकिन समाज अब भी उस कबीलाई मानसिकता में है कि किसी समुदाय से बदला लेना या सबक सिखाना है तो उसकी औरत या बच्ची पर यौनिक हमला किया जाए।    

यह सीधा-सीधा उस व्यवस्था का मामला है जो अपने मूल चरित्र में मर्दाना है। यह उस सामाजिक अनुकूलन का मामला है जिसके अनुसार स्त्री “सेकेण्ड सेक्स” है, दोयम दर्जे की नागरिक है, वस्तु सम है। खुला हुआ खज़ाना जिसे मौका मिलते ही लूटा जा सकता हो। इसलिए स्त्री पर किसी भी किस्म की हिंसा दरअसल उसकी देह पर ही हमला होती है। कहना चाहिए उसकी उसकी यौनिकता पर। उसे उसकी जाति के लिए सबक सिखाना है तो यौन हिंसा। उसकी स्कर्ट से चमकती टांगे उसके स्वस्थ और अच्छे परिवार से होने की गवाह हैं। वर्गीय कुण्ठाएँ अंतत: यौन हिंसा का ही रूप लेती है। स्त्री गरीब, दलित है तो भी यौन वस्तु के रूप में वह उपलब्ध समझी जाती है। स्त्री की यौनिकता का दमन करके ही उसकी हिम्मत को तोड़ा जा सकता है यह सोच हमारी सामाजिकता की नींव में ही है। ना कहने पर एसिड फेंक दिया जाएगा,चरित्रहनन किया जाएगा, बलात्कार किया जाएगा, हत्या की जाएगी।  वाचिक हिंसा में भी स्त्री जननांग और यौन क्रियाएँ ही निशाना बनती हैं। मानो यह देश स्त्रियों का देश है ही नहीं। मानो इस देश की अर्थव्यवस्था में औरतों का होना कोई मानी ही नहीं रखता।


क्या हर पुरुष एक सम्भावित बलात्कारी है ?
पुरुष-यौनिकता पर हम बहुत कम बात करते हैं। लेकिन जब होती है तब बहुत सी बातें जो विचलित करती हैं वे सामने आती हैं। जब अप्रैल 2015 में नंदिता दास का यह कथन एवरी मैन इज़ अ पोटेंशियल रेपिस्ट ट्वीट हुआ और ट्रेण्ड करने लगा और फिर इस पर ट्रॉलिंग भी हुई तब मर्द-औरत इस सदमे में आ गए कि क्या उन्हें बलात्कारी कहा जा रहा है? अपनी किताब अगेंस्ट आवर विल में सूसन ब्राउनमिलर विस्तार में बलात्कार के इतिहास में गई हैं और समझने की कोशिश की है कि कैसे सामाजिक-संरचना और पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने मर्दों के शिश्न को यौन-हथियार में बदल दिया। यौन आनंद की एक जटिल व्यवस्था बनाई है मनुष्य ने। पशु-जगत में बलात्कार नहीं होते। वहाँ मेटिंग होती है। वक़्त, मौसम और तरीक़े तय हैं। मादा का संकेत न मिले तो नर के लिए सम्भोग का कोई तरीका नहीं है। वे प्रकृति की एक विराट योजना का हिस्सा हैं। मनुष्यों में नर स्त्री की इच्छा, इजाज़त, हीट पीरियड में होना/ न होना जैसी किसी अड़चन के बिना भी यौन-सुख हासिल कर सकता है। मानव-मादा मानसिक-भावनात्मक-दैहिक तौर पर तैयार है या नहीं इस बात की परवाह किए बिना मानव नर स्त्री देह में कभी भी, किसी भी समय, जब भी,उसके दिमाग में सेक्स की घण्टियाँ बजने लगें, प्रवेश कर सकता है। करा सकता है। इसका सीधा मतलब यह कि मानव नर रेप कर सकता है। यानी टेक्निकली यह सम्भव है। सब उसका दिमाग नियंत्रित करता है और दिमाग को यौन-राजनीति। इसलिए जब उन्नाव से विधायक कैमरा पर चिल्लाता है कि क्या बात करते हैं! तीन बच्चों की माँ का भी कोई  रेप कर सकता है?’ तो हँसी ही आती है। जिसके पास एक स्वस्थ लिंग और बुरी तरह लैंगिक-गैर-बराबरी में यकीन करने वाला अस्वस्थ दिमाग है वह रेप कर सकता है ।

पुरुष की हमेशा असंतुष्ट कामेच्छा को लेकर एक कम्बोडियाई कहावत है- दस नदियाँ मिला कर भी एक सागर को नहीं भर सकतीं। वैवाहिक रेप तो और भी अस्वीकृत अवधारणा है भारतीय संस्कारी समाज में। जब पुरुष मालिक हुआ तो उसका कोई यौनिक-कृत्य अपराध कैसे हुआ,जिसके लिए कि वह समाज से लाइसेंस-प्राप्त है? जो स्त्री के संकेत पर, बिना किसी दबाव के हुआ ऐसा फ्री-सेक्स निंदनीय है। इसलिए कि वह स्त्री की यौनिकता को स्वीकार करता है लेकिन पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री का यौन सम्बन्ध के लिए संकेत देना तो छिनाल होने का लक्षण है। 

यह हैरान करने वाला है कि औरतों के साथ तो बलात्कार समझ आता है, नवजात और बच्चियों के साथ भी बलात्कार ? कहाँ से आ रहे हैं चाइल्ड रेपिस्ट? सामाजिक दृष्टि से कमज़ोर,दलित, अल्पसंख्यक, गरीब, आदिवासी समुदायों की स्त्रियाँ, बच्चियाँ बलात्कारों की शिकार होती रही हैं। क्या यह एक साथ पूरी की पूरी सामाजिक व्यवस्था के ध्वस्त होने का संकेत है? क्या पूरी की पूरी संरचना ही विकृति का शिकार है? परवर्ट है? मानव-मादा की व्यवस्था में दोयम स्थिति ने धर्म, जाति, वर्ग, राजनीति और ताकत की बाकी सच्चाइयों से मिलकर मानव-नर को स्त्री-द्वेषी और परपीड़ा में आनंद लेने वाले मनोरोगी में तब्दील कर दिया है ?   

क्या वाकई बलात्कार को एक सामान्य दुर्घटना की तरह देखा जा सकता है? क्या सिर्फ यह माना जा सकता है कि अपने मर्दाने बल का इस्तेमाल करके कोई पुरुष अपने यौन आवेग को शांत करता है?  पिछले कई सालों में बलात्कार के इतने प्रकार हम खबरों में देख-सुन  और अखबारों  में पढ चुके हैं कि बलात्कार सिर्फ इतना भर मामला नहीं लगता कि इसे एक दुर्घटना कहा जा सके। आखिर , किसी दलित स्त्री पर गाँव के सवर्णों द्वारा की गई यौन हिंसा या वर्गीय और नस्लीय भेद भाव के चलते की गई यौन हिंसा सिर्फ यौन आवेग की शांति के लिए स्त्री पर किया बल प्रदर्शन नहीं है। कठुआ में, देवस्थान में घटित बलात्कार-काण्ड इसी की गवाही है। आसिफ़ा जिस बकरवाल मुस्लिम घुमंतू समुदाय से थी वह जम्मू-कश्मीर की अनुसूचित जनजाति समुदाय का एक बड़ा हिस्सा है और सामाजिक रूप से पिछड़े माने जाते हैं।



बलात्कारी पैदा नहीं होते, बनाए जाते हैं
पुरुष मूलभूत रूप से बलात्कारी नहीं हैं। कहना चाहिए कि वह प्राकृतिक रूप से बलात्कारी नहीं है। मर्द बलात्कार करने के लिए पैदा नहीं होते। बल्कि बलात्कार पितृसत्तात्मक-शक्ति-संरचना से संचालित सम्बन्धों का उत्पाद है जिसे सैद्धांतिक रूप से और संस्थाबद्ध तरीके से लागू किया जाता है, चलाया जाता है, मनवाया जाता है। बलात्कार प्राकृतिक नहीं। यह सामाजिक है। सामाजिक ट्रेनिंग का हिस्सा। एक राजनीतिक कृत्य । यौनिक-राजनीति।

ब्राउनमिलर अपनी किताब में बताती हैं कि कैसे यौनिक-सम्बन्ध उस अथॉरिटी की वजह से व्याख्यायित होते हैं जो उन मामलों में पुरुष के पास होती है जबकि उसे अपनी विद्यार्थी, अधीनस्थ कर्मचारी, अधीनस्थ अदाकारा, ट्रेनी,मरीज़, नौकरानी, बेटी, भांजी, भतीजी पर सीधा शारीरिक-ताकत या धमकी भी इस्तेमाल नहीं करनी पड़ती। उसका उस वक़्त एक कद्दावर- व्यक्तित्व होना ही काफी होता है। इसे पुरुष उकसाना कह सकते हैं। यह भी उकसावे को पुरुष-दृष्टि से व्याख्यायित करना है। बच्चियों के बलात्कार के मामले में तो इसे सिरे से खारिज किया जाना चाहिए। ब्राउनमिलर लिखती हैं- लेकिन यौन-हमले का सबसे भयावह रूप बाल-यौन-हिंसा में देखा जा सकता है क्योंकि बच्चे के लिए तो सभी वयस्क अप्रतिवाद्य सत्ताधारी हैं।

जिन्हें परेशानी है कि दुनिया को स्त्रीवाद बाँट रहा है बार-बार स्त्री के शोषण और संरचनाओं के हर मामले में लैंगिक बँटवारे को रेखांकित करके वे स्त्री-पुरुष की हर यौनिक/अयौनिक मुठभेड़ और आकस्मिक मिलन को प्रभावित यहीं करने वाले लैंगिक-भेद को जो समाज की संरचना में पैबस्त है, नकारना चाहते हैं। एशिया के सेक्स बाज़ार की हकीकत और भारतीय बंद समाज की खोखली नैतिकता को लुइज़ ब्राउन ने अपनी किताब एशिया का सेक्स बाज़ार में तफसील से खोला है।  वे लिखती हैं “दुनिया भर में देह व्यापार के निकृष्तम रूपों को झेलने वाले वे लोग हैं जो जटिल, बहुआयामी समाज व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर हैं। वे स्त्रियाँ हैं,वे गरीब समुदायों के गरीब परिवारों की सदस्य हैं, वे निकृष्ट मानी गई नस्लों और जातीय अल्पसंख्यकों की सदस्य हैं। उन्हें अपमानित, शोषित किया जाता है, उनमें से कुछ को यौन दासता में धकेल दिया जाता है, सिर्फ इसलिए क्योंकि उनके साथ ऐसा किया जा सकता है, क्योंकि वे समाज के सबसे कमज़ोर लोग हैं।”  और यह सिर्फ देह-व्यापार को ही नहीं, बलात्कार के शिकारियों के लिए भी सबसे मुफीद हैं।


बलात्कार पितृसत्तात्मक-शक्ति-संरचना से संचालित सम्बन्धों का उत्पाद है
इसलिए बलात्कारी सिर्फ एक बीमार व्यक्ति या सामान्य अपराधी माना जाए तो इसका मतलब आप यह भी मान लें कि एक भयानक लैंगिक-गैर बराबरी भी सामान्य बात ही हैं। हर उस व्यक्ति में बलात्कारी होने की  सम्भावना छिपी है जो स्त्री के प्रति मानसिक-वाचिक हिंसा में केवल उसकी यौनिकता को लक्ष्य करता है। थ्री इडियटस की बलात्कार और चमत्कार वाला भाषण, उसमें धन का स्तन हो जाना हमें गुदगुदाता क्यों है? तमाम कॉमेडी शो ऐसी लैंगिक हिंसा और स्त्री देह को वस्तु में बदल देने की बुरी बीमारी से ग्रस्त हैं। निर्भया केस के बाद अगर कोई वकील खुले आम समाचार चैनलों पर यह कह सकता है कि -मेरी बेटी ऐसी होती तो मैं उसे जला देता- तो हमें यह सुनकर दहशत होनी चाहिए कि लैंगिक-ताकत की राजनीति ने हमें एक समाज के रूप में कितनी बुरी तरह भीतर खोखला और बीमार कर दिया है। इस हिसाब से यह एक पूरी सभ्यता का रोग है। एक पुरानी बीमारी। युद्ध-बलात्कारों को ऐसे ही जायज़ ठहराया जाता रहा। युद्धों के समय,दंगों के समय कुछ बलात्कार तो होंगे ही। मर्दानेपन, वीरता और शौर्य की एक परिभाषा में हाथ की राइफल और पैण्ट में छिपा यौन-औजार , दोनो ताकत हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय हवलदारों का यह ड्रिल गीत शक्ति की पौरुषेय व्याख्या इस तरह करता रहा – this is my rifle, this is my gun. This is for killing, this is for fun. धीरे-धीरे एक राष्ट्रवाद की मर्दाना व्याख्या तैयार होती है जिसमें शारीरिक-बल और शस्त्र-बल सब तय करता है। स्त्रीत्व हाशिए पर जाता है, अधिकृत किया जाता है, जीता जाता है। शत्रु की स्त्री को नग्न भटकते देखने का खयाल रीतिकालीन कवि भूषण के काव्य की उस पंक्ति में आता है जिसमें अपने आश्रयदाता की प्रशंसा के लिए वे शत्रु की दुर्दशा बयान करते हुए शत्रु पक्ष की स्त्री के जंगल-जंगल नग्न फिरने की बात कहते हैं नगन जड़ाती थी वे नगन जड़ाती हैं । कविता की लय बांधने के लिए , अलंकार का चमत्कार दिखाने के लिए वन में जाड़ा खाती शत्रु पक्ष की नग्न स्त्रियाँ जो ट्रजडी का समाँ बांधेंगी वह किसी अन्य प्रकार से क्यों/ कैसे भला सम्भव नहीं होता ! और वैसे भी वीर भोग्या वसुंधरा !

इस तरह सेक्शुअल पॉलिटिक्स जीवन हिस्सा होती जाती है। दबंगों द्वारा स्त्री-स्वतंत्रता को नियंत्रित करने के लिए, उसके शिक्षा और नौकरी के मौकों पर वज्रपात करने के लिए, ,उसे उसकी घर की सीमाएँ और औकात दिखाने के लिए इस्तेमाल होने लगता है। भँवरी देवी केस आप नहीं भुला सकते जहाँ एक औरत को निष्ठापूर्वक अपना काम करने के लिए बलात्कार की सज़ा दी गई। कार्यक्षेत्र पर यौन-उत्पीड़न के सम्बन्ध में विशाखा गाइडलाइन उसी केस में पहली बार बनी। कानून फिर भी नहीं बन पाया। अप्रैल, 2016 को केरल में जिशा, जिसे केरल की निर्भया कहा गया, के बलात्कार-हत्या का केस सामने आया। कानून की पढाई करके वकील बनने का सपना देखने वाली तीस वर्षीय दलित स्त्री का उसी के गाँव के पुरुष उसी के घर में घुस कर बलात्कार करते हैं, उसके शरीर को रौंदते हैं, उसके किसी भी तरह ज़िंदा बचने की सम्भावना को खत्म करने के लिए तेज़ औजारों से उसका पेट काट कर अंतड़ियाँ बाहर कर देते हैं। यहाँ स्त्री के खिलाफ हिंसा दरअस्ल उस व्यवस्थागत औजार की तरह काम आती है जिससे ब्राह्मणवादी-मर्दवादी समाज को गैर-बराबरी को बनाए रखने में मदद मिलती है।   
ऐसे ही सेक्शुअल पॉलिटिक्स फिर पॉलिटिक्स की राह पकड़ती है और नेता बयान देते हैं कि लड़कों से गलती हो जाती है। फिर सलाहें-नसीहतें कि कितने बजे के बाद औरतें बाहर न निकलें, फिर जीन्स और स्कर्ट के दोष गिनाया जाना, विधायक का रोना कि उसे फँसाया जा रहा है, बलात्कारी के पाँव पकड़ने की सलाह, पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव वगैरह। बलात्कार के मामले में सबसे मुश्किल चीज़ स्वीकृति को परिभाषित करना बना दिया गया। कैथरीन ए. मैककेनन कहती हैं कि यौनिकता दरअसल पुरुष-सत्ता की निर्मिति है । स्त्री/पुरुष के अंतर को समर्पण/ प्रभुता की तरह देखा गया है। यौनिकता की जो भी अवधारणा समाज में पैठी हुई है वह लैंगिक-असमानता और पितृसत्तात्मक प्रभुत्व के ज़रिए बनी है। यह किसी भी यौनिक सम्बन्ध, बलात्कार, यौन-उत्पीड़न और यहाँ तक कि पॉर्नोग्राफी को भी प्रभावित करती है।  



राष्ट्रवाद का नया अतिरेक: बलात्कार के पक्ष में
भारत-पाक विभाजन के समय तो यह धार्मिक अस्मिता के साथ जोड़ कर वैध बनाया ही गया।  हिंदू-मुस्लिम दंगों में भी बलात्कार का इस्तेमाल इसी तरह स्वीकृत होता है। अपने समुदाय के भीतर इज़्ज़त से ज़िंदगी गुज़ारने के संघर्ष के साथ-साथ गुजरात दंगों की रेप-सर्वाइवर न्याय पाने के लिए अब तक संघर्ष कर रही हैं । पिछले सालों में एक हिंदू-राष्ट्रवादी- अवधारणा भी उदित हुई है जो इसी तरह के पौरुषेय पराक्रम को मान्यता देती है। शम्भू रेगर जैसे हत्यारे की शोभा यात्रा निकाला जाना उसे अतिवाद तक ले जाता है। यह अति फिर-फिर सामने आती है और अपने सबसे शर्मनाक रूप में यह कठुआ के रेप-हत्या केस में देखाई देती है जब वक़ील बलात्कारियों के पक्ष में खड़े होकर जज का रास्ता कई घण्टे तक रोके रहते हैं, बलात्कारियों के समर्थन में विरोध-धरना करते हैं। कोई नफरत से भरकर सोशल मीडिया पर लिखता है कि अच्छा हुआ मर गई आसिफा वर्ना आतंकवादी बनती बड़ी होकर,। स्त्रियाँ खुद हिंदू-पितृसत्ता के समर्थन में खड़ी दिखाई देती हैं। पिछले साल ही छत्तीसगढ के राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष विभा राव ने बयान दिया था कि बलात्कार में महिलाएँ बराबर की दोषी हैं। वे अपनी देह का प्रदर्शन करती हैं। हिंदू धार्मिक ग्रंथों को महत्व न दिए जाना भी उन्होंने इसकी एक वजह बता दी। पिछले दो-तीन सालों में बीजेपी से किसी न किसी तरह जुड़े विधायक, कार्यकर्ताओं के बलात्कारों के मामलों में लिप्त होने की खबरें लगातार बढी हैं जिनके हायपरलिंक यह लेख लिखते समय मेरे सामने हैं।

हिंदू एकता मंच तो एक खास तरह की हिंदू पितृसत्ता का प्रचार कर ही रहा है दुर्गावाहिनी की दुर्गाओं का हिंदू-मुस्लिम रेप की तुलनाएँ और हिंदुआनियों का आह्वान अधिक भयावह है। कठुआ में रेप करने गए लड़के की माँ आखिर दबाव में उसे बचाने आई ही। यह निराशा से भरता है कि संसद में जो स्त्रियाँ हैं वे देश के सबसे अमानवीय और बर्बर रेप-हत्या के मामलों में मौन हैं। हम औरतों का प्रतिनिधित्व करने वाली उन स्त्रियों के ज़मीर को ललकारते हुए सोशल मीडिया पर कई लोगों ने कड़े शब्दों में लिखा।

लेकिन ध्यान से देखिए, वे सत्ता में बैठकर हमारा प्रतिनिधित्व नहीं कर रहीं। वे स्त्री-मुद्दों पर चुनाव जीतकर नहीं आई हैं। वे अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। अभी तो वे बेचारियाँ (?) अपनी-अपनी सीट बचा रही हैं। अपनी -अपनी सीट मने वह सीट जिसके लिए मर्द समझते आए हैं कि दर असल यह उनकी सीट है जो औरतों ने छीन ली है।दूसरा, सत्ता के साथ भागीदार होने की यह फ़ीस है कि आप हाशिए के असल और आसन्न मुद्दे पर भी ईमानदारी से बोल नहीं सकते और धीरे-धीरे सत्ता आप पर हावी हो जाती है।

मैं संसद की महिलाओं की तरफ तब उम्मीद से देखूँगी जब वे महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर आएँगी।
अफ़सोस कि इस दिन के आने का कोई आश्वासन भविष्य में भी नहीं दिख रहा क्योंकि महिलाओं के लिए आरक्षण न पार्टियाँ अपने भीतर करेंगी न संसद में होगा।बलात्कारी नेताओं और उन्हें बचाने वाली पार्टियों के चलते यह उम्मीद कम है। फास्टट्रैक कोर्ट, बलात्कार जैसे अपराधों के लिए जल्द से जल्द न्याय मिलना, महिला-पुलिस की अधिकाधिक भर्तियाँ, स्कूलों-कॉलेजों में जेण्डर-बराबरी की ट्रेनिंग तो तत्काल ज़रूरी हैं। इसके अलावा जब तक औरतें अपने मुद्दों की गम्भीरता समझ घरों से निकल कर सड़कों और संसद तक नहीं जाएंगी, जब तक संसद में बैठी औरतें अपने पार्टी हित छोड़, स्त्री मुद्दों पर एक नहीं होंगी, जब तक पार्टियां ही राजनीति में लैंगिक बराबरी को अपना मुद्दा न बना लें या जब तक स्त्रियाँ अपनी ही राजनीतिक पार्टी न बना लें, पूरी पॉलिटिक्स, पूरी दुनिया की पॉलिटिक्स, मर्द ही नियंत्रित करेगा।
...
हमारे शहर में सब कुछ है लेकिन स्त्री के लिए वह फिर भी सुरक्षित जगह नहीं है। तरह तरह के मोबाइल एप हैं। लेकिन सामाजिक विषमताएँ इतनी अधिक हैं कि लैंगिक भेद के साथ मिलकर वे स्त्री के लिए एक हिंसक माहौल रचती हैं। हम एक शहर में एक साथ कई अलग-अलग तरह के समाज अलग-अलग युगों में जीते हैं। इन सभी सामाजिक परिस्थितियों से अलगाकर स्त्री के विरुद्ध यौन हिंसा को रोकने के बहुत कारगर उपाय होना सम्भव नहीं है। निर्भया के पास अपनी कार होती तो उस दर्दनाक अनुभव से गुज़रने की सम्भावना लगभग शून्य होती। यानी आम आदमी के यातायात का साधन एकदम सुरक्षित नहीं है जो कि इस केस के बाद सबसे पहले सुधार किया जाना चाहिए था। आप आम स्त्री हैं , उस पर से अशिक्षित और आर्थिक रूप से निर्भर भी तो आपके लिए शहर में रहने के नियम और शर्तें मर्दाने वक़्त और स्पेस में और भी ज़्यादा कड़ी होंगीं। हफ्ता भर पहले बिहार से दिल्ली आई पंद्रह साल की लड़की अगर बलात्कारियों का शिकार हो जाती है तो समझा जा सकता है कि यह सिर्फ आत्म रक्षा प्रशिक्षण कैम्प और मोबाइल एप्प जैसे उपायों (हालांकि वे भी बेहद ज़रूरी हैं) से निबटने वाली समस्या नहीं है बल्कि यह पूरे सामाजिक ढाँचे की ओवरहॉलिंग का मामला है ।