Wednesday, September 25, 2019

मैं गाँव से निकल चुकी थी क़स्बे की तरफ महानगर की लड़कियों का पता ढूंढते हुए

"रास्ता?"
उन भागी हुई लड़कियों ने पूछा होगा।
वे भागी क्योंकि उन्हें देखने थे दुनिया के तमाम रास्तेपगडंडियाँ और सड़कें।
इन लड़कियों के भीतर से कभी नहीं निकलेंगी उनकी पीछे छूट चुकी सखियाँ
वे जब-जब थकेंगी

उन्हें याद आएगा कि अभी उन्हें चलना है उनके सखियों के हक़ का भी...



गाँव से क़स्बे और क़स्बे से शहर की यात्रा में लड़कियों के लिए आज़ादी के मानी बदलते हैंं कभी विजित और कभी ठगा सा महसूस करती हैं। खुद को 'अन्य' पाती हैं उनके सामने जो उनकी सहेलियाँ हैं लेकिन शहरी हैं और फिर वे अपनी जड़ों से जुड़ती हैं किसी नए ढंग से...
अपने अनुभवों का यह कोलाज एक युवा चोखेरबाली,  ऐश्वर्या ने हमें यह लिख भेजा है। आज पढिए चोखेरबाली पर-  






1. कल रात जब मैंने फेसबुक पर अपडेट किया था, "दूरदराज़ से आये, अपना गांव-क़स्बा साथ लेकर दिल्ली में घूमते ये लड़के "
मैं ऐसा लिखते समय उन सभी लड़कों के सपनीले, चमकते आंखों को याद कर रही थी जो बिहार, झारखण्ड, राजस्थान के सुदूर इलाक़ों से आकर दिल्ली में रह रहे हैं। उनके पास घण्टे भर बैठूँ तो खेत, दियरा, सरकारी स्कूलों के छत पर जमती मंडलियाँ, चुपके-चुपके शहर जाकर फिल्में देखने या सिगरेट पीने की कहानी, उनके बड़े आँगन वाले घरों में बची-बचाई संजुक्त परिवारों के पात्रों का ऐसा खांका कल्पनाओं में उकेर लेती हूँ कि वे सारी जगहें-लोग-गाँसफूंस-ऊँट-मवेशी दूर के रिश्तेदार बनकर मेरी स्मृतियों में रह जाते हैं।

मेरी इस खुशनुमा फैंटेसी की दुनिया से ठीक उलट है एक और कहानी, इस कहानी में मेरी दोस्त का नाम 'अमृता' रख लेते हैं फिलहाल।
कॉलेज का पहला साल शुरू हुआ था, हिंदी ड्रामेटिक सोसाइटी के ऑडिशन में मैंने दुष्यंत कुमार की पंक्तियों पर मोनोलॉग किया था, तब वहाँ ऑडिशन के लिए वो भी आई थी, 100-150 लोगों की भीड़ में अमृता को शायद मैं अपनी सी लगी थी। हम दूसरी बार कॉलेज लॉन्स में मिले, हमें एक दूसरे का नाम तो नहीं पता था पर हमने दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों और अरुंधति रॉय की किताबों पर लम्बी बातचीत की थी। तीसरी बार हम लाइब्रेरी में मिले, अमृता अक्सर लाइब्रेरी जाया करती थी, ऐसे ही किसी दिन रीडिंग रूम में हमें एक-दूसरे का नाम पता चला था।

उस दिन मैं लाइब्रेरी में लेटी पड़ी थी, वो मुझ से थोड़ी दूरी पर बैठी कोई अंग्रेज़ी अख़बार पढ़ रही थी, हम दोनों लंबे समय से चुप थे, मुझे नहीं पता उस पल में ऐसा क्या था, या मुझमें ऐसा क्या था जो अमृता पास आकर बोल पड़ी "मैं तुम्हें कुछ बताना चाहती हूँ", मैं उठकर बैठ गयी। "अपने परिवार में मैं पहली लड़की हूँ जो उस शहर से बाहर आ पाई, पिछली पीढ़ियों की बात नहीं करूंगी, अभी कुछ दिन पहले मेरी पंद्रह साल की चचेरी बहन का ब्याह हुया है"

मैं चुप रही और वह बातें करती गयी..अपने शहर के बारे में, अपनी बहनों के बारे में, दिल्ली आने के बारे में..'विक्टिमहुड' नहीं था उसके चेहरे पर.. पहले वह भाव अफ़सोस था, कारण कई औरतों-बच्चियों के नाम हो सकते थे; और फिर 'अफ़सोस' संतुष्टि में तब्दील होने लगी, यह संतुष्टि उपज थी दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ पाने, लाइब्रेरी में अपनी मर्ज़ी से घण्टों बैठ पाने, बिना सर्विसेजलेंस दोस्तों के साथ सड़कों पर टहल पाने, घर से आये पैसे बचाकर किताबें आर्डर कर पाने, स्विगी कर ब्राउनी माँगने पाने, प्रोटेस्ट-एलेक्शन्स-लेफ्ट-राइट पर घण्टों कॉलेज लॉन्स में लेटकर गप्पें मार पाने की छोटी-छोटी आज़ादियों का!
                 
 हम जब भी मिलते हैं तो वो अपनी पढ़ी-हुई नई किताबों के बारे में चाव से बात करती है, मैं उसे फिल्मों-हिंदी कवियों के बारे में बताती हूँ। जब कभी मैं कोई नया झोला खरीदती वह हर बार पूछती, "कहाँ से लिया?" फिर मैं उसे दिल्ली के उस कोने-खोपचे बाज़ारों के बारे में बताती जहाँ महँगे दिखते झोले सस्ते मिला करते हैं। कल वो मुझे 'मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस' के उन हिस्सों के बारे में बताने लगी जो मैंने अपने आलस में नहीं पढ़े थे। मैंने उससे पहली बार उसके राजस्थान के बारे में पूछा, जो कुछ भी उसने बताया वो ज़ायके, कपड़े, बोलियों के बारे में थे..लेकिन कोई ऐसी नटखट बचकानी व्यक्तिगत कहानी नहीं थी जैसा मेरे लड़के दोस्त सुनाया करते हैं। जिस तरह ये लड़के पीछे मुड़कर देखते हैं और मुस्कुराने लग जाते हैं, वो मुस्कान अमृता(ओं) के हिस्से वर्तमान और भविष्य में झाँकते हुए आती है!

हम अक्सर एक-दूसरे से कहती हैं कि हम इन दो दुनिया के बीच लगी ब्रिज हैं, एक जो हम छोड़ आई हैं, और एक जो मिरांडा हाउस के अंदर है।

दूर-दराज़ से आये, अपना गाँव-क़स्बा साथ लेकर दिल्ली में घूमते लड़के, अगली बार जब घर जाना, देखना अपनी बहिनों, पड़ोसिनों, दूध दूहती या चावल फटकारती किसी अंजान लड़की को। उनकी आँखें भी मेरी काजल भरी, दुनियां को निहारती आँखों जैसे ही हैं। हम सभी हैं अमृता...
 चित्र इंटरनेट से साभार


2. भागी हुई लड़कियाँ-
ये घर से भागी हुई लड़कियाँ आख़िर क्यों भागती हैं?
पढ़ने के ख़ातिर? प्रेम के ख़ातिर?
आँगन और तुलसी को पीछे छोड़ते हुए
कई छलाँगें लगाईं होंगी उन्होंने
एक छलाँग में चौखट पार कर पाने से पहले,
जब उसने चाहा होगा अपनी सखियों को बैग में हंसोंत
साथ ले जाना,
उनकी सखियाँ बिफ़र पड़ी होंगी
और समझाया होगा कि भागना नहीं है रास्ता,
"रास्ता?"
उन भागी हुई लड़कियों ने पूछा होगा।
वे भागी क्योंकि उन्हें देखने थे दुनिया के तमाम रास्ते, पगडंडियाँ और सड़कें।
इन लड़कियों के भीतर से कभी नहीं निकलेंगी उनकी पीछे छूट चुकी सखियाँ
वे जब-जब थकेंगी
उन्हें याद आएगा कि अभी उन्हें चलना है उनके सखियों के हक़ का भी...

ये लड़कियाँ भागकर कहाँ जाती होंगी?
पुस्तकालय? संग्रहालय? अपने प्रेमी के पास?
या वे चमेली हो खिलती होंगी किसी टहनी से
और लग जाती होंगी
अपनी अगली पीढ़ी की किसी भागती लड़की के बालों में जाकर..

3. जब मैं कस्बे में थी मुझे महानगर जाना था
क्योंकि मैं देखती थी महानगरों की लड़कियों के खुले, रंगीन बाल
उनकी आज़ाद हँसी, स्त्रीवाद पर लिखे उनके लंबे-चौड़े लेख,
मैं मन ही मन उनके लिए तालियाँ बजाती..

मैं महानगर आयी,
मैंने किताबें पढ़ी खूब सारी और बाल कर लिए छोटे
मेरे आस-पास रहती मेरे कस्बे से आयी लड़कियों ने मेरे लिए तालियाँ बजायीं,
मैं असंतुष्ट थी
मैं चाहती थी कि महानगर की वे सारी मेरी हमउम्र लड़कियाँ भी
मुझे देखें, तालियाँ बजायें...
आज, बड़े दिनों बाद
महानगर की कुछ लड़कियाँ,
मुझे घेर कर खड़ी हो गईं और कहा
"तुम कस्बे से शहर आयी कैसे?
क्या तुम्हें तकलीफ़ हुई सीखने में अंग्रेज़ी?
क्या अब भी तुम्हारे तरफ चमार सिलता है जूते?
वैसे तुमपर खूब फबते हैं छोटे बाल"
फिर
मेरा जवाब सुने बिना वे सब वहाँ से निकल गयी,
किसी को जाना था सी.पी.,
किसी को 'कविता-पाठ' में हिस्सा लेने,
किसी के घर से आ रहा था कॉल,
और किसी को पूरी करनी थी स्त्रीवाद पर लिखी जा रही अगली क़िताब।
मैं देर रात वहीं खड़ी रही,
कि शायद उनमें से कोई वापस आ जातीं
और मेरे लिए बजा दी होती तालियाँ।

आज मैं 'कुसुम' थी।

कुसुम मेरे गाँव की पहली लड़की है जिसने सालों पहले
सबसे पहले हासिल की थी
सरकारी कॉलेज से स्नातक की डिग्री,
शायद उसे सुननी थी मेरी तालियाँ,
जब उसने अपनी अंगूठाछाप मां को भेजा था मुझे बुलाने
मैं गाँव से निकल चुकी थी कस्बे की तरफ
महानगर की लड़कियों का पता ढूंढते हुए...



परिचय: ऐश्वर्या, मिरांडा हाउस कॉलेज में दर्शनशास्त्र की द्वितीय वर्ष की छात्रा।

1 comment:

priya said...

Very nice.. Inspiring