Thursday, November 14, 2019

कवयित्री बतौर गृहिणी


अनुराधा अनन्या इन दिनों विदेशी कवयित्रियों के अनुवाद कर रही हैं। चोखेरबाली के लिए उन्होंने एलिज़ाबेथ आइबर्स की कुछ कविताएँ भेजी हैं।

 एलिज़ाबेथ की कविताएँ कई खंडों में प्रकाशित हुई हैं।इनकी कविताओं में अफ्रीकी और डच भाषा का जो मेल है उसमें वहाँ की संस्कृति की झलक दिखाई देती हैं। 1915 में जन्मी एलिज़ाबेथ 1986 में डच नागरिक भी बनीं। अफ्रीका के अलावा इन्होने नीदरलैंड में भी प्रवास किया। इनकी कविताओं में अफ्रीका और नीदरलैंड के आम जनमानस के जीवन की झल है। ये कविताएँ जीवन के इतना क़रीब और सहज हैं कि  वैश्विक स्तर पर पढ़ी गई और अलग-अलग भाषाओं में अनूदित हुई। स्त्री-जीवन के विविध अनुभवों के अलावा एक प्रवासी की नज़र से देखी गई दुनिया भी इनकी कविताओं में दर्ज है।बतौर कवयित्री एलिज़ाबेथ को खूब सराहा भी गया और कई पुरस्कार भी प्राप्त हुए। अफ्रीका में जन्मी एक महिला के लिए लिखना ही बड़ी बात होती है वहां बतौर कवयित्री इस तरह से दर्ज होना और भी बड़ी बात है- अनुवादक 


Elisabeth Eybers


कवयित्री बतौर गृहिणी
हमेशा एक झाड़ू एक दीवार के

सहारे खड़ी पाई जाती है
कभी खाना आये भी
तो समय पर नहीं आता

बिना तारीखों के वो दिन

जिनमें वो इधर-उधर घूमती रहती है
ख़ाली,ज़िद्दी
और थोड़ी गड़बड़ाई सी

इस्त्री होने वाले कपड़े उदासी से

कुर्सी पर लटके रहते हैं
ये मुद्राएं ना जाने कहां से आती है

ढेर बन पड़ी हुई पुरानी चिठ्ठीयां
जिनके जवाब दिए जाने हैं 

कागज़, दवाइयां 
गहरे दराज़ में ठूंसे हुए हैं

शुक्रिया,कि वह तुम्हारे विशाल हृदय का

हिस्सा है
तब भी अभी भी अपनी छोटी खोपड़ी की सीमाओं के लिए समर्पित.

ओ क़ायदे के दोपाये(दो पैर वाले)

ध्यान दो
उसे अकेला छोड़ दो
उसे पढ़ने दो




प्रवासी

मेरे पास हाथ पैरों के सिवा कुछ भी नहीं है,
बाकी जो कुछ भी था, वो पारगमन में खो गया था
घबराया हुआ दिल,बेचैनी
लेकिन फिर, उनसे होगा क्या?

 तोलने के लिए, कि क्या खोया है, क्या आसपास है
रोशनी और आवाजों को समझने के लिए
हालाँकि इन्हें मैंने ना देखा या ना सुना
लेकिन मेरे चेहरे पर अब भी होश है।

और मेरी छाती और पेट की जगह पर
मुझे लगता है कि इनकी बजाय कुछ और ही था
उस जगह पर ।
किसे पता था, कि ख़ालीपन इतना भारी है
कि बेपर्दा होने का अंजाम ऐसी जकड़न है?



तर्क के लिये आख़िरी कोशिश

ख़ालीपन- जो कि एक आदमी के भीतर तक भर जाता है
जो धीरे-धीरे शुरू हुआ और आखिरकार लबालब भर गया है
फिर तेजी से एक ज़ख्म की शक्ल ले लेता है
और अक्सर एक झंझट बन जाता है

इसे छोटी-मोटी परेशानियों के साथ जोड़ना
वास्तव में एक जायज़ तर्क नहीं है
इससे पहले आप दिन-ब-दिन इसमें डूबते जा रहे थे.
अब कभी कभी पूरी तरह से
लगभग नाकारा

यहां तक कि आख़िर में भी
आप फ़ितरतन इसे टालते ही रहते हैं

रात में

हां, मैं अभी तक यहीं हूँ और शायद मुझे यहां से कभी ना जाना पड़े
तुम सोचते हो 
जब गहरी रात में चौंककर तुम उठ जाते हो.

जो तुम्हारे पीछे छूट जाएगा
वो ग़ायब नही हो जाएगा तुम्हारी निगरानी के बिना
रख लो जो रख सकते हो और बाक़ी जो बच जाए उसका खुद का जीवन होगा।

कभी पहुंच के भीतर, पर क्षय से अछूता

सुनहरे रंगों में गिरफ्त
हाल के दिनों से बचा हुआ।

तुमने वक्त के कटघरे से चौंकती हुई एक निगाह डाली
वहाँ, जहां वो सब जो ग़ायब हो चुका है जो गायब नही होना चाहता था, तुम्हारा इंतजार कर रहा है ।
और तुम खुद अनन्त की ओर
खिंचे जा रहे हो
वक्त दर वक्त
जब तुम गहरी रात में चौंक कर जाग जाते हो।



विरासत

मेरे पिता और मेरी माँ की तरह ही
मुझमे भी ऐसी ही जारी है जैसी उनकी रही
मेरे लंबे अंग जो पिता से मिले हैं
मेरे उलझे मोटे बाल, जो मुझे मेरी माँ से मिले हैं

पिता शांत और संशयमुक्त मनन करते रहते थे
इस दौरान कुछ भी,
चाहे कितना भी सम्मानीय हो
नही मिटा सकता था मेरी माँ की भेदती सी मुस्कान को
उन दोनों ने आपसी असमानताओं के बीच भी समझौते किये
और उनकी असहमतियों की आदतों
की पूरी क़ीमत चुकानी पड़ी मुझे

आख़िर, अब मेरे अस्सी के दशक में
मुझमें उन्हें बर्दाश्त करने की कुव्वत है

हर आदमी नष्ट हो जाता है
और निंदा करने वाला भी कोई नहीं रहता

सिर्फ: वे शायद ही कभी आराम करते हैं
और हर शय को अपनी तरह बनाने के लिये बेचैन रहते हैं

मुझे अहसास हुआ है कि इस तरह एक दूसरे के बगल में रहना
 दिन-ब-दिन थकाऊ होता जाता है

अनुवाद-  अनुराधा अनन्या