Wednesday, October 30, 2019

निर्वात की कड़ियाँ कब टूंटेगी?


- रश्मि रावत


‘आजादी’ शब्द ही ऐसा मनोहारी है कि कान में पड़ते ही मन में लुभावनी छवियाँ तिरने लगती हैं। खुले आकाश में पंख पसारे चहचहाते परिंदों की खुशनुमा उड़ानें, हँसते-गाते-मचलते-खेलते-दौड़ते बच्चे (बच्चियाँ अलग से बोलना पड़े तो कैसी आजादी),....हर ओर जीवन की उमंग, अपने होने का, जीने का उत्सव।

   जीवन जब बाधा दौड़ हो तो मनोजगत की ये छवियाँ देर तक नहीं चलतीं। मनुष्य होने के नाते जो मानवाधिकार हर किसी को मिले ही होने चाहिए, उन्हें हासिल करने के लिए भी अनवरत संघर्षों की दरकार हो तो मुक्ति की कल्पना भी अबाध क्योंकर हो। हाँ आँखें मुक्ति का यह सपना देख पाती हैं-इसका मतलब पहले से बेहतर स्थिति तक तो हम पहुँचे ही हैं। सपना देख पाना छोटी बात तो है नहीं। राजनीतिक स्वतंत्रता के आने से सामाजिक, आर्थिक आयामों में फर्क न पड़ा हो, ऐसा तो नहीं है, मगर उसकी गति काफी धीमी रही है। बेहतर समतामूलक स्वस्थ भविष्य की उम्मीद जगने लगी थी। मगर पिछले कुछ समय में स्वस्थ, सुंदर जिंदगी जीने की राह की अड़चनें बढ़ती जा रही हैं। संवैधानिक मूल्यों को जड़ परम्पराओं और उग्र उपभोक्तावाद की ताकतों के सामने लचर पड़ते देखने के अनुभवों में इजाफा ही हो रहा है। सामाजिक भेदभाव के खत्म हुए बिना आजादी की कल्पना की भी कैसे जा सकती है। तीन-चौथाई भारत शेष एक चौथाई इंडिया का उपनिवेश ही लगता है।


आज के समय की सबसे बड़ी विडम्बना है कि यथार्थ की विषमता का बोध ही लोगों को नहीं है। बोध नहीं है तो विषमता को दूर करने के उपक्रम भी भला कैसे होंगे। साहित्य और अच्छे लेखन की और लघु पत्र-पत्रिकाओं की वर्तमान में बहुत अधिक जरूरत है, मगर लोगों को अपनी इस जरूरत का पता ही नहीं है। इस चुनौती से निपटने के क्रम में अपनी भूमिका तलाशने की कोशिश की तो और भी तीखे ढंग से पता चला कि यह खाई कितनी बड़ी है।


यथार्थ बोध सम्पन्न चिंतन-मनन-लेखन करने वाले लोगों की संख्या इतनी बड़ी नहीं है कि समय की माँग को पूरा कर सके। लिखने-पढ़ने के अपने अनुभवों से एहसास हुआ कि इन चंद लोगों में भी बहुलांश की मानसिकता विभाजित है। दृष्टि खंडित है। समानता मूलकता अभी उनके लिए भी सुदूर भविष्य की कोई चीज है जो सिर्फ यूटोपिया में हो सकती है इसलिए उसके लिए कोशिश करने का हौसला ही नहीं पैदा हो पाता।  वस्तुत: सदियों से मन-मस्तिष्क में जड़ें जमाए हुए ढाँचों को दरकाने के लिए सजग और निरंतर कोशिशों की दरकार होती है। हमारी कोशिशें ढीली पड़ती हैं तो वे मजबूत होते हैं। दूसरी स्थिति यह है कि वर्चस्वशाली वर्ग के विशेषाधिकारों से चिपटे रहने की ललक ( मैं इस ललक को ‘वासना’ मानती हूँ) इतनी तीव्र है कि सामाजिक बराबरी वह चाहता ही नहीं है, सामाजिक मुक्ति का शब्दाडंबर रचना बस उसने सीख लिया है। भीतर परम्परा के ढाँचे कमोबेश अक्षुण्ण रहते हैं और अभिव्यक्ति में समानता के भाव का छद्म भी बना रहता है।

एक स्त्री होने के नाते अकादमिक-बौद्धिक जगत में मिले अपने अनुभवों की ही बात करूँ। स्त्री-दृष्टि की अवधारणा कुछ समय पहले तक मेरी वैचारिकी का अलग से हिस्सा नहीं थी। अब भी साफ समझ बन गई हो, कह नहीं सकती। स्पष्ट तौर पर तो बस यही जानती और मानती आई हूँ कि संविधान में स्त्री-पुरुष सब बराबर हैं और उन्हें समान अधिकार मिले हुए हैं। स्वतंत्र भारत के मध्यवर्गीय परिवार में जब जन्म लिया तब तक पढ़ने की, हँसने-बोलने, खाने-पीने, नौकरी करने की सुविधा जैसे बुनियादी अधिकार स्त्रियों को प्राप्त हो चुके थे। मतलब ऐसा दिखने लायक परिवर्तन सामाजिक गतिकी में हो चुका था कि इन जीवन-गतिविधियों में जाहिरा तौर पर बराबरी सी दिखे, आचरण और अभिव्यक्ति का इतना कौशल तो तब तक समाज ने अर्जित कर ही लिया था। तो उम्र का अब तक का हिस्सा अपने आप को स्वतंत्र भारत का आजाद नागरिक मानते हुए गुजारा। जिसमें स्त्रियों के कर्त्तव्य और अधिकार एकदम वही हैं जो कि पुरुष के। हर सार्वजनिक, सामाजिक परियोजनाओं में हमेशा खुद को एक व्यक्ति समझा, नागरिक समझा। व्यक्ति होने में जब-जब, जिस-जिस आयाम में हारती रही तब-तब अपने को कमतर समझने का बोध पुष्ट होता गया। उम्र बढ़ने के साथ व्यक्तित्व के कई आयामों में मैं खुद को हीन समझती गई। मगर ऐसे ही जैसे एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से कमतर या बेहतर होता ही है किसी काम में। उन क्षेत्रों में जिनमें वस्तुनिष्ठता अपेक्षाकृत अधिक पाई जाती है जैसे गणित, विज्ञान इत्यादि में खुद को हमेशा बराबर समर्थ पाया। साहित्य-लेखन जैसे क्षेत्र में जिनमें विषयनिष्ठता तुलनात्मक ढंग से अधिक पाई जाती है, कोई स्पेस कभी किसी चीज का बना नहीं पाई। स्पेस से मेरा मलतब है अपनी बात कहने का अवसर। तनिक प्रोत्साहन, या लिखे हुए या बोले हुए पर कोई भी प्रतिक्रिया, जिससे अपनी कमी या ताकत का पता चले। कम से कम इतना भर कि लिखा हुआ सम्प्रेषित होता भी है या नहीं। ‘स्पेस’ का अर्थ किसी मुकाम तक पहुँचना मेरे लिए कदाचित नहीं है। संवाद की स्थिति बनना ही स्पेस है हम स्त्रियों के लिए। कह-सुन भर पाने की स्थितियाँ होना काफी लगता है। अकादमिक कार्यक्रमों, पत्र-पत्रिकाओं, सोशल मीडिया सब जगह स्त्रियों की संख्या निरंतर बढ़ती दिखाई दे रही है इसलिए इन सब बाधाओं का स्त्री होने से कोई सम्बंध है, लम्बे समय तक कोई ध्यान नहीं गया। लगा कि जिसमें काबलियत होगी वह साहित्यादि लिख-पढ़ रहे होंगे। मुझे दुनिया के कुछ और काम खोज लेने चाहिए। इसलिए बीच के तमाम वर्षों में क्षेत्र बदल-बदल कर पढ़ाई और काम करती रही। दर्शन शास्त्र तो पहले पढ़ लिया था। मनोविज्ञान पढ़ा।  मानवाधिकार, पर्यावरण और पारिस्थितिकी, जेंडर अध्ययन, शिक्षा शास्त्र में औपचारिक अध्ययन किया। लैंगिक सौहार्द और सॉफ्ट स्किल की कई कार्यशालाओं में लोगों को प्रशिक्षित करने का अवसर मिला। जब पुलिसकर्मियों और अन्य कामगारों से जुड़ी जहाँ लैंगिक विभेद बाहरी आचरण में या एकदम ऊपरी सतह पर दिखाई देता है। मानसिक मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए की गई गुड़ाई में लैंगिक विषमता के मोटे-मोटे ढेले मिले। जिनके अस्तित्व से इंकार करना असंभव था। लैंगिक विभेद की सख्त चट्टानों, मोटे-मोटे ढेलों से टकराने के बारम्बार के अनुभवों के कारण समानता की छद्म चेतना को बनाए रखना असम्भव हो गया। उन ढेलों को निकालकर बाहर फेंकने में जब सफलता मिलती है तो क्रमशः महीन होती जाने वाली जकड़नें दिखाई देने लगती हैं। पुलिस कर्मचारी, छात्रों के लैंगिक संवेदीकरण के लिए अपने साहित्य के अध्ययन का न केवल प्रयोग करती थी। अपितु नई-नई रचनाएँ खोज-खोज कर पढ़ती थी जिससे सही बात सही ढंग से कह सकूँ। इस प्रक्रिया में प्रबुद्ध जन के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व में गूँथा हुआ विभेद साफ नजर आने लगा। बौद्धिक, अकादमिक जगत में यह विषमतामूलकता महीन स्तर पर काम करती है इसलिए महीन बुद्धि या गहरी खुदाई से ही नजर आ सकती थी। कम से कम उस व्यक्ति की आँखों से तो कदाचित नहीं दिख सकती थी जो स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के जश्न की समारोही घोषणाओं पर भरोसा करके और संविधान को अपना धर्मग्रंथ मानते हुए बढ़ी हुई हो। अपने भीतर और बाहर के उस नशे की चेतना ही अगर न हो जिससे हम जाने-अनजाने संचालित होते हैं तो कैसे आधुनिक हो सकते हैं। सचेतन, सुचिंतित अनवरत सक्रियता के बिना भला कैसे कोई किताब (संविधान) आचरण और सोच को निर्धारित कर सकती है। विविध अनुभवों की इस मुठभेड़ ने मुझे महीन स्तर पर कार्यरत विषमता के विषफलों को पहचानने की दृष्टि दी तो रील की तरह वह अनुभव आँखों के सामने घूमने लगे जो पहले बोध न होने से समझ नहीं आए थे। उन पर अगली कड़ी पर बात करेंगे। एक स्त्री की आजादी के बारे में सोचती हूँ तो उन कानों को जन्म देना जो एक स्त्री को सुनना सीख पाएँ, मुझे अपना दायित्व लगता है, जो मेरे समय ने मुझे सौंपा है, जो किया जाना अगली पीढ़ी की स्त्रियों की आजादी के लिए नितांत जरूरी है।





नया कुछ सुनने के कान चंद ही लोगों के पास हैं। जिस दिन भी एक जोड़ी ऐसे कान मिल जाते हैं तो मन पूरा दिन प्रफुल्लित रहता है। अंग-अंग में ताजगी आ जाती है। प्रभा खेतान को कार की स्टीयरिंग थामने पर लगा था कि पहली ड्राइविंग के आनंद के सामने प्रथम चुम्बन का आह्लाद फीका है।









जिन रचनाकारों ने प्रतिबद्धता के साथ खुले दिमाग से लिखा है, उनका लेखन इस जरूरत को एक हद तक पूरा करता है। ममता कालिया की कहानी ‘तोहमत’ मेरी बात को बेहतर ढंग से साफ कर पाएगी। इसमें आशा और सुधा नाम की दो करीबी सहेलियाँ हैं जो साथ पढ़ती हैं, टहलती हैं, सपने देखती हैं। एक-दूसरे का साथ उन्हें सोद्देश्यतापूर्ण जीवन जीने और सपनों को पूरा करने की योजनाएँ बनाने का हौंसला देता है । एक शाम टहलते हुए सुरम्य प्रकृति के बीच दरिया की मौजों ने उन्हें अपनी ओर बरबस खींच लिया। चार कदमों के साथ होने ने स्त्री शरीर में होने से उपजी बंदिशों को भुला ही दिया। प्रकृति की ताल से तरंगित उनका मन निर्धारित सीमा रेखा से दूर उन्हें ले गया तो शाम घिर आयी और उस सुनसान माहौल से घबरा कर वे दौड़ते-भागते-हाँफते, कँटीली झाड़ियों में उलझतीं, गिरती-पड़तीं घर पहुँचीं। उनके कपड़े जगह-जगह से चिर गए थे, शरीर में जगह-जगह खरोंचें बन गईं थे। उनकी हालत देख कर बिना उनसे पूछे परिजनों ने मान लिया कि उनके साथ बलात्कार हुआ है। वे दोनों लाख कहती रह गईं कि हमारे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ। पर घर भर में मातम छाया रहा। खाना-पीना-सोना कुछ नहीं हुआ। “सुधा ने सारी घटना बताने की कोशिश की, लेकिन उसे महसूस हुआ, उसके सामने तीन बहरे बैठे हैं। वे ठूँठ बन उसे घूर रहे थे।...माँ घुटनों में सिर दिए सारी रात रोती रही, अपनी कोख को कोसती रही। सुबह पिता ने ऐलान कर दिया कि आज से सुधा का कॉलेज जाना बंद।” एक घटना उन मेधावी विद्यार्थियों की जिंदगी की सारी सम्भाव्यताओं को और उनके सारे रिश्तों-नातों को कुचल सकती है। यह शुचिता का मिथक कितना बेहूदा है। उस पर तो लम्बे समय से बहुत कुछ कहा-सुना जा ही रहा है। विडम्बना यह कि घटित का सच भी समाज अपने सीमित सामान्यता बोध से तय करेगा।


     हैरानी की बात है कि इक्कीसवीं सदी में दिल्ली जैसे महानगर के प्रबुद्ध वर्ग के बीच बोलते हुए भी कानों की कमी महसूस होती है। जिस बात को 2-3 सत्रों में पुलिस वालों या छात्रों को सम्प्रेषित कर पाती हूँ, वह भी इस बौद्धिक वर्ग के बीच सम्प्रेषित करना मुश्किल ही है। अक्सर इसी भावमुद्रा के साथ वे बैठे रहते हैं कि सच उनकी जेब में है। नया कुछ सुनने के कान चंद ही लोगों के पास हैं। जिस दिन भी एक जोड़ी ऐसे कान मिल जाते हैं तो मन पूरा दिन प्रफुल्लित रहता है। अंग-अंग में ताजगी आ जाती है। प्रभा खेतान को कार की स्टीयरिंग थामने पर लगा था कि पहली ड्राइविंग के आनंद के सामने प्रथम चुम्बन का आह्लाद फीका है। मेरे अलावा अन्य स्त्रियों के अनुभव भी ये रहे हैं कि ऐसे कान मिलने का अनुभव प्रेम से कम सुखकर नहीं। सन 2006 से ही मै कुछ-कुछ लिखती रही थी। 2008-2009 में तो जनसत्ता, दैनिक भास्कर, वागर्थ, लोकायत, आर्यकल्प आदि कई पत्र-पत्रिकाओं में छपा भी। भारतीय भाषा परिषद की महत्वकांक्षी परियोजना हिंदी साहित्य कोश के लिए भी कुछ प्रविष्टियाँ लिखीं हैं। एम-फिल, पी.एच.डी के दौरान प्रस्तुतियाँ पाठ्यक्रम का हिस्सा होती हैं। वे सब अच्छे से सम्पन्न हुई, काफी सराहना भी मिली। पर इस सब को तो कई वर्ष गुजर गए। आज तक कभी किसी अकादमिक काम में मुझे शामिल नहीं किया गया है। शोध जमा करने की अर्हता प्राप्त करने के लिए राष्ट्रीय सेमिनार में पेपर प्रस्तुति का प्रमाण पत्र चाहिए होता है। वह हासिल करने के लिए भी  अवसर उपलब्ध नहीं हुआ । अधिकतर जगह सिर्फ अवसरों, हितों के आदान-प्रदान या पद देख कर बुलाने का माहौल है। नागरिकता बोध सम्पन्न वैयक्तिक स्त्री पुरुषों को कतई रास नहीं आती। जेंडर संवेदित नई संवेदना वाले चंद पुरुषों को छोड़ दें तो बाकि के पुरुषों के बोध में दो ही तरह की स्त्री अटती है। पारम्परिक स्त्री और पौरुष गुणों को आत्मसात की हुई स्त्री। या तो स्त्री की आँखों में वह माधुर्य दिखना चाहिए जैसा घरों की शालीन स्त्रियों में दिखता है। न सही मधुरता कम से कम आँखों में एक निरीह सी कातरता तो दिखे कि सामने वाला कोई अवसर बताते हुए या सूचना देते हुए जमीन से कुछ ऊँचा उठा हुआ महसूस करे। व्यक्तित्वबोध सम्पन्न एक ऐसी ही आत्मविश्वासी निर्भय स्त्री को समाज से मिलने वाली चुनौतियों को नूर जहीर ने ‘नायिका अभिसारिका’ कहानी में बयां किया है। उसके ठोस व्यक्तित्व से घबरा कर कोई उससे शादी नहीं करना चाहता है तो उसे अपने गुणों को ढाँप कर रखना पड़ता है ताकि उचित समय पर उन्हें जिया जा सके। वर्ना अक्सर स्त्री के ये गुण अविकसित ही रह जाते हैं। उम्र के शुरूआती चरण में अनुकूल माहौल मिलने पर विकसित हो भी गए तो फिर बाद में कुंठित हो कर रह जाते हैं। मगर यह नायिका गुण कायम रखती है भले ही काफी समय तक अव्यक्त तौर पर। अर्चना वर्मा एक कहानी के संदर्भ में कहती हैं कि नायिका कभी अपने अस्तित्व के भीतर जाती थी कभी उसके बाहर। अपने अस्तित्व के साथ जीने के लिए अनुकूल स्थितियाँ स्त्री के लिए अब तक नहीं बनी हैं । उसे अपने वजूद को काट-छील कर या उसमें कुछ अनावश्यक जोड़ कर अपनी जगह बनाने की बहुत जद्दोजहद करनी पड़ती है, इस प्रक्रिया में बहुत कुछ अनमोल छूट जाता है। स्त्री का असली रूप सामने नहीं आ पाता और समाज को भी एक नई समावेशी दृष्टि से वंचित रहना पड़ता है। यथार्थ का बड़ा हिस्सा ओझल ही रह जाता है। अगर शिखा और आशा के परिजन उनकी बात सुन लेते तो उन्हें भी कितनी राहत मिलती। कान झाड़ कर बैठना सिर्फ आधी आबादी के नहीं पूरे समाज के स्वास्थ्य को बिगाड़ रहा है। यह विचार का अलग बिंदू है कि अगर उनके साथ यह घटा होता तो ऐसे सहयोग करना चाहिए परिवार को?
      अकादमिक, औपचारिक-अनौपचारिक बैठकियों में अपनी बात कहते हुए अक्सर यह महसूस हुआ है कि शब्दों को अपनी य़ात्रा करने के लिए जिस माध्यम की जरूरत होती है, वह हवा अचानक गायब हो गई है। एक निर्वात बन गया है जिससे आवाज गति नहीं कर पा रही। सब रुक गया है। थम गया है। लगने लगता है कि काश ऑक्सीजन का बैग होता तो पहले उसे उड़ेल कर हवा पैदा करूं तो अपनी कहूँ। सोचती हूँ क्या स्त्री-विमर्श ऑक्सीजन का सिलेंडर ही है जो अपनी बातें कहने के लिए माध्यम उपलब्ध करवा रहा है। पहले की स्त्री-पीढ़ी इतना कुछ लिख कर न छोड़ गई होती तो जो टुकड़ा-टुकड़ा बातें पहुँच भी पाती हैं, वे भी कहाँ पहुँचतीं। स्कूल के दौर में प्रेमचंद, रविंद्रनाथ टैगोर, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, टॉलस्टाय, चेखव,...इत्यादि क्लासिक लेखकों को खूब पढ़ा। बाद के सालों में भी इस कड़ी में कई नाम जुड़ते रहे। मगर दुर्भाग्य! स्त्री-रचनाकारों तक पहुँचने तक उम्र का एक बड़ा हिस्सा निकल गया। प्रौढ़ हो कर ही उनके लेखन से ठीक से सामना हुआ। उनके लेखन ने रगों में संकुचित हो कर बहने वाले खून को रवानगी दी है। खुद के प्रति स्वीकार भाव आया है। कभी-कभी लाड़ भी। अपराध भाव कम हुआ। कमतरी का एहसास कुछ कुंद हुआ। अगर जीवन की उठान के समय ही उन्हें पढ़ लिया होता तो सम्भवतः मेरा व्यक्तित्व और उपलब्धियाँ खुद पर गर्व करने लायक होतीं। वर्तमान में तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। समाज में सारे सामान्यीकरण पुरुष के हिसाब से हैं। जरा सा अलग सोचने पर दिमागी पेंच ढीला हो गया है’, समाज ऐसा सोचने पर मजबूर करता है। मेरे परिवार में मुझ से बड़े चार भाई हैं। चारों ही मेरे प्रति बेहद स्नेहशील और उदार हैं। रोक-टोक और संरक्षण का भाव तो उनसे कभी मैंने जाना ही नहीं। हम सब जेंडर समानता को स्थापित सच मान कर जी रहे थे। मगर आँखें बंद करने से काँटे चुभना तो मगर नहीं छोड़ते। हर वह काम जो वे करते थे मैं भी करती थी। उन्हें ये एहसास मगर नहीं था कि इतने बड़े मूल्य को लाने के लिए सायास, सचेतन ढंग से माहौल बनाना पड़ता है। देहरादून की उस समय की कस्बाई समझ के हिसाब से एक अच्छी लड़की होने की भूमिका और चारों भाई के साथ लड़का होने की दौड़ साथ-साथ करने में मेरी पूरी ऊर्जा और व्यक्तित्व का कचूमर निकल गया। घर में माँ, मौसी, आंटियों की अपेक्षा के अनुरूप सभी सामाजिक अपेक्षा पूरी करती रहूँ और बाहर भाइयों की। वे भी आखिर मेरी तरह समाज के उत्पाद ही हैं तो लाजमी ही है कि पुरुषों से समाज द्वारा अपेक्षित गुण उन्होंने जाने-अनजाने अर्जित कर लिए होंगे। भाई के विवाह के बाद भाभी घर आईं तो लगा कि जैसे मेरे घर में कान उग आए हैं। लगा पूरा घर हवा से भर गया है। जहाँ शब्द दोतरफा यात्रा करते हैं। उनकी आमद ने घर को जिस तरह मेरे लिए सुकून भरा आसरा बना दिया। लगता है काश ऐसा समाज में भी हो पाए। जेंडर संवेदना विकसित हो जाए तो सुनने वाले कान समाज में उग जाएँगे तब स्त्री-विमर्श की अलग से जरूरत नहीं पड़ेगी और आज जब वर्तमान की चुनौतियाँ इतने भयावह रूप में सामने खड़ी हैं।  ये समय है क्या अपने संघर्ष को अलग-अलग समूहों में विभक्त करने का?







रश्मि रावत दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट्स एण्ड कॉमर्स में अध्यापन कर रही हैं।  हिंदी में पीएच.डी के अलावा मानवाधिकार, जेंडर स्टडी, पर्यावरण , शिक्षा  शास्त्र पर औपचारिक अध्ययन। विभिन्न पत्रिकाओं में नियमित स्तम्भ लेखन। आलोचना इनका मुख्य क्षेत्र  है।  

Tuesday, October 29, 2019

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन


स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से पुनर्पाठ और नवोन्मेष की तरह हैं। अनुप्रिया इन दिनों जिस तरह डूब कर अपना काम कर रही हैं मानो वे उसी में जी रही हैं। उनके रेखांकन कविता की तरह अनंत अर्थ छवियाँ समेटे हैं। इनकी विशेषता है कि उनमें आधुनिक और परम्परागत जीवन के बीच स्त्री अस्मिता की छ्टपटाहट, उसके व्यक्तित्व की तमाम परतें, उलझने, उम्मीद और सपने अभिव्यक्ति पाते हैं। उसका अकेलापन है, एकांत है, बहनापा है। उनके रेखांकनों से महज़ गुज़र जाना सम्भव नहीं है, हमें ठहरना होता है और वे खुद किन्हीं प्रतीकों, किन्हीं कोड्स के साथ हमारे भीतर ठहर जाते हैं। कभी हम बुद्ध हो जाती और आधे हिस्से में तमाम कामनाएँ सजाती स्त्री का चेहरा घण्टों देखते रह सकते हैं, कभी देखते ही कोई भाव उतर आता है हृदय में, कभी बस आह! निकलती है या अचानक किसी रेखांकन में एक स्त्री की कुर्ती में लगा सेफ़्टी पिन दर्ज हो जाता है मन में, याद आ जाती है अनामिका की कविता या अपनी ही किसी मौसी, माँ का चेहरा। इनका पूरा शिल्प समझने के लिए स्त्री के साझा अनुभवों और संघर्षों तक जाना होता है और लोक-कला में बसी स्त्री, उसके भित्ति-चित्र, कलाकारी के ज़रिए एक कहानी कहने का कौशल समझना होगा। खुद अनुप्रिया के शब्दों में एक स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है अपने लिए अपने आप से ही।यह लड़ाई कब तक चलेगी नहीं जानती।होगी थकान ,कभी टूट भी जाएं बिखरने की हद तक ,लेकिन रुकना नहीं है ।चलते जाना है ।एक दूसरे का हाथ थामे ,उम्मीदों के बीज अपनी खुरदरी हथेली में लिए जलते जाना है  उस मद्धम रोशनी के लिए जो हमारे भीतर उग आयी है ।  

आज चोखेरबाली पर अनुप्रिया के इन दस रेखांकनों के साथ हम इसे एक स्थायी स्तम्भ की तरह शुरु करने जा रहे हैं। अनुप्रिया के रेखांकनों का यह चोखेरेबाली कोना इस पेज पर दर्ज रहेगा और नियमित अपडेट होता रहेगा।  - सुजाता 


अनुप्रिया 


Thursday, October 24, 2019

रमणिका गुप्ता की आत्मकथा 'आपहुदरी' की एक पाठकीय समीक्षा



 - रीना पंत 

आखिरकार रमणिका गुप्ता जी की 'आपहुदरी एक जिद्दी लड़की की आत्मकथा' पढ़ ली। यह किताब मैने बहुत पहले मंगवा ली थी। स्वयं रमणिका जी ने ही बताया था कि मैं सामयिक प्रकाशन से मंगवा लूं। किताब आ गई और वक्त निकाल कर पढ़ी जाने वाली किताबों के बीच रख भी दी पर बीच में कई दूसरी किताबें पढ़ लीं। इस किताब की मोटाई देख हर बार फिर पढ़ूंगी सोचकर किताब ज्यों की त्यों रखी रही। इस बीच रमणिका जी के जाने की खबर मिली। नजर किताब पर पड़ी फिर रह गई एक दिन यकायक किताब उठाई पढ़ना शुरू किया और जब तक पूरी नहीं पढ़ी तब तक छूटी नहीं। बस डूबती चली गई किताब में। दो भागों में लिखी किताब के पहले भाग में उनके पारिवारिक जीवन, बचपन , यौवन के संघर्ष हैं और दूसरे भाग में उनके राजनैतिक जीवन की कहानी है। हादसे के बाद उनकी आत्मकथा की दूसरी कड़ी है आपहुदरी।




एक अद्भुत आत्मकथ्य है आपहुदरी। बोल्ड बहुत बोल्ड!  एक औरत के जीवन का संघर्ष हमेशा बोल्ड ही होता है बशर्ते लेखिका के अंदर उसे कहने का साहस हो। इसका बोध तब ही हो जाता है जब लेखिका कहती है। 'मैं रमना हूँ।

अपने सामंती परिवार के भीतर की दुनिया में करीबी रिश्तों से ही ठगी स्त्री दुनिया भर में प्रेम ढूंढती रही, दोस्त ढूंढती, अकेली अपने अस्तित्व की पहचान के लिए संघर्ष करती जब कहती है तो समझ में आता है कि उसका साहस, 'एक दृढ़ संकल्प मन में कहीं मचल रहा था, मैं, मैं हूँ। मेरी पहचान है, मैं संपूर्ण स्त्री बनकर दिखाऊंगी, जो संपूर्ण मनुष्य होती है। अर्धांगिनी नहीं, अपने में सम्पूर्ण! '


तब वह अपने भीतर की स्त्री को खत्म नही होने देती। बार-बार टूटी, निराश, हतोत्साहित हुई औरत फिर-फिर उठी और कहने लगी, 'नदी तब तक नहीं रूकती जब तक उसका पानी का स्रोत खत्म नहीं हो जाता और मैने अपने भीतर की स्त्री के स्रोत को कभी खत्म नहीं होने दिया। '


लेखिका इस भरे पूरे कठोर संसार में अपने प्रति संवेदना खोजती रहीं । इस बेहद बेदर्द दुनिया में टिकी रही। इसलिए पृष्ठभूमि में ही स्पष्ट कर देती हैं 'मुझे बदलाव प्रिय है हालांकि मैं अब भी भीतर से कहीं रमना ही हूँ। '


आत्मकथा और वह भी बेबाक, लिखना आसान नहीं होता होगा। सेना में डाक्टर पिता की बेटी,दो भाइयों की बहन रमणिका ,दादी ,बहन ,भाभियों,घर आने वाले मेहमानों से भरे पूरे घर में भी अकेली थी। मास्टर द्वारा किए शारीरिक शोषण को वो अपनी माँ को भी न बता पाई पर बहन को मास्टर ने अपना शिकार बनाया तो फट पड़ी और मास्टर को घर से जाना पड़ा। काश हमारे समाज में लड़कियों को आवाज मिलती तो रमणिका जी की आत्मकथा किसी और रूप में होती। लेखिका कई जगह जिक्र करती है वो अपने पिता के घर से जाना चाहती थीं इसलिए उन्होंने विवाह किया। कैसी विडंबना रही जिस घर में लड़की सबसे ज्यादा महफूज़ होती है वहाँ से भाग जाने का मन करे अपने अस्तित्व को पाने के लिए।  रमणिका जी भी भाग जाना चाहतीं थीं। 


तो क्या विवाह के बाद उन्हें वैसा जीवन मिल गया जैसा जीवन वे चाहतीं थीं। कुछ ही समय के बाद वे समझ गईं कि उनके रास्ते इतने सरल और सहज नहीं हैं। जो लोग संपर्क में आए उन्होंने उन्हें स्त्री से देह बनाकर उनका शोषण किया। लेखिका ने स्वीकार किया कि इन संबंधों से ही उनके खर्चे चलते। 


राजनैतिक जीवन में प्रवेश करते ही उन्होंने राजनीति और उसमें पनप रही पितृसत्तात्मक प्रवृत्ति को खूब महसूस किया। उससे जुड़ी, लड़ीं और आगे बढ़ीं और कह पाईं "राजनीति में समझौता या व्याभिचार ज्यादा चलता है और बलात्कार कम।" अंत में रमणिका जी कहती हैं, "मैं औरत के लिए स्वछंद शब्द को स्वतंत्र से बेहतर मानती हूँ… . . मैं स्वछंद होना श्रेयस्कर समझती हूँ चूंकि इसमें छद्म नहीं है, दंभ भी नहीं है। "

बस एक मलाल रह गया कि उनके जाने के बाद किताब पढ़ी। इसलिए न जाने कितने अनकहे प्रश्न अनुत्तरित रह गए । मैं उनसे पूछती कि क्या माँ बेटी के बीच की अंडरस्टैंडिग इतनी भी न थी कि अपनी बेटी के शारीरिक शोषण को समझ ही न पाईं।? या सामंती परिवारों की परंपरा में  स्त्री का शोषण बहुत सहजता से स्वीकार किया जाता है?पत्नी अपने पति के, बेटी अपने पिता के,मां अपने बेटे के विवाह से इतर संबंधों को आसानी से स्वीकार करती है। 


भारतीय मानसिकता से कंडिशन्ड औरतों की परंपरा को तोड़ती लेखिका की स्वीकारोक्ति कि वो मास्टर के साथ सैक्स इंजौय करती थी, एक बहुत बोल्ड स्टेटमैंट है। क्या ये लिखते हुए उन्होंने एक बार भी सोचा नहीं कि लोग क्या कहेंगे? कैसे रिएक्ट करेंगे


एक लड़की की मनोदशा की कल्पना कीजिये जो भी पुरूष उसके संसर्ग में आता है उसके साथ उसके दैहिक संबंध हो जाते हैं? क्या उसके लिए इतना आसान होता होगा किसी के साथ या कह लीजिए इतने लोगों के साथ दैहिक-संबंध बनाना!


क्या स्त्री सिर्फ और सिर्फ देह है? जिसका इस्तेमाल पुरुष मर्जी से करता है और स्त्री करने देती है
वे कई जगह लिखती हैं कि ये पुरूष जो पैसे देते थे उनसे लेखिका अपनी जरूरतें पूरी करती थीं। क्यों नहीं  वे आम औरतों की तरह प्रकाश (पति) की कमाई से गुजारा नहीं कर सकतीं थीं

पर आप तो आपहुदरी थीं, जिद्दी लड़की, आम कैसे होतीं! आप तो खास थीं रमणिका जी। आपके लिए सम्मान और बढ़ गया मेरे मन में मेरी आपहुदरी, आप होतीं तो शायद कुछ प्रश्नों के उत्तर मिल जाते। 


रीना पंत मुम्बई में रहती हैं। पेशे से शिक्षिका हैं।साहित्य को बच्चों और आमजन तक पहुँचाने के लिए कथा समय कार्यक्रम और आइए रोइए sharing room द्वारा लोगों के दर्द तक पहुँचने के प्रयासों के अतिरिक्त किताबें पढने का शौक रखती हैं।उनसे pantreena22@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।  




Friday, October 18, 2019

बातें बेवजह की

अपना ही तमाशा बनाकर हम स्त्रियों ने एक-दूसरे के बीच एक अटूट दीवार खड़ी कर ली है। इसके बीच जो भी खिड़की बनती है उससे विचारों के बीच-बीच करवाचौथ की थालियाँ फिराई जाने लगती हैं। आज चोखेरेबाली पर ममता सिंह का यह लेख साझा कर रही हूँ पढिए और सोचिए कि सुहाग के जिन त्यौहारों को  हम अपने जीवन में प्रेम का प्रतीक बना रहे हैं वे सभी त्यौहार मिलकर समस्त स्त्री-समाज के लिए दुर्गति का पहाड़ रच रहे हैं। हम कितनी खुशी से उन स्त्रियों को बाहर कर दे रहे हैं जिनके  लिए इस सबमें शामिल होना परम्पराविरुद्ध और दोष है। अजीब खुशी है यह। अक्सर अश्लील।  बेवजह की लगने वाली बातें स्त्रियों के सामूहिक अस्तित्व के ज़रूरी सवाल हैं।-     

 
 


बातें बेवजह की
-         - ममता सिंह
करवा चौथ, तीज आदि व्रत का उपहास उड़ाना कभी मन्तव्य नहीं रहा पर कई बार भौचक रह जाती हूँ जब देखती हूँ कि अभी हाल में ही जिस सखी ने रोते हुए फ़ोन पर अपनी व्यथा सुनाई,जिसकी भेजी तस्वीर में पड़े नील कई रातों तक मेरे सपनों को चीरते रहे वही करवाचौथ पर माँग टीका लगाए,मेहंदी रचाये पति के साथ डीपी में परफेक्ट कपल लग रहे। वैसे बताना ज़रूरी है कि सखी हमारी सरकारी नौकरी में है यानी आर्थिक रूप से कोई मजबूरी नहीं फिर भी आए दिन मार पीट जीवन का हिस्सा है। कुछ समझाओ सब बेकार,अगले व्रत,त्योहार पर वह सभ्य,भारतीय स्त्री बनी मुस्कुराते हुए पोज़ देते दिखती है,बाक़ी दिन रोते बिसूरते।

दाम्पत्य में झगड़े होना आम है पर यदि पति माँ-बहन की गाली दे, हर तिमाही  नियम से कूटे और पत्नी उसके मर जाने की दुआ करती हुई कुढती रहे तब यह व्रत और हैप्पी फैमिली, “मेड फ़ॉर ईच अदर” का दिखावा मन में वितृष्णा ही भरता है।

सहेली से पूछना चाहती हूँ कि दूसरी बेटी की पैदाइश पर हॉस्पिटल में ही बीबी को छोड़कर भाग जाने वाले पति के साथ वैष्णो देवी की यात्रा का स्टेटस फेसबुक से लेकर व्हाट्सप्प पर लगाना, हर वक्त दुनिया की नज़र में सुगढ़, सलीकेदार बनना और सबसे बड़ी बात स्वामिभक्ति का दिखावा कब तक चलेगा ! आसपास नज़र उठाकर देखती हूँ तो हर घर में स्त्रियों की त्रासद कहानियाँ बिखरी हैं,क्या पुराना ज़माना,क्या नया लगभग सब एक जैसी।

हाँ पहनावे ओढ़ावे में अंतर आया है,अभी दस वर्ष पहले लगभग एक पचास वर्षीया चाची जिन्होंने हाल में बेटा ब्याहा था ने जब ब्रा पहनना शुरू किया ख़ूब उपहास की पात्र बनीं। ये वही औरतें हैं जिन्होंने अपनी छोटी सी छोटी इच्छा को अच्छी औरत होने के तमगे के लिए मारा। अब ख़ूब दहेज लाई किसी बहू की सलवार-कुर्ता पहनने की मांग आराम से मान ली गई यह कहकर कि बड़े घर की बेटी है,नाज़ुक है।


पति द्वारा त्यागी पर ज़िन्दगी भर सिंदूर,बिछिया पहन सुहागिनों द्वारा किये जाने वाले व्रत उपवासों, पूजा में बैठने भर की सुविधा पर निहाल ये औरतें कब सच स्वीकारेंगी पता नहीं। मेरी एक सहेली की पढ़ाई दसवीं में ही इसलिए उसके पिता ने छुड़ा दी थी क्योंकि उसके बैग में किसी लड़के का दिया प्रेमपत्र मिला। शादी ढूंढने पर कम पढ़े होने के कारण परेशान होकर तीन साल  बाद उसे प्राइवेट इंटर और बाद में बी.ए. भी प्राइवेट कराया गया। शादी एक बहुत पिछड़े इलाके में हुई ,परिवार बहुत बड़ा और दकियानूसी था किन्तु पति सरकारी नौकरी में और पत्नी को प्रेम करने वाला था तो गुज़र ठीक से हो जा रही थी। एक बेटी भी पैदा हुई ही थी उसकी पैदाइश के छठवें दिन एक दुर्घटना में पति की मृत्यु हो गई। 

भाई और पिता उसे मायके ले आये थोड़ी कोशिशों के बाद बी.ए. होने के कारण अप्रोच से सहेली को नौकरी मिल गई। नौकरी और बच्ची के साथ वह सेटल हो ही रही थी कि समाज,परिवार ने फिर से उसके लिए फंदा तैयार किया,न पहली बार उससे कुछ पूछा,बताया गया न दुबारा। वह भी संस्कारी बेटी,बहन बनी चुप रही और उसका विवाह दसवीं पास, गुटखा खाने,आवारागर्दी करने वाले देवर से कर दिया गया। मायके वालों ने इज़्ज़त बचाई, ससुराल वालों ने कमाऊ बहू पाई। तिसपर एहसान यह कि एक विधवा को फिर से सुहागिन चोला पहना दिया। दूसरी बेमेल शादी इसलिए भी ज़रूरी थी कि भला रोज़ बाहर निकल सरकारी नौकरी करने वाली पच्चीस साल की स्त्री पर पिता,भाई समेत पूरा समाज भरोसा कैसे कर सकता था,क्या पता वह किस जगह फिसल जाए सो घर की इज़्ज़त को घर में ही महफूज़ कर दिया गया।

अब देवर तो हुआ पति तो उसके भीतर का पुरुष जाग पड़ा, घूंघट निकालकर वह ऑफिस जाती,पति पहुंचाने,लेने जाता।  दिन में भी अचानक ऑफिस में छापेमारी होती कि कहीं किसी से नैन मटक्का तो नहीं कर रही। पुरुष तो दूर की बात ऑफिस में महिला सहकर्मी से भी दोस्ती की इजाज़त नहीं। सारी सावधानी के बावज़ूद एकदिन भयंकर गलती हो गई। हुआ यूं कि एक सीनियर की माताजी का देहांत हो गया,सारा स्टाफ़ मातमपुर्सी के लिए जा रहा था तो सहेली भी चली गई। पतिदेव आये और उसे ऑफिस में न पाकर गुस्से से लाल-पीले हो उठे। उस रात पति ने हाथ उठाया। पिता को फ़ोन करके उल्टा सीधा कहा।

पिता भाई अगले रोज़ गए,उसका पक्ष सुने बिना उसे नसीहतों की पोटली थमा आए। देवर के भीतर  कम पढ़े होने, बेरोजगार होने की कुंठा को अब मारपीट और लांछन की शक्ल में बाहर निकलने का मौका मिल गया। सास- ननदें भी पति की मृत्यु का दोषी उसे ठहराती रहीं हालांकि उसने तीज,करवा चौथ के व्रत तब भी रखे थे,अब भी रख रही थी।

बात बिगड़ती गई,उसका झुका सिर और झुकता गया,आखिर में एकदिन नर्वस ब्रेकडाउन होने पर जब हॉस्पिटलाइज कराने की नौबत आई तब पिता,भाई पसीजे उसे लम्बी छुट्टी दिला मायके लाये। मायके में भी अक्सर पति आकर गाली गलौज, झगड़े करता तब ऊबकर उसका ट्रांसफर मायके कराया गया। एक कैद से निकलकर दूसरी कैद में रहने की शुरुआत थी यह क्योंकि वही नियम कानून मायके में भी थे कि ऑफिस में किसी से दोस्ती नहीं करना,मोबाइल नहीं रखना,कहीं अकेले आना-जाना नहीं। कई दिनों बाद देवर से तलाक हुआ पर अब भी वह चौड़ा पीला सिंदूर लगाती है, ख़ूब चौड़े पल्ले की साड़ी पहनती है और सिर झुकाकर चलती है। पूजा पाठ करना,सारे तीर्थ मायके वालों के साथ जाकर करना उसके जीवन में शामिल है।

उससे मिलने उसके घर नहीं ऑफिस जाती हूँ,वह भी चुपके से जबकि बचपन की सहेली हूँ, घरेलू ताल्लुक़ात हैं हमारे,फिर भी घर जाने पर माँ, भौजाइयाँ यूँ घेर कर बैठ जाती हैं कि हम बस दुनिया की बातें,साड़ी की डिजाइन,सोने के चढ़ते भावों पर ही बात करते हैं,अपनी बात करने की न इजाज़त न मोहलत। कई बार मैंने पूछा क्या इतने व्रत करने से तुम्हें शांति मिलती है,उसने कहा मन को शांति कहाँ पर घर में शांति रहती है। जब अपने माँ बाप,भाई भौजाई को ही नहीं होश कि मैं ज़िंदा इंसान हूँ,मुझमें भी कुछ ख़्वाहिशें हैं,कुछ सपने हैं तब और किसी से क्या शिकायत। एकबार तो भावावेश में उसने कहा कि यदि मेरी बेटी की ज़िंदगी का सवाल न होता तो कब की आत्महत्या कर चुकी होती। एक पति की मृत्यु,दूसरे से तलाक के बावजूद सिंदूर,चूड़ी,बिछुआ उसके लिए समाज की क्रूर निगाहों और पूजा,व्रत परिवार की निगाहों में तनिक सहानुभूति पाने का ज़रिया भर है।  साहस से काम लेने और एक फ़ोन रखने की सलाह को वह एक कान से सुनती है,दूसरे से निकाल देती है।

बात नए ज़माने की हो या पुराने, स्त्रियां एक ही नाव पर सवार दिखती हैं मुझे। हमारे टोले में एक काकी हैं तीन बेटों एक बेटी की माँ। सबसे छोटा बेटा साल भर का था कि उनके मियाँ जी को काकी में सौ कीड़े नज़र आने लगे मसलन काकी फूहड़ हैं,साफ़-सफ़ाई से नहीं रहतीं,पढ़ी-लिखी नहीं हैं,आगे के दाँत बड़े हैं वगैरह। मज़ेदार बात यह सब नुक्स उन्हें चार बच्चों की पैदाइश के बाद नज़र आए। वे पढ़े-लिखे सरकारी नौकरी वाले मर्द थे इसलिए उनकी शिकायत जायज़ ठहरी। काकी चार बच्चों,सास-ससुर,ननद के साथ गाँव में चौका-चूल्हा,गोबर-पानी,धान-पिसान करती रहीं,काका मात्र डेढ़ कोस पर पक्का घर बना अपनी पढ़ी लिखी प्रेमिका के साथ खुलेआम रहने लगे । काका के इस कदम पर समाज,समय,सभ्यता,संस्कृति का एक पत्ता भी नहीं हिला, बड़ी आसानी से लोगों ने उनके इस कदम को स्वीकार कर लिया,काकी की किस्मत में सुख नहीं बदा था ,इतनी भर सहानुभूति उनके हिस्से आई।
काकी पहले ही कम बोलती थीं,अब एकदम ख़ामोश हो गईं,घर बाहर की स्त्रियां उन्हें सब्र करने की घुट्टी पिलातीं और सीता मैया से लेकर जाने कहाँ कहाँ के उदाहरण देतीं। कोई भी उन्हें बिना बेचारी कहे नहीं बात करता था मसलन गंगा पार वाली बेचारी को कल बीछी(बिच्छु) मार दी,बेचारी का तीसरा बच्चा बहुत बीमार है,बेचारी सोलह साल से मायके नहीं गई। काकी का नाम क्या है हमें बरसों नहीं मालूम चला,काकी का मायका कहाँ है कुछ बरस पहले पता चला..काकी कभी हँसती नहीं थीं,काकी गुस्सा भी नहीं करती थीं,और तो और काकी रोती भी नहीं थीं।


हमने उन्हें जब भी देखा काम करते ही देखा, उनकी बेटी हमारी उम्र की थी,त्योहारों में काका हमारे यहाँ मिलने आते तब वह आती,चुपचाप खड़ी रहती काका उसपर निगाह भी नहीं डालते थे। अम्मा जबर्दस्ती उसे काका के सामने खड़ा कर देतीं और कहतीं देखो तो भैया कितनी सुंदर है यह,बिल्कुल तुम पर पड़ी है।पढ़ने में बहुत अच्छी है,बेटों को जाने दो कम से कम बेटी पर ध्यान दे दो,काका अनमने से दूसरी तरफ़ देखते रहते। हाँ जाते वक़्त कुछ रुपये बेटी को थमा जाते।

काकी सुहागिनों द्वारा की जाने वाली पूजा में बुलाई जातीं,यह सात,चौदह,इक्कीस सुहागिनों द्वारा पूजा जाता था,किसी सुहागिन को इससे नहीं मतलब था कि कोई स्त्री पति की प्रिया है या नहीं,उसने विवाह करके क्या खोया-क्या पाया! उनके लिए जरूरी था मांग में सिंदूर होना,भले ही पति उसे छोड़कर दूसरी दुनिया में रहने लगा हो,वह स्त्रियां इकट्ठी होकर  पति की लंबी उम्र के लिए कथा कहतीं,पैरों में आलता और एक दूसरे को नाक से लेकर पीछे मांग तक सिंदूर लगातीं,घंटों देवी गीत गातीं... देवी जी ने काकी के कौन से दुख दूर किये यह काकी ही जानें,पर वह बुलावे में जाती जरूर थीं।

वक़्त बीतता रहा हम बचपन से किशोरावस्था में आ गए,अब ज़रूरतों के साथ सपने भी बड़े होने लगे। हम रोज़ अम्मा से कुछ न कुछ फ़रमाइशें करते,कभी वह पूरी होतीं,कभी न होतीं...
काकी के बच्चे भी किसी तरह पलते रहे,मुझे नहीं पता कि उनके बच्चों ने कभी उनसे फ़रमाइशें की होंगी या नहीं,अगर वह कुछ माँगते होंगे तो काकी कैसे उन्हें समझाती रही होंगी।कई बार अम्मा हमारी चीजें काकी के बच्चों को ख़ासकर बेटी को देतीं तो हम लड़ने लगते।शहर से आये नए फैशन के कपड़े,बस्ते,रबरबैंड भला किसी को देना कैसे सुहाता हमें,वही चीजें तो हमें और बच्चों से अलग  करती थीं।सारी धौंस,सारा रौब नए कपड़ों,सामानों का ही होता था नहीं तो सब एक ही स्कूल में पढ़ते,एक साथ खेलते,तब कहाँ इतनी समझदारी और संवेदनशीलता थी हममें।

पूरे गाँव में काकी बस अम्मा से ही अपने मन का हाल कहती थीं वह भी जब अंधेरा होने पर टोले भर की औरतें शौच के लिए झुंड बनाकर जाती थीं,काकी और अम्मा सबसे दूर चली जातीं..आजी लोग भुनभुनाती कि जाने यह दोनों इतनी दूर क्यों जाती हैं,इतनी देर क्यों लगाती हैं।हमारी अम्मा शहर की पढ़ी-लिखी और नौकरी वाली थीं इसलिए वह बखूबी जवाब दे देती थीं उन औरतों को ,लेकिन काकी वह हमेशा चुप रहतीं।

काकी के बेटे पैसों के अभाव, देखभाल की कमी और खेतीबाड़ी में जुटने के कारण हाइस्कूल के बाद  नहीं पढ़ पाए पर बेटी पढ़ने में तेज थी,वह बीए तक पढ़ी।अब बात और ज़रूरतें पढ़ाई से ज़्यादा शादी पर केंद्रित हो गईं।काका भी रिटायर होने वाले थे,और इनदिनों उनकी प्रेमिका से उनके सम्बन्ध कुछ ठीक नहीं चल रहे थे सो वह उनके घर से चली गई थीं..बुज़ुर्गों ने मौके का फ़ायदा उठाकर एक दिन काकी और उनके बच्चों को लेकर उन्हें मनाने गए। हालांकि होना इसका उल्टा चाहिए था यानी काकी को नाराज़ होना और काका को मनाना चाहिए था पर एक तो पति ,दूजे सरकारी नौकरी वाला तो उसका रुतबा देवता से बड़ा होना ही था।

सारा लावलश्कर काका के घर पहुंचा...बुजुर्गों को बैठने के लिए काका ने कहा पर पत्नी और चार बच्चों से बोले तक नहीं...घण्टों काका चारपाई पर बैठे रहे काकी और बेटी पैर पकड़कर रोती रहीं,साथ गए बुजुर्गों ने काका से उनके बेटी-बेटों के ब्याह की समस्या,काका के आसन्न बुढ़ापे,उनके बड़े ब्लड प्रेशर और अन्य बीमारियों का हवाला देकर घर लौटने का दबाव बनाया,उस कहानी में काकी का कहीं ज़िक्र या फ़िक्र शामिल नहीं था।

बरहहाल काका लौटे पर काकी से अबोला ठाने रहे,उनका खाना-कपड़ा सब बेटे-बेटी करते। धीरे धीरे बेटों और बेटी का ब्याह हुआ,काकी उसी तरह चुपचाप काम करती रहीं,हां उनके आगे के दाँत जरूर टूट गए।

पिछले बरस गया जगन्नाथ जी की तीर्थयात्रा पर जाने के लिए होने वाले अनुष्ठान में काका-काकी गाँठ जोड़कर कथा सुनने बैठे। बेटे बहू, बेटी दामाद ,नाती पोतों से घर आँगन भरा था..काकी नई नवेली दुल्हन की तरह घूंघट किये,चुनरी ओढ़े गठरी बनी बैठी थीं..लग रहा था वह सो रहीं या शायद रो रहीं थीं। स्त्रियां उनके भाग्य और त्याग तपस्या को सराह रही थीं कि देखो इनका भाग्य,इनकी तपस्या  जो चालीस बरस बाद पति के साथ गाँठ जोड़ कथा सुन रहीं। मेरा मन किया काकी को झिंझोड़कर जगा दूँ और पूछुं कि इतने बरसों की घुटन,दर्द,अभाव, अकेलेपन की कीमत क्या यही गाँठ जोड़कर कथा सुनना भर है,काश काकी वह चमकीली चुनरी ओढ़ने से इंकार कर देतीं,काश वह पूजा में साथ न बैठतीं!

पर पिक्चर अभी बाकी है दोस्तों... अभी पता चला कि काकी आज अपनी तीनों बहुओं के साथ करवा चौथ का  व्रत रखी हैं,जिसने भी सुना पहले ताज़्जुब फिर व्यंग्य से हँस दिया..फिर सर्वसम्म्मति से कहा गया आख़िर सुहागिन होने जैसा बड़ा पद काकी को मिला है,उसको निभाना तो चाहिए ही।

हम तो बरसों से तमाशाई थे,आज भी हैं।

परिचय यह कि अम्मा बताती हैं कि शादी के बाद बरसों तक बांझ कहलाने के बाद जब दुनिया समेत वह भी नाउम्मीद हो चली थीं तो पहले भैया और फिर मेरा जनम हुआ..बरस था 1978 और महीना था कातिक(नवम्बर) तारीख़ थी तीन।
बचपन में जन्मदिन मनाने की ज़िद करती तो अम्मा बहलाती थीं कि तू तो छोटी दीवाली को हुई थी,सारे जग में अंजोर करने को सो बहुत साल छोटी दीवाली को जन्मदिन समझ ख़ुश होती रही।

अम्मा गाँव के प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका थीं सो पढ़ना उन्हीं के स्कूल में शुरू हुआ,वह गज़ब की पढ़ाकू थीं,गाँव की पहली अंग्रेजी पढ़ी बहू, हिन्दी साहित्य की शौकीन...उन्होंने कोर्स की किताबों से ज़्यादा कहानी की किताबों को पढ़ने पर जोर दिया नतीज़न माँ से कुछ भी गुन ढंग नहीँ मिले पर मिल गई किताबें पढ़ने की लत।

किताबें पढ़कर दुनिया को जाना, समझा ..जीविकोपार्जन के लिए स्कूल मास्टरी कर रही,माँ के स्कूल में पढ़कर उसी में पढ़ाने गई तब तक माँ इस दुनिया से विदा हो गई थीं,था बस रजिस्टर में दर्ज़ उनका नाम।बच्चों और         किताबों के साथ गाँव की छोटी दुनिया में रहना-जीना.. रोज़ सीखना और खुद को बड़े होते देखना..

शौक के नाम पर यात्राएं करना,किताबें पढ़ना और आलसियों की तरह पड़े रहना ही है। हां एक सार्थक काम ज़िन्दगी में यह हुआ कि गाँव में एक छोटा सा निःशुल्क पुस्तकालय खोल लिया ताकि किताबों से इश्क़ फैलता रहे,अच्छी बात यह कि पुस्तकालय चल नहीं दौड़ रहा।
सम्पर्क: mamtathinks@gmail.com