Thursday, October 24, 2019

रमणिका गुप्ता की आत्मकथा 'आपहुदरी' की एक पाठकीय समीक्षा



 - रीना पंत 

आखिरकार रमणिका गुप्ता जी की 'आपहुदरी एक जिद्दी लड़की की आत्मकथा' पढ़ ली। यह किताब मैने बहुत पहले मंगवा ली थी। स्वयं रमणिका जी ने ही बताया था कि मैं सामयिक प्रकाशन से मंगवा लूं। किताब आ गई और वक्त निकाल कर पढ़ी जाने वाली किताबों के बीच रख भी दी पर बीच में कई दूसरी किताबें पढ़ लीं। इस किताब की मोटाई देख हर बार फिर पढ़ूंगी सोचकर किताब ज्यों की त्यों रखी रही। इस बीच रमणिका जी के जाने की खबर मिली। नजर किताब पर पड़ी फिर रह गई एक दिन यकायक किताब उठाई पढ़ना शुरू किया और जब तक पूरी नहीं पढ़ी तब तक छूटी नहीं। बस डूबती चली गई किताब में। दो भागों में लिखी किताब के पहले भाग में उनके पारिवारिक जीवन, बचपन , यौवन के संघर्ष हैं और दूसरे भाग में उनके राजनैतिक जीवन की कहानी है। हादसे के बाद उनकी आत्मकथा की दूसरी कड़ी है आपहुदरी।




एक अद्भुत आत्मकथ्य है आपहुदरी। बोल्ड बहुत बोल्ड!  एक औरत के जीवन का संघर्ष हमेशा बोल्ड ही होता है बशर्ते लेखिका के अंदर उसे कहने का साहस हो। इसका बोध तब ही हो जाता है जब लेखिका कहती है। 'मैं रमना हूँ।

अपने सामंती परिवार के भीतर की दुनिया में करीबी रिश्तों से ही ठगी स्त्री दुनिया भर में प्रेम ढूंढती रही, दोस्त ढूंढती, अकेली अपने अस्तित्व की पहचान के लिए संघर्ष करती जब कहती है तो समझ में आता है कि उसका साहस, 'एक दृढ़ संकल्प मन में कहीं मचल रहा था, मैं, मैं हूँ। मेरी पहचान है, मैं संपूर्ण स्त्री बनकर दिखाऊंगी, जो संपूर्ण मनुष्य होती है। अर्धांगिनी नहीं, अपने में सम्पूर्ण! '


तब वह अपने भीतर की स्त्री को खत्म नही होने देती। बार-बार टूटी, निराश, हतोत्साहित हुई औरत फिर-फिर उठी और कहने लगी, 'नदी तब तक नहीं रूकती जब तक उसका पानी का स्रोत खत्म नहीं हो जाता और मैने अपने भीतर की स्त्री के स्रोत को कभी खत्म नहीं होने दिया। '


लेखिका इस भरे पूरे कठोर संसार में अपने प्रति संवेदना खोजती रहीं । इस बेहद बेदर्द दुनिया में टिकी रही। इसलिए पृष्ठभूमि में ही स्पष्ट कर देती हैं 'मुझे बदलाव प्रिय है हालांकि मैं अब भी भीतर से कहीं रमना ही हूँ। '


आत्मकथा और वह भी बेबाक, लिखना आसान नहीं होता होगा। सेना में डाक्टर पिता की बेटी,दो भाइयों की बहन रमणिका ,दादी ,बहन ,भाभियों,घर आने वाले मेहमानों से भरे पूरे घर में भी अकेली थी। मास्टर द्वारा किए शारीरिक शोषण को वो अपनी माँ को भी न बता पाई पर बहन को मास्टर ने अपना शिकार बनाया तो फट पड़ी और मास्टर को घर से जाना पड़ा। काश हमारे समाज में लड़कियों को आवाज मिलती तो रमणिका जी की आत्मकथा किसी और रूप में होती। लेखिका कई जगह जिक्र करती है वो अपने पिता के घर से जाना चाहती थीं इसलिए उन्होंने विवाह किया। कैसी विडंबना रही जिस घर में लड़की सबसे ज्यादा महफूज़ होती है वहाँ से भाग जाने का मन करे अपने अस्तित्व को पाने के लिए।  रमणिका जी भी भाग जाना चाहतीं थीं। 


तो क्या विवाह के बाद उन्हें वैसा जीवन मिल गया जैसा जीवन वे चाहतीं थीं। कुछ ही समय के बाद वे समझ गईं कि उनके रास्ते इतने सरल और सहज नहीं हैं। जो लोग संपर्क में आए उन्होंने उन्हें स्त्री से देह बनाकर उनका शोषण किया। लेखिका ने स्वीकार किया कि इन संबंधों से ही उनके खर्चे चलते। 


राजनैतिक जीवन में प्रवेश करते ही उन्होंने राजनीति और उसमें पनप रही पितृसत्तात्मक प्रवृत्ति को खूब महसूस किया। उससे जुड़ी, लड़ीं और आगे बढ़ीं और कह पाईं "राजनीति में समझौता या व्याभिचार ज्यादा चलता है और बलात्कार कम।" अंत में रमणिका जी कहती हैं, "मैं औरत के लिए स्वछंद शब्द को स्वतंत्र से बेहतर मानती हूँ… . . मैं स्वछंद होना श्रेयस्कर समझती हूँ चूंकि इसमें छद्म नहीं है, दंभ भी नहीं है। "

बस एक मलाल रह गया कि उनके जाने के बाद किताब पढ़ी। इसलिए न जाने कितने अनकहे प्रश्न अनुत्तरित रह गए । मैं उनसे पूछती कि क्या माँ बेटी के बीच की अंडरस्टैंडिग इतनी भी न थी कि अपनी बेटी के शारीरिक शोषण को समझ ही न पाईं।? या सामंती परिवारों की परंपरा में  स्त्री का शोषण बहुत सहजता से स्वीकार किया जाता है?पत्नी अपने पति के, बेटी अपने पिता के,मां अपने बेटे के विवाह से इतर संबंधों को आसानी से स्वीकार करती है। 


भारतीय मानसिकता से कंडिशन्ड औरतों की परंपरा को तोड़ती लेखिका की स्वीकारोक्ति कि वो मास्टर के साथ सैक्स इंजौय करती थी, एक बहुत बोल्ड स्टेटमैंट है। क्या ये लिखते हुए उन्होंने एक बार भी सोचा नहीं कि लोग क्या कहेंगे? कैसे रिएक्ट करेंगे


एक लड़की की मनोदशा की कल्पना कीजिये जो भी पुरूष उसके संसर्ग में आता है उसके साथ उसके दैहिक संबंध हो जाते हैं? क्या उसके लिए इतना आसान होता होगा किसी के साथ या कह लीजिए इतने लोगों के साथ दैहिक-संबंध बनाना!


क्या स्त्री सिर्फ और सिर्फ देह है? जिसका इस्तेमाल पुरुष मर्जी से करता है और स्त्री करने देती है
वे कई जगह लिखती हैं कि ये पुरूष जो पैसे देते थे उनसे लेखिका अपनी जरूरतें पूरी करती थीं। क्यों नहीं  वे आम औरतों की तरह प्रकाश (पति) की कमाई से गुजारा नहीं कर सकतीं थीं

पर आप तो आपहुदरी थीं, जिद्दी लड़की, आम कैसे होतीं! आप तो खास थीं रमणिका जी। आपके लिए सम्मान और बढ़ गया मेरे मन में मेरी आपहुदरी, आप होतीं तो शायद कुछ प्रश्नों के उत्तर मिल जाते। 


रीना पंत मुम्बई में रहती हैं। पेशे से शिक्षिका हैं।साहित्य को बच्चों और आमजन तक पहुँचाने के लिए कथा समय कार्यक्रम और आइए रोइए sharing room द्वारा लोगों के दर्द तक पहुँचने के प्रयासों के अतिरिक्त किताबें पढने का शौक रखती हैं।उनसे pantreena22@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।  




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