Wednesday, August 31, 2011

जन्नत लुटाता एक दोजख

गायत्री आर्य
(जे.एन.यू. में शोधार्थी व स्वतंत्र पत्रकार )

काफी समय पहले आलोचक-लेखक विजयमोहन सिंह का एक रोचक आलेख पढ़ने को मिला था। लेकिन उस लेख में जिस 'जन्नत' के बारे में पढ़ा था आज भी खून खौलाती है। इस लेख में उन्होंने अमेरिकी लोगों और समाज का चित्र बड़ी सहज भाषा में उकेरा था। इसी में एक जगह अमेरिका के मशहूर शहर लास वेगाास का जिक्र आया है जो कि दुनिया भर में अपने जुआघरों के लिए मशहूर है । लास वेगास से जुड़े एक प्रसंग को उन्होंने इस लेख में दर्ज किया था। मैं उस पूरे पैर को कोट करने से खुद को रोक नहीं पा रहीं हूं -''कुछ बाद में पता चला कि अनेक सेवानिवृत्त पिता, पुत्रों से विशेष अनुरोध करके लास वेगाास जरूर जाते हैं और वहां से विभोर और कृत-कृत होकर लौटते हैं। मेरे बेटे ने बताया कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के ऐसे ही एक पिताश्री को उनके 'श्रवण कुमार' लास वेगास घुमाकर लाए तो उन्होंने भारत लौटकर अपने हमउम्र निश्तेदारों से कहा : 'भार्इसाहब स्वर्ग अगर कहीं है तो वहीं है, अब क्या बताएं आप से, प्राय: निर्वस्त्र बालाएं ठुमकती हुर्इ आकर सुरापान कराती हैं और गाल-वाल थपथपा जाती हैं। कुछ धर्मग्रंथों में स्वर्ग के बारे में भी यही सब लिखा है न तो स्वर्ग और क्या होगा ?''
इस पैरे को पढ़कर काफी देर तक 'पिताश्री का स्वर्ग' मरे जहन में घूमता रहा... कितना अच्छा हुआ कि एक भारतीय पिता की स्वर्ग संबंधी कल्पना मुझेहमें इतनी सहजता से पढ़ने को मिली। जाहिर है अपवादी पिता (पुरुष) इस स्वर्ग से दूर ही रहते हैं और मैं उनकी बात कर भी नहीं रही। मै विश्वास से कह सकती हेंू कि लास वेगास से लौटे इन पिता को सड़क या पार्क में एक-दूसरे का हाथ पकड़ चलते या चूमते हुए युवक-युवतियां हमेशा ही से नागवार गुजरे होंगे। हर बार उन्होंने इस सबके लिए पशिचमी सभ्यता को दोषी ठहराया होगा और गाली भी दी होगी। खैर, ये हमारे दादाओं , पिताओं, पतियों, दोस्तों, भाइयों और बेटों की जन्नत है। जिसके बारे में या तो अक्सर खुलकर स्वीकारा नहीं जाता या फिर पुरुषों की महफिलों में ही इस जन्नत का जिक्र छिड़ता होगा। जो लोग लास वेगाास जाना अफोर्ड नहीं कर सकते वे पोर्न साइट, एम.एम.एस, पोर्न फिल्मों और थोड़ा बहुत रेड लाइट एरिया के कोठों पर इस जन्नत का मजा लेते हैं। तकनीक ने कर्इं माध्यमों ने पुरुषों के लिए इस जन्नत को बेहद सस्ता, सुलभ और टिकाऊ बनाया है। हमारी फिल्में, विज्ञापन, पोस्टर, अखबार, और पत्रिकाएं हर पल, हर क्षण पूरे समाज के माहैल को 'स्वर्गमय' बनाने में जुटे हुए हैं। और काफी हद तक वे अपनी इस मेहनत में सफल भी हो रहे हैं। हर तरफ निर्वस्त्र या लगभग निर्ववस्त्री बालाएं समय, बाजार (और पितृसत्ता की भी) मांग के मुताबिक इस देश-दुिनया को स्वर्गमय बनाने में अपना कीमती सहयोग दे रही हैं।
हम माने या ना माने लेकिन इस 'स्वर्गानुभूति' के कारण ही हमें (स्त्री को) दुनिया की, कायनात की 'सबसे खूबसूरत वस्तु' कहा और प्रचारित किया जाता है। हमारा मातृत्व, हमारी रचनात्मकता, हमारा प्रबंधन, हमारा दिन-रात का अदृश्य श्रम हमें सुंदरतम कहलवाने में शामिल नहीं है।
लेकिन पुरुषों के लिए इस स्वर्ग को रचने में हम सित्रयांलड़कियांबचिचयां किस दोजख से गुजरती हैं इसकी खबर कौन लेना चाहेगा भला ? छेड़खानी, बदतमीजी, अश्लीलता, बलात्कार, शारीरिक-मानसिक हिंसा, और असितत्वहीनता से भरे दोजख में कैसे हम जिंदा हैं इसकी किसे पड़ी है ? फिर भी सुनिए तो सही, आपकी शर्मिंदगी की हमेें उम्मीद नहीं....क्योंकि शर्मिंदगी के साथ जन्नत नहीं पनप सकती। लेकिन जिस चीज को बाजार का वरदहस्त प्राप्त हो वह तो कब्र से भी जीवित लौट सकती है। औरतें बाजार को अपने जीवन के पक्ष में पूरी तरह खड़ा भी नहीं कर सकी... कि पुरुषों ने बाजार को अपने स्वर्ग के हक में खड़ा कर लिया....! सच में कुछ चीजों में अभी भी सित्रयां पुरुषों की बराबरी नहीं कर सकी। ठीक है कि हमारे यहां लास वेगास नहीं है। लेकिन आधी आबादी की जरुरत के मददेनजर हमारे यहां 'छोटे-बड़े लास वेगास' तो हैं ही, जिन्हें हम नफीस भाषा में रेड लाइट एरिया कहते हैं। 'कोठे' और 'वेश्या' शब्द बोलने में तो हमें अपनी जबान के गंदा होने का अहसास होता है लेकिन उन में रह रही वेश्याएं हमारी मूलभूत जरुरतों में शामिल हैं....! ऐसे ही हैं हम....पर ऐसे कैसे हैं हम....?
सेंटर फार सोशल रिसर्च की निदेशक डा0 रंजना के अनुसार देश में लगभग 30 लाख से ज्यादा महिलाएं और लड़कियां अपनी इच्छा के खिलाफ देह व्यापार का काम कर रही है।...और हर साल लगभग दो लाख से ज्यादा लड़कियोंसित्रयों को जबरन या धोखे से इस धंधे में उतार दिया जाता है। पुरुषांें के इस स्वर्ग के लड़कियों की तस्करी भी होती है जिसमें लगभग 60 प्रतिशत की उम्र 18 साल से कम होती है ! सिर्फ कुछ लड़कियों और सित्रयों के दोजखमय जीवन से यदि करोड़ों लोगों को स्वर्ग और जन्नत नसीब होती हो तो क्या हमें इस दोजख को स्वीकार करते नहीं चले जाना चाहिए ? 'सर्वजन सुखाय' ना सही अधिकांश के सुख के लिए तो हमें अपनी आहूति देनी ही चाहिए...........नहीं ?



8 comments:

Dr Varsha Singh said...

NICE....

आर. अनुराधा said...

पढ़ कर बुत सारे विचार एक साथ मन में आ रहे हैं। पर सबसे पहले तो यह-
कहीं पढ़ा था कि वेश्याएं अपना शरीर किराए पर देती हैं, जैसे कोई मकान या कमरा देता है। शरीर के किराए से उस महिला की जीविका चलती है, तो क्या गलत है।


गलत है। मकान निर्जीव है, पर शरीर के भीतर जीवन है, सोच है, दर्द है, इच्छाएं हैं। कोई कितना भी मन बना ले शरीर को इच्छा के खिलाफ संबंध बनाने के लिए तैयार नहीं कर पाता। ऐसे में जो संबंध बनता है, वह जबर्दस्ती है, बलात्कार है- चाहे व्यवसाय के लिए हो या संबंधों में हो।

SM said...

interesting read
India got the problems, and there is difference between forceful and willingly.

raj said...

विचारोत्तेजक लेख है.सही कहा आपने कि शर्मिंदगी के साथ ज़न्नत नही पनप सकती और इस तथाकथित ज़न्नत की लज़्जत कुछ ऐसी है कि तमाम नैतिकता, मानव मूल्यों और शर्मिंदगी पर भारी पड़ जाती है. यह दोहरापन(दोगलापन) हमारी और खासकर पुरुष की बपौती है(पुरुष प्रधान समाज मे'बपौती' ही प्रचलिथै,यहां भी मां को कोई स्थान नही)
खैर, धीरे -धीरे ही सही, नारी जागरण को तमाम गरियाने और उसे बेशर्मी घोषित करने के बाद भी चुप्पी टूट रही है और इसमे इस प्रकार के लेखों का भी योगदान है.
राज नारायण

sajju mail said...

Gayatri ne hamesha ki tarah achcha likha hai, chubhta hai uar chubhna chahiye bhi.
sudhir kumar

Rajeysha said...

Yahi saari haqiqat nahi... bada mushkil hota hai jabardasti aur marzi ke beech ka rishta samajhna..
इसे चिराग क्यों कहते हो?

raj said...

राजे_शा जी,
आपकी टिप्पणी से यह(कम से कम मुझे तो)इस पोस्ट से टिप्पणी का तादात्म्य जोड़ पाने मे दिक्कत हो रही है. क्या आपकी टिप्पणी इसी पोस्ट के क्रम मे है? दूसरे किसे चिराग कहते हैं, यह भी समझ नही पाया कि किस सन्दर्भ मे कहा है? चिराग का किसी प्रतीक के रूप मे भी इस पोस्ट मे ज़िक्र नही है.
राज नारायण

poornendra pandey said...

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