Sunday, October 13, 2019

सत्य के साथ मौलिक प्रयोगों के बिना कोई पीढ़ी अपने युद्ध नहीं जीत सकती



(सत्य के साथ मेरे प्रयोग)
-         --- सुजाता  

गांधी पर बात करते हुए दो ग़लत रास्ते पकड़ना सबसे आसान है। एक भक्ति, दूसरा निंदा। मैं सोचती हूँ कि महात्मा की पदवी उन्हें भली ही लगती होगी। उसका जो दबाव बाकियों पर था उससे ज़्यादा गांधी पर खुद रहा होगा। दक्षिण अफ्रीका में मिली प्रसिद्धि के बाद जब वे भारत आए तो एक देशव्यापी असहयोग आंदोलन चला पाना उनकी पहली बड़ी सफलता थी। एक ऐसा काम था यह जिसके बारे में उस वक़्त ज़्यादातर प्रभावशाली लोग शंका में थे। यह व्याव्हारिक भी है या नहीं? यही गांधी की सबसे बड़ी ताकत बनी। अव्यावहारिक को व्याव्हारिक बना देना। लोगों को अपने साथ ले आना। उन्हें नेतृत्व देना। उन्हें वह रास्ता दिखाना जो सत्ता के विरुद्ध सामूहिक संघर्ष के लिए शायद सबसे उपयुक्त था उस वक़्त। अहिंसा और सत्याग्रह। आपको पता है कि आपके पास ताकत नहीं है, ऐसे में सत्ताधारियों के भीतर वह उदारता और करुणा जगाना कि वह अपनी ताकत का सही इस्तेमाल करे इसके लिए सत्याग्रह और अहिंसा औजार भी थे, कवच भी।लेकिन गांधी आजीवन खूब आलोचनाओं के शिकार हुए। चिट्ठियों में उन्हें लोग जी भरकर गालियाँ देते थे। वे कहते थे गाली और प्रशंसा मेरे लिए एक ही है। मैं इसे समझ सकती हूँ। जब आपका उद्देश्य विराट होता है तब निंदा-प्रशंसा एक ही हो जाती है। बहुत फर्क नहीं पड़ता इस बात से कि उनके किसी कदम पर भक्त या निंदक क्या कह रहे हैं। इसी स्थितप्रज्ञता और महानता के आस-पास कहीं एक तानाशाह मन होता है जिसे बरजते रहना, परखते रहना चाहिए। इस मुद्दे पर आगे बाते करूंगी ही।     

इस घपले की शुरुआत में मैं उस बोदे आदमी को देखना चाहती हूँ जो अपनी असफलताओं से घबराया हुआ था, सबके सामने बोलने से डरता था, जैसा कि हममे से कोई भी हो सकता था, आज भी है। कमज़ोर और भगौड़े जैसे!  अब तक उसके संघर्ष निजी थे। चोरी करके, माँसाहार करके,सिगरेट पीकर उसने अंतत: पिता को सब चिट्ठी में लिख दिया और रोकर अपनी आत्मा को पवित्र पाया। दक्षिण अफ्रीका में पहली बार इस अच्छे मारवाड़ी परिवार के लड़के को यह समझ आया कि सामूहिक अस्मिता के सवालों से जूझे बिना वैयक्तिक संघर्षों का इतिहास की नज़र में कोई मोल नहीं है। आगे के सारे प्रयोगों  के बीज यहीं पड़े थे। उसने अपनी कमज़ोरियों पर विजय पाने के लिए एक कठिन और निराली राह चुनी। यह राह थी- ज़िद ! न टूटने वाली ज़िद। सविनय अवज्ञा। पहले दर्जे का टिकट लेकर तीसरे दर्जे में नहीं बैठूंगा भले ट्रेन से बाहर फेंक दिया जाए। स्टेशन पर रात गुज़ारनी पड़े।वे पलट के घूसा भी मार सकते थे। अदालत में मैं अपनी पगड़ी नहीं उतारूंगा। यह ज़िद गांधी के बहुत काम आई आगे और उनके परिवार की पीड़ा भी बनी।

दक्षिण अफ्रीका ने यह तय कर दिया था कि गांधी का जीवन अब सार्वजनिक जीवन ही हो सकता है। वे अकेले में, पत्नी-बच्चों के साथ अपने छोटे से संसार में खुश रह सकने वाले जीव नहीं थे। सार्वजनिक जीवन में उन्हें अपनी उपादेयता महसूस हुई तो यह एक लत बन गई। दक्षिण अफ्रीका में ही अहिंसा और सत्याग्रह जैसे महत्वपूर्ण औजार उनके हाथ लग चुके थे जिनके साथ और प्रयोग हिंदुस्तान में अभी किए जाने थे। यहाँ मज़ेदार यह है, और जिस मुख्य बिंदु पर मुझे आना ही है, ये दोनो औजार उन्होने स्त्रियों से प्राप्त किए थे। इसमें  संदेह नहीं। अपनी कमज़ोरियों और अक्षमताओं से उलझते हुए उनके लिए कस्तूरबा से निबटना आसान नहीं था। कस्तूरबा की हठ, असहयोग, सहनशीलता और उत्सर्ग उनके लिए एक पथ-प्रदर्शक बने। साथ ही काली औरतों का उनपर गहरा असर हुआ। स्त्रियों के भीतर अहिंसात्मक तरीकों से लड़ने और बात मनवाने, सहते जाने और त्याग करने की अदम्य क्षमता के विविध प्रयोग अभी हिंदुस्तान में किए जाने थे।


मेरी नज़र में इसका सबसे सुन्दर प्रयोग साम्प्रदायिकता के मुद्दों से निपटने में गांधी ने किया। नोआखली में जो हुआ उसे कोई गांधी ही सम्भव कर सकता था। इससे ज़्यादा दुख की बात क्या हो सकती है कि एक व्यक्ति जो हिंदुओं से मुसलमानों का पक्ष लेने के लिए और मुसलमानों से हिंदुओं का पक्ष लेने के लिए आजीवन गाली खाता रहा वह आज फिर से गालियाँ खा रहा है।


यह कोई नई बात नहीं थी। उन्नीसवीं सदी के समाज-सुधारकों को पढते हुए मैंने यही महसूस किया कि स्त्रियों को लेकर उनकी सोच में कोई नई बात, कोई क्रांतिकारिता नहीं थी। अपनी किताब इण्डियन विमेन में गेराल्डाइन फोर्ब्स लिखती हैं कि यूरोप की नज़र में भारत एक अत्यंत पिछ्ड़ा हुआ देश था क्योंकि यहाँ की स्त्रियों की दुर्दशा जैसी दुनिया में कहीं नहीं थी। बाल-विवाह, सती-प्रथा, जहालत, अशिक्षा, अंध-विश्वास, ऊंची मृत्यु-दर, विधवाओं की स्थिति तो अत्यंत शोचनीय थी। ऐसे में सुधारकों को अपने राष्ट्र की छवि सुधारने के लिए सबसे ज़रूरी लगा कि स्त्रियों को इस नरक से निकाला जाए। लेकिन इन सब सुधारों का अंतिम लक्ष्य एक अच्छी, कुशल, शिक्षित, संस्कारित गृहिणी बनाना ही था। संरचना से टकराने का काम तो औरतों को खुद ही करना था। ज्योतिबा और सावित्री बाई, पंडिता रमाबाई ने यह काम किया भी। लेकिन यह और मज़ेदार है कि बीसवीं सदी की शुरुआत में राष्ट्रीय आंदोलन से रमाबाई की आवाज़ गायब कर दी गई।  1922 तक उनके जीवित रहने के बावजूद। महज़ इसलिए कि वे हर स्तर पर संरचना से टकरा रही थीं। संरचना, जो पितृसत्तात्मक ही नहीं थी हिंदू भी थी और रमाबाई दलित से विवाह करके ईसाई हो चुकी थीं। ख़ैर।  

सबको साथ लेकर चलना गांधी की वह खूबी थी और राष्ट्रीय आंदोलन की विवशता भी कि वे स्त्रियों के लिए कोई क्रांतिकारी ज़मीन तैयार करके अपनी ताकत को कमज़ोर नहीं करा सकते थे। स्त्रियों को अपनी अस्मिता के प्रति सचेत होने देने का मामला बड़ा नाज़ुक मामला था। इससे बड़ा लक्ष्य गांधी के सामने था। मुझे दूधनाथ सिंह की कहानी माई का शोकगीत याद आती है। गांधी जी के आंदोलन में जी-जान से लगी माई जब एक दिन अपने गाँव की स्त्री को घर में पिटता देखती हैं तो बापू को चिट्ठी लिखती हैं – देश के गोरे राचछ्सों से आप लड़िए, मेरे लिए गाँव में ही बहुत काम है, यहाँ तो घर-घर में गोरे राच्छस भरे पड़े हैं।


तो गाँधी ने भारत की स्त्रियों के भीतर आत्मोत्सर्ग और सहनशीलता की भावना को चुनौती दी, और बावजूद इसके कि गांधी के भारत आने से पूर्व ही स्त्रियाँ सार्वजनिक जीवन और कामों में आ चुकी थी, उन्होंने स्त्रियों के बाहर निकलने के कारणों को वैधता दी और बड़ी संख्या में उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन के हिरावल दस्ते में शामिल कर लिया। वे लिखते हैं –“भारत में स्त्रियों ने पर्दे को फाड़ फेंका और राष्ट्र के लिए काम करने को आगे आई। उन्होंने देखा कि राष्ट्र उनसे महज़ घर की देखभाल के अलावा भी कुछ और चाहता है” इस तरह वे मामूली स्त्रियाँ भी जो सदियों के शोषण और गुलामी की वजह से आत्म-सम्मान खो बैठी थीं उनमें एक गर्व का भाव भरा। देश के लिए उनका होना भी मानी रखता है !


लेकिन स्त्रियों के साथ इस प्रयोग में कई सीमाएँ थीं। विचारों और कर्मों से जो पवित्र हैं वे स्त्रियाँ ही उनके अभियान का हिस्सा हो सकती थीं। स्त्रियों के साथ इस पवित्रता को जोड़ना एक हिंदू सवर्ण की नैतिकता के अलावा क्या था कि 1925 में बंगाल कॉन्ग्रेस द्वारा वेश्याओं को संगठित करने को लेकर वे उखड़ गए ? राधा कुमार अपनी किताब हिस्टरी ऑफ डूइंग में इस पर विस्तार से बात करती हैं।

गाँधी स्त्री होना चाहते थे। वे चाहते थे आश्रम के लोग उन्हें बाप नहीं माँ मानें। मनु गाँधी ने उन्हें माँ ही कहा है। एक तरह से यह प्रयोग था। वे मानते थे कि साधना से पुरुष स्त्रियों के गुण पा सकते हैं। अपने एक सहयोगी कृष्ण्चंद्र को एक पत्रमें वे लिखते हैं- ‘the idea is that a man, by becoming passionless, transforms himself into a woman, that is, he includes woman into himself’ स्त्रैण और परुष विशेषताओं का आना-जाना लगे रहना और दुनिया के तमाम लोगों में स्त्रैण-परुष का समान बँटवारा होना एक बराबरी का समाज बनाएगा। लेकिन यहाँ कुछ अलग बात है।  यहाँ दो बातें अजीब हैं। हम सब उनके ब्रह्मचर्य के प्रयोगों के वाकिफ़ हैं। लेकिन पहली बात, ‘पैशन्लेसनेस से स्त्रीत्व को व्याख्यायित करना दिक्कततलब है। अपनी किताब द फीमेल यूनक में जर्मेन ग्रीयर उसी प्रक्रिया को खोलकर बताती हैं जिसके ज़रिए स्त्री को बधिया बनाया जाता है, आवेगहीन, शमित किया जाता है और फिर मूल्य की तरह यह उसके चरित्र के साथ नत्थी कर दिया जाता है।


दूसरी बात, दोषहीन, निष्कलंक ब्रह्मचारियों (यानी जो मात्र संतानोतपत्ति के लिए संसर्ग करें) का समाज बनाने का मकसद क्या हो सकता है? हम जानते हैं कि गाँधी का सारा संघर्ष अपनी कमज़ोरियों के खिलाफ लड़ने से शुरु होता है। यह संघर्ष बड़ा होता जाता है तो समस्त नैसर्गिक मानवीय प्रकृति के खिलाफ एक युद्ध में तब्दील हो जाता है। भोजन के साथ किए प्रयोग, इलाज के तरीकों में उनके प्रयोग और ब्रह्मचर्य ! सभी में एक सी हठ कि मेरा रास्ता सही है। स्त्री-यौनिकता से यह भय पूरी दुनिया की भिन्न संस्कृतियों का जैसे ज़रूरी हिस्सा है। अकेले में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन आसान है। लेकिन स्त्री के करीब रहकर उसके कामुक प्रभाव से बच निकलना सच्चा संत ही कर सकता है। सबरीमाला के भगवान तक स्त्री की उपस्थिति से आक्रांत हैं। माया महाठगिनी, पाप का द्वार,नर्क का द्वार। ऐसे में उसे खुद भी पवित्र रहना चाहिए और पुरुष को भी रहने देना चाहिए। संसार की सेवा के लिए अविवाहित स्त्री जो ब्रह्मचर्य का पालन करती है उससे बेहतर कोई भी नहीं।  
          पिता को चिट्ठी लिखकर मोहनदास इतना तो जान गए थे कि जो बात छुपाई जाती है वह पाप है। छिपाने का अपराध-बोध आपको पवित्र नहीं रहने देगा। इसलिए ब्रह्मचर्य के सभी प्रयोगों पर उन्होंने स्वयम बात की। यह साहस श्लाघनीय है। हमारे बीच में से कितने पुरुष स्वीकार कर सकते हैं कि बसों, सार्वजनिक जगहों पर स्त्रियों के बीच वे क्या-क्या महसूस करते रहे? उनके और प्रेमा कण्टक या बाकी के सहयोगियों के बीच का पत्राचार इस साहस का प्रमाण है। लेकिन जितना गांधी अपने अनुभवों की कहते हैं उन स्त्री-सहयोगियों की भावनाओं की एकदम नहीं बताते जो इन प्रयोगों में साथ थीं। उनका मह्ज़ गिनी पिग बना दिया जाना अक्षम्य है। आश्रम की तमाम स्त्री-सहयोगियों के बीच ईर्ष्या के कई सबूत मिलते हैं। तमाम आलोचनाओं के बाद भी गांधी कहते हैं कि उनकी सहयोगियों की सहमतिहै तो फिर बाकियों को क्या दिक्कत है? यहाँ सुचेता क्रपलानी के प्रेम विवाह की बात याद करनी चाहिए। गाँधी प्रेम विवाह और अंतरजातीय विवाहों के खिलाफ थे। शायद पूछा भी किसी ने कि जब दो लोग राज़ी हैं तो बाकियों को दिक्कत क्यों? इन तमाम वैचारिक विरोधाभासों पर बात करने से नीलिमा डालमिया तक बच निकलीं हैं जिन्होंने अपनी किताब कसूरबा की रहस्यमय दायरी में तथ्यों के आधारपर कस्तूरबाई की दृष्टि से एक फिक्शनल किताब लिखी है। 


मैं वापस लौटती हूँ राष्ट्रीय आंदोलन में भारतीय स्त्रीत्व के साथ उनके प्रयोग पर। तो स्त्री को माता बनाया गया और माता को पीड़िता। भारत माता का बिम्ब भी यही था। दुर्गा और काली। सरोजिनी नायडू अपने एक भाषण में देश के मर्दों को सम्बोधित करते हुए कहती हैं कि पालना झुलाने वाले हाथों ने आज आज़ादी की मशाल थाम ली है, अब तो शर्म करो भाइयों !

कुल मिलाकर गाँधीवादी आंदोलन में स्त्रियों की हर तरह की हिस्सेदारी ने उन्हें इस तरह भ्रमित किया कि उन्हें अपना असल शत्रु- पितृसत्ता नज़र ही नहीं आई। वे तो एक पवित्र उद्देश्य में अपने भाइयों, पतियों, पिताओं का साथ देने के लिए पर्दे को फेंककर दुर्गा और काली बन सामने आ गई थीं। सबसे पहला झटका उन्हें तब लगा जब हिंदू कोड बिल के समर्थन में वही हिंदू पुरुष खड़े मिले जिनके कंधे से कंधा मिलाकर वे आज़ादी के लिए प्राणोत्सर्ग करने निकली थीं। इस पर विस्तार से बात हो सकती है। बल्कि उन तमाम बिंदुओं पर जिन्हें मैंने अपने वक्तव्य में उठाया है।
यह भ्रमावस्था लम्बी चलती है। लगभग 1970 तक। यही हमारे राष्ट्रीय आंदोलन का स्वरूप था। आज हम देखते हैं कि उन्नीसवीं सदी के तमाम सुधारकों और राष्ट्रीय आंदोलन के महान नेताओं गोखले, तिलक, पटेल, जस्टिस रानाडे जैसे तमाम लोगों की धरोहर हिंदू राष्ट्र बनाने के काम आ रही है।      

एक बात साफ है कि गहरे अध्ययन के बिना इस व्यक्ति के बारे में कुछ भी ठसक से कहना निरी मूर्खता है और तमाम अध्ययन के बाद भी इसके बारे में बिना एक पक्ष पकड़े कुछ कहना मुश्किल है।
इतना ज़रूर है कि निजी और सार्वजनिक का भेद जिस तरह यह अपने जीवन में मिटा पाया वह असाधारण है। यह भी कि उसकी क़ीमत आप कभी अकेले नहीं चुकाते। गाँधी ने भी अकेले नहीं चुकाई गाँधी होने की क़ीमत। यह कोलेटरल डैमेज सम्भवतः सबसे ज़्यादा स्त्रियों के पल्ले पड़ा।
असल समस्या अब यह है कि सावरकर और गोडसे जैसों की मौजूदगी की क़ीमत चुकाना एक समाज को इतना भारी और महँगा पड़ता है कि पूरे इतिहास में गाँधी को एक ही बार पाया जा सकता था।

अब, सबको साथ लेकर चलने वाला भी गाँधी नहीं हो सकता, लेकिन गाँधी के रास्ते से गुज़रे बिना यह संभव भी नहीं।

दरअसल, मौलिकता के बिना कोई पीढ़ी अपने युद्ध नहीं जीत सकती। सत्य के साथ उसे अपने प्रयोग करने होंगे।



-रज़ा फाउंडेशन द्वारा महात्मा गाँधी की बीज पुस्तकों पर आधारित युवा-2019कार्यक्रम में दिया गया मेरा वक्तव्य

यह महज़ थप्पड़ की गूँज नहीं थी


-     ---- शिखा परी

यह मह्ज़ थप्पड़ की गूँज नहीं थी। 

 उस दिन जब स्कूल से वापिस आयी तो ताऊजी छोटू के लिए एक बड़ा सा एरोप्लेन लाये थे और मेरे लिए लाल छोटी - छोटी चूड़ियाँ मैंने पूछा भी कि मेरे लिए एरोप्लेन क्यों नहीं लाये तो बोले तुम उड़ा नहीं पाओगी।मुझे सुनके बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।
लड़की और लड़का की स्पेलिंग जब टीचर ने सिखाई थी तब ये नहीं सिखाया था कि नहीं, नो शब्द भी जुड़ते हैं लड़की के साथ ये फ़र्क किसी डिक्शनरी में भी मुझे नहीं दिखाई दिया।
आज ताऊजी ने मुझे एरोप्लेन न देकर ये भी बताया कि मैं नहीं उड़ा पाऊंगी इसे,मैंने कुछ नहीं कहा और चूड़ियाँ भी उन्हें वापिस कर दी।
मैंने बहुत सारी किताबों में ढूँढा कि छोटू और मुझमें क्या फ़र्क है?माँ भी बहला देती थी ,कुछ बिना कहे जब थोड़ी और बड़ी हुई तो पिताजी को दुकान खाना देने छोटू जाता था वो हाफ पेंट पहनकर दुकान चला जाता फिर पार्क में खेलकर आता देर रात, मैं घर में भी हाफ पैंट पहनती तो दादी गुस्सा होने लगती थी, मैं दुकान नहीं जा सकती थी,थोड़ी और बड़ी हुई तो अचार खाने से माँ और दादी ने रोका।
मुझे पता नहीं था कि लड़की होना और उसका बड़ा होना लोगों को अखरता है . बगल के पवन भैया  मुझे अजीब नज़रो से देखते थे एक दो बार छाती के पास भी हाथ ले गए तो मैं सहम गई ,मुझे समझ नहीं आया कि पवन भैया इतने कैसे बदल गए.इन्हें मेरे साथ ही खेलते देखा है लेकिन सीने के पास हाथ क्यों ले जाने लगे हैं मेरे ,हाँ मेरे सीने के पास. मेरा सीना उभरा था. थोड़ा मुझे समझ नहीं आया सीना तो इनके पास भी है फिर ये खुद के सीने को क्यों नहीं स्पर्श करते?
मैं उभरे सीने में उलझ गई थी, सोचा दादी से कहूँगी तो वो मेरा खेलना भी बंद करवा देंगी।छोटू से कहूँ तो क्या वो समझेगा?
हिम्मत करके माँ से कहा मुश्किल से, वो गुस्से से लाल थी पवन की माँ से उस दिन माँ ने बहुत लड़ाई की ।अब मैं और छोटू दोनों पवन भैया के साथ नहीं खेलते थे।माँ से कई बार पूछा कि ऐसा क्यों हुआ तो माँ ने कुछ नहीं बताया मुझे बोली लड़कियों के साथ होता है ऐसा, बेटी इसलिए तुझे मना किया था हाफ पैंट में खेलने मत जाया कर।
ये भेड़िये सी भूखी दुनिया हम लड़कियों के लिए कितनी भयानक थी समझ नहीं आती थी,दुनिया तो लड़कों के लिए भयंकर हो सकती थी, पर लड़कियों को ही ठीक से रहने के लिए कहा जाता है।मैं अब सातवीं कक्षा में पढ़ रही थी कि एक दिन मेरी सहेली की स्कर्ट पे मैंने खून से लतपथ धब्बे देखे मेरी चीख़ निकल गई।मेरी चीख़ अकेली नहीं थी ,उस चीख़ में मेरी सहेली की चीख़ और तेज़ थी जिसके स्कर्ट पे लाल धब्बे थे, वो ज़ोर ज़ोर से रो रही थी हम सब उसे देख रहे थे ।हम सबको लगा उसे कैंसर हो गया ।टीचर ने शांत रहने को बोला लड़कों को क्लास से बाहर भेजा और उसकी मम्मी को बुलाकर उसे घर भेज दिया ।मैंने मम्मी से घर आके बताया दादी ने सुन लिया बोली इसको गर्म चीजें बिल्कुल न दो ,छोटू को दादी गोंद के लड्डू खिलाती थी मैं माँगती तो आधा देकर भगा देती थी।मैंने माँ से शिकायत की पर दादी तो लीडर थी घर की माँ की कहाँ हिम्मत होती थी, माँ मुझे ही चुप कराती थी।
राखी पर हमेशा बुआ छोटू को सोने का लॉकेट देती थी, मुझे 200 रुपए. मैं गुस्सा हो जाती थी पर किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता था।छोटू रूठ जाता तो पिताजी उसके लिए समोसे लाते थे।

फिर वह दिन भी आया जब मेरी खुद की स्कर्ट पे लाल धब्बे थे। मैं अब समझ गई थी कि ये मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई है लड़की और लड़के में ये एक ख़ास फ़र्क को खून के धब्बे अलग करते थे।मेरी बचपन की सहेली चम्पा मुझसे अक्सर मिलने आती थी मैं और चम्पा ढेर सारी बातें करते थे, नवीं कक्षा में पहुँचे तो वो अक्सर आती थी, एक दिन छोटू को मैंने चम्पा को हाथ लगाते खुद देखा मुझे तुरंत पवन भैया याद आ गए मैंने छोटू के थप्पड़ रसीद दिया, उस दिन पिताजी ने घर आकर मुझे बहुत सारी बातें सुनाई,मैं कमरा बन्द करके रोती रही दो दिन तक ।मैं साईकल से स्कूल जाना चाहती थी पर जानती थी पिताजी नहीं मानेंगे ,पिताजी ने छोटू के साथ रिक्शे से जाने के लिए हिदायत दी मैंने बहुत मिन्नतें की पर पिताजी नहीं माने ।


ईस्टर एग गर्ल शीर्षक यह चित्र इंटरनेट से साभार 





मैं अब समझ गई थी कि ये मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई है लड़की और लड़के में ये एक ख़ास फ़र्क को खून के धब्बे अलग करते थे।






उस दिन गाँव से ताऊजी आये थे बोले बहुत मोटी हो रही हो, कुछ कम खाया करो मैं सोचने भी लगी कि घी के लड्डू, दाल में घी डालके तो छोटू खाता है मैं तो वो भी नहीं फिर मैं अपने बढ़ते वज़न के लिए ज़्यादा कैसे खाने लगी?
चम्पा से मेरा मिलना अब बन्द हो गया था, चम्पा ने मुझसे माफी मांगी उसे लगा उसकी वजह से छोटू और पिताजी से मेरी लड़ाई हो गई पर ऐसा नहीं था। छोटू को थप्पड़ रसीद के मैंने अपने दिल को ठंडक पहुंचाई थी, ऐसा लगा जैसे सारे पवन भैयाओं को जड़ा था मैंने वह थप्पड़। चम्पा को समझाया।
सभी सहेलियाँ पिकनिक के लिए बाहर घूमने जा रही थी, मैंने पिताजी से मुश्किलों से आग्रह किया कि वो मुझे बाहर जाने दे ये इंटर की आखिरी पिकनिक थी हम सब दोस्त इसके बाद कभी नहीं मिलते. संयोग से छोटू की कक्षा भी हमारे साथ उसी पिकनिक में गई।पिकनिक पे हमने बहुत मस्ती की खूब मजे मारे, लेकिन एक दिन जिसदिन वापिस आना था ,उसी दिन शाम को चम्पा के साथ छोटू ज़बरदस्ती करते हुए पकड़ा गया मैं तुरंत चम्पा के साथ खड़ी हो गई।
छोटू नफरत भरी आँखों से मुझे देख रहा था, मैंने चम्पा को पूरा सपोर्ट किया और प्रिंसीपल से छोटू को सख्त से सख्त सज़ा देने की रिक्वेस्ट भी की।
पिताजी ने घर आकर मुझे बहुत बातें सुनाई, दादी ने कहा एक ही भाई है तेरा कौन पूछेगा तुझे भाई की दुश्मन बन जाएगी तो ?
मुझे समझ नहीं आया कि छोटू ने चम्पा के साथ जो किया उसके लिए हर सज़ा कम थी लेकिन पिताजी और दादी लड़की लड़का की उस मात्रा को समझा रहे थे मुझे।मैं अब बाग़ी हो चुकी थी ,मैंने उस दिन पहली बार पिताजी और दादी से बहस की ,दादी तुरंत बोली पढ़ना बेकार था इस लड़की का।मैंने समझ लिया था कि अब हर चीज़ जो एक लड़की करती है वो बुरी ही होती है।छोटू मुझसे बहुत बुरी तरह नाराज़ हो गया था।
मैं बाहर पढ़ना चाहती थी पर फिर से घर में अपनी एक लड़ाई लड़ी।बाहर पढ़ने गई नए दोस्त मिले और मुझे अपना करीबी दोस्त भी मिला हमने शादी के ढेर सारे सपने सजा लिए थे,लेकिन उससे पहले ही पिताजी ने छोटू के कहने पर एक जगह मेरी शादी तय कर दी।मैंने मिन्नतें की लेकिन पिताजी को न नहीं कर पाई।शादी हुई और वो सब हुआ जो एक स्त्री जिसके लिए जन्म लेती है मैं माँ बनने वाली थी मेरे पति अच्छे थे या नहीं मुझे समझ नहीं आता था उन्हें मेरा कहीं आना जाना बात करना पसंद नहीं था।मैंने एक बेटी को जन्म दिया, मैं बहुत खुश थी लेकिन मेरी सास और पति उतने खुश नहीं हुए।पति मुझसे रात को जानवरों जैसा बर्ताव करते थे, मैं चुपचाप अपने शरीर पे निशान बनवाती, माँ से कहती तो वो बोलती बेटा किस्मत है क्या कर सकते हैं धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा।
धीरे धीरे मैं अपनी बेटी को बढ़ते देखने लगी, मैं फिर से गर्भवती थी ,शरीर जवाब देने लगा था अब दूसरा बच्चा बच नहीं पाया।मेरे पति की नफ़रत और सास का रूखापन दोनों का पैमाना बढ़ गया था।मैं एक अच्छी औरत नहीं, लड़की को जन्म देने से क्या फ़ायदा?वो वंश नहीं चला पाएगी
ये सारे ताने दिल में छेद कर रहे थे लगातार।
मेरी बेटी शुरू से दादी के रूखेपन को जीती हुई बड़ी होती गई, जेठ के बेटे को मेरे पति खूब प्यार करते और मेरी बेटी से हमेशा कहते भाई है तेरा माना कर उसे।मुझे अपनी और छोटू की उस लड़ाई, खींच तान याद आने लगी।मैंने ठान लिया कि मेरी बेटी कोई मामूली बेटी नहीं ये साबित कर के रहूँगी।
मेरी बेटी के अंदर एक आग थी वही आग जो मेरे अंदर सुलगती रहती थी।

वह  दिन रात पढ़ती और इतना पढ़ती कि मुझे उससे कहना होता कि बस कर।पर उसके अंदर तो जैसे ज्वाला थी बहुत तेज ज्वाला।उस साल आई आई टी में सेलेक्शन हुआ मेरी बेटी का।मैं खुशी से पागल हो गई थी।पर अभी भी मेरे पति खुश नहीं थे,उनका मानना था क्या कर लेगी ?इतना पढ़के भी। उसकी दादी तो और सुलग गयीं थी।
उसका दाखिला हुआ।फिर इंजीनियरिंग। मेरी बेटी ने इसरो का फॉर्म भरने और चुने जाकर हम सब को चौंका दिया।मैं रोने लगी ,खुशी के मारे पागल हो गई थी। मन ही मन उसे चाँद पर भेजने की तैयारी कर ली।
 उसके दीक्षांत समारोह में मेरे अपने ताऊजी भी शामिल होने आए,मेरे बगल में बैठे सकुचाते हुए जैसे कुछ बोले बेटा तुझे याद है मैंने तुझे एक बार एरोप्लाने न देकर चूड़ियाँ दी थी... वे आगे कुछ और भी कहना चाहते थे  लेकिन  मेरे लिए वह सब सुनना अब कोई मानी नहीं रखता था। मैंने बिना आगे सुने खुद बेटी के साथ चल दी स्टेज पर।
हम माँ-बेटी मंच से जो जवाब दे रहे थे उसकी गूंज न सिर्फ ताऊजी को अवाक कर गई बल्कि आगे की कई पीढियों तक सुनाई देने वाली थी।




शिखा परी , कानपुर उ. प्र. से हैं । इंजीनियरिंग और जर्नलिज़म करने के बाद लिखने में मन रमता गया। पिछले 9 साल से ब्लॉगिंग में सक्रिय। स्त्री-विषयक लेखन के लिए जानी जाती हैं। दो उपन्यास लिख चुकी हैं। देश की विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में लिखती रहती हैं।

Friday, September 27, 2019

और मैं आगे बढ़ गई


प्रियंका ओम
एक झटके के साथ ट्रेन अपनी जगह से हिली थीलेकिन मैं अब भी अपने सामान के साथ अस्त व्यस्त खड़ी थी। कंधे पर रेयन के खिलौने और खाने  से भरा बैगऔर कमर पर ख़ुद रेयन। मैंने उसे किसी ज़िद्दी माँ की तरह कस के जकड़ा हुआ थाऔर वो आम बच्चे की तरह मेरी पकड़ से छूटने की कोशिश कर रहा था।
कितना मुश्किल होता है छोटे बच्चे के साथ एक औरत का अकेले स़फर करनालेकिन बहुत बार हमें वो करना पड़ता हैजो हम करना नहीं चाहते हैं।
मेरे साथ भी यही हुआ था। ज़िन्दगी की तमाम भागमभाग से थककर एक ह़फ्ते के सुकून के लिए मम्मी के पास आई थीऔर अब वापस जाते हुए जमशेदपुर बहुत बुरा लग रहा था। यहाँ एयरपोर्ट तो हैलेकिन उड़ानें नहीं हैंऔर फ़्लाइट से जाने के लिये पहले जमशेदपुर से तीन-साढ़ेतीन घंटे तक रोड यात्रा कर राँचीफिर पटना होकर फ़्लाइटदिल्लीदेर शाम तक पहुँचती है। कुल मिलाकर पूरा दिन रास्ते मेंऔर उसपे भी आराम नहीं।
सच तो ये है कि ट्रेन में स़फर करने जैसा आराम किसी में नहींऊपर से जैसे ही ट्रेन चलती हैरेयान को नींद आ जाती है। इसलिये मैं जमशेदपुर आने-जाने के लिए ट्रेन पसंद करती हूँऔर हमेशा की तरह इस बार भी टिकटभुवनेश्वर राजधानी के ‘टू सीटर’ कम्पार्टमेंट में ही मिला थाजो इस बार अकेले होने के कारण समस्या बन गई। बंद कम्पार्टमेंट में किसी अजनबी के साथ... कोई पुरुष हुआ तोमन में कैसे-कैसे डरावने खयाल आ रहे थे। आये दिन महिलाओं के साथ होने वाली घटनाओं की याद से मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैंने अपनी सीट बदलवाने की सोची और टीटीई के इंतजार में खड़ी रही।
अक्सर जिस बात से आप डरते हैंआपके साथ वही हो जाता है। टीटीई के आने से पहलेबहुत तेजी से एक थका हुआ आदमी अंदर दाखिल हुआउसकी ट्रेन छूटते-छूटते बची थी शायद। ऐसे व़क्त में इंसान सि़र्फ अपनी जगह पाने की जल्दी में होता है... और इस जल्दी में वो मुझे नहीं देख पायालेकिन मैं तो उसे देखते ही निश्चिन्त हो गई।
रेयान को बिठाकर मैं भी अपना पैर मोड़अपनी सीट पर आराम से बैठ गई।
वो आदित्य थामेरे बचपन का संसार। असल में ये कहानी उसी से शुरू होती है... लेकिन ज़िन्दगी की कहानी में किरदार बदलते रहते हैं। मेरी ज़िन्दगी की कहानी का अहम् किरदार भी बदल गया था।
आदित्य के हाथ में एक लैपटॉप बैग के अतिरिक्तएक बड़ा सा ट्रैवलिंग बैग थाजिसे सामान रखने की जगह पर रखकर उसने मेरी ओर सर उठा के देखाक्योंकि मेरा बैग अब भी सामने पड़ा था।
‘‘वनिता तुम!’’ उसकी आँखें ज़रा से आश्चर्य से फैल गई थीं।
‘‘कैसे हो आदित्य?’’
‘‘अच्छा हूँतुम कैसी हो?’’
‘‘मैं भी अच्छी हूँ।’’
‘‘थैंक गॉड आदित्यतुम होअब मुझे अपनी जगह बदलने की जरूरत नहीं।’’ मैंने बहुत ख़ुश होकर कहा थीलेकिन हमेशा की तरह मेरी ख़ुशी पर उसने तुरंत ही अपनी कड़वाहट फेर दी।
‘‘सब कुछ तो तुमने ही बदला था वनितामैं तो हमेशा से वैसा ही रहा हूँतुम मुझे छोड़कर ज़िन्दगी में आगे बढ़ गई थींलेकिन मैं वहीं रह गया जहाँ तुम छोड़कर गई थींभावनात्मक रूप से अकेला... लेकिन तुम्हें इससे क्या... खैरक्या मैं तुम्हारे बैग्स भी रख दूँ?’’
मन तो किया कह दूँ, छोड़ा कहाँ था, दरअसल आजाद हुई थी लेकिन औपचारिकता बस,‘‘अगर तुम्हें कोई तकलीफ न हो तो " ही कहा |
‘‘तुम्हारे लिये कुछ भी करके मुझे ख़ुशी ही होती है वनिता।’’ कहते हुए उसने मेरे बैग्स भी अंदर रख दिए।
ब्लू जीन्स और लेमन येलो फुल स्लीव शर्ट में आदित्य आज भी उतना ही हैंडसम लग रहा थाहाँ उसके घने बालों की मोटी-मोटी लटों से सफेदी झाँकने लगी थीजिसका कारण धूप नहीं था।
बाल अगर व़क्त के साथ स़फेद हों तो आम बात होती हैलेकिन अगर व़क्त से पहले स़फेद हों तो कोई और बात होती है।
अचानक ही मेरे फ़ोन की घंटी बजने लगी। ऊपर nick फ़्लैश हो रहा था।
मैंने फोन उठाते ही कहा, ‘‘मैं आपको कॉल करने ही वाली थी।’’
‘‘इसे ही तो टेलीपैथी कहते हैं नीता।’’ निक बहुत खुश हो रहा था।
वैसे तो आदित्य ऊपर अपनी सीट पर चला गयालेकिन मैं उसकी उपस्थिति को ऩजरअंदा़ज नहीं कर पा रही थीइसलिए सि़र्फ हम्म ही कहा।
‘‘मैं कल एक हफ्ते बाद आपको देखूँगा!’’ निक ने कहातो मैंने कहा,- ‘‘और मैं भी आपको।’’
हाँ।
‘‘अच्छा अब रखोकल तो मिल ही रहे हैं।’’ मैं अब भी असहज थीऔर निक समझ गया था।
‘‘आप हमेशा दूसरों के सामने बात करते हुए नर्वस फील करती हो।’’
‘‘हाँ जीआप तो जानते ही हो’’
‘‘ठीक हैसेफ जर्नीकल तो मिल ही रहे हैं।’’
‘‘हम्म बाय...’’ कहकर मैंने फ़ोन रखना चाहालेकिन रेयान पापा पापा कहकर मेरा हाथ खींच रहा था। मैंने उसे फ़ोन दे दियाक्योंकि दो पुरुष आपस में ज्यादा देर तक बातें नहीं करते हैं इसलिये रेयान ने फोन रखकर अपने ब्लॉक बुक से खेलना शुरू कर दिया। अचानक ही उसने कहा, ‘‘मम्मा! ये ट्रेन है, aeroplane नहीं है।’’ शायद उसने अपने ब्लॉक बुक में A फॉर aeroplane की पिक्चर देखी थी।
‘‘हाँ बेटा ये ट्रेन है।’’
‘‘मम्मा मुझे ट्रेन से उतरकर पापा के पास जाना है।’’
‘‘अभी नहीं उतर सकतेक्यूँकि ट्रेन चल रही हैकल दिल्ली में रुकेगी तब उतरेंगे।’’
‘‘नहीं मुझे तो अभी उतरना हैअभी पापा के पास जाना है।’’ कहकर वो रोने लगा था। निक से बात करने के बादवो उसे और ज़्यादा मिस करने लगा था।
आमतौर पर ऐसा ही होता हैकि हम जिसे मिस करते हैंउससे बात करने के बाद उसे और ज़्यादा मिस करने लगते है। मैं भी निक को बहुत मिस कर रही थी।
‘‘रोना बंद करोनहीं तो ऊपर जो अंकल हैं वो तुम्हें मारेंगेअंकल बहुत ग़ुस्से वाले हैं।’’ मैंने उसे डरायाऔर वो डर भी गया।
असल में रेयान को अंकल्स से एक ख़ास क़िस्म का डर हैऔर मैंने उसके डर का फ़ायदा स्थिति को सँभालने में किया था।
हालाँकि मैंने ये सब धीरे-धीरे फुसफुसाकर कहा थाताकि आदित्य न सुनेलेकिन उसका कान शायद हमारी ओर ही थाइसलिये ऊपर से ही कहा, ‘‘नहीं बेटाअंकल बच्चों को नहीं मारतेबल्कि किसी को नहीं मारते।’’
‘‘ओहतुमने सुन लिया... मा़फ करनामैंने सि़र्फ इसे डराने के लिए कहा था।
‘‘कोई बात नहांअगले stoppage पर मैं इसे नीचे घुमा लाऊँगालेकिन उसके पहले दोस्ती कर लूँ।’’ कहते हुए वो मेरी सीट पर आकर बैठ गयाठीक मेरे ब़गल मेंक्यूँकि रेयान को मैंने खिड़की की तऱफ बिठाया था।
‘‘हेलो बेटा! आपका नाम क्या है?’’ उसने रेयान से पूछा।
मैंने रेयान को हम दोनों के बीच बिठाते हुए कहा, ‘रेयान। क्यूँकि मैं जानती थी वो जवाब नहीं देगाअजनबियों से मैंने उसे डराकर रखा था।
‘‘बहुत प्यारा नाम हैज़रूर निकेतन ने ही रखा होगा।’’
उसका कटाक्ष समझने के बावजूद मैं किसी तरह की कड़वाहट नहीं घोलना चाहती थीइसलिये सि़र्फ शुक्रिया कहा।
स्वकेंद्रित लोग अपनी सहूलियत से अपनी सोच बदलते हैं। जब मैं उसके साथ थी तो कमतर थीऔर अबजब निकेतन के साथ हूँ तो बेहतर हूँ।
अनुप्रिया का रेखांकन 

खैर... रेयान थोड़ी देर में ही उसके साथ घुलमिल गया और खेलने लगा। आदित्य को शुरू से ही बच्चे बहुत अच्छे लगते थे। बच्चे बहुत जल्दी उसके हो जाते हैं... यही कारण था कि मुहल्ले के सभी बच्चे उसके दीवाने थेऔर वो उन सबका फेव भैया।
ट्रेन की गति धीमी हो गई थीशायद कोई स्टेशन आने वाला था। ‘‘मैं रेयान को लेकर नीचे जा रहा हूँ।’’ आदित्य ने कहातो मैंने ख़यालों से निकलकर चौंकते हुए कहा ‘‘शुक्रिया आदित्य!’’
‘‘शुक्रिया क्यूँ?’’
‘‘मेरी और रेयान की मदद करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया।’’
‘‘शुक्रिया की ज़रूरत नहीतुम्हें पता है न बच्चे मुझे बहुत पसंद हैं।’’
तुम्हारे कितने बच्चे हैंमैं पूछना चाहती थीलेकिन शायद ये समय उचित नहीं था।
‘‘तुम्हें कुछ चाहिये?’’ जाते-जाते उसने मुझसे पूछा।
‘‘नहीं नहींमुझे कुछ नहीं चाहिये।’’
असल में मुझे व़क्त चाहिए थाऔर वो मिल गया था। मैंने तुरंत निकेतन को फ़ोन किया।
उधर से आवा़ज आई, ‘‘मुझे मिस कर रही हो?'' 
‘‘हाँबहुत।’’
‘‘कल मैंने sick leave लिया है।’’
‘‘क्या हुआबताया क्यूँ नहीं?’’
‘‘क्या बताताजब आपको पता है, I am love sick.’’
निकेतन से बात करते हुए मेरी आँखें बंद हो गई थींमैं उसे बिलकुल अपने पास महसूस कर रही थी। कुछ पलों में सारी दूरियाँ मिटने वाली थींमैं उसके सीने से लगकर उसकी और अपनी धड़कन एक करने वाली थीकि फ़ोन कट गया।
उस व़क्त फ़ोन कटना बहुत असहनीय थाऐसा लगाशरीर से किसी ने ख़ून निचोड़ लिया हो। फिर से फ़ोन लगाने वाली थीकि सामने से आदित्यरेयान के साथ आता दिखाई दिया।
ट्रेन ने फिर से गति पकड़ ली थीऔर मुझे पता भी नहीं चला।
रेयान के हाथ में ढेर सारे चिप्स के पैकेट्स थे।
‘‘अरेइतने चिप्स क्यूँ लेकर आयेमैं तो पहले से ही बहुत सारा लेकर चली थी।’’
‘‘बच्चों के लिए कितना भी लेकर चलोकम होता हैये तुम्हारे लिए।’’ कहते हुए उसने एक बड़ा सा पैकेट मुझे दिया।
‘‘शुक्रिया आदित्यलेकिन मैं नहीं खाती।’’
‘‘पहले तो बहुत खाती थी!’’
‘‘हाँलेकिन अब डर लगता है कि मोटी हो जाऊँगी।’’
‘‘खा लोबहुत pathetic लग रही हो।’’
‘‘पथेटिक तो मैं पहले भी लगती थीजब तुम मुझे रो़ज चिप्स खिलाते थे।’’
आदित्य सर झुकाकर बैठ गया था। शायद उसे मेरा जवाब बहुत कड़वा लगा था। सच हमेशा कड़वा ही होता है।
मैं जवाब नहीं देना चाहती थीलेकिन कई बार जवाब नहीं देने पर सामने वाले को लगता हैउसने जो किया वो सही कियाऔर वो और भी प्रोत्साहित होता है।
लेकिन मुझमें और आदित्य में बाहरी रंग रूप के अतिरिक्त कई और विषमताएँ थीं। आदित्य को अपनी ग़लती का एहसास कभी नहीं होता थाजबकि मुझे ग़लती करने के बाद ख़ुद ग़लती का एहसास हो जाता था।
‘‘घर में सब कैसे हैंमैंने फिर से बात शुरू की थीक्यूँकि माहौल में घुली हुई उदासीमेरे आरामदायक स़फर को बोझिल बना रही थी।
‘‘सब अच्छे हैं।’’
‘‘अनुज क्या कर रहा है?’’
‘‘वो विप्रो में है बैंगलोर में।’’
‘‘और तुम्हारे बीवी बच्चे।’’
‘‘मैंने शादी नहीं की।’’ कहते हुए उसने मुझे कुछ ऐसी ऩजरों से देखाजैसे कह रहा हो, ‘‘अब ये मत पूछना क्यूँ!''
और मैंने पूछा भी नहींमैंने उसकी आँखों के आदेश का पालन किया।
इस सबके बीच रेयान बिलकुल चुप थाउसे नींद आ रही थी।
‘‘चलो खाना खा लेते हैं; it's dinner time’’
‘‘मैं अपना डब्बा लेकर आता हूँ।’’ कहकरआदित्य ऊपर चला गयातब तक मैंने प्लेट लगा लिया।
आदित्य का डब्बा खुलते ही यादों के स्वादिष्ट पकवान ललचाने लगे। लालन के हाथ का बना खानाप्यार और स्वाद से भरा हुआ।
वैसे तो बच्चों को दुनिया में अपनी माँ के हाथ का खाना ही अच्छा लगता हैलेकिन मुझे मम्मी से ज़्यादा लालन के हाथ का खाना अच्छा लगता थाक्यूँकि वो भी माँ थी इसलिये।
लालन मीठे ताने भी दिया करती थी, ‘‘बहुत चालाक है ये लड़कीअच्छा-अच्छा कहकरबाद में भी मुझसे ही खाना बनवाएगी।’’
हम दोनों चुपचाप एक दूसरे का खाना शेयर करके खा रहे थे... ठीक वैसे हीजैसे बचपन में स्कूल में लंच शेयर करते थे। अगर रेयान को हर बाइट के साथ तुरंत तैयार की गई कहानी नहीं सुना रही होतीतो शायद हम दोनों के बीच की पथरीली ख़ामोशी पहाड़ों सी हठी हो गई होती।
रेयान खाना खाकर सो चुका था। अचानक ही आदित्य ने कहा ‘‘तुम बिलकुल अपनी मम्मी जैसी होतुम्हारे हाथ का खाना भी उतना ही स्वादिष्ट है।’’
‘‘तुम्हें मेरी मम्मी याद हैं?’’
‘‘मैं आसानी से लोगों को नहीं भूलता वाणीजैसे तुम भूल जाती हो।’’
वो आज भी बिलकुल वैसा थाजैसा कई साल पहलेज़रा भी नहीं बदला था। उसके ताने चुभ रहे थे मेरे दिल की गहराइयों में। मुझे वहाँ दर्द हो रहा थाजहाँ निकेतन रहता है। मैंने दर्द कम करने के लिये सोते हुए रेयान की तऱफ देखा।
रेयानबिलकुल अपने पापा पर गया है। कई बार मुझे लगता हैजैसे वो निकेतन का मिनियेचर है... छोटा सा निकेतन। बोनसाई निकेतन को देखकर मेरा मूड अच्छा हो गया। मूड अच्छा होते ही मुझे चाय पीने का ख़याल आयाजो मैं अपने साथ लेकर आई थी।
‘‘चाय पियोगे?’’
‘‘अभी नहीं मिलेगीअगले स्टेशन पर लाता हूँ।’’ 
‘‘मैं लेकर आई हूँ।’’ कहते हुए मैंने चाय का फ्लास्क निकाल लिया।
चाय की पहली सिप के साथ उसने कहा- ‘‘वाह! इलाइची वाली चायलेकिन तुम तो चाय नहीं पीती थीं।’’
‘‘हाँलेकिन प्यार में इंसान सब सीख जाता हैमैं से तुम बन जाता हैऔर तुम से मैं।’’
‘‘मेरी और निकेतन की पसंद बिलकुल एक जैसी हैइलायची वाली चाय...'' आदित्य ने फिर से कुछ अलग कहने की कोशिश कीऔर उसकी कोशिश कामयाब भी हुईइसलिये मैंने तुरंत ही कहा, ‘‘लेकिन तुम्हें कड़वी पसंद है और उसे मीठी।''
उसे फिर मेरा जवाब पसंद नहीं आयाइसलिए गुडनाइट कहकर ऊपर चला गया। नीचे मैं रह गई थीयादों की भीड़ में अकेली।
मैं बचपन से ही ये सुनते हुए बड़ी हो रही थीकि आदित्य मेरा होने वाला पति है। आदित्य प़र्फेक्ट थाऔर ज़िन्दगी बहुत ख़ूबसूरत। उसकी और मेरी बचपन की मुहब्बत किसी भी हिंदी फिल्म की लव स्टोरी से कुछ ज्यादा रोमांटिक थीलेकिन आम हिन्दी फ़िल्म की कहानी की तरह हमारी कहानी में भी एक एंगल आ गया था... ज़िन्दगी में निकेतन आ गया था और हमारी बाई एंगल स्टोरी ट्रार्इंगल स्टोरी बन गई।
ट्रेन की गति पहले से काफी तेज हो गई थीऔर धड़धड़ करते हुए आगे बढ़ रही थीलेकिन मैं पीछे जा रही थी... जैसे कोई चुम्बकीय ताकत मुझे खींच रही हो।
*  *  *
पापा और विक्रम अंकल ने साथ में इंजीनियरिंग की थीऔर टिस्को में जॉब भी साथ में ही मिलीयहाँ तक कि दोनों को क्वार्टर भी क़ुलसी रोड में अ़गल-ब़गल ही मिला।
हालाँकि हमारा पारिवारिक माहौल एक दूसरे से पूरी तरह से भिन्न थाफिर भी उनकी दोस्ती दिन-प्रतिदिन गहरी होती जा रही थी। पहले आदित्यऔर फिर मेरे जन्म के बादइन दोनों ने अपनी दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने का अनौपचारिक निर्णय लिया।
लालन का नामलालन कब और कैसे पड़ाये तो मैं नहीं जानतीलेकिन पहली बार मैंने भी उन्हें लालन ही पुकारा थाऔर तब से लेकर आज तक वो मेरे लिये सि़र्फ लालन ही रहीं।
मेरी छोटी बहन अमिता के लिए आदित्य उसका सुपरहीरो थाजो उसकी हर फ़रमाइश तुरंत पूरी कर देता थाजबकि आदित्य के छोटे भाई अनुज के लिए मैं उसकी भाभी थी। चाभी के गुच्छे की तरह हम सब हमेशा एक साथ तो रहतेलेकिन वेदांत के आने से पहले तक भाई का रिश्ता मेरे लिए काल्पनिक था। आदित्यनमिता और अनुजएक दूसरे के भाई बहन थे। इन सबने मेरे साथ रिश्ते का एक अलग ही समीकरण बना रखा था। जहाँ अनुज मुझे ख़ास सम्मान देकर बात करतावहीं आदित्यअधिकार से। हम सबके बीच का रिश्ता सामाजिक विज्ञान का कोई भी अध्याय परिभाषित न कर सका।
नमिता को हम आदित्य की चमची कहतेऔर वो अनुज को मेरा। हम सब एक साथ ख़ूब लड़ते-झगड़तेफिर साथ में खेलतेऔर फिर थककर एक ही बिस्तर पर सो जाते।
हम सब एक ही स्कूल जाते थे। मैं सुबह जल्दी से तैयार होआदित्य के घर उसके साथ के लोभ में चली जातीऔर साथ में कभी-कभी लालन को भी चिढ़ा लिया करती।
मैं जानबूझकर शू़ज नहीं उतारती। तब लालन मुझपे चिल्लाती थीं, ‘‘अगर तुम मेरी होने वाली बहू नहीं होतीतो तुम्हारी टाँग अभी तोड़ देती।'' और इस बात पर मैं जोर-जोर से हँसती। फिर वो अपनी हँसी को बनावटी गुस्से का मुखौटा पहनाकर कहतीं, ‘‘देखो कितनी बेशरम लड़की हैमैं गुस्सा कर रही हूँऔर ये दाँत निपोर रही है।’’ इस बात पर मैं और जोर से हँसतीजिससे वो भी हँस पड़तीं। 
पुराने दिनों की याद आप ही मेरे चेहरे पर एक स्माइल ले आयी।
लालन बहुत ख़ूबसूरत थीं। ऐसा लगता था मानो ईश्वर ने उन्हें ख़ुद अपने हाथों से बनाया थाबिना किसी सहायक के। आदित्य को गोरा रंग और तीखे नैन ऩक्शलालन से ही मिले थेऔर लम्बाई विक्रम अंकल सेऔर इसी लम्बाई के कारण उसे क्लास में सबसे पीछे बैठना पड़ता थाजिसका फ़ायदा वो ख़ूब उठाता था। पिछली बेंच पर बैठकर ड्रॉइंग बनाया करता... घर की ड्रॉइंग। कहताबड़ा होकर घर बनाऊँगाजिसमें हम सब एक साथ रहेंगे।
पढ़ने में उसकी दिलचस्पी बहुत कम थी। वो इतना ही पढ़ता था कि पास हो सके। उसके विपरीत मैं इतना पढ़ती थी कि टॉप कर सकूँ। असमानताओं के बावजूदऐसा लगता था एक दूसरे के लिये ही बने हैं हम। न मुझे उसके ब़गैर चैन थान उसे मेरे ब़गैर आराम।
आदतन एक सुबह जब मैं उसके घर गईतो वो बहुत परेशान दिख रहा था। उसकी टाई नहीं मिल रही थी। मुझसे उसका परेशान होना देखा नहीं गयामैं झट से अपने गले से टाई निकाल उसे पहना दी। लालनजो अब तक आदित्य की टाई ढूँढ़ने में व्यस्त थींअचानक से सामने प्रकट होकर बोलीं, ‘‘तुम दोनों का जयमाल हो गयामतलब आधी शादी हो गई तुम दोनों कीआज से आदित्य का आधा काम भी वनिता करेगी।''
मैंने मासूमियत से पूछा था ‘‘कौन सा काम लालन?''
‘‘बैग पैक करना,वॉटर बॉटल भरनाऔर शू़ज पॉलिश करना...।’’ लालन ने अभी अपनी बात भी ख़त्म नहीं की थीकि आदि चिल्लाया, ‘‘नहीं माँवनिता शू़ज पॉलिश नहीं करेगीउसके हाथ गंदे हो जायेंगे।’’
आदित्य की मासूम मोहब्बत बा़गी हो गई थीजबकि लालन की आँखें भर आई थीं। ‘‘जुग जुग जिओ बेटाइसे हमेशा ऐसे ही प्यार करते रहना।'' कहते हुए हम दोनों को एक साथ गले से लगा लिया था।
लालन जितनी ख़ूबसूरत तन से थींउतनी ही ख़ूबसूरत मन से भी थींऔर इस कारण वो दुनिया की बेस्ट सासू माँ बनने वाली थीं।
विक्रम अंकल ने आदित्य को साइकिल दिलवाई थी। मैंने भी माँ से साइकिल की जिद की। आदित्य ने कहाजो मेरा है वो तुम्हारा भी तो हैये साइकिल हमारी हैहम साथ चलायेंगे।
आदित्य के साथ उसकी साइकिल परउसके आगेउसकी बाँहों के घेरे में बैठकर पूरे क़ुलसी रोड का चक्कर लगाना बहुत रोमांचक लगता था। हालाँकि मोहल्ले की औरतें अक्सर मम्मी को समझातींकि बेटी को इतना छूट देना ठीक नहींवैसे भी पढ़ाई में मैं आदित्य से बेहतर हूँ और मुझे बेहतर लड़का मिल सकता है। लेकिन मम्मी कहतींपढ़ाई-लिखाई धरी की धरी रह जाती हैघर आपके सामंजस्य और प्यार से चलता हैजो इन दोनों के बीच है।
आदित्य हमेशा की तरह पीछे की बेंच पर बैठकर घर की ड्रॉइंग बना रहा था। साइंस की टीचर आर्इं तो सभी खड़े हो गएलेकिन आदित्य ड्रॉइंग बनाता रहा। टीचर ने शायद उसे देख लिया थाइसलिये क्लास शुरू होते ही उसे खड़ा करके अमीबा की परिभाषा पूछ लियाजो उसे याद नहीं था।
टीचर ने उसे क्लास से बाहर निकाल दिया। मुझे बहुत ग़ुस्सा आया। ‘‘अमीबा का ड्रॉइंग भी बनवा सकती थीं; परिभाषा पूछना ज़रूरी था?’’ मैंने फुसफुसाकर कहाफिर भी टीचर ने सुन लिया।
पता नहीं टीचर बनने के बाद सेन्स इतने शार्प होते हैं या सेन्स शार्प होते हैं इसलिए टीचर बनते हैं।
‘‘ये साइंस का क्लास हैइश़्क का ट्यूशन नहींतुम भी बाहर जाओऔर तोता-मैना की कहानी लिखो।’’ कहकर मुझे भी क्लास से बाहर निकाल दिया था टीचर ने।
क्लास से बाहर निकालने के दुःख परआदित्य के साथ रहने का सुख कहीं ज़्यादा थाइसलिये आँखों में शर्म की जगह चमक आ गई थीऔर जाते-जाते टीचर हम दोनों को बेशर्म कह गर्इं।
उस बेशर्मी के बाद से science टीचर ने हमें निशाने पर रखा था।
एक दिन टीचर ने फिर से मुझे क्लास से बाहर निकलने की सजा दीक्योंकि मैं आदित्य से बात कर रही थी। आदित्य ने टीचर से कहा- ‘‘ग़लती मेरी हैक्यूँकि बात मैं कर रहा थावानी तो बस जवाब दे रही थी।’’
‘‘ठीक हैतो स़जा भी दोनों को मिलेगी।'' कहते हुए टीचर हाथ में स्केल लिए हमारे पास आ गई थी।
‘‘वनितातुम हाथ आगे निकालोऔर आदित्य तुम बाहर जाओ।''
मेरे हाथ पर स्केल पड़ने से पहले ही आदित्य ने दोनों हाथों से अपनी आँखें बंद कर लीं।
‘‘तुम्हें क्या हुआ?'' टीचर ने डाँटते हुए पूछा।
‘‘मैं इसे मार खाते नहीं देख सकता।’’ आदित्य ने किसी पक्के आशिक की तरह कहा था।
‘‘ठीक हैतो उसके बदले मार भी तुम्हीं खा लो।’’ और आदित्य के मार खाने के बाद बात वहीं ख़त्म नहीं हुई थीहमारे पेरेंट्स को बुलाकर ख़ूब लताड़ा गया था, ‘‘आपके बच्चे स्कूल पढ़ने नहीं आते हैंइश़्क फ़रमाने आते हैंदूसरे बच्चों पर भी असर हो रहा है... हमें स्कूल से निकालने पर म़जबूर न करें।’’
जब भी बच्चों की कम्प्लेन करने के लिए पेरेंट्स को स्कूल बुलाया जाता हैसिर्फ मम्मियाँ ही आती हैंक्यूँकि बच्चों की ग़लती की ज़िम्मेदार सि़र्फ मम्मी होती हैंऔर अच्छाई के ज़िम्मेदार पापा।
हमारी कम्प्लेन सुनने के लिए भी मम्मी और लालन आई थीं।
मम्मी ने समझाया था, ‘‘अभी पढ़ाई पर ध्यान दो तुम दोनोंबिना पढ़े शादी नहीं होती है... आदित्य! तुम पढ़-लिखकर पापा की तरह engineerबनोगेतभी वनिता से शादी होगी।
लालन ने हँसते हुए कहा, ‘‘वनितातुम पढ़ोगी नहीं तो मैं मारूँगी भीऔर ख़ूब काम भी कराऊँगी।’’
उसी दिन शाम को आदित्य ने अकेले में कहामैं engineer नहीं बनना चाहतामुझे सारा दिन पढ़ना अच्छा नहीं लगता लेकिन engineer की तरह घर बनाना चाहता हूँ।
मैंने कहा, ‘‘तुम engineer नहीं बनोगेमैं तब भी तुमसे ही शादी करूँगी।’’ ये सुनकर आदित्य ने मुझे गालों पर चूम लिया थाऔर मैं शर्मा गई थी।
समर वेकेशन में मैंने स्केटिंग क्लास ज्वाइन कर ली थी। मेरे पीछे से आदित्यघर के सामने से गुजरने वाली गाड़ियों के नंबर नोट किया करता था। मैंने कहामेरे साथ तुम भी ज्वाइन कर लो। उसने कहा- ‘‘नहींये लड़कियों वाले जुम्भी काम मैं नहीं करता।’’ मुझे उसका तर्क बहुत बेतुका लगा था, ‘‘तो तुम जो कर रहे हो उसमें कौन सी लड़कों वाली बात है?'' उसने तपाक से कहा- ‘‘कम से कम मैं बोर नहीं होताखैर छोड़ोदेखो मैं तुम्हें कितना मिस करता हूँ।’’ कहते हुए उसने अपनी नोटबुक मेरे सामने रख दिया। पेन्सिल से लिखे वो अनगिनत नंबर्समुझे प्रेम की कोई नई परिभाषा लग रहे थे।
वो पेज फाड़कर मैंने अपने पास रख लिया... पहला प्रेम पत्र।
हम बड़ी ते़जी से बड़े हो रहे थेऔर उतनी ही ते़जी से हमारी मासूमियत हमसे अलग हो रही थीऔर शायद इसीलिए नाइन्थ में आते ही स्कूल में लड़के-लड़कियों की क्लास भी अलग हो गयी थीऔर यहीं से हमारे बीच अलगाव की शुरूआत भी हो गई थी।
हम दोनों अपने-अपने पारिवारिक बिलीव और वैल्यू में खुद को ढालते हुए बड़े हो रहे थेऔर इस बड़े होने में बचपन की बहुत सी छोटी-छोटी बातें छूटती जा रही थीं।
उसकी उम्र और लम्बाई के साथ-साथ दिन प्रतिदिन उसका घमंड भी बढ़ता जा रहा था। ये घमंड बिना वजह नहीं था। स्कूल में पढ़ने वाली सभी लड़कियाँ उसकी एक ऩजर को तरसती थीं। वो उम्र ही ऐसी थीकि किताब के फड़फड़ाते पन्नों में भी दिल की धड़कन सुनाई देती है।
आदित्य की गर्वीली नाक कुछ ज़्यादा ही लम्बी थी। मुहल्ले की लड़कियाँ उसे ह्रतिक रोशन कहतींजिससे उसके पारदर्शी गोरे रंग के भीतर से झाँकती नसों में ख़ून का प्रवाह दुगुना हो जाताऔर चेहरा लाल... हाँअगर कभी कोई उसके पुरुष वाले अहंकार को ललकारतातो ख़ूननसों से आँखों में उतर आता था।
असल में दोष उसका नहीं थाउस माहौल का थाजिसमें वो पल रहा था। मैंने लालन को कभी विक्रम अंकल के साथ हँसते नहीं देखान ही कभी अपना पक्ष रखते देखा। वह एक पुरुषवादी परिवार थावहाँ औरतों को commodity समझा जाता था। वहाँ औरतों को पुरुषों के साथ खाने की इजा़जत नहीं थीमेरे घर के माहौल से बिलकुल अलग। हमारे घर के बाहरी फ़ैसले पापा लेते थेऔर घर के अंदर के सारे फ़ैसले लेने का अधिकार मम्मी को मिला थायहाँ तक कि कई बार पापा अपनी चेयर मम्मी को देकर अपने लिए दूसरी ले आते। संडे की चाय से लेकर सुबह का नाश्ता भी पापा बनातेजबकि विक्रम अंकल को पानी भी गर्म करना शायद ही आता होगा।
मम्मी अक्सर कहतींअलग-अलग घरों में पलने वाले लोग भी अलग-अलग ही होते हैंकिसी को किसी और से compare नहीं करना चाहिये। 
दसवीं का रि़जल्ट आ गया था। मैंने हमेशा की तरह टॉप किया थाऔर आदित्य बस पास हुआ था। मम्मी का़फी परेशान थीं। शायद मुहल्ले की औरतों की बातें असर कर रही थीं। वनिता की शादी का फ़ैसला लेने में हमने शायद जल्दी कर दी।
पापा ने कहा, ‘‘मुझे भी ऐसा ही लग रहा है कि भावुकता में लिया गया फ़ैसला कहीं ग़लत तो नहीलेकिन अंतिम फ़ैसला वनिता का ही होगा।’’
आदित्य और मैं बचपन से साथ थे। आदित्य मेरी परवाह करता था। मुझे जब भी ज़रूरत हुईआदित्य को हमेशा साथ पाया। शहर की सारी लड़कियाँ उसपे मरती थींऔर वो मुझ परइससे ज़्यादा किसी लड़की को और क्या चाहियेइसीलिए उस व़क्त मम्मी-पापा की बात अच्छी नहीं लगी। जेहादी इश़्कआदित्य के अतिरिक्त कुछ और सोचने भी नहीं देता था। आँखों में घुसकर किताब के पन्नों पर उतर जाता था।
‘‘क्या ये काले अक्षर तुम्हें मेरे प्रेम पत्र की याद नहीं दिलाते?’’ मुझसे पूछतातो मैं हा़िजरजवाबी से तुरंत कह देती, ‘‘लेकिन ज़िन्दगी अमीबा की ड्रॉइंग नहींडे़फिनिशन है जानेमन।'' और किताब बंद कर देती।
टॉप करने की ख़ुशी में पापा ने मुझे स्कूटी दिलाईलेकिन आदित्य इस बात से ख़ुश नहीं था। ‘‘scooty की क्या ज़रूरत थीमेरी bike थी नबचपन में तो हमने एक ही साइकिल चलाई है।’’
‘‘तो क्या तुम अब भी मेरे ड्राइवर बनना चाहते हो?’’ मैं उसकी नस नस से वा़िक़फ थीइसलिए मैंने वही कहाजिससे किसी तरह के वाद विवाद की संभावना ख़त्म हो जायेऔर वो चुप हो भी गया।
‘‘नहींमैं जानेमन ही बने रहना चाहता हूँचलो नई scooty से घूमकर आते हैं।’’
मैंने ब्लैक जीन्स और पिंक टॉप पहना थाटॉप के साथ मैचिंग बेली़जऔर बालों को बाँधकर पोनीटेल बनाया था।
उसने कहा, ‘‘तुम बहुत ख़ूबसूरत लग रही हो।’’
‘‘तुमसे कमभगवान जी ने जब तुम्हें बनाया होगाउस व़क्त उनका मूड बहुत अच्छा होगाजैसा अभी तुम्हारा।’’ मैंने शर्माते हुए कहा था।
‘‘जानती होएक फिलॉस्फर के अनुसार उन पतियों को हार्टअटैक नहीं होताजिनकी वाइ़फ कम सुंदर होती हैकम से कम मैं हार्टअटैक से नहीं मरूँगा।’’ उसने बेशर्मी से हँसते हुए कहा था।
बुरा तो बहुत लगा थालेकिन मेरे पास कोई जवाब नहीं थाक्यूँकि कुछ देर पहले मैंने ही उसे ख़ुद से बेहतर कहा था।
खैर जैसे ही मैंने scooty में चाभी लगाईउसने मेरे पीछे बैठने से ये कहकर मना कर दियाकि वो किसी लड़की के पीछे नहीं बैठ सकता। कितनी अजीब बात हैवो मुझे साइकिल पर अपने आगे तो बिठा सकता हैलेकिन स्कूटी पर मेरे पीछे नहीं बैठ सकता। ये सोचते हुए चाभी मैंने उसे दे दी थी।
छुट्टियों में जब मैं चपाती बनाना सीख रही थीतो उसने कहा- ‘‘चलो गोल-गप्पे खाने चलते हैं।’’
मैंने कहा- ‘‘थोड़ी देर रुक जाओचपाती बना लूँ फिर चलती हूँ।’’
‘‘नहीं जल्दी चलो प्लीज।’’
‘‘जल्दी जाना है तो मेरी हेल्प करो।’’
‘‘लड़कों का काम रोटी बनाना नहींपैसे बनाना हैये लड़कियों वाले काम तुम्हीं करो।’’
मैं कहाँ चुप रहने वाली थी। मैंने भी झट से जवाब दे डाला- ‘‘बहुत सी औरतें आज पुरुषों से ज्यादा पैसे बना रही हैंऔर बहुत से पुरुष रोटियाँ बनाकर बहुत पैसे बना रहे हैंलेकिन तुम्हें तो ये पता भी नहीं।’’
‘‘अच्छा अच्छाचलो अब।’’ वो लाजवाब हो गया था शायद।
मैं शहर में लगे पुस्तक मेले में जाने के लिए तैयार हो रही थीऔर वो मेरे सर पे बैठा था।
‘‘जल्दी करोदेखो मैं कितनी जल्दी तैयार हो गया हूँ।''
‘‘हाँ तो मैं लड़की हूँलड़कियों को टाइम लगता है।’’
‘‘लेकिन कितना भी तैयार हो लोमेरे सामने तो तुम कमतर ही लगती हो।'' उसकी ये बात कान के रास्ते सीधे दिल में उतर गईकिसी गर्म पिघले हुए शीशे की तरह। कंघी करते-करते मेरे हाथ रुक गए।
आदित्य का पुरुषबोध और स्वसौन्दर्यबोधहमें जोड़े रखने वाली कड़ियों को दरका रहा थामेरे अंदर का जेहादी इश़्क शिथिल हो रहा था।
मम्मी कहती हैं, ‘यद्यपि प्रेम में सम्मान अदृश्य रहता हैलेकिन फिर भी उसपे दोनों का बराबर अधिकार होता है।’ मैं अपने सम्मान के अधिकार को खोना नहीं चाहती थीइसलिये इश़्क को स्याह डब्बे में बंदकर दरिया में फेंक देना चाहती थी।
प्लस टू के बाद मेरा सेलेक्शन निफ्ट में हो गया। आदित्य ने कहा, ‘‘दर्जी बनने के लिए इतनी दूर जाने की क्या जरूरत हैजमशेदपुर में बहुत से इंस्टीट्यूट्स हैं जो कपड़े सिलना सिखाते हैंऔर फिर ये सब सीखकर मिलेगा भी क्याजब अंत में सँभालना घर और चूल्हा ही है।’’‘‘और ये फिजूल तुमसे किसने कहा आदित्य?’’ मैंने जरा गुस्से में पूछा था।
‘‘मैं कह रहा हूँ वनितातुम्हारा होने वाला पतिऔर फिर मेरी और तुम्हारी मम्मी इतने वर्षों से फिजूल तो नहीं कर रही हैं न।’’
‘‘लेकिन समय बदल गया हैमुझे अपनी अलग आइडेंटिटी बनानी है।’’ मैं बहस करने पर तुली हुई थी।
‘‘हाँसमय बदल गया हैलेकिन जिम्मेदारियाँ नहीं बदलीं।'' आदित्य को मेरे जवाब देने से और ज्यादा गुस्सा आ रहा था, ‘‘और तुम्हारी आइडेंटिटी तुम्हारे सामने है... आदित्य भारद्वाज।’’
‘‘लेकिन अभी हमारी शादी नहीं हुई है।’’ मैंने सीधा सा जवाब दिया था।
‘‘ख़ूबसूरत लड़कियाँ क्यू में खड़ी हैं मुझसे शादी के लिएतुम अपने आप को कुछ ज़्यादा नहीं समझ रही हो?’’
‘‘हाँख़ूबसूरत लड़कियाँ...।’’ एक आह सी निकली थी मेरे अंदर सेक्यूँकि उस दिन से पहले इतना बुरा कभी नहीं लगा था। पहली बार मुझे अपने साँवले रंगऔर मॉडल से कम क़द होने का अ़फसोस हुआ थाऔर पहली बार ही मुझे आदित्य पर बहुत तरस भी आया था।
उस वक्त तो मम्मी ने आदित्य और मुझे चुप रहने को कह दियालेकिन बाद में मैंने उन्हें पापा से कहते हुए सुनाकि वो आदित्य के नजरिये और व्यवहार से खुश नहीं हैं।
पापा ने कहा, ‘‘एक बार फ़ैसला लेकर हम ग़लती कर चुके हैंदुबारा मैं कोई ग़लती नहीं करना चाहताशादी की बात हुई हैशादी नहीं हुई है... इस बार फ़ैसला वनिता को लेने दो।’’
*  *  *
ऊपर की सीट पर आदित्यबार-बार करवट ले रहा थानिश्चित ही यादों के शूल उसकी आँखों में भी चुभ रहे थे।
*  *  *
मेरा जाना उसे अच्छा नहीं लग रहा था। वो बहुत ग़ुस्से में थाऔर इसीलिए बहुत ते़ज ड्राइविंग कर रहा था। मैं उसके ब़गल में बुत सी बैठी थी। पीछेअनुज नमिता और वेदांतआपस में खुसर-पुसर कर रहे थे।
‘‘इतना सन्नाटा क्यूँ है भाई। हम nift मेंसिलेक्शन की पार्टी में जा रहे हैं या किसी की मैय्यत पर?’’ नमिता ने हमारे बीच की ख़ामोशी को तोड़ने की कोशिश की।
‘‘तुम ठीक कह रही हो नमितामुझे समझ में नहीं आताभैया इतना ग़ुस्सा क्यूँ है।’’ अनुज ने कहा तो मैं सोचने लगी।
आखिर ग़ुस्सा क्यूँ न होमेरे बिना कितना अकेला हो जायेगा। फिर किसे वो अपने हृतिक रोशन लुक और मर्दानगी का बखान उदाहरण देकर स्पष्ट करेगा।
डिनर के बाद डे़जर्ट में मैंने उसके लिये डबल आइसक्रीम ऑर्डर कियाक्यूँकि ग़ुस्से से अब भी उसकी नाक लाल थी।
‘‘आज की शाम हमें enjoy करना चाहियेकल तो मैं चली जाऊँगी।’’ कहते-कहते मेरी आवा़ज भीग गई थी।
मेरी आवा़ज का गीलापनआदित्य को भी भिगा गया था, ‘‘तो क्या जाना ज़रूरी है?''
मैंने कुछ नहीं कहामैं कुछ और कहना नहीं चाहती थीक्यूँकि मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मेरा उससे दूर जाना उसे अच्छा नहीं लग रहा थाया मेरा आगे बढ़ना।
वापसी में उसने धीरे से मुझे देखते हुए कहा, ‘‘इंसान जब ग़ुस्से में होता हैतब उसे पता नहीं होता है वो क्या बोल जाता है।’’
‘‘इंसान ग़ुस्से में ही सच बोलता है।'' मैंने उसे बिना देखे कहा था।
विक्रम अंकल ने अपनी गम्भीर और भारी आवा़ज में कहा,‘‘सिलाई सीखने के लिये दिल्ली जाने की क्या ज़रूरत है?''
‘‘सिलाई नहीं अंकलफ़ैशन डि़जाइनिंग।’’ मैंने तपाक से कहातो अंकल ने मुझे घूरकर देखाऔर मैं समझ गई कि उन्हें मेरा बोलना अच्छा नहीं लगा।
‘‘बच्चों के भी शौ़क होते हैं।’’ पापा ने हल्के से कहा था।
‘‘हमें घरेलू बहू चाहियेशौ़क यहाँ जमशेदपुर में पूरे किये जा सकते हैं।’’
‘‘जाने दो न यारकुछ महीने बाद वापस आयेगी तो ख़ुद नहीं जायेगी... वहाँ उसका मन थोड़ी न लगेगा हम सबके बिना।’’
‘‘दिल्ली बड़ा शहर हैवहाँ अकेली रहेगीये बात मुझे कुछ ठीक नहीं लग रही।’’ इतना कहकर अंकल उठ गए थे।
‘‘शायद भाई साहब नारा़ज हो गये।’’ मम्मी ने चिंता जताई।
‘‘आखिरवानी उसके घर की भी इ़ज़्जत हैउसका सोचना भी ग़लत नहीं हैलेकिन मैं अपनी बेटी से उसकी ख़ुशियाँ नहीं छीन सकता।’’ पापा ने खड़े होकर निर्णायक अन्दा़ज में कहा थाऔर ख़ुशी से मेरी आँखें भर गई थीं।
निफ्टदिल्ली में मेरा पहला दिन था। orientation क्लास में hi! I am Niketan from Jamshedpur. कहते ही मैंने उसकी तरफ देखा था। थैंक गॉडजमशेदपुर से एक और भी हैये सोचते ही खुशी का एक जुगनू मेरे अंदर रौशन हो गया। बस यहीं से जुड़ाव की शुरूआत हुई थी। मेरे introduction पर उसने भी ज़रूर मुझे देखा होगा।
रैगिंग के दौरान मुझे और निकेतन को सीनियर्स ने न सिर्फ श को स और ड़ को र के उच्चारण के लिए बुरी तरह से रैग कियाबल्कि हमें भाई-बहन भी कहा। अंत में मुझेशायद मेरी शादी का खयाल दिल में आया हैगाने के लिए कहाऔर जैसे ही मैंने, ‘सायद मेरी सादी का खयाल दिल में..’ गायासब जोर-जोर से हँसने लगे और मैं रोने लगी। मेरे रोने से वे सब डरकर चले गए।
‘‘तुम रोई क्योंनिकेतन ने पूछा।
‘‘क्योंकि मैं और बेइज्जती नहीं कराना चाहती थी।’’
‘‘लेकिन रोने से तो और बेइ़ज़्जती होती हैवैसे कमी हममें हैग़लत हम बोलते हैं।’’
‘‘एक दिन में तो कोई नहीं सीखता नकल ही तो आई हूँ।’’
‘‘हम्म... वैसे हम एक-दूसरे का नाम, orientation क्लास में जान चुके हैंऔर मुझे तुम्हारा भाई बनने में कोई इंट्रेस्ट नहीं है; friend बनना है तो बोलो।’’ कहते हुए निकेतन ने मेरी तऱफ अपना हाथ बढ़ा दिया। किसी अनजान शहर के अलग से माहौल में अपने शहर से किसी का मिल जाना किसी दुआ से कम नहीं। अपने आँसू पोंछकर इस दुआ को झट से क़बूल कर लिया था मैंने।
दिल्ली हमारे शहर जमशेदपुर से बिलकुल अलग थाऔर हम दिल्ली के लोगों से। बड़ी-बड़ी इमारतों और चटख रंग के कपड़े पहने ख़ूबसूरत लोगों की भीड़ में भी हम पहचान लिये जाते थे।
मम्मी हमेशा कहती हैं,जैसा देश वैसा भेष। हमने दिल्ली को अपनाना शुरू कर दिया थाऔर दिल्ली ने हमेंऔर इसी बीच पता नहीं कब चुपके से मेरे मन ने निकेतन को भी अपनाना शुरू कर दिया था। बड़ी-बड़ी आँखों वाला निकेतनअनजाने ही मुझे अपनी ओर खींच रहा था। वैसे तो वो कुछ कहता नहीं थालेकिन मन के चोर की झलक कभी-कभी उसकी आँखों वाली खिड़की से मिल जाया करती थी।
मम्मी ने फोन पर बताया थाकि आदित्य ने construction का काम शुरू किया है और साथ-साथ अपना घर भी बना रहा है।
वक्त को जैसे पंख लग गया था। और बहते हुए वक्त के साथ जैसे-जैसे मैं निकेतन के करीब आती जा रही थीवैसे-वैसे आदित्य से दूर होती जा रही थी।
निकेतन का मुझेआप कहना अंदर तक छू जाता थाऔर पढ़ाई के अतिरिक्त किसी दूसरे काम में भी ‘‘दो मैं करता हूँ।’’ कहकर मेरी हेल्प करने सेमैं उसपे डिपेंड होती जा रही थी।

उस दिनबहुत दिनों बाद मैंने आदित्य का फ़ोन उठाया था। ‘‘तुम मेरा फ़ोन क्यूँ नहीं उठाती हो?’’ ग़ुस्से से पूछा था उसने।
‘‘तुम्हारा फ़ोन हमेशा ग़लत टाइम पर आता हैकभी मैं क्लास में होती हूँकभी प्रोजेक्ट में बि़जी... you know पढ़ने के लिये ही आई हूँ न।’’
‘‘हाँकितना भी पढ़ लोबाद में मुहल्ले भर की औरतों के ब्लाउज ही सिलोगी न।’’
‘‘और तुम्हारे शर्ट भी।’’ मेरा प्रत्युत्तर म़जा़िकया थालेकिन वो समझा नहीं था। मैं अब उससे लड़ना भी नहीं चाहती थीक्यूँकि अब मेरी लड़ाई ख़ुद से थी।

निकेतन के पापा की डेथ बहुत पहले एक एक्सीडेंट में हो गई थी। नानी और मम्मी के साथ वो जमशेदपुर में रहता था। उसकी मम्मी वहीं बैंक में जॉब करती थीं। निकेतन अकेला हैउसके कोई भाई-बहन नहीं हैं। ‘‘असल में और भाई बहनों के आने से पहले ही पापा का ...।’’ उसने वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया था। ‘‘मुझे पापा की याद भी नहींसि़र्फ तस्वीरें है।’’
उसने ऩजर का चश्मा उतारकर अपनी आँखों के कोर को अपनी उँगलियों से हल्के से दबायाउसकी उँगलियाँ गीली हो गई थीं।
‘‘जानते होमैं एक ऐसे इंसान से शादी करने जा रही हूँजिसके इंत़जार में ख़ूबसूरत लड़कियाँ क्यू में खड़ी हैंऔर ये मुझे उसी ने बताया।’’ मैं भी इमोशनल हो गई थी।
व्हाट?’
‘‘हाँ जी।’’
‘‘तो किसी और के लिए कोई चान्स नहीं है?’’ उसकी उदासी बढ़ गईजिसे मैं अनदेखा नहीं कर पाई।
‘‘नहींमुझे लगता है आदित्य मुझसे ज़्यादा ख़ूबसूरत लड़की डि़जर्व करता हैऔर मैं respect.’’ मैंने उसकी आँखों में जुगनू डाल दिया था।
फ़ैशन स्कूल join करने के बाद पहली बार निक के साथ जमशेदपुर राजधानी के टू सीटर कम्पार्टमेंट में आई थी।
जानती थीस्टेशन पर पापा के साथ आदित्य भी आयेगा। मैं जल्दी से कम्पार्टमेंट से बाहर निकल ट्रेन से उतर गईऔर निक को बाय बोले बिना ही चल दी। दिलवाले दुल्हनियाँ ले जायेंगे की काजोल की तरह मेरा मन गाना गाताउससे पहले ही उसने आवा़ज दिया, ‘‘वानी! तुम्हारा बैग।''
मैंने मुड़कर देखावो वहीं खड़ा था।
औपचारिक जान-पहचान के बाद पापा ने उसे घर पर इन्वाइट करमेरे मन का कर दिया थाजबकि आदित्य की नारा़जगी सा़फ झलक रही थी।
लेकिन उसकी नारा़जगी पर मेरे आने की ख़ुशी भारी पड़ रही थी। ड्राइव करते हुए बैक व्यू मिरर में बार-बार मुझे देखने की उसकी कोशिश मुझसे छुपी नहीं थी।
उस रात आदित्य ने अकेले में मुझे किस करने की कोशिश कीऔर मेरे मना करने पर उसने कहा- ‘‘पहली बार तो नहीं कर रहा!’’
‘‘हाँलेकिन अब हम बच्चे नहीं रहे।’’ मैंने बच्चे शब्द पर अतिरिक्त जोर देते हुए कहा था।
‘‘तो इससे क्या फर्क पड़ता हैतुम मेरी होने वाली बीवी हो।’’
‘‘लेकिन हूँ तो नहीं नइससे पहले तुमने अकेले में कभी ऐसा किया भी नहीं।’’
‘‘क्योंकि अब हम बच्चे नहीं हैं।’’
‘‘वही मैंने भी कहा।’’ कहकर मैं उसे वहीं छोड़कर चली गई थीनिक की यादों की साथ सोने।
अगले दिन आदित्य ने आदेशात्मक स्वर में कहा, ‘‘वानी! चेंज कर लोमैं तुम्हें कन्स्ट्रक्शन साइट पर ले चलता हूँ।’’
‘‘चलोमैं तो तैयार हूँ।’’
‘‘नहींचेंज कर लो।’’ उसने दृढ़ता से कहा।
‘‘इन कपड़ों में क्या बुराई है?’’
‘‘असल में मेरे म़जदूर तुम्हारी तरह फ़ैशन स्कूल से नहीं आये हैं नइसलिये शार्ट लेंथ स्कर्ट और स्लीवलेस टॉप में तुम उन्हें आइटम लगोगी।’’
मुझे समझ में नहीं आया कि उसने तारी़फ की थी या टॉन्ट किया थाइसलिये से़फ वर्ड  ok बोलकर चुप हो गई।
साइट पर उसने कहा, ‘‘मुझे ऐसे कपड़े बिलकुल पसंद नहीं वानीआइंदा मत पहनना।’’
‘‘तुम पतियों की तरह बिहेव कर रहे हो!’’
‘‘क्यूँकि पति बनने वाला हूँ।'' उसने रोमांटिक होकर कहा था।''
‘‘बने तो नहीं न।’’ मैं चिढ़ गई थी।
‘‘पति बनने के बाद बदल तो नहीं जाऊँगा नजो आज हूँ वही रहूँगा।’’
‘‘मेरी अपनी पसंद और नापसंद है।’’
‘‘पति की पसंद ही पत्नियों की पसंद होती है।’’
‘‘लेकिन मैं कठपुतली नहींजिसकी डोर तुम्हारे हाथ में है।’’
‘‘समय बदल गया है जानेमनतुम कठपुतली नहींचाभी वाली गुड़िया हो... जितनी भरूँगा उतना ही चलोगी।’’
ग़ुस्सा तो मुझे बहुत आया थाजी चाहासब कुछ तुरंत ख़त्म कर दूँलेकिन मैं रिश्ते को तब तक निभाती हूँजब तक उसमें आखिरी उम्मीद बची हो।
मैं बचपन की दोस्ती निभाना चाहती थी।
हालाँकि मेरे लिये उससे अलग हो जाना बहुत आसान थाक्यूँकि स्त्री के लिये सि़र्फ प्रेम का़फी नहीं होतासम्मान विहीन प्रेमनमक बिना खाना... फीका फीका।

‘‘औरत का जीवन पराधीन होता है बेटा!’’ लालन मुझे समझा रही थीं।
‘‘आप ज़िन्दगी भर चुप रहींअब मुझे भी वही सिखा रही हैं।’’ मैं बहुत ग़ुस्से में थी।
‘‘औरत को धैर्य से काम लेना पड़ता है।’’ लालन ने फिर से कोशिश की।
‘‘औरत को धैर्य से क्यूँ काम लेना पड़ता हैपति को क्यूँ नहीं?’’
‘‘क्यूँकि पति पुरुष होता है बेटा।’’
‘‘तो क्या पत्नी ग़ुलाम होती है?’’
‘‘ये समाज ऐसा ही है बेटातुम तो मेरी बेटी होसमझाना मेरा फ़र्ज़ है...मैं आदित्य के जन्म के पहले ही माँ बन गई होतीअगर ...।’’
‘‘अगर क्या?’’
‘‘अगर कोख में बेटी नहीं होती।’’ लालन की आवा़ज दर्द में डूबी हुई थी।
क्या!!
‘‘हाँआदित्य की दादी और पापा नहीं चाहते थे कि बेटी होतुम मेरे लिए वही मार दी गई बेटी हो।’’
‘‘आप मुझे फिर से मार देना चाहती हैं?’’
‘‘पाँचों उँगलियाँ एक जैसी नहीं होतींआदित्य तुमसे बहुत प्यार करता है।’’
‘‘ठीक कहा आपने लालनकि पाँचों उँगलियाँ एक जैसी नहीं होतींलेकिन कुछ लोग प्यार के साथ-साथ सम्मान भी चाहते हैं।’’
‘‘जीवन में आत्म-सम्मान से बढ़कर कुछ भी नहींबाकी सब मन का रोग हैऔर रोगमुक्त जीवन औरत के नसीब में नहीं।’’ कहकर लालन चुप हो गई थीं।
उन्हें बहुत ज़्यादा बहस करने की आदत नहीं थी।
‘‘भैयाकैंडल लाइट डिनर पर चले जाओ तो ग़ुस्सा उतरेगाऔर हाँअपने ग़ुस्से को यहीं कहीं छोड़कर जाना।’’ नमिता ने समझायालेकिन उसने कहा, ‘‘एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी।’’
‘‘मैं क्यूँ झुवूँâ? ग़लती उसकी हैउसने घटिया कपड़े पहनेवो सॉरी कहे तो कैंडल लाइट पर ले जाऊँगा।’’
नमिता ने कहा, ‘‘दीतुम्हीं सॉरी बोल दो।’’
‘‘मैं सॉरी बोलकर लालन नहीं बनना चाहती हूँ।’’ इतना कहना का़फी थाशायद इसलिये फिर उसने कुछ नहीं कहा।
आदित्यधीरे-धीरे दिल से निकलकर दिमा़ग में शि़फ्ट हो रहा थाऔर दिल वाली ख़ाली जगह में निकेतन आ रहा था।
दिल और दिमा़ग से मेरी ज़बरदस्त लड़ाई चल रही थी। दिमा़ग कह थाएक रिश्ता ख़त्म करके दो परिवारों का इतना पुराना रिश्ता ख़त्म नहीं किया जा सकतादिल कह रहा थादिल के मामलों में दिमा़ग का क्या कामदिल और दिमा़ग की इस लड़ाई में थककर सो गई थी। नमिता के चिल्ला-चिल्लाकर उठाने से जब आँख खुलीतो जानी-पहचानी आवा़ज सुनाई दी। लगभग दौड़कर गई थी। निकेतन की ऩजर मुझपर पड़ीऔर कुछ पल के लिए मैं पत्थर हो गई।
‘‘कैसी हो?’’ उसने पूछा तो जैसे मैं होश में आयी।
‘‘अब ठीक हूँ।’’ कहकर ख़ुद ही झेंप गई।
शायद दिल ने क़िला फ़तेह किया था।
आदित्यअचानक से चिप्स लेकर आ गया थाऔर निकेतन को देखकर उसके चेहरे का रंग उड़ गयाउसपे निक से उसे मैंने मात्र बचपन का दोस्त कहकर मिलवायाजिसने आग में घी का काम किया। 
मैं उसकी आग को और भड़काना भी चाहती थीताकि उसका इश़्क स्वाहा हो जायेऔर वो मुझे छोड़ देलेकिन आदित्य के लिए मैं उसकी अच्छी आदत थीजिसे वो किसी तरह की आग में झोंकना नहीं चाहता थाइसलिये वो वहीं बैठ गया।
उसने कहा वो मेरा मंगेतर हैशायद वनिता ऐसा कहने में शर्मा रही हैइसलिये नहीं बताया।
निकेतन ने पहले तो हमें बधाई दीफिर आदित्य से कहा, ‘‘तुम बहुत क़िस्मत वाले हो,जो तुम्हें वनिता मिली हैवनिता जितनी इंटेलिजेंट स्टडी़ज में हैउतनी ही स्मार्ट क्रिएटिविटी में ''
‘‘घर गृहस्थी सँभालने के लिये ज़्यादा intelligency और smartness की ज़रूरत भी नहीं।’’ आदित्य ने किसी अनपढ़ गँवार की तरह कहा था।
‘‘क्या तुम fashion school से पढ़ने के बाद रोटियाँ डि़जाइन करोगी?’’ निकेतन ने मुझसे मु़खातिब होकर पूछा था।
लेकिन जवाब आदित्य ने दिया - ‘‘ईश्वर ने मर्दों को पैसे कमानेऔर औरतों को घर सँभालने के लिये बनाया हैजो नियम तोड़ते हैंउनके घर टूटने के कई किस्से हैं... आखिर वनिता किसी खास ग्रह से तो नहीं आई है न!’’
‘‘ये नियम ईश्वर ने नहींतुम्हारे जैसे पुरुषों ने बनाये हैंऔर ये पुरुष-समाजमहिलाओं को घर-गृहस्थीमें क़ैद कर ख़ुद भगवान बन बैठा है। सच तो ये है कि महिलाएँ हम पुरुषों से कहीं ज़्यादा सक्षम हैं... आज की महिलाघर और बाहर दोनों एक साथ समान रूप से सँभालती हैऔर इसी डर से पुरुषों ने महिलाओं को ईश्वर और समाज की दुहाई देकर घर के अंदर क़ैद कर दियाफिर तुम्हारा वनिता को क़ैद करने की कोशिश अनोखा नहीं।’’
‘‘खैरइतनी बहस करने की फ़ुर्सत मुझे नहींतुम्हें जो समझना है वो समझने के लिये आ़जाद हो... हाँवनिता का दिल्ली जाने का बहुत मन थाइसलिये हमने ज़्यादा रोका नहींवैसे भी हमें कौन सा इससे नौकरी करवाना है।’’ आदित्यपक्के बु़जुर्ग वाले अन्दा़ज में कह रहा था।
‘‘वनिता को तो तुम्हारा शुक्रगु़जार होना चाहियेकम से कम तुमने इसे दिल्ली घूमने की इजा़जत दे दी।’’ फिर मुझसे कहा, ‘‘इतना intelligentऔर स्मार्ट होने का क्या फ़ायदाजब तुम्हारे फ़ैसले कोई और लेता हो।’’
निकेतन का ये कहना आदित्य के लिए असहनीय हो गया था। अंगारे बरसाती हुई आँखों से मुझे और निकेतन को देखाफिर बुरा सा मुँह बनाकर बोला, ‘‘वो तो आने वाला समय बतायेगा कि कौन कितना intelligent और smart है।’’ कहकर निकल गया।
अगले दिन उसने कहा, ‘‘तुम दिल्ली नहीं जा रही हो।’’
हालाँकि मैं जानती थीये कल वाली आग का परिणाम थालेकिन जानबूझकर अनजान बनते हुए पूछा, ‘‘ये तुमसे किसने कहा? ''
‘‘मैं किसी के कहने पर कुछ नहीं करता।’’ उसने अपनी आवा़ज को और भारी बनाते हुए कहा।
‘‘मैं भी नहीं।’’ मैंने भी उसी के अन्दा़ज में जवाब दिया था।
‘‘चार दिन दिल्ली में रहकर बिल्ली की तरह ज़्यादा म्याऊँ-म्याऊँ करना सीख गई हो।’’
‘‘और पीछे से तुमने कुत्ते की तरह फ़ालतू भौंकना सीख लिया है।’’
वानी!’ बहुत ज़ोर से ची़खा था आदित्य।
‘‘धीरे बोलोगे तब भी सुन लूँगी।’’ मैंने उसे और चिढ़ाने वाले अन्दा़ज में कहा था।
‘‘तुम शायद उस बदतमी़ज के साथ रहकर बात करने की तमी़ज भूल गई हो।’’
उसने निकेतन को बदतमी़ज कहा थाऔर जवाब सुनने से पहले ही चला गया।
मैं उसे इस हद तक मजबूर कर देना चाहती थीकि वो ख़ुद मुझसे रिश्ता तोड़ देलेकिन हर बार वो सि़र्फ ग़ुस्सा करके रह जाता।
उसके ग़ुस्से पर उसका इश़्क भारी थाते़ज मिर्ची सा तीखा इश़्क। न जाने कितनी बार मेरी आँखों से आँसू निकल आये।
मम्मी-पापा भी शायद वही चाहते थे जो मैं। लेकिन निक के साथ लंच पर जाने से नमिता बहुत नारा़ज थीऔर शायद उसने आदित्य को बता भी दिया था। वो उम्र ही ऐसी होती हैइसमें सि़र्फ प्यार अच्छा लगता है। इस उम्र से मैं भी गु़जर चुकी थीजब मुझे आदित्य के सिवा कुछ और न दिखाई देता थान सुनाई।
असल में हमें जब सच में प्यार होता हैतब महसूस होता हैकि आज से पहले जो थावो मात्र प्रेम का भ्रम था।
दिल्ली वापस जाने का समय ऩजदीक आ गया था। मैं सब कुछ ख़त्म करके जाना चाहती थी। ख़ुद आ़जाद होकरऔर उसे मुक्त कर देना चाहती थीउस बंधन सेजिसमें मैं बँधना नहीं चाहती थीऔर वो मुझे बाँधना चाहता था।
अबसब जल्दी ही ख़त्म होने वाला था। विक्रम अंकल को अपने घर में देखकर अंदेशा हो गया था मुझे।
उन्होंने कहा कि अब मुझे दिल्ली जाने की ज़रूरत नहींक्यूँकि कोई अच्छा सा मुहूर्त देखकर वो मेरी और आदित्य की सगाई करना चाहते हैं।
मम्मीपापा का मुँह देखने लगी थींऔर पापा ने मुझे देखा। मैं कुछ कहतीइससे पहले ही आदित्य ने पीछे से आकर सीधे शब्दों में कहा कि जो लड़की किसी और लड़के से अकेले में मिलती-जुलती हैमैं उससे शादी नहीं करना चाहता।
‘‘शादी तो मैं भी तुमसे नहीं करना चाहतीक्यूँकि तुम्हारे लिये कोई गाँव वाली ठीक रहेगीजो पल्लू ओढ़े तुम्हारे चरणों में पड़ी रहे।’’ मैंने प्रहार किया था।
‘‘कम से कम घर की इ़ज़्जत घर में रहेगीलेकिन मुझे नहीं पता था कि दिल्ली जाकर तुम इतनी शहरी हो जाओगी।’’
‘‘थोड़े तुम भी शहरी हो जाओ आदित्यकब तक खूँटे से बँधे रहोगे।’’
‘‘अगर बेहयाईशहरी होना है तो मैं गँवार ही ठीक।’’
‘‘तुम तो विदेश भी चले जाओगे तब भी गँवार ही बने रहोगेपता है क्यूँक्यूँकि education इंसान को प्रोग्रेसिव बनाता हैऔर तुम्हें तो पढ़ने से ऩफरत थी।
अब वा़कई शायद हद हो गई थीइसलिये विक्रम अंकल उठकर खड़े हो गये थे। ‘‘वनिता को तुमने ज़रा भी तमी़ज नहीं सिखायाबात अगर बच्चों तक होती तो फिर भी ठीक थाइसे तो बड़ों का भी लिहा़ज नहीं।’’
मैं वापस दिल्ली आ गई थी। कुछ महीनों बाद मम्मी ने फोन पर बताया कि आदित्य का घर बन जाने के बाद वे लोग अपने घर शिफ्ट हो गएऔर बगल वाले क्वार्टर में नए पड़ोसी आ गए हैं।
*  *  *
आदित्य मुझे पुकार रहा था-, ‘‘वानी! वानी! वानी!''
मैं हड़बड़ाकर उठी।
‘‘उठ जाओगाजियाबाद आ गया हैतुम फ्रेश हो लोमैं चाय लेकर आता हूँ।’’ कहकर वो जल्दी से गया और जल्दी से आया भी।
मैं अब भी वैसे ही उनींदी सी थी। टिश्यू से फेस क्लीन करके आदित्य को चाय के लिए थैंक्स कहा।
बदले में वो सिर्फ मुस्कुरायाफिर थोड़ा रुककर कहा- ‘‘उतरने से पहले मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता हूँ।''
‘‘हाँ कहो न!'' मैंने भी जल्दी में कहा थाक्योंकि उसकी मंजिल तो गाजियाबाद ही थी।
‘‘मेरी शादी हो गई हैऔर मेरी एक बेटी भी है।’’ उसने कहातो मैं आश्चर्य से उसका चेहरा देखने लगी थी।
‘‘तो झूठ क्यों बोला तुमने?’’
‘‘मैं तुम्हें गिल्ट फील कराना चाहता था बस।’’ कहते हुए उसने पहले से ही बाहर निकाला हुआ अपना बैग उठायाऔर मुझे बाय कहकर निकल गया।
आदित्यजरा भी नहीं बदला। सोचते हुए मैं बची हुई चाय खत्म करने लगी।
और मेरी तरह ट्रेन भी आगे बढ़ गई।






प्रियंका ओम 

जन्म :- 05 मई 
स्थान :- जमशेदपुर , झारखंड 
शिक्षा :- अंग्रेज़ी साहित्य से स्नातक, सेल्ज़ एंड मार्केटिंग से मास्टर्ज़
साहित्य :- विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित 
शैली :- पॉप्युलर फ़िक्शन 
प्रकाशित पुस्तकें :- वो अजीब लड़की ( कहानी संग्रह ) 2016
                                                     मुझे तुम्हारे जाने से नफ़रत है ( कहानी संग्रह ) 2018