Thursday, March 8, 2018

इस पृथ्वी पर मेरा कुछ भी नहीं

सुलोचना वर्मा ने जब नटी बिनोदिनी पर यह परिचयात्मक लेख चोखेरबाली के लिए भेजा तो बिनोदिनी दासी की 23 साल की उम्र में लिखीं 'आमार कोथा' और 'आमार अभिनेत्री जीबोन' याद आईं। अपनी आत्मकथा में जब विनोदिनी लिखती है कि इस पृथ्वी पर मेरे लिए कोई जगह नहीं तो जैसे आज 150 बरस बाद भी देश के सारे कमाठीपुरा, सोनागाछी,जीबी रोड याद आते हैं। एक बंद समाज की सड़ी हुई नैतिकता इन मोहल्लों को बसाती है और मनुष्यता के सारे सपने देखने सेहमेशा के लिए महरूम कर देती है। उन्मादी भक्त लेनिन का स्टेच्यू ढहा दें,अम्बेडकर या पेरियार का या गौरी लंकेश की हत्या कर दें या दुनिया में कहीं भी कुछ भी हो मौक़ा मिलते ही मर्दवादियों कौमार्योपासकों की भाषा एक लात स्त्री की योनि पर चलाती है अपनी ज़बान से कि वह जो औरत है उसकी ज़बान सिली रहे, स्वप्न मृत रहें और देह प्रस्तुत रहे ! ऐसा नहीं तो वह आँखों को ऐसे खटकेगी कि इतिहास उसकी सुध न लेगा। बंगाल के उन्नेसवीं सदी के थियेटर का इतिहास बिनोदिनी को ऐसे ही  लम्बे समय तक नज़रअंदाज़ करता रहा।  


नटी बिनोदिनी




यह उस युग की बात है जब स्त्रियों का अपना कोई वजूद नहीं होता था| वो बस हुआ करतीं थीं| यह उस युग की बात है जब चार-पाँच बरस का होते ही लड़कियों को लड़की बनने की शिक्षा देना समाज का हर नागरिक अपना परम कर्त्तव्य समझता था| ऐसे समय में सन १८६२ में कोलकाता के कॉर्नवालिस स्ट्रीट (आज की विधान सरणी ) के १५४ नंबर की खोली में एक अत्यंत गरीब वारांगना के घर जन्म लिया एक गोरी-चिट्टी लड़की ने, जिसका नाम रखा गया "पूँटी"|

न जाने क्या सोचकर पूँटी की नानी ने बचपन में ही उसका ब्याह साथ खेलने वाले एक लड़के से कर दिया| कुछ दिनों बाद लड़के के घरवाले आए और अपने लड़के को लेकर चले गए| पीछे रह गयी पूँटी| उसे अवसाद में डूबता देख उसे व्यस्त रखने के लिए उसकी माँ ने उसका दाखिला करवाया कॉर्नवालिस स्ट्रीट के एक अवैतनिक स्कूल में, जहाँ उसका नाम लिखवाया गया "बिनोदिनी दासी"| एक अभावग्रस्त वारांगना ने अपनी बेटी की शिक्षा के विषय में सोचा, न सिर्फ सोचा, अपितु उसे स्कूल भी भेजा बावजूद इसके कि  जिस परिवेश में बिनोदिनी रहती थी, वहाँ पढ़ने -लिखने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था; पर बिनोदिनी अत्यंत मेधावी निकली| पढ़ाई-लिखाई में अव्वल तो थी ही, गाती भी शानदार थी

अभी पूँटी को स्कूल गए और पूँटी से बिनोदिनी दासी बने अधिक समय नहीं हुआ था, पर गरीबी ने उसके घर पर ऐसा अतिक्रमण किया कि उसकी माँ और नानी ने अपने पेशे के अनुरूप  ही उसे संगीत की शिक्षा के लिए गंगाबाई के सुपुर्द किया| गंगाबाई बिनोदिनी के घर के एक हिस्से में किराये पर रहती थी और उम्र में बिनोदिनी से काफी बड़ी होकर भी मित्रवत थीं, इसलिए बिनोदिनी के संगीत सीखने का सफर आसान रहा| कुछ ही समय में बिनोदिनी संगीत में निपुण हो गयी| यह विडंबना ही थी कि जहाँ संगीत को साध लेना समाज में सम्मान पाने का वायस होना चाहिए था, बिनोदिनी की सुमधुर आवाज़ और परिस्थिति ने महज ११ वर्ष की आयु में उसे वारांगना बना दिया| पर बिनोदिनी उस दीये के समान थी जो मंदिर में हो या कोठे पर, रौशनी समान रूप से बांटता है| जल्द ही गुणीजन उसकी विलक्षण प्रतिभा के कायल होने लगे | यह समाज का दोगलापन ही रहा है कि जहाँ गाने वालियों को हेय दृष्टि से देखा जाता रहा है, वहीं समाज के नामी-गिरामी पुरुष उस महफ़िल का हिस्सा होकर भी सम्मान के पात्र बने रहते हैं| गंगाबाई के घर गाने की महफ़िल सजती थी जिसमें शहर के कई नामचीन लोग आते थे| जब पूर्णचंद्र मुखोपाध्याय और ब्रजनाथ सेठ ने बिनोदिनी को गाते सुना, उसे दस रूपये की मासिक आय पर ग्रेट नेशनल थियेटर में नौकरी पर रखवा दियाशुरुआत के दिनों में उसकी नाट्य शिक्षा का दायित्व महेंद्रलाल बसु को दिया गया| बाद में उस समय के नाट्य जगत की अन्य बड़ी हस्तियों ने उसे प्रशिक्षित किया

ग्यारह बरस की उम्र में बिनोदिनी ने "शत्रु संहार" नाटक से अपने रंगमंच के सफर की शुरुआत की और अपने पहले ही नाटक से दर्शकों को अभिभूत कर दिया| उन दिनों अभिजात्य वर्ग की लडकियाँ/स्त्रियाँ रंगमंच से दूर रहती थी और नाटकों में अभिनय के लिए वारांगनाओं को ही बुलाया जाता था| पहली नाटक से बिनोदिनी को ऐसी प्रशंसा मिली कि अगले नाटक में उसे नायिका की भूमिका दी गयी जबकि उसकी उम्र मात्र बारह बरस थी| बिनोदिनी ने अपने संस्मरण में लिखा था कि उसकी सज्जा करनेवालों को काफी मशक्कत करनी पड़ती थी क्यूँकि वह अभी छोटी थी और उसे युवती दिखना होता था| नाटक का चरित्र पौराणिक, सामजिक या ऐतिहासिक जैसा भी होता, बिनोदिनी उसी के अनुरूप खुद को ढाल लेती| वह एक ही नाटक के कई चरित्रों का अभिनय करती थी| नाटक "मेघनाद वध" में उसने सात अलग चरित्रों का अभिनय किया था| उसने स्त्री और पुरुष चरित्रों का अभिनय किया और हर किरदार में खूब वाहवाही लूटी|

उसका बचपन तो बचपन के शुरुआती दिनों में ही में ही ख़त्म हो गया था| ग्यारह बरस की उम्र में वह शादीशुदा भी थी और परित्यक्ता भी, वह गायिका भी थी और नटी भी, वह लड़की भी थी और युवती भी, पर समाज ? उसके लिए वह अब भी केवल वारांगना ही थी !

अपने नाट्य दल की प्रमुख अभिनेत्री होने के साथ-साथ वह एक मेहनती इंसान भी थी| ग्रेट नेशनल थियेटर के धनोपार्जन के लिए उसने उत्तर भारत के कई  शहरों का दौरा किया था | उसे "नीलदर्पण" नाटक से खूब ख्याति मिली |

रवीन्द्रनाथ टैगोर के बड़े भाई ज्योतिन्द्रनाथ टैगोर के नाटक "सरोजिनी"में बिनोदिनी के अभिनय ने नया इतिहास रचा| इसके बाद वह ग्रेट नेशनल थियेटर छोड़ बंगाल थियेटर का हिस्सा बन गयी| यहाँ दो साल से भी कम समय में उसने वह मुकाम हासिल किया जो अब तक किसी ने नहीं किया था| एक रोज़ उसका नाटक "कपालकुंडला" देखने रंगमंच की एक बड़ी हस्ती गिरीश घोष आए और बिनोदिनी की अभिनय क्षमता से प्रभावित होकर उसे अपने साथ नेशनल थियेटर ले आए| गिरीश बाबू के साथ काम करते हुए उसने बहुत कुछ सीखा और सफलताओं की नयी बुलंदियाँ छूती चली गयी| उसने जब बंकिमचंद्र के उपन्यास "मृणालिनी" के मनोरमा का किरदार निभाया, तो नाटक देखने के बाद बंकिम बाबू ने कहा था "इस किरदार को लिखते हुए मैंने कभी कल्पना ही नहीं की कि एक रोज़ मनोरमा को साक्षात् देख पाऊँगा| आज मंच पर बिनोद ने मुझे मनोरमा से मिला दिया"| एक कलाकार के लिए कितने गर्व की बात है न? पर बिनोद असाधारण व्यक्तित्व की स्वामिनी होते हुए भी बेहद सहज थीं| उनकी सफलता आसमान छू रही थी, पर उनके पाँव जमीन पर अपनी पकड़ बनाये हुए थे|

कुछ समय बाद गुर्मूख राय नामक २०-२१ वर्षीय एक धनी बिनोद की ओर आकर्षित हुआ और बिनोद को पचास हजार रुपयों में खरीदने की पेशकश की| शर्त थी कि उसे रंगमंच छोड़ना होगा| बिनोदिनी बिकने के लिए तो तैयार थी, पर उसे रंगमंच को छोड़ने की यह शर्त मंजूर नहीं थीनाटक के अतिरिक्त बिनोद के जीवन में था ही क्या और फिर सफलताओं के शिखर पर भी समाज के लिए वह एक वारांगना ही थी| उसने समझौता स्वीकार कर लिया| वह पचास हजार रूपये लेकर गुर्मूख राय  की रक्षिता बन गयी| उन रुपयों से थियेटरयेटर के लिए जगह खरीदा गया| थियेटर का नाम बिनोदिनी की इच्छानुसार "बी थियेटर" होना था, पर समाज एक वारांगना के नाम को कैसे स्वीकार कर पाता ! उस समाज के तथाकथित सम्मानित भद्रलोक इस वारांगना की देह की जमीन में धँसने के लिए उतावले तो रहते थे, पर उनके समझ की जमीन भी कच्ची थी और उनका ज़मीर भी | थियेटर का पंजीकरण "स्टार थियेटर" के नाम से हुआ| बिनोद ने इसे नियति मान लिया और पूरी लगन से मेहनत करती रही, पर नियति को कुछ और ही मंजूर था| गुर्मूख राय पर परिवार ने दबाब डाला और स्टार थियेटर को बेचने की नौबत आ गयी | गुर्मूख हालाँकि बिनोद को सच्चे दिल से चाहते थे और उसे थियेटर का स्वामित्व देना चाहते थे, पर इस बार बिनोद को उन्हीं लोगों ने छला, जिन्होंने बिनोद को सफलता के इस मुकाम तक पहुँचाया| स्वयं गिरीश बाबू ने बिनोद और उसकी माँ को इस प्रस्ताव को अस्वीकार करने के लिए कहा और स्वामित्व गया रंगमंच के मित्र और बसु बंधुओं के पास|

बिनोदिनी अभिनीत नाटक "चैतन्यलीला" देखने के बाद स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने  ग्रीनरूम में जाकर बिनोद को आशीर्वाद देते हुए कहा था "चैतन्य हो !"| आशीर्वाद देते हुए स्वामी जी का स्पर्श पाकर उसका ग्लानिबोध कुछ कम हुआ और शायद थोड़े साहस का भी उसमें संचार हुआ | अब वह अपने सहकर्मियों का अपने प्रति व्यवहार देखकर रोष प्रकट करती और कई बार रंगमंच के नामी गिरामी लोगों का भी प्रतिरोध करतीं| फिर एक रोज़ दुःख, अपमान और थियेटर जगत के तिरस्कारपूर्ण व्यव्हार से क्षुब्ध होकर मात्र 23 बरस की उम्र में रंगमंच को अलविदा कह गयीं |

जब देश में ग्रामोफोन आया, तो बिनोद ने गाना भी गाया जिसे लोगों ने पसंद किया| आख़िरकार वह प्रशिक्षित गायिका थी| दुनिया जिसे नटी कहती रही, उसके व्यक्तित्व का एक और पहलू बहुत लोगों को आज भी पता नहीं है| कम पढ़ा-लिखा होकर भी भाषा पर बिनोदिनी की जबरदस्त पकड़ थी| उन्होंने बतौर संस्मरण "आमार कॉथा" और "आमार ओभिनेत्री जीबोन" नामक दो किताबें लिखीं और साथ ही "वासना" और "कनक नलिनी" नामक दो काव्य-संग्रह भी लिखा|

हर स्त्री की तरह उसे भी अपना एक परिवार चाहिए था| हालाँकि उसके जीवन में कई पुरुष आए और गए, पर साथी नहीं मिला| संतान सुख भी कम समय के लिए ही मिला| उसकी एकमात्र बेटी १३ वर्ष में किसी अज्ञात रोग से संसार छोड़ गयी|

जिसके प्रशंसकों की तालिका में रामकृष्ण परमहंस, बंकिमचंद्र, स्वामी विवेकानंद, एड्विन अर्नोल्ड जैसे लोग रहे, नियति ने उसके साथ बेहद ही क्रूर मजाक किया और परिस्थिति ऐसी हुई कि उसे वापस उन्हीं गलियों में जाना पड़ा जहाँ से निकल उसने अपना नया परिचय पाया था| नाट्य साम्राज्ञी को जीवनपर्यन्त रक्षिता बन रहना पड़ा| ७९ वर्ष की आयु रही होगी, जब उनके जीवन के रंगमंच का पर्दा गिर गया और वह इहलोक छोड़ गयी| उनके जीवन में कितना दर्द था इस बात का अंदाजा उनकी किताब "आमार कॉथा" की भूमिका को पढ़कर लगाया जा सकता है जिसमें उन्होंने लिखा "मर्म और वेदना की क्या भूमिका होगी ! यह सिर्फ एक अभागिनी के जले हुए हृदय की राख है| इस पृथ्वी में मेरा कुछ भी नहीं है, है तो बस अनंत निराशा, कातरता साझा कर सकूँ, ऐसा भी कोई नहीं है क्यूँकि इस संसार के लिए मैं केवल एक पतिता वारांगना हूँ ! आत्मीय बंधुहीना कलंकिनी ! "

 "आमार कॉथा" की भाषा किसी विदुषी की ही भाषा हो सकती हैइस किताब में लिखे उनके संस्मरण को पढ़कर उनके सरल स्वभाव और विशाल हृदय का भी पता चलता है| जिस गिरीश घोष ने उन्हें कई बार छला, बिनोदिनी ने उन्हें सिर्फ एक गुरु के रूप में याद कर कृतज्ञता जताया|



वह बिनोदिनी दासी ही थी जिसने रंगमंच की दुनिया में स्त्रियों की मौजूदगी को बंगाल के दर्शकों के समक्ष सहज बनाया| वक़्त भी कम नाटक नहीं करता हैक्या अजीब इत्तेफाक है कि बिनोदिनी दासी की मृत्यु के लगभग १५० बरस बाद "स्टार थियेटर" का नाम बदलकर "बिनोदिनी थियेटर" कर दिया गया|


1 comment:

ashutosh dwivedi said...

बहुत सुन्दर जानकारी।
सहज भाषा के साथ सशक्त अभिव्यक्ति।
आभार आपका 🙏