Thursday, July 5, 2018

तीन कहानियाँ


सबाहत के पास कितनी ही कहानियाँ हैं। अपने मायके और ससुराल के गाँव में देखी हुई जाने कितनी ही औरतें उसके ज़हन में घूमती हैं, उसे बेचैन करती हुई। वे सब औरतें जो हालात की मारी हैं, जिनके इर्द-गिर्द ऐसे घेरे हैं कि उनसे निकलने की चाह भी कुफ़्र है। वे जो हालात से लड़ते हुए अपने प्रेम के लिए एक अलग व्याख्या तैयार करती हैं, ग्लानि से कोसों दूर, सब नतीजे भुगतने को तैयार। आपके बनाए मापदण्ड तोड़कर औरत दबंग हो जाए तो समाज के लिए मर्द बौदा हो जाता है! मर्दाना अहंकार को ललकारा जाना औरत की हदें बनाए रखने के लिए कितना ज़रूरी है। खिड़की के भीतर सवाल है। खिड़की के बाहर भी। इस पर सबाहत की शैली में वह मस्ती झलकती है जो उर्दू-लेखिकाओं की याद दिलाती है। यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि उर्दू में स्त्री-लेखन को अपनी पुरखिनों से एक बहुत मज़बूत परम्परा मिली है जिसमें सशक्त भाषा है एक चुटीलेपन से के साथ सम्वेदनशीलता। सबाहत अपनी मेहनत और संजीदगी से इसे पाने की सामर्थ्य रखती है।

1.
तेज़ औरतें

बौदा का असल नाम क्या है यह जानने में किसी की दिलचस्पी नहीं थी , मुझे भी न होती अगर दोपहर में बाक़ी घर की औरतों की तरह गहरी नींद आती तो इतनी ज़रा सी बात मेरे ज़ेहन में न घूमती।
बौदा की औरत का पूरे गावँ में जलवा है , और जैसा कि आमतौर पे होता है एक ख़ूबसूरत तेज़ तर्रार ,मर्दो को इशारों पे घुमाने वाली औरत से बाक़ी की औरतें दिल ही दिल में खूब जलती हैं । तो ज़ाहिर है बौदा बहू से भी ख़ुदा वास्ते का बैर पाले बैठी थीं ज़्यादातर औरतें । मुझे हमेशा उन बातों में दिलचस्पी होती थी जिन्हें घर वाले ममनून क़रार देते थे जिन पर पर्दे लगाए जाते थे , इसलिए पहली फ़ुर्सत में बौदा बहु से मेरी दोस्ती हो गयी ।

काजल की तीखी धार सजाये , भरे होंठ पान की लाली से सुर्ख़ किये ,गोल ठोड़ी पे नन्हा तिल । अल्लाह जाने तिल पैदायशी था या उस छैल छबीली ने बनवा रख्खा था । पहली नज़र में दिलकश लगी थी । ज़ात की नाइन है इसलिए शादी ब्याह काम काज के सिलसिले में लोगो को उसका सहारा लेना ही पड़ता है । औरतों के लिए तीख़ी मिर्च ,मर्दों की नज़र में फ़ुर्सत से सधे हाथों से बनाया बनारसी पान है नाउन ।

दिल से दिल की राह होती है बौदा बहु को एहसास हो गया कि मेरे दिल मे उसके लिए कोई रार नही , सो मेरे सामने उसकी जिंदगी की कई गिरहें खुलीं जो उसने अपने दिल से छुपा कर बांध रखी थी ।
बौदा की दिमाग़ी हालत कमज़ोर थी , धोखे से उसकी शादी नाउन से कर दी गयी । नाउन का नाम रेहाना है , उसने पहली मुलाक़ात में जान लिया था कि बौदा बुध्धु है घामड़ है । काम कोई करता नही था , पैसे कमाने का कोई ज़रिया न था । रेहाना ने अपना ख़ानदानी पेशा अपना लिया , शादी ब्याह में लड़की को उबटन लगाना , शादी के बर्तन साफ करना , गावँ में कार्ड देना ,और भी बहुत से अल्लम गल्लम काम । ख़ुशशकल थी मेहनती हंसमुख थी इसलिए मर्दो की नज़र में तर माल थी , ये अलग बात है कि रेहाना होशियारी से अपना काम निकाल कर ऐसा बच निकलती कि सब हाथ मलते रह जाते । गावँ के ही रसूख़ वाले चौधरी से उसे मुहब्बत हो गयी थी , बक़ौल रेहाना ," चौधरी ने पहली नज़र उस पे डाली तो रेहाना एकटुक उन्हें देखती रह गयी , और घर आकर सारी रात जाग जाग कर ख़्वाब देखती रही ।"" बाक़ी के मर्द हज़रात कहते थे चौधरी में ऐसा क्या जड़ा है जो हममे नही है ? रेहाना हंस कर भद्दी सी गाली देकर भाग खड़ी होती ।
ख़ैर हैरानी मुझे तब हुई जब उसने ख़ुशदिली से मुस्कुराकर बताया कि उसे बौदा से भी मुहब्बत है ।
इंसानी दिमाग़ रेशम के गुच्छे से ज़्यादा उलझा हुआ नाज़ुक है । वाक़ई कब क्या सोचे क्या समझे क्या कर बैठे कुछ खबर नही ।

Zehra Doğan is a Kurdish artist and journalist from Diyarbakir in Turkey. She is the editor of Jinha, a feminist Kurdish news agency with an all female staff. She was jailed for a painting of the destruction of the city of Nusaybin in 2017



2.

शरारती लड़की 

गाँव के पुराने जमींदार घर के नई पौध के लड़के असग़र दर्ज़ी के यहां उठने बैठने लगे थे।असग़र इस इज़्ज़त अफ़ज़ाई से दिल ही दिल मे ममनून रहा करता था कि एक ज़माने मे बड़े दरवाज़े के लोग उससे सीधे मुंह बात नही करते थे । आज का ज़माना अच्छा है , नई नस्ल यह सब नही मानती ,असग़र को चचा कह कर पुकारा जाने लगा है , ग़रीब होना कोई जुर्म नही रह गया आजकल । "चचा मटके का पानी पिलवाओ यार , हलक़ सूख गया गर्मी में ।"लड़को में से किसी ने आवाज़ लगाई ।

 "वाह बाबू। आप लोग फ्रिज का पानी छोड़कर मेरे मटके का पानी पीने आते हो , अल्लाह आप लोगो के दिलो में रहम बनाये रख्खे । सजीला , ठंडा पानी ले आ बड़े दरवाज़े से लोग आए हैं ।"

लड़कों ने एक दूसरे को नज़रो में इशारे किये , फिऱ असग़र की निहायत खूबसूरत बेटी की आमद का इंतज़ार करने लगे । सजीला की ख़ूबसूरती पूरे गाँव मे मशहूर हो चुकी थी और इस वजह से असग़र दर्ज़ी सख़्त परेशान रहा करता था । आहिस्ता आहिस्ता यह भेद खुल ही गया कि बड़े दरवाज़े के लड़के किस ग़रज़ से उठते बैठते हैं असग़र की दुकान पर । ख़ैर ऐसी कोई अनहोनी नही होने पाई न ही सजीला का किसी के साथ रूमानी सिलसिला जुड़ा ।

असग़र ने कमउम्र शोख़ ,बेहद हसीन बेटी की शादी मुम्बई में काम धंधा करने वाले इरशाद से तय कर दी । अपने तयशुदा वक़्त पर शादी हो गई गावँ के नौजवान लड़के बुझ कर रह गए , बड़े दरवाज़े के लड़के फिर से अपनी हैसियत के लोगो मे उठने बैठने लगे । सब कुछ मामूल पर आ गया । मुम्बई में सजीला इरशाद के साथ खोली में रहने लगी , आस पास और भी बहुत सी फैमिलीज़ थीं जो एक कमरे के घर मे रह रहे थे । सजीला को मुम्बई काफ़ी पसन्द आया ,उसने पाया कि आसमान तो बेहद वसी है बहुत बड़ा । दुनिया काफ़ी हसीन है , मज़ेदार है ,रंग बिरंगी है ।
इरशाद उसकी खूबसूरती से खाइफ़ रहा करता था ,उसने अपने पड़ोस में रहने वाली उम्रदराज़ ख़ातून से सजीला की देखभाल करने को  कहा और ज़रूरत केघरेलू सामान लाने की जिम्मेदारी भी   पड़ोसियों को सौंप दी । लेकिन परिंदों को कैद में रहना कब पसन्द आया है ,मछलियां रेत में कब रहना चाहती हैं ? सजीला को बाजार देखने और गोलगप्पे खाने का शौक़ था , इरशाद के काम पर जाने के बाद , घर के सारे काम निमटा कर  , बुरका डाल कर सजीला चल देती थी गोलगप्पे खाने ।
इस ज़बान ने क्या क्या न सितम ढाये हैं लोगो पर । गरीब सजीला कितने दिन बचती ? किसी दिलजले ने ख़बर कर दी इरशाद को । एक दिन इरशाद काम पर जाने का बहाना करके , बाज़ार में छुप कर बैठ गया । हस्बे आदत घरेलू कामो से फ़ारिग़ होकर सजीला बाज़ार पहुंची , गोलगप्पे बनवाये और चेहरे से पर्दा हटा कर ,धड़ल्ले से सी सी करके गोलगप्पा खाने लगीं। ऐन उसी लम्हे
इरशाद उसके सामने आ खड़ा हुआ , उसके बुर्के को नोच कर वहीं फेंक दिया , घसीटते हुए  ,भरे बाज़ार मुहल्ले में गालियों से नवाज़ते उसको घर लाया । मुम्बई में रहने वाले सजीला के क़रीबी रिश्तेदारो को बुलाया , और  मना करने के बावजूद ,चोरी छुपे चेहरा खोल कर गोलगप्पा खाने के जुर्म में उसे तलाक़ दे दी ।


 लाख  मिन्नते की गईं माफ़ी माँगी गयी , मगर तलाक़ हो ही गया ,असग़र को बुला कर उसकी बेटी उसके हवाले कर दिया गया ।सजीला को एहसास हुआ उसका आसमान तो निहायत छोटा था भरम था जो टूट गया । रोती बिलखती वापस गावँ आ गई , जहां रात दिन के तानो से उलझ कर ,अपनी सगी माँ के ख़राब रवैये से घबरा कर  उसने सल्फास खाकर अपनी जान दे दी ।

सच कहती हूँ जब से ये वाक़या सुना है दिल चाहता है इरशाद से पूछूं किसने हक़ दिया तुम्हे ? बिना चेहरा खोले वो कैसे खा सकती थी ? और तुम इरशाद , तुमने राह चलते हुए कब कब ग़ैर औरतो पे अपनी निगाह नही पड़ने दी ? कब तुमने अपनी नज़रो की हिफाज़त की ? कब तुमने एक अच्छे साथी , दर्दमन्द शौहर होने का हक़ अदा किया ? क्यों तलाक़ दी तुमने ? कौन होते हो तुम यूँ किसी मासूम को बेइज़्ज़त कर उसकी जान लेने वाले ?

शरीयत में ऐसा कहीं कोई हुक्म नही , जाहिल इंसानो पहले ख़ुद क़ुरआन पढो , तर्जुमा पढो फ़िर एहसास होगा कि बीवी को कितना अहम दर्जा दिया गया है । तुम कफ़ील बनाये गए हो बीवी के , तुम्हे बीवी की दिलजुई (मनोरंजन,दिल बहलाना )करने का हुक्म दिया गया है , खाना न बनाना चाहे तब भी कोई ज़बर्दस्ती करने का हुक्म नही दिया गया । उसकी गलतियों को माफ़ करने का हुक्म दिया गया ।

इरशाद तुमने बुरा किया ,उसका आसमान खींच लिया ।



3.
ख़ूबसूरत मजबूरी 


सफ़ेद दुपट्टे में हिजाब से बंधा चेहरा इतना हसीन ,दिलकश लग सकता है ,इसका अंदाज़ा मुझे तब हुआ जब मैंने शाज़रा को देखा । आँखें नाक ,गाल और होंटो की बनावट ऐसी कि शायरी का दम भरने वाले रूमानी शायर एक लम्हे में हज़ार ग़ज़ल लिख डालें ।  मैंने कई सारे ख़ूबसूरत , रानाई हुस्न वाले चेहरे देख रखे थे ,मगर उसकी खूबसूरती नज़रो को रोक लेती थी ,नज़र ठहर सी जाती थी ।
 शाज़रा को किसी दीनी इज्तमे के दौरान देखा था मैंने । घर आकर नानी से ज़िक्र किया छोटे मामू के रिश्ते के लिए । बक़ौल नानी  "उनके घर मे रिश्ता करना मुनासिब नही ,शाज़रा की दादी निहायत गुस्सैल ,ज़बान दराज़ ख़ातून वाक़ए हुई हैं । बहु को ज़ुल्म के ज़ोर से और पोती को ज़बानी तीरों तन्ज़ो से लहूलुहान कर के रखा है । ऐसे घराने से क्या मेलजोल करना ,जहां बहुओं बेटियों से बदज़बानी बदतहजीबी से पेश आया जाता हो ।" नानी की दलीलें अपनी जगह सही थीं ,मगर मेरे  ज़ेहन में शाज़रा की  जादुई सूरत घूमा करती थी । नानी की निगाह में मैं फ़ितरतन खुराफ़ाती साबित हुई हूँ ,मुझे चैन से सोना बैठना रास नही आता  ,ज़रूर मुझपर किसी भटके हुए जिन्न का साया है । चुड़ैल वाली बात हम नही मानते क्योंकि चुड़ैल से मुझे लंबे नाख़ून बिखरे बाल और उल्टे पैरों वाली औरत का ख़्याल आता है जो कि काफी डरावना है ।

अपनी फ़ितरत से मजबूर होकर मुहल्ले की रशीदा ख़ाला से शाज़रा की मज़ीद जानकारी लेनी चाही । रशीदा ख़ाला अपने आप मे छोटी मोटी गूगल की अहमियत रखती हैं। उन्होंने बताया शाज़रा कि दादी जल्लाद सिफ़त औरत हैं ।", बहु और पोती पर ऐसे ऐसे ग़ज़ब ढाये कि ख़ुदा की पनाह । ऐसा भी सुना है पोती को कभी अच्छी ग़िज़ा नही खाने दीं ,उनका मानना था    दूध ,अंडा  खाने से जवानी जल्दी आती है लड़की बालिग़ होने लगती है । शाज़रा की अम्मी की तो ज़बान ही क़ैद कर रखी थी उन्होंने । अल्लाह माफ़ करे , इन वहशी लोगो के घर कौन शरीफ़ आदमी रिश्ता करेगा । "
ख़ैर , रशीदा ख़ाला की बात आई गयी हो गयी  । हम भी नानी के घर कब तक क़याम करते , सो तशरीफ़ का टोकरा एक पिंजरे से दूसरे पिंजरे में ट्रांसफर हो गया । हम वापस घर आ गए ।

वक्तन फोक्तन शाज़रा के बारे में उड़ती पड़ती खबरें मिला करतीं । क़ुदरत ने उस हसीन मुजस्सिमे को अपनी तमामतर तारीफों से नवाज़ा था । इसलिए जल्द ही उसका रिश्ता किसी अच्छे घराने में तै हो गया ,और इतना सुनने में आया कि उसका शौहर पुलिस डिपार्टमेंट में है । मैंने कहीं पढ़ा था ,"ज़्यादा ख़ूबसूरती भी बद्दुआ बन जाती है ।" अल्लाह का एहसान , इधर बीच फिऱ से मामू के यहाँ जाने का मौक़ा मिला । अक़ीके की दावत थी । हमारी मुमानी चलती फिरती प्रोडक्शन हाउस थीं । हर दो साल पे  बच्चा पैदा करना उनकी ज़िंदगी का अहम मक़सद था ।
बहरहाल दावत में रशीदा ख़ाला से मुलाक़ात हुई । रस्मन दुआ सलाम के बाद ख़ाला ने इधर उधर की जानकारी मुझ तक उंडेलनी शुरू कर दी ।बातों के दौरान ख़ाला ने कहा ,"बेचारी शाज़रा के साथ बड़ा बुरा हुआ  ,चेहरा ऐसा चमकदार और नसीब  कालिख़ से लिखवा कर आई है । माँ के घर दादी और बाप का ज़ुल्म , ससुराल में शराबी शौहर का ज़ुल्म "।

"हाए अल्लाह ख़ाला ! क्या कह रही हैं आप ??

सच कह रही हूँ । शाज़रा का शौहर एक एक पैसे के लिए मोहताज रखता है ,और मारता पीटता अलग से है ।"

उफ़, कोई नौकरी कर लेती शाज़रा ,कम से कम सुकून से ज़िन्दगी बसर होती ।"

अरे बेटी , कौन सी दुनिया मे जी रही हो ? बिना पढ़ाई लिखाई बिना हुनर के नौकरी कहाँ रख्खी पड़ी है , कि जिसको ज़रूरत लगी उठा ले ।"

रशीदा ख़ाला की बातें जारी थीं और मेरे ज़ेहन में आंधी चल रही थी ,लड़कियों को यूं बेबस मजबूर बना कर किसी मर्द के हवाले करके  ,माँ बाप कौन सा फ़र्ज़ अदा कर रहे होते हैं  ?? कौन पूछे ........


--- सबाहत आफ़रीन 

1 comment:

nazish ansari said...

कहानियों के कैरेक्टर मेरे मुहल्ले की शाहीन परवीन नसरीन के से लगते हैं। सबका वही दर्द। हर जगह वही दर्द। सिंपल सी बात सिम्पली कही गयी। लेकिन बांधे रखती है। ंंमुसलमानो ंंमें लड़कियों का आगे आना ही क्रान्ति है। लेखिका के लिये बहोत सी शुभकामनाएँ।