Friday, October 18, 2019

बातें बेवजह की

अपना ही तमाशा बनाकर हम स्त्रियों ने एक-दूसरे के बीच एक अटूट दीवार खड़ी कर ली है। इसके बीच जो भी खिड़की बनती है उससे विचारों के बीच-बीच करवाचौथ की थालियाँ फिराई जाने लगती हैं। आज चोखेरेबाली पर ममता सिंह का यह लेख साझा कर रही हूँ पढिए और सोचिए कि सुहाग के जिन त्यौहारों को  हम अपने जीवन में प्रेम का प्रतीक बना रहे हैं वे सभी त्यौहार मिलकर समस्त स्त्री-समाज के लिए दुर्गति का पहाड़ रच रहे हैं। हम कितनी खुशी से उन स्त्रियों को बाहर कर दे रहे हैं जिनके  लिए इस सबमें शामिल होना परम्पराविरुद्ध और दोष है। अजीब खुशी है यह। अक्सर अश्लील।  बेवजह की लगने वाली बातें स्त्रियों के सामूहिक अस्तित्व के ज़रूरी सवाल हैं।-     

 
 


बातें बेवजह की
-         - ममता सिंह
करवा चौथ, तीज आदि व्रत का उपहास उड़ाना कभी मन्तव्य नहीं रहा पर कई बार भौचक रह जाती हूँ जब देखती हूँ कि अभी हाल में ही जिस सखी ने रोते हुए फ़ोन पर अपनी व्यथा सुनाई,जिसकी भेजी तस्वीर में पड़े नील कई रातों तक मेरे सपनों को चीरते रहे वही करवाचौथ पर माँग टीका लगाए,मेहंदी रचाये पति के साथ डीपी में परफेक्ट कपल लग रहे। वैसे बताना ज़रूरी है कि सखी हमारी सरकारी नौकरी में है यानी आर्थिक रूप से कोई मजबूरी नहीं फिर भी आए दिन मार पीट जीवन का हिस्सा है। कुछ समझाओ सब बेकार,अगले व्रत,त्योहार पर वह सभ्य,भारतीय स्त्री बनी मुस्कुराते हुए पोज़ देते दिखती है,बाक़ी दिन रोते बिसूरते।

दाम्पत्य में झगड़े होना आम है पर यदि पति माँ-बहन की गाली दे, हर तिमाही  नियम से कूटे और पत्नी उसके मर जाने की दुआ करती हुई कुढती रहे तब यह व्रत और हैप्पी फैमिली, “मेड फ़ॉर ईच अदर” का दिखावा मन में वितृष्णा ही भरता है।

सहेली से पूछना चाहती हूँ कि दूसरी बेटी की पैदाइश पर हॉस्पिटल में ही बीबी को छोड़कर भाग जाने वाले पति के साथ वैष्णो देवी की यात्रा का स्टेटस फेसबुक से लेकर व्हाट्सप्प पर लगाना, हर वक्त दुनिया की नज़र में सुगढ़, सलीकेदार बनना और सबसे बड़ी बात स्वामिभक्ति का दिखावा कब तक चलेगा ! आसपास नज़र उठाकर देखती हूँ तो हर घर में स्त्रियों की त्रासद कहानियाँ बिखरी हैं,क्या पुराना ज़माना,क्या नया लगभग सब एक जैसी।

हाँ पहनावे ओढ़ावे में अंतर आया है,अभी दस वर्ष पहले लगभग एक पचास वर्षीया चाची जिन्होंने हाल में बेटा ब्याहा था ने जब ब्रा पहनना शुरू किया ख़ूब उपहास की पात्र बनीं। ये वही औरतें हैं जिन्होंने अपनी छोटी सी छोटी इच्छा को अच्छी औरत होने के तमगे के लिए मारा। अब ख़ूब दहेज लाई किसी बहू की सलवार-कुर्ता पहनने की मांग आराम से मान ली गई यह कहकर कि बड़े घर की बेटी है,नाज़ुक है।


पति द्वारा त्यागी पर ज़िन्दगी भर सिंदूर,बिछिया पहन सुहागिनों द्वारा किये जाने वाले व्रत उपवासों, पूजा में बैठने भर की सुविधा पर निहाल ये औरतें कब सच स्वीकारेंगी पता नहीं। मेरी एक सहेली की पढ़ाई दसवीं में ही इसलिए उसके पिता ने छुड़ा दी थी क्योंकि उसके बैग में किसी लड़के का दिया प्रेमपत्र मिला। शादी ढूंढने पर कम पढ़े होने के कारण परेशान होकर तीन साल  बाद उसे प्राइवेट इंटर और बाद में बी.ए. भी प्राइवेट कराया गया। शादी एक बहुत पिछड़े इलाके में हुई ,परिवार बहुत बड़ा और दकियानूसी था किन्तु पति सरकारी नौकरी में और पत्नी को प्रेम करने वाला था तो गुज़र ठीक से हो जा रही थी। एक बेटी भी पैदा हुई ही थी उसकी पैदाइश के छठवें दिन एक दुर्घटना में पति की मृत्यु हो गई। 

भाई और पिता उसे मायके ले आये थोड़ी कोशिशों के बाद बी.ए. होने के कारण अप्रोच से सहेली को नौकरी मिल गई। नौकरी और बच्ची के साथ वह सेटल हो ही रही थी कि समाज,परिवार ने फिर से उसके लिए फंदा तैयार किया,न पहली बार उससे कुछ पूछा,बताया गया न दुबारा। वह भी संस्कारी बेटी,बहन बनी चुप रही और उसका विवाह दसवीं पास, गुटखा खाने,आवारागर्दी करने वाले देवर से कर दिया गया। मायके वालों ने इज़्ज़त बचाई, ससुराल वालों ने कमाऊ बहू पाई। तिसपर एहसान यह कि एक विधवा को फिर से सुहागिन चोला पहना दिया। दूसरी बेमेल शादी इसलिए भी ज़रूरी थी कि भला रोज़ बाहर निकल सरकारी नौकरी करने वाली पच्चीस साल की स्त्री पर पिता,भाई समेत पूरा समाज भरोसा कैसे कर सकता था,क्या पता वह किस जगह फिसल जाए सो घर की इज़्ज़त को घर में ही महफूज़ कर दिया गया।

अब देवर तो हुआ पति तो उसके भीतर का पुरुष जाग पड़ा, घूंघट निकालकर वह ऑफिस जाती,पति पहुंचाने,लेने जाता।  दिन में भी अचानक ऑफिस में छापेमारी होती कि कहीं किसी से नैन मटक्का तो नहीं कर रही। पुरुष तो दूर की बात ऑफिस में महिला सहकर्मी से भी दोस्ती की इजाज़त नहीं। सारी सावधानी के बावज़ूद एकदिन भयंकर गलती हो गई। हुआ यूं कि एक सीनियर की माताजी का देहांत हो गया,सारा स्टाफ़ मातमपुर्सी के लिए जा रहा था तो सहेली भी चली गई। पतिदेव आये और उसे ऑफिस में न पाकर गुस्से से लाल-पीले हो उठे। उस रात पति ने हाथ उठाया। पिता को फ़ोन करके उल्टा सीधा कहा।

पिता भाई अगले रोज़ गए,उसका पक्ष सुने बिना उसे नसीहतों की पोटली थमा आए। देवर के भीतर  कम पढ़े होने, बेरोजगार होने की कुंठा को अब मारपीट और लांछन की शक्ल में बाहर निकलने का मौका मिल गया। सास- ननदें भी पति की मृत्यु का दोषी उसे ठहराती रहीं हालांकि उसने तीज,करवा चौथ के व्रत तब भी रखे थे,अब भी रख रही थी।

बात बिगड़ती गई,उसका झुका सिर और झुकता गया,आखिर में एकदिन नर्वस ब्रेकडाउन होने पर जब हॉस्पिटलाइज कराने की नौबत आई तब पिता,भाई पसीजे उसे लम्बी छुट्टी दिला मायके लाये। मायके में भी अक्सर पति आकर गाली गलौज, झगड़े करता तब ऊबकर उसका ट्रांसफर मायके कराया गया। एक कैद से निकलकर दूसरी कैद में रहने की शुरुआत थी यह क्योंकि वही नियम कानून मायके में भी थे कि ऑफिस में किसी से दोस्ती नहीं करना,मोबाइल नहीं रखना,कहीं अकेले आना-जाना नहीं। कई दिनों बाद देवर से तलाक हुआ पर अब भी वह चौड़ा पीला सिंदूर लगाती है, ख़ूब चौड़े पल्ले की साड़ी पहनती है और सिर झुकाकर चलती है। पूजा पाठ करना,सारे तीर्थ मायके वालों के साथ जाकर करना उसके जीवन में शामिल है।

उससे मिलने उसके घर नहीं ऑफिस जाती हूँ,वह भी चुपके से जबकि बचपन की सहेली हूँ, घरेलू ताल्लुक़ात हैं हमारे,फिर भी घर जाने पर माँ, भौजाइयाँ यूँ घेर कर बैठ जाती हैं कि हम बस दुनिया की बातें,साड़ी की डिजाइन,सोने के चढ़ते भावों पर ही बात करते हैं,अपनी बात करने की न इजाज़त न मोहलत। कई बार मैंने पूछा क्या इतने व्रत करने से तुम्हें शांति मिलती है,उसने कहा मन को शांति कहाँ पर घर में शांति रहती है। जब अपने माँ बाप,भाई भौजाई को ही नहीं होश कि मैं ज़िंदा इंसान हूँ,मुझमें भी कुछ ख़्वाहिशें हैं,कुछ सपने हैं तब और किसी से क्या शिकायत। एकबार तो भावावेश में उसने कहा कि यदि मेरी बेटी की ज़िंदगी का सवाल न होता तो कब की आत्महत्या कर चुकी होती। एक पति की मृत्यु,दूसरे से तलाक के बावजूद सिंदूर,चूड़ी,बिछुआ उसके लिए समाज की क्रूर निगाहों और पूजा,व्रत परिवार की निगाहों में तनिक सहानुभूति पाने का ज़रिया भर है।  साहस से काम लेने और एक फ़ोन रखने की सलाह को वह एक कान से सुनती है,दूसरे से निकाल देती है।

बात नए ज़माने की हो या पुराने, स्त्रियां एक ही नाव पर सवार दिखती हैं मुझे। हमारे टोले में एक काकी हैं तीन बेटों एक बेटी की माँ। सबसे छोटा बेटा साल भर का था कि उनके मियाँ जी को काकी में सौ कीड़े नज़र आने लगे मसलन काकी फूहड़ हैं,साफ़-सफ़ाई से नहीं रहतीं,पढ़ी-लिखी नहीं हैं,आगे के दाँत बड़े हैं वगैरह। मज़ेदार बात यह सब नुक्स उन्हें चार बच्चों की पैदाइश के बाद नज़र आए। वे पढ़े-लिखे सरकारी नौकरी वाले मर्द थे इसलिए उनकी शिकायत जायज़ ठहरी। काकी चार बच्चों,सास-ससुर,ननद के साथ गाँव में चौका-चूल्हा,गोबर-पानी,धान-पिसान करती रहीं,काका मात्र डेढ़ कोस पर पक्का घर बना अपनी पढ़ी लिखी प्रेमिका के साथ खुलेआम रहने लगे । काका के इस कदम पर समाज,समय,सभ्यता,संस्कृति का एक पत्ता भी नहीं हिला, बड़ी आसानी से लोगों ने उनके इस कदम को स्वीकार कर लिया,काकी की किस्मत में सुख नहीं बदा था ,इतनी भर सहानुभूति उनके हिस्से आई।
काकी पहले ही कम बोलती थीं,अब एकदम ख़ामोश हो गईं,घर बाहर की स्त्रियां उन्हें सब्र करने की घुट्टी पिलातीं और सीता मैया से लेकर जाने कहाँ कहाँ के उदाहरण देतीं। कोई भी उन्हें बिना बेचारी कहे नहीं बात करता था मसलन गंगा पार वाली बेचारी को कल बीछी(बिच्छु) मार दी,बेचारी का तीसरा बच्चा बहुत बीमार है,बेचारी सोलह साल से मायके नहीं गई। काकी का नाम क्या है हमें बरसों नहीं मालूम चला,काकी का मायका कहाँ है कुछ बरस पहले पता चला..काकी कभी हँसती नहीं थीं,काकी गुस्सा भी नहीं करती थीं,और तो और काकी रोती भी नहीं थीं।


हमने उन्हें जब भी देखा काम करते ही देखा, उनकी बेटी हमारी उम्र की थी,त्योहारों में काका हमारे यहाँ मिलने आते तब वह आती,चुपचाप खड़ी रहती काका उसपर निगाह भी नहीं डालते थे। अम्मा जबर्दस्ती उसे काका के सामने खड़ा कर देतीं और कहतीं देखो तो भैया कितनी सुंदर है यह,बिल्कुल तुम पर पड़ी है।पढ़ने में बहुत अच्छी है,बेटों को जाने दो कम से कम बेटी पर ध्यान दे दो,काका अनमने से दूसरी तरफ़ देखते रहते। हाँ जाते वक़्त कुछ रुपये बेटी को थमा जाते।

काकी सुहागिनों द्वारा की जाने वाली पूजा में बुलाई जातीं,यह सात,चौदह,इक्कीस सुहागिनों द्वारा पूजा जाता था,किसी सुहागिन को इससे नहीं मतलब था कि कोई स्त्री पति की प्रिया है या नहीं,उसने विवाह करके क्या खोया-क्या पाया! उनके लिए जरूरी था मांग में सिंदूर होना,भले ही पति उसे छोड़कर दूसरी दुनिया में रहने लगा हो,वह स्त्रियां इकट्ठी होकर  पति की लंबी उम्र के लिए कथा कहतीं,पैरों में आलता और एक दूसरे को नाक से लेकर पीछे मांग तक सिंदूर लगातीं,घंटों देवी गीत गातीं... देवी जी ने काकी के कौन से दुख दूर किये यह काकी ही जानें,पर वह बुलावे में जाती जरूर थीं।

वक़्त बीतता रहा हम बचपन से किशोरावस्था में आ गए,अब ज़रूरतों के साथ सपने भी बड़े होने लगे। हम रोज़ अम्मा से कुछ न कुछ फ़रमाइशें करते,कभी वह पूरी होतीं,कभी न होतीं...
काकी के बच्चे भी किसी तरह पलते रहे,मुझे नहीं पता कि उनके बच्चों ने कभी उनसे फ़रमाइशें की होंगी या नहीं,अगर वह कुछ माँगते होंगे तो काकी कैसे उन्हें समझाती रही होंगी।कई बार अम्मा हमारी चीजें काकी के बच्चों को ख़ासकर बेटी को देतीं तो हम लड़ने लगते।शहर से आये नए फैशन के कपड़े,बस्ते,रबरबैंड भला किसी को देना कैसे सुहाता हमें,वही चीजें तो हमें और बच्चों से अलग  करती थीं।सारी धौंस,सारा रौब नए कपड़ों,सामानों का ही होता था नहीं तो सब एक ही स्कूल में पढ़ते,एक साथ खेलते,तब कहाँ इतनी समझदारी और संवेदनशीलता थी हममें।

पूरे गाँव में काकी बस अम्मा से ही अपने मन का हाल कहती थीं वह भी जब अंधेरा होने पर टोले भर की औरतें शौच के लिए झुंड बनाकर जाती थीं,काकी और अम्मा सबसे दूर चली जातीं..आजी लोग भुनभुनाती कि जाने यह दोनों इतनी दूर क्यों जाती हैं,इतनी देर क्यों लगाती हैं।हमारी अम्मा शहर की पढ़ी-लिखी और नौकरी वाली थीं इसलिए वह बखूबी जवाब दे देती थीं उन औरतों को ,लेकिन काकी वह हमेशा चुप रहतीं।

काकी के बेटे पैसों के अभाव, देखभाल की कमी और खेतीबाड़ी में जुटने के कारण हाइस्कूल के बाद  नहीं पढ़ पाए पर बेटी पढ़ने में तेज थी,वह बीए तक पढ़ी।अब बात और ज़रूरतें पढ़ाई से ज़्यादा शादी पर केंद्रित हो गईं।काका भी रिटायर होने वाले थे,और इनदिनों उनकी प्रेमिका से उनके सम्बन्ध कुछ ठीक नहीं चल रहे थे सो वह उनके घर से चली गई थीं..बुज़ुर्गों ने मौके का फ़ायदा उठाकर एक दिन काकी और उनके बच्चों को लेकर उन्हें मनाने गए। हालांकि होना इसका उल्टा चाहिए था यानी काकी को नाराज़ होना और काका को मनाना चाहिए था पर एक तो पति ,दूजे सरकारी नौकरी वाला तो उसका रुतबा देवता से बड़ा होना ही था।

सारा लावलश्कर काका के घर पहुंचा...बुजुर्गों को बैठने के लिए काका ने कहा पर पत्नी और चार बच्चों से बोले तक नहीं...घण्टों काका चारपाई पर बैठे रहे काकी और बेटी पैर पकड़कर रोती रहीं,साथ गए बुजुर्गों ने काका से उनके बेटी-बेटों के ब्याह की समस्या,काका के आसन्न बुढ़ापे,उनके बड़े ब्लड प्रेशर और अन्य बीमारियों का हवाला देकर घर लौटने का दबाव बनाया,उस कहानी में काकी का कहीं ज़िक्र या फ़िक्र शामिल नहीं था।

बरहहाल काका लौटे पर काकी से अबोला ठाने रहे,उनका खाना-कपड़ा सब बेटे-बेटी करते। धीरे धीरे बेटों और बेटी का ब्याह हुआ,काकी उसी तरह चुपचाप काम करती रहीं,हां उनके आगे के दाँत जरूर टूट गए।

पिछले बरस गया जगन्नाथ जी की तीर्थयात्रा पर जाने के लिए होने वाले अनुष्ठान में काका-काकी गाँठ जोड़कर कथा सुनने बैठे। बेटे बहू, बेटी दामाद ,नाती पोतों से घर आँगन भरा था..काकी नई नवेली दुल्हन की तरह घूंघट किये,चुनरी ओढ़े गठरी बनी बैठी थीं..लग रहा था वह सो रहीं या शायद रो रहीं थीं। स्त्रियां उनके भाग्य और त्याग तपस्या को सराह रही थीं कि देखो इनका भाग्य,इनकी तपस्या  जो चालीस बरस बाद पति के साथ गाँठ जोड़ कथा सुन रहीं। मेरा मन किया काकी को झिंझोड़कर जगा दूँ और पूछुं कि इतने बरसों की घुटन,दर्द,अभाव, अकेलेपन की कीमत क्या यही गाँठ जोड़कर कथा सुनना भर है,काश काकी वह चमकीली चुनरी ओढ़ने से इंकार कर देतीं,काश वह पूजा में साथ न बैठतीं!

पर पिक्चर अभी बाकी है दोस्तों... अभी पता चला कि काकी आज अपनी तीनों बहुओं के साथ करवा चौथ का  व्रत रखी हैं,जिसने भी सुना पहले ताज़्जुब फिर व्यंग्य से हँस दिया..फिर सर्वसम्म्मति से कहा गया आख़िर सुहागिन होने जैसा बड़ा पद काकी को मिला है,उसको निभाना तो चाहिए ही।

हम तो बरसों से तमाशाई थे,आज भी हैं।

परिचय यह कि अम्मा बताती हैं कि शादी के बाद बरसों तक बांझ कहलाने के बाद जब दुनिया समेत वह भी नाउम्मीद हो चली थीं तो पहले भैया और फिर मेरा जनम हुआ..बरस था 1978 और महीना था कातिक(नवम्बर) तारीख़ थी तीन।
बचपन में जन्मदिन मनाने की ज़िद करती तो अम्मा बहलाती थीं कि तू तो छोटी दीवाली को हुई थी,सारे जग में अंजोर करने को सो बहुत साल छोटी दीवाली को जन्मदिन समझ ख़ुश होती रही।

अम्मा गाँव के प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका थीं सो पढ़ना उन्हीं के स्कूल में शुरू हुआ,वह गज़ब की पढ़ाकू थीं,गाँव की पहली अंग्रेजी पढ़ी बहू, हिन्दी साहित्य की शौकीन...उन्होंने कोर्स की किताबों से ज़्यादा कहानी की किताबों को पढ़ने पर जोर दिया नतीज़न माँ से कुछ भी गुन ढंग नहीँ मिले पर मिल गई किताबें पढ़ने की लत।

किताबें पढ़कर दुनिया को जाना, समझा ..जीविकोपार्जन के लिए स्कूल मास्टरी कर रही,माँ के स्कूल में पढ़कर उसी में पढ़ाने गई तब तक माँ इस दुनिया से विदा हो गई थीं,था बस रजिस्टर में दर्ज़ उनका नाम।बच्चों और         किताबों के साथ गाँव की छोटी दुनिया में रहना-जीना.. रोज़ सीखना और खुद को बड़े होते देखना..

शौक के नाम पर यात्राएं करना,किताबें पढ़ना और आलसियों की तरह पड़े रहना ही है। हां एक सार्थक काम ज़िन्दगी में यह हुआ कि गाँव में एक छोटा सा निःशुल्क पुस्तकालय खोल लिया ताकि किताबों से इश्क़ फैलता रहे,अच्छी बात यह कि पुस्तकालय चल नहीं दौड़ रहा।
सम्पर्क: mamtathinks@gmail.com

4 comments:

DEVESH said...

Bahut Khubsoorat abhivyakrti Lekhika ka

malini gautam said...

कितना सटीक लिखा ममता ने, इनमें से कोई भी पात्र हवा में नहीं आया,सब हमारे आस पास ही हैं, हम सब इन्हें अक्सर देखते रहते हैं , लेकिन फिर भी उसी लकीर पर चलते हैं ।

Arvind Singh said...

दीदी आप और मुंशी प्रेमचंद की लिखावट में बहुत सारी समानता मिलती है बहुत अच्छा लगता है आपके पूरे पोस्ट को पढ़कर ऐसा लगता है समाज में फैली कुरीतियों को आप अपने शब्दों से कितना जल्दी दूर कर देती है

Ashok Kumar pandey said...

कितना सजीव...भीतर तक दहला देने वाला। ख़ूब शुभकामनाएं। और लिखिये