Thursday, February 7, 2008

स्वप्नदर्शी और शास्त्री फिलिप जी के बहाने कुछ अहम बातें

स्वप्नदर्शी जी ने रचना जी की सुबह की पोस्ट पर पूछा है -ज़रा चोखेर बाली का मतलब समझाइए । उनके और सबके लिए ।चोखेर बाली का मतलब है -"आँख की किरकिरी" या आँखों को खटकने वाली । रविन्द्रनाथ टैगोर के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित फिल्म 'चोखेर बाली'में बिनोदिनी [जिसकी भूमिका ऐश्वर्य राय ने निभाई थी] नाम की स्त्री पात्र है जो शादी के एक साल में ही विधवा हो जाती है पति के सामीप्य का सुख भोगे बिना । जीवन की छोटी छोटी खुशियों और सुखों से महरूम कर दी गयी बिनोदिनी समाज की आँखों मे खटकने वाली किरकिरी बन जाती है । अपनी सहेली के पति को अपनी विद्वता से आकर्षित कर वह स्त्री की यौन ज़रूरतों की और चाहतों की पहली अभिव्यक्ति है बन जाती है । आज भी समाज जहाँ ,जिस रूप में उपस्थित है - स्त्री किसी न किसी रूप में उसकी आँखों को निरंतर खटकती है जब वह अपनी ख्वाहिशों को अभिव्यक्त करती है ; जब जब वह अपनी ज़िन्दगी अपने मुताबिक जीना चाह्ती है , जब जब वह लीक से हटती है । जब तक धूल पाँवों के नीचे है स्तुत्य है , जब उडने लगे , आँधी बन जाए ,आँख में गिर जाए तो बेचैन करती है । उसे आँख से निकाल बाहर् करना चाहता है आदमी ।
दूसरी बात शास्त्री जी के बहाने बाकि पुरुष ब्लॉगरों से । वे कल रचना की पोस्ट देखते हुए यहाँ आये । अच्छा लगा । आते रहें ।उनकी टिप्पणी है -
Shastri said...
यह चिट्ठा आज ही मेरी नजर में आया. यहां हमारे चिट्ठालोक के स्त्रीरत्न कई बातें कहने की कोशिश कर रही हैं. नियमित रूप से पढूंगा. देखते हैं कि कुल मिला कर आप लोग क्या कहना चाहते हैं.

शुभकामनाये !!
यह 'आप लोग 'कुछ सकारात्मक टोन नही देता । मै सोचने पर विवश हुई कि कहीं इस ब्लॉग से ही यह ध्वनि तो नही जाती कि यहाँ खूंटा हमने गाडा है । यहाँ "us" और "them" वाला भाव नही है । कुछ बातें और समस्याएँ हैं जिन्हें पुरुष कभी एड्रेस नही करना चाहते । बस प्रोवोक करना है सम्वाद स्थापित करने के लिए ।बात हमारी ज़रूर है पर कहिये आप भी ।क्योंकि आप लोगो के बिना भी तो संसार पूरा नही बनता । मंशा साथ की ही है। इस विषय पर कई बार अपने ब्लॉग पर लिखा है --"स्त्री की लडाई ,दर असल , पुरुष से नही पितृसत्ता से है जिसका समान रूप से शिकार पुरुष भी है ;इसलिए स्त्री की मुक्ति या लडाई पुरुष की भी मुक्ति और लडाई है ।लेकिन अफसोस यह है कि इस् मुद्दे पर स्त्री व पुरुष एक दूसरे को प्रतिद्वन्द्वी मानते हैं और सारी ऊर्जा अवास्तविक शत्रु से जूझने में निबट जाती है ।मायने यूँ समझिए कि, जब एक स्त्री अपनी पारम्परिक भूमिकाओं से निकल कर मनचीता करना चाहती है तो उसका रास्ता रोकने वालों में पितृसत्ता के चौकीदार पुरुष ही बाधा नही बनते बल्कि इसी व्यवस्था में रची-पगी स्त्रियाँ भी उतनी ही बाधक बनती हैं ।"

साथ साथ इस मुद्दे पर सोचें । बात सिर्फ यह है कि पुरुष का जिन समस्याओं से सीधा सरोकार नही पडता और जो उसका नुकसान नही करते उन्हें वह अनदेखा कर जाता है । इसलिए जैसा कि बेजी की स्त्री मुद्दों को निबटाने की शिकायत पर प्रमोद जी ने कहा था कि
"और यहां बात के खत्‍म होने जैसी कोई बात नहीं है, लोग थोड़ा इधर-उधर ठंडा, सुस्‍ता रहे हैं.. यह आपलोगों की दुनिया (और उस दुनिया के अंदर का भी भारी आंतरिक कन्‍फ़्यूज़न) है तो आपका ज़्यादा फर्ज़ बनता है कि इस मसले की आंच और आग जिलाये रखें.. "

हमारा ज़्यादा फर्ज़ बनता है । ज़ाहिर है । बस इसलिए एक शुरुआत है । ताकि बहसें जारी रहें , विमर्श होते रहें , मुद्दे निबटाए न जाएँ ।प्रत्यक्षा वहाँ लिखती हैं--" इस विषय पर लगातार डायलॉग चलते रहना चाहिये । अगर किसी को एक बार भी सोचने और इंट्रोस्पेक्शन पर मजबूर कर पाये ..इतनी सार्थकता ला पाये तो सही ।बावज़ूद इसके किसी के पारिवारिक जीवन में कैसा और क्यों हस्तक्षेप ।
बेजी , बहस कोई खत्म नहीं हुई और शायद ओवर्टली और पब्लिकली न भी दिखे , लोगों के जीवन में हर दिन किसी न किसी रूप में ऐसे मुद्दे सर उठाते हैं । ज़रूरत है उसे कुछ मायनों में संतुलित तरीके से सामने लाते रहने की । कुछ कुछ रिले रेस जैसा ..पासिंग द बैटन । और ऐसी कवायदों को हल्के तौर पर महिला मुक्ति संगठन के नाम से ब्रैंड करके उसकी अहमियत खत्म करने की कोशिश अगर स्त्रियाँ ही करें तो उनके पुरुषों से आप कैसी और कितनी उम्मीद रखती हैं ? ये मुद्दे व्यक्तिगत मुद्दे नहीं "
अगर अब तक स्त्री ने व्यक्तिगत अनुभवों को प्रकट किया होता तो समाज शायद उसे बेहतर तरीके से समझ सकता था । उसने मुँह खोला नही । किसी ने समझा नही । बोलेंगे तो सुने समझे जाएंगे । आप अपने अनुभव कहिये । स्वागत है ।
कल सुबह रचना की पोस्ट पर श्रीमान 'मेराचिट्ठा'ने यहाँ लिखने की मंशा ज़ाहिर की थी ,सो उन्हें मेल भेज दिया गया है ।
चोखेर बाली ब्लॉग जगत के आँख की किरकिरी तो नही है न ! तो सम्वेदनशीलता और साथ दीजिये न कि यह कि "हम तो दूर बैठ तमाशा देखेंगे । देखें आप लोगों के विचारों से क्या तस्वीर बनती है ? पता तो चले आप लोग चाह्ती क्या हैं ?"

11 comments:

Anonymous said...

सही कहा है सुजाता आपने , बिना बोले कुछ नहीं होता , चीख को दफ़न करने मे माहिर इस समाज मे अब सब को ढोल बजाना होगा । दूसरी दुनिया की नहीं हमारी citizenship इस ही दुनिया की है . लाइन नहीं दूसरी अब लगानी हैं . हाथ से हाथ जुड़ता जाये करवा आगे ही बढेगा ।

Mohinder56 said...

यह व्लाग आज ही मेरी नजर में आया.. अब यहां आना जान लगा रहेगा.....

न जाने महिलाओं को क्यों ऐसा लगता है कि समाज में सिर्फ़ उन्हीं का उत्पीडन हो रहा है और इसके विरुद्ध आवाज उठानी चाहिये.. जबकि स्थिति यह है कि हर कमजोर व्यक्ति का उत्पीडन हो रहा है और हम सब को मिल कर इसके विरुद्ध काम करना है.

विनीत कुमार said...

sujata aur chokherwali ki toli,yae sahi kiya aapne, apni baat apni aawaaz me. nahi to hum purush istriyo ke maamle me jo soft bante firte hai ussue raahat milegi aur hame samajne ka mauka ki kaise hum chah kar bhi istri abhiwyakti me anubhuti ki pramanikta stapit nahi kar paate. badhai

गिरिराज जोशी said...

मोहिन्दरजी से सहमत हूँ... आवाज़ हर कमजोर व्यक्ति के ख़िलाफ़ उठनी चाहिये... हर कलमकार की नैतिक जिम्मेदारी भी होनी चाहिये... चुप बैठकर सहने की बज़ाय मुकाबला करना चाहिये... मात्र नारी की थीम से बाहर निकलकर प्रत्येक वर्ग को शामिल कीजिये...

मसिजीवी said...

हे हे गिरिराज मित्र तो मोहिन्‍दरजी से 'सहमत' होने के जोश में कमजोर व्‍यक्ति के खिलाफ ही आवाज उठाने लगे :)

चोखेरबाली के लिए शुभकामनाएं, उम्‍मीद है कि बेटियों (के बापों) का ब्‍लॉग से पैदा विसंगति दूर करने में मदद मिलेगी इस प्रयास से।

स्वप्नदर्शी said...

धन्यवाद, मतलब बताने के लिये. उत्पीडन के खिलाफ आवाज उठाने के अलावा भी और बहुत कुछ यहा मिलेगा. एक दूसरी द्रिस्टी. हम ये दावा नही करते कि हम पुरुषो से बढ्कर है, और ये भी नही कहते कि कमतर है, बस हमारा दुनिया को देखने समझने का तरीका अलग है, और नैतिकता का मानदंड भी जुदा है.

सुन्दर-सलोने रिश्तो के बन्द कमरो से ज्यादा हमे, तपती हुई दोपहर मे खुली सडके, खुला आकाश, और साफ हवा पसन्द है.
बहन, बेटी, और पत्नी के सम्बन्ध हमारे लिये मह्त्त्वपूर्ण है, पर सिर्फ घर के भीतर, व्र्हतर समाज मे हमे वही सम्बन्ध स्वीकार है, जो मानवीय गरिमा पर आधारित हो.

स्वप्नदर्शी said...

घर के भीतर भी और बाहर भी हम अपनी और दूसरो की गरिमा को लेकर सचेत है.

dilip uttam said...

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Unknown said...

पिछले कुछ दिनों में कुछ नई बातें पता लगीं हिन्दी ब्लाग्स के बारे मैं. शुरुआत चोखेर वाली से हुई. यह एक सराहनीय प्रयास है. जब पहली बार यह नाम देखा तो मन ने पूंछा इस के मायने क्या हैं? आज यह भी पता चल गया. अपनी इगो में पुरूष इतना उलझ गया है की नारी को आँख की किरकिरी मानता है. ईश्वर ने पुरूष को अधूरा बनाया है. वह पूरा तब होता है जब उसे नारी का साथ मिलता है. स्वयम को पूरा करने वाली नारी को यदि पुरूष चोखेर वाली मानता है तो इसे उस की मूर्खता ही कहा जा सकता है. नारी पुरूष की आँख की किरकिरी नहीं है, वह पुरूष की सम्पूणॅता है.

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

--"स्त्री की लड़ाई ,दरअसल , पुरुष से नही पितृसत्ता से है जिसका समान रूप से शिकार पुरुष भी है; इसलिए स्त्री की मुक्ति या लड़ाई पुरुष की भी मुक्ति और लड़ाई है। अफसोस यह है कि इस मुद्दे पर स्त्री व पुरुष एक दूसरे को प्रतिद्वन्द्वी मानते हैं और सारी ऊर्जा अवास्तविक शत्रु से जूझने में निबट जाती है। मायने यूँ समझिए कि जब एक स्त्री अपनी पारम्परिक भूमिकाओं से निकलकर मनचीता करना चाहती है तो उसका रास्ता रोकने वालों में पितृसत्ता के चौकीदार पुरुष ही बाधा नहीं बनते बल्कि इसी व्यवस्था में रची-पगी स्त्रियाँ भी उतनी ही बाधक बनती हैं।"

सुजाता जी, बढ़िया समझ और एकदम सटीक विश्लेषण. अफ़सोस कि यह उदारतापूर्ण और वा-जहनी बात कई स्त्रियाँ भी नहीं समझतीं, पुरुषों की तो ख़ैर बात ही क्या करनी!

seema gupta said...

"oh so nice to read it,wonderful"

Regards

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