Thursday, December 17, 2009

एक पुरातन आखेट-कथा

(नए वक्त की एक घटना को याद करते)

तुम्हारे नीचे पूरी धरती बिछी थी
जिसे तुमने रौंदा
वह सिर्फ़ स्त्री नहीं थी
एक समूचा संसार था फूलों और तितलियों से भरा
रिश्तों और संभावनाओं से सजा

जो घुट गयी तुम्हारे हाथों तले
सिर्फ़ एक चीख़ नहीं थी
आर्तनाद था
समूची सृष्टि का

हर बार जो उघड़ा परत दर परत
सिर्फ शरीर नहीं था
इतिहास था
शरीर मात्र का

जिसे तुमने छोड़ा
जाते हुए वापस अपने अभियान से
ज़मीन पर
घास के खुले हुए गट्ठर -सा
उसकी जु़बान पर तुम्हारे थूक का नहीं
उससे उफनती घृणा का स्वाद था

वही स्वाद है
अब मेरी भी ज़ुबान पर !

(ये एक पुरानी कविता है - ९६ के ज़माने की !)

5 comments:

अन्तर सोहिल said...

कारुणिक कविता

प्रणाम स्वीकार करें

आलीन said...

ek stri ke pure vajud ko torane, khatm karne ke prayasoN se jude ahasasoN ki hai ye kavita.
Bahut marmsparshi.

प्रज्ञा पांडेय said...

shireesh ji aapki post par nigaah ruk jaati hai .. aapki pasand ki daad dete hain hum .. bahut sunder kavita padhaayi aapne . dhanyvaad

Bhawna 'SATHI' said...

en sunder bhavo ke liye dhnyabad shireesh ji.

विभा रानी श्रीवास्तव said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 09 नवम्बर 2019 को लिंक की जाएगी ....
http://halchalwith5links.blogspot.in
पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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