Thursday, February 22, 2018

रात की पेट्रोलिंग के वक़्त दो साल की बेटी भी साथ जाती है - वंदना चौहान से बातचीत के कुछ अंश



इस जनवरी इंदौर जाना हुआ था लेकिन वंदना चौहान से मिलना नहीं हो पाया था। इस अफसोस के साथ बाद में उनसे एक लम्बी बातचीत हुई और मुझे लगा उस बातचीत को एक व्यवस्थित तरीके से आप सबसे साझा करना ज़रूरी है। वंदना जी फिलहाल CSP (city superintendent of police) मल्हारगंज हैं। यह रास्ता उनके लिए आसान नहीं था। स्त्रियों के लिए इस पेशे में बहुत दिक्कतें हैं, पुरुष-शक्ति का वर्चस्व जिस भी पेशे की अनिवार्यता होगा वहाँ औरत के लिए अपनी जगह बनाना और अपने लिए काम करने की स्थितियाँ डिमाण्ड करना चुनौती है। लेकिन अपनी पह्चान बनाने के लिए ज़िद और जुनून के साथ ही आगे बढा जा सकता है। यह भी मज़ेदार है कि अक्सर रात की पेट्रोलिंग के वक़्त वंदना की दो साल की बेटी भी साथ जाती है।


मैं : पढने और करियर चुनने के दौरान आपको किन समस्याओं का सामना करना पड़ा ?

वंदना: पढ़ने के लिये तो सबसे बड़ी समस्या ये थी कि हमारे गांव में प्राथमिक स्कूल के बाद स्कूल ही नही था। आगे पढ़ने के लिये खंडवा जाना था जिसके लिए परिवार को मनाना बडी चुनौती थी। हमारे मम्मी पापा ने सबको मनाने में काफी मेहनत की।  खंडवा में अकेले या किसी परिचित के यहाँ रहने में अलग किस्म की समस्या थी।
करियर चुनने में भी काफ़ी दिक्कतें आई थी, छोटे शहर में करियर के बारे में कोई ज्यादा जागरूकता नही होती है। ऐसे में एम.एससी. बॉटनी से करने के बाद मैने इण्डियन फॉरेस्ट सर्विसेज़ के बारे में एक करियर पत्रिका में पढ़ा।

इस बारे में आगे जानकारी के लिए टेलीफोन डायरेक्टरी से खण्डवा के DFO का नम्बर लेकर बात की, फिर मुलाकात की। उन्होंने बताया कि इस परीक्षा की तैयारी दिल्ली में होगी। तब एक बार को तो लगा कि हम शायद ये नही कर सकेंगे क्योंकि पहले ही एक बार माँ- पापा सबसे लड़ के हमे खण्डवा भेजे थे। दिल्ली के लिए तो शायद वे ही राजी न होंगे। पर हमारी सोच के विपरीत माँ-पापा ने ही हमे दिल्ली जाने का और सिविल सेवाओं में जाने का हौसला दिया ।करियर चुनने मे भाषा भी एक समस्या रही । हम चूँकि मध्यप्रदेश से है हमने एम.एससी. बॉटनी भी हिंदी में किया था। दिल्ली में विज्ञान की कोचिंग्स अंग्रेज़ी में ही थी तो वहा एडजस्ट करने में औऱ पढ़ाई करने में दिक्कतें आई।  हमने अपने अँग्रेजी के डर को बहुत हद तक काबू कर के आगे की  सभी परीक्षाएँ अंग्रेजी माध्यम से ही दी.                     

मैं: पुलिस में होना, स्त्री होने को कैसे प्रभावित करता है? क्या यह मर्दानेपन को बढावा देने और औरतपने को कम करके आकने से कोई पहचान का संकट भी पैदा करता है ?
वंदना: . पुलिस विभाग जिसे आम तौर पर आज भी पुरुषों वाला विभाग माना जाता हैइसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ महिला अधिकारी को भी सम्बोधित करने के लिए SIR शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। शायद और किसी विभाग में यह नही होता होगा।। आज से कुछ वर्षो पहले की स्थिति यह थी कि थाने में महिला प्रसाधन-कक्ष होता ही नही था ।
पहचान का संकट ! हाँ ! यह बात हम अक्सर अपने साथ काम करने वाली महिला अफसरों करते भी हैं कि ‘we always have to prove that we are equally qualified and trained like our male colleagues.’  कभी कभी कोई  लॉ एण्ड ऑर्डर की स्तिथि में हमारे वरिष्ठों का हम पर उतना विश्वास नही होता जितना दूसरे
" काबिल पुरुष अधिकारी" पर होता है। महिलाओं को लेकर यह सोच शायद सभी विभागों में होगी।

ये बातें विचलित करती हैं। पर जैसे स्त्रियों का स्वभाव है ही कि हम एडजस्ट कर ही लेते है। कुछ समय बाद जब आप अपना काम पूरी ईमानदारी और सजगतापूर्वक करते है तो आपके अधिकारी भी इस बात से अच्छे से परिचित हो जाते है फिर वे आपके काम को जज करने लगते हैं, न कि जेण्डर को।

मैं:  आपकी मातहत स्त्री-अधिकारियों, कर्मियों से आपके रिश्ते कैसे हैं? उनकी समस्याएँ किस तरह की हैं?
वंदना: सबसे बड़ी दिक्कत है इस विभाग में अभी भी जितनी संख्या में महिला बल चाहिए वो अभी भी पर्याप्त नही है ऐसे में जो महिला अधिकारी है वे ओवरबरडंड है। जिस तरह से महिला अपराध, बच्चों के साथ  घटने वाले अपराध , पारिवारिक विवाद आज समाज में तेज़ी से बढ़ रहे है ,और  इन अपराधों से निपटने के लिए जो भी नए क़ानून और अधिनियम बन रहे है सभी मे  बहुत सी वैधानिक कार्यवाही करने के लिए महिला पुलिस अधिकारी की ही ज़रूरत होती है। ऐसी स्थिति में उपलब्ध महिला पुलिस बल को कई बार आवश्यकता से अधिक कार्य करना पड़ता है। जिसका प्रतिकूल प्रभाव उन पर परिवार पर और स्वास्थ्य पर पड़ता है। 

अभी भी थानों की बात की जाए तो यदि किसी थाने में 50 मेल पुलिस है तो शायद 2-3 फीमेल पुलिस होती है। कई जगह तो सिर्फ एक महिला आरक्षक ही होती है। ऐसी स्थिति में उसका काम करना और मुश्किल हो जाता है , महिला प्रसाधन की कमी,महिलाओं के लिए एक अलग से कक्ष की कमी जहाँ कभी-कभी वो कुछ आराम कर सके, बेबी- फीडिंग रूम का न होना आदि बहुत सी समस्याएँ है. मासिक-चक्र से हम सबको गुज़रना होता है और थानों में ऐसा कोई कक्ष नहीं कि हम अपना सामान रख सकें या चेंज कर सकें। मान लीजिए, कोई महिला कम्प्लेनेण्ट ही आ जाती है, कोई रेप-पीड़िता या किसी भी तरह सताई हुई , सदमा-ग्रस्त, उसके लिए भी ज़रूरी है कि थानों में प्रबंध हो !!ग्रामीण इलाकों में स्त्री-पुलिस का काम करना बेहद मुश्किल है। रात की पेट्रोलिंग के वक़्त कहीं टोयलेट नहीं जा सकते हम। फिर एक कण्ट्रोल रूम जहाँ एक ठीक ठाक सा कॉमन टोयलेट है , मैं एक बार रात में वहाँ से गाड़ी ज़रूर गुज़ारती हूँ। सन 80-90 तक हाल ये था, हमारी सीनियर्स बताती हैं कि उन्हें इस समस्या से निबटने का कोई इलाज नहीं समझ आया था कि दिन भर रात भर बाहर रहने पर टॉयलेट कहाँ जाएँ ! उन्होने पानी पीना कम कर दिया था।           
 
बड़े शहरों में तो बदलाव हैं। भोपाल में हमारा हेडक्वार्टर सभी आधुनिक सुविधाओं से युक्त है।

            

मैं : अब तक के करियर में कोई ऐसा केस, किसी महिला से जुड़ा हुआ, जो आप आज भी नहीं भूलतीं !
वंदना: बहुत से केसेस देखे हैं पिछले 4 सालों में पर एक केस है ऐसा जो आज जब भी याद आता  है तो मन दुखी हो जाता है। 2014 की बात है । परिवीक्षा अवधि के दौरान हम थाना प्रभारी के रूप में ग्रामीण थाने में पदस्थ थे। एक दिन सुबह खबर मिलती है कि पास के जंगल मे शॉल में लिपटी एक 8-9 माह की बच्ची मिली है, पता नही कौन उस बच्ची को बारिश के मौसम में जंगल मे छोड़ आया था। बच्ची की हालत नाजुक थी। तत्काल उसे इलाज के लिए शहर के अस्पताल में भेज गया। फिर शुरू किया उसके अपराधियों को ढूंढने का काम जो कि बहुत मुश्किल लग रहा था। एक तो गांव और जंगल का मामला किसी ने किसी को बच्ची को वहाँ रखते नही देखा था। मामला सवेंदनशील भी था । अगले दिन न्यूज पेपर में दी गई बच्ची की तस्वीर काम कर गई और हमें आरोपी का पता चल गया जो खुद उस बच्ची का पिता था। बाद में पता चला कि बच्ची की माँ भी शामिल है इस अपराध में। जब माँ से हमने इस बारे में बात की तो पता चला वो खुद 18 -19 साल की लड़की है जिसे खुद नही पता कि उसने जो किया वह सही था या गलतयह घटना मुझे आज तक झकझोरती है।                    

 मैं: पुलिसवाली बहू से डर नहीं लगता ;)
वंदना : बहू ऐसा शब्द है कि उसके आगे हर विशेषण नलीफाई हो जाता है, बेअसर ! ;)
हाँ हस्बेण्ड बेहद कॉपरेट करते हैं। शाम को निकलती हूँ तो उनके ही भरोसे होती है बच्ची। बेटी अब मेरी गाड़ी पहचानने लगी है। जब देर रात तक नहीं सोती उसे पेट्रोलिंग पर साथ ले जाती हूँ। कभी गाड़ी में सो जाए तो घर पर ड्रॉप कर देतीहूँ या नहीं भी। 
 और मैं यह भी कहना चाहूंगी कि लड़कियाँ जो भी काम अपने लिए चुनें उसमें अपना शत प्रतिशत दें। उस काम को सिर्फ करने के लिए नकरें बल्कि इसलिए करें कि उसको करने से उन्हें खुशी मिलती है। तभी अपनी एक अलहदा पहचान बना सकेंगी !