Sunday, September 13, 2020

भीड़ का न्याय न्याय नहीं लिंचिंग है

 

वह स्क्रीन पर रो-रोकर सम्वेदनाएँ जुटा सकती थी, जैसा कि मर्दवादी समाज कहता है औरतें झूठा आरोप लगाती हैं, रिया विक्टिम-कार्ड खेल सकती थी; लेकिन उसने मज़बूती से तमाम घिनौने आरोप झेले और जेल-जेल चिल्लाते समाज के जल्लाद चेहरे ने उसे भावशून्य कर दिया। उसे ड्रग्स के लिए जेल की हवा खिलाकर पत्नियों से शाम की महफिल में चखना और बर्फ मंगवाने वाले शायद संतुष्ट हों लेकिन यह वीभत्स प्रकरण इस देश की लड़कियों को कभी नहीं भूलना चाहिए। पढिए युवा साथी कशिश नेगी की एक टिप्प्णी। 

                                                                                                                                                                              - सम्पादक   


- कशिश नेगी 

 

भारतीय पत्रकारिता अभी अंतिम सांसे ले ही रही थी कि 14 जून 2020 को मशहूर अभिनेता सुशांत राजपूत की आत्महत्या के साथ साथ भारतीय मीडिया ने भी दम तोड़ दिया। सुशांत राजपूत के आत्महत्या डिप्रेशन के कारण बताई जाने लगी लेकिन धीरे धीरे इसकी दिशा कृति सेनन और अंकिता लोखंडे को कोसते हुए रिया चक्रवर्ती पर ठहर गयी। रिया चक्रवर्ती एक स्ट्रगल अभिनेत्री हैं जिन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत 2008 से टीवी के छोटे पर्दे एमटीवी से की। उन्होंने दक्षिण भारतीय फिल्म्स में भी काम किया। बाद में उन्होंने बॉलीवुड फिल्म में भी छोटे रोल किये, उन्होंने बतौर अभिनेत्री 4 बॉलीवुड फिल्मों में काम किया, 2018 में उन्होंने "जलेबी" फ़िल्म में लीड रोल किया। लेकिन उनका कैरियर सफलता न पा सका।



वे आम प्रेमी-जोड़े की तरह ही ख़ुश थे

सुशांत राजपूत और रिया चक्रवर्ती किसी पार्टी में मिले थे, वे जिम भी साथ ही जाते थे। दोनों को साथ साथ देखा जाता था, अन्य प्रेमी युगलों की भांति ही वे ख़ुश थे। सुशांत की आत्महत्या के बाद सोशल मीडिया में रिया पर सवाल उठने लगे। रिया का मीडिया ट्रायल होने लगा इन सब के बीच रिया की मुसीबत तब बढ़ गयी जब दिवंगत सुशांत के पिता ने पटना के राजीव नगर के थाने में रिया के खिलाफ एफआईआर कर दी। रिया पर 16 गम्भीर आरोप लगाए गए। सुशांत के डेबिट और क्रेडिट कार्ड यूज़ कर आर्थिक शोषण, मानसिक बीमारी का ओवर डोज़ देना, ब्लैकमेल करना और परिवार वालों से न मिलने देने, जैसे आरोप मुख्य हैं।

 

मीडिया का पितृसत्तात्मक चेहरा

अचानक ही सोशल मीडिया और मीडिया में बिना तथ्यों के अनर्गल आरोप रिया पर लगने लगे। मीडिया तो इसे काले जादू तक का एंगल दे कर लोगों में अंधविश्वास परोसने लगा। कुछ वक्त बाद केस में ड्रग्स का मुद्दा उछाला जाने लगा, रिया पर आरोप लगाए गए कि वो सुशांत को ड्रग्स देती थी।

मीडिया ने रिया के बहाने न सिर्फ  पितृसत्तात्मक मानसिकता, महिलाओं के प्रति दुर्भावनापूर्ण एवम पूर्वाग्रहों को मजबूत बनाने का मौका पा लिया बल्कि  सोशल मीडिया के माहौल को भी ज़हरीला बना दिया। जो सोशल मीडिया और मीडिया कुछ वक्त पहले तक डिप्रेशन पर बात कर संवेदनाएँ प्रकट कर रहा था वह अब ऐसे गिद्ध में परिवर्तित हो चुके थे जो एक ज़िंदा लडकी को नोच डालना चाहते थे। जो समाज, मीडिया मानसिक बीमारी की बड़ी बड़ी बातें कर रहा था वो एक अकेली लड़की को मानसिक प्रताड़ित करने में को कमी नहीं छोड़ रहा।

 

रिया को निशाना बना पितृसत्ता के कई पूर्वाग्रहों को हवा दी जा रही है। "लड़कियां लड़कों को पैसों के लिए फंसाती है", "लड़कियां, लड़कों को घरवालों से अलग कर देती है", " लड़कियां सिर्फ अमीर लड़कों से रिलेशन में रहती है", "लड़कियां पैसों के लिए धोखा देती है", "लड़कियां लड़कों को दबा कर रखती हैं" जैसे अनेकों पुरुषसत्तात्मक जुमलों को मजबूत करने का कार्य मीडिया कर रही है। रिया सुशांत केस के बाद महिलाओं पर जोक्स की जैसे बाढ़ ही आ गयी। मधु किश्वर ने रिया (और उन जैसी लड़कियों) को Sex bait  कहा।

 

पुरुषवादी समाज के लिए महिलाएं सॉफ्ट टारगेट रही हैं

मीडिया, सोशल मीडिया और समाज का लैंगिक भेदभाव स्पष्ट नज़र आता है, 25 साल की जिया खान के खुदकुशी करने पर कोई बवाल नहीं हुआ यहां तक कि जिया की मां ने सूरज पंचोली पर खुले आम शक जताया लेकिन कोई खास कार्रवाई नहीं। श्री देवी की आकस्मिक मृत्यु पर भी दाह संस्कार के बाद विराम लग लग गया। 1999 में रेखा को भी ऐसा ही दंश सहना पड़ा जब उनके पति मुकेश अग्रवाल ने उन्हीं के दुप्पटे से फांसी लगाई थी, वो दुपट्टा रेखा का ही था? आज तक साबित नहीं हुआ। लेकिन पुरुषसत्तात्मक समाज उस वक़्त भी रेखा जी को दोषी मान चुका था। मीडिया ट्रायल से दुःखी रेखा जी ने टाइम्स ऑफ इंडिया को इंटरव्यू देने के प्रस्ताव को विनम्रता से ठुकरा दिया। अंत मे उन्होंने किसी विश्वसनीय पत्रकार से बात कर सिर्फ इतना कहा, "मैंने मुकेश को नहीं मारा"

 

बलात्कारों पर खून क्यों नहीं खौलता ?

पुरुषवादी समाज के लिए महिलाएं सॉफ्ट टारगेट रही हैं। आये दिन हो रहे सैंकड़ों बलात्कार और महिलाओं पर हो रही हिंसा पर हमारे समाज का खून नहीं खौलता। बलात्कार पीड़िता और उसके परिवार को जान से मार देने पर भी किसी को फर्क नहीं पड़ता। इन पीड़िताओं के लिए किसी को न्याय नहीं चाहिए। पुरुषसत्ता समाज को क्यों लगता है कि जब कोई आदमी सुसाइड करता है तो उसका कारण उसकी पत्नी या प्रेमिका ही होती है जबकि जब कोई औरत आत्महत्या करती है तब ये धारणा ही बदल जाती है। वैसे भी डायन, चुड़ैल, मनहूस और पति को खाने वाली कुलक्षिणी की उपाधियां सिर्फ और सिर्फ औरत को ही मिली है, पुरुषों को नहीं। डायन और चुड़ैल के नाम पर सिर्फ महिलाओं पर ही हमले होते हैं और उन्हें ज़िंदा तक जलाया जाता है।

 

पॉपुलर न्याय ? 

रिया पर अभी तक कोई आरोप सिद्ध नहीं हुए लेकिन उसे ड्रग्स के मामले में गिरफ्तार कर लिया गया है। अगर ड्रग्स मामले में कायदे और ईमानदारी से गिरफ्तारी की जाए तो आधा हिंदुस्तान शायद जेल में दिखे। जो समाज बॉलीवुड के संजय दत्त और रणवीर कपूर के ड्रग्स आरोपों को आसानी से भुला देता है वही समाज रिया के मामले में न्याय चाहता है।

मीडिया ट्रायल से तंग आ कर रिया ने एक वीडियो जारी किया जिसमें उन्होंने कहा, "मुझे देश के न्यायतंत्र पर भरोसा है" जिस पर विपक्ष के वकील विकास सिंह का बयान आया कि जो सलवार कमीज रिया ने वीडियो में पहनी है, शायद पहले कभी न पहनी हो। रिया खुद को आम महिला दिखाने की कोशिश कर रही है। वकील विकास सिंह का ये बयान पूर्णतया पितृसत्ता मानसिकता से लबालब था। वे लोगों का ध्यान रिया के परिधान की ओर आकृष्ट करना चाहते थे। वे केस को पितृसत्तात्मक तरीके से मजबूत करते दिख रहे थे।

 

 रिया अभी दोषी साबित नहीं हुई, मीडिया को तथ्यों पर रिपोर्टिंग करनी चाहिए न कि कल्पनाओं पर। रिया दोषी है या नहीं ये तय करना न्यायालय का कार्य है, आपका, हमारा, किसी मीडिया या सोशल मीडिया पर बैठे पोस्टकर्ता का कार्य नहीं। न्याय-पालिका हो ही काम करने दीजिए। भीड़ का न्याय न्याय नहीं लिंचिंग है।

 

लेखिका हिंदी में, दलित साहित्य में एम ए हैं और फिलहाल सी बी एस एस ई में कम्प्यूटर असिसटेंट हैं। चोखेरबाली पर उनका यह पहला लेख है।  

2 comments:

पुनीता सिंह said...

बिल्कुल सही । अकेला इस केस पर मिडिया ने लगभग तीन महिनों तक सनसनी बनाए रखी। इसमें गौर तलब बात यह है कि तमाम शिक्षित वर्ग भी सुशांत से दया भाव दिखाते हुए रिया को बड़ी आसानी से गुनहगार साबित करने की कोशिश की । प्रेमिका और लिव इन रिलेशनशिप से हमारे समाज को हमेशा चुनौती मिलती है। यह पितृ सत्तात्मक समाज यह मानना नहीं चाहता कि उसकी सन्तान उससे पुछे बगैर कोई काम करे और प्यार तो उसे करने का अधिकार ही नहीं है। चलो एक बार प्रेम कर भी लिया तो शादी करके उसपर लगाम लगाकर रखो । यह लिव इन रिलेशन क्यों ? नजर में अब लद्कियों के लिए यह घटना सबक सिखाने के रूप में भी है और एक सोची समझी साजिश के तहत ही इसे इतना लम्बा खींचा गया।

Seema Mann said...

बेहद अच्छे शब्दों में कशिश अपने बात सामने रखी। जब बात सुशांत को मानसिक तनाव देने की थी तो हर किसी को शक के घेरे मे लिया गया। लेकिन वो ही मीडिया और समाज रिया को मानसिक तनाव देने में कोई कसर नी छोड़ रहा। ये समाज हम औरतों के लिए कितना सुरक्षित है ये इस केस से अच्छे से पता चल रहा है। एक आदमी की मानसिक प्रताड़ना का सोचना भी पाप है वहीं औरत को तनाव देकर उसको मरने पे मजबुर करना भी कोई बड़ी बात नहीं है। सुशांत को कुछ मूवी कम मिली पे वो सुसाइड कर सकता था पर जो रिया के साथ हो रहा है लोगो को वो समझ नहीं आ रहा कि उसका तो पुरा कैरियर खराब कर दिया है। वो कल को कानून की नज़रों में निर्दोष साबित हो भी जाए तो भी उसको अब कोई काम नही देगा।। अगर अब वो सुसाइड कर ले तो उसका जिम्मेदार कौन होगा?

हो सकता है इस बात को कोई value ही ना दे। अपने बहुत सही पहचाना है इस पुरुषवादी मानसिकता के समाज को।
आप लिखती रहना, आपके लेखन का इंतजार रहेगा।

धन्यवाद

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